शिक्षा की अनोखी अवधारणा : मॉन्टेसरी स्कूल
मीनू मंजरी
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रंग.विवरंगी मेज'कुर्सिया, खिलौनों से भरी अलमारी, समूहों में बैठे अपने काम में र्मग्न बच्चे यह द़श्य पारंपारकि पाछशाला से काफी भिन्न है ा पर दुनिया भर से मॅान्टेसरी स्कूलों की सफलता ने शिक्षा की इस अवधारणा को मान्य बनाया हैा
प्रसिद्ध इतावली शिक्षाशास्त्री और मनोवेत्ता मारिया मॉन्टेसरी; अगस्त 31, 1870–मई 6, 1952 , ने इस प्रणाली का आरंभ सर्वप्रथम मंदबुद्धि बच्चों की शिक्षा के लिए किया था। मारिया यूनिवर्सिटी ऑव रोम, ला सेपियांजा मेडिकल स्कूल से स्नातक होने वाली प्रथम महिला थी। मारिया विश्वविद्यालय के मनोचिकित्सा क्लीनिक की सदस्या थी। 1898 में टोरीनो में हुए शिक्षा सम्मेलन में उन्होंने मानसिक रूप से कमजोर व्यक्तियों के प्रशिक्षण पर लेक्चर दिया था। इटली के शिक्षा मंत्री इस लेक्चर से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मारिया को स्कूओला ओर्तोप्रफेनिका, मंदबुद्धि बच्चों की शिक्षा के लिए संस्थान, का निदेशक बना दिया। मारिया ने ÷न पढ़ाए जा सकने योग्य' करार दिए गए इन बच्चों को न केवल पढ़ाया, बल्कि उनमें से आठ वर्षीय कई बच्चों ने तो राज्य की लेखन और पाठ परीक्षा में सामान्य बच्चों से अधिक अंक लाया। इस सफलता को ÷द मॉन्टेसरी मिरैकल' नाम दिया गया।
बाद में मारिया अपनी प्रणाली को सामान्य बच्चों की शिक्षा के लिए भी उपयोग में लायीं।
मॉन्टेसरी प्रणाली में बच्चों को एक भिन्न व्यक्तित्व की तरह देखा जाता है और उनकी सीखने की नैसर्गिक क्षमता को विकसित होने का मौका दिया जाता है। इस प्रणाली की कुछ खास बातें इस प्रकार हैं :
1. बच्चे सक्षम व्यक्तित्व हैं, अतः निर्णय ले सकते हैं।
2. बच्चों की शिक्षा आयु-समूहों के अनुसार निर्धारित की गई–0-3, 3-6, 6-9 और 9-12 वर्ष।
3. हालांकि यह प्रणाली आरंभ में कम उम्र वाले बच्चों के लिए ही थी, पर बाद में मारिया ने किशोरवय बच्चों के लिए अर्डकिंडर; चिल्ड्रेन ऑव द वर्ल्ड नाम का कार्यक्रम भी इसमें शामिल किया।
4. कक्षा के वातावरण में शैक्षणिक सामग्री का समावेश जिससे बच्चे पाठ्यक्रम की वस्तुएँ सीख सके।
5. विकास के ÷सेंसिटिव पीरियड्स' के लिए एक मानक बनाना। जैसे कि–भाषा सीखने के लिए, सामाजिक व्यवहार, गणित इत्यादि के लिए। इस ज्ञान के लिए बच्चे के ÷मस्तिष्क' की क्षमता पर विश्वास किया गया। यही कारण है कि मॉन्टेसरी प्रणाली में शिक्षक एक ÷निर्देशक' न होकर ÷निरीक्षक' की तरह कार्य करते हैं।
पूरी दुनिया में मॉन्टेसरी प्रणाली को ÷बचपन की खोज' की तरह माना गया।
अमेरिका में तो मॉन्टेसरी स्कूलों को वित्तीय सहायता देने वालों में अलेक्जेंडर ग्राहम बेल और टॉमस एडीसन जैसे नाम शामिल थे।
मॉन्टेसरी प्रणाली तीन वर्षीय है। पहले दोनों वर्षों में व्यवहारिक ज्ञान पर जोर दिया जाता है। इसके लिए क्लासरूम में ऐसी शिक्षण सामग्री रखी जाती है, जिसमें बच्चे की रुचि हो और वह स्वयं कुछ सीख सके। इसमें पांचों इंद्रियों के उपयोग, गति, स्थान इत्यादि का ज्ञान और ठोस, मूर्त्त शिक्षण को प्राथमिकता दी जाती है। जैसे कि–पहली कक्षा में किए गए रंगीन क्यूब्स के खेल द्वारा बाद में (a+b3 = a3 + 3a2b + 3ab2 + b2) का फॉर्मूला सिखाया जा सकता है। तीसरे वर्ष तक आते-आते सभी भिन्न-भिन्न सीखी गई चीजें समन्वित होने लगती हैं जिसे ÷एक्सप्लोजन इनटू लर्निंग' नाम दिया गया है।
इस समय तक बच्चे लगभग पाँच वर्ष के होते हैं। पिछले दोनों वर्षों में अवशोषित किया गया ज्ञान अब व्यावहारिक रूप में दिखाई देने लगता है। बच्चे पढ़ने-लिखने, गणित बनाने लगते हैं और दूसरे बौद्धिक तथा भावनात्मक विकास दर्शाते हैं। जो बच्चे इस वर्ष तक ये सभी क्रियाएँ नहीं कर पाते, वे कक्षा–एक तक यह सीख लेते हैं। और इसमें किसी प्रत्यक्ष प्रयास की जरूरत नहीं होती, क्योंकि पिछले दोनों वर्षों में वे इस ज्ञान को सीखने की तैयारी कर चुके होते हैं। 3-6 वर्ष वाली इस अवस्था में अच्छी आदतों को बनाए रखने पर भी जोर दिया जाता है, क्योंकि इस प्रणाली में यह माना जाता है कि इस समय बनी आदतें बच्चों के विकास का भाग बन जाती हैं।
6-7 जनवरी 2007 को रोम में एक समारोह आयोजित किया गया और पूरे वर्ष भर विश्व में फैले मॉन्टेसरी स्कूलों के लिए कार्यक्रम आयोजित करने का निश्चय किया गया। 6 जनवरी, 1907 को ही मारिया मॉन्टेसरी ने रोम में अपनी पहली पाठशाला आरंभ की थी, जिसका नाम उन्होंने ÷केसा देई बम्बीनी'; बच्चों का घर रखा था। अपने कैरियर के अंतिम वर्षो में मारिया मॉन्टेसरी ने अपनी पुस्तक फ्रॉम चाइल्डहुड टू अडोलेसेन्स; बचपन से किशोरावस्था तक में अपनी प्रणाली को माध्यमिक और विश्वविद्यालय स्तर तक प्रयोग में लाने की रूपरेखा बनाई।
मारिया की प्रसिद्धि उनके जीवनकाल में ही विश्वभर में फैल गई थी। उन्हें इटली से मुसोलिनी द्वारा निर्वासित कर दिया गया था, क्योंकि वे बच्चों को सैनिक बनाने के खिलाफ थीं। 1939 तक वे नीदरलैंड में रही। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान वे भारत में रहीं। फिर मृत्युपर्यन्त नीदरलैंड ही उनका घर रहा और आज वहीं असोशिएशन मॉन्टेसरी इंटरनेशनल का मुख्यालय है। उनके जन्मस्थान इटली में यूरो स्वीकृत किए जाने से पूर्व तक हजार लीरा के नोटों पर उनकी ही तस्वीर होती थी।
आज जब सूचना क्रांति के नाम पर बच्चों के बस्ते का बोझ बढ़ता जा रहा है, तब मॉन्टेसरी प्रणाली का बच्चों की स्वयं की क्षमता पर यकीन कारगर हो सकता है। वे बच्चों को सीखने की मशीन नहीं, बल्कि संभावनाओं से परिपूर्ण व्यक्तित्व के रूप में देखती थीं। जैसा कि उन्होंने कहा–÷÷मानवजाति अपनी अत्यंत महत्त्वपूर्ण समस्याओं जैसे कि शान्ति एवं एकता की समस्या का हल बच्चों के स्वभाव की पड़ताल से प्राप्त कर सकती है। बचपन की खोज और निर्माण के वर्षों में व्यक्तित्व की संभावनाओं का अध्ययन हमें बहुत कुछ सिखा सकता है।''
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