इस अंक में
मन माने की बात बातचीत
माइंड योर लैंग्वेज यानी जुबान सँभाल के
डॉ विनय कुमार
शब्दों के अर्थ शुरुआती अर्थों तक ही सीमित नहीं रहते। सभ्यता की विकास-यात्र में समय-समय पर नए अर्थ जुड़ते जाते हैं। यह आवश्यक नहीं कि नए अर्थों की आमद सकारात्मक ही हो।
दुख को बेहतर समझती है मनोचिकित्सा...
डॉ. नरेन्द्रनाथ विग से डॉ. विनय कुमार की बातचीत
जीवन और ज्ञान की विविधताओं के गहरे अध्येता डॉ. एन.एन.विग भारतीय मनोचिकित्सा जगत की उज्ज्वलतम उपस्थितियों में से एक हैं।
 
मन माने की बात डायरी
रचनाकार की पूंजी होती है बचपन की ...
डॉ. नरेन्द्रनाथ विग से डॉ. विनय कुमार की बातचीत
अपनी कविताओं में मनुष्य और उसके जीवन के प्रति समाहित होनेवाले कथ्य को आप किस रूप में देखते हैं ? पानी में घिरे हुए लोग शीर्षक कविता की रचना प्रक्रिया के बारे में बताएं।
....फ्रायड ग़ायब और इन्द्र मुस्कुरा रहा था
लीलाधर मंडलोई
हिन्दी कविता के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर और दूरदर्शन के महानिदेशक लीलाधर मंडलोई कविता के अतिरिक्त गद्य लेखन के लिए भी जाने जाते हैं। वर्षों से वे अपनी मनःस्थितियां डायरी में दर्ज करते रहे हैं।
 
मनोचिकित्सक की कलम से मनोचिकित्सक की कलम से
हिस्टीरिया की कहानी : डॉ. प्रमोद कुमार सिंह
सचमुच यह अब एक कहानी मात्र ही रह गयी है, क्योंकि विशेषज्ञों ने इस शब्द का प्रयोग बन्द कर दिया है। किन्तु इस शब्द की प्रासंगिकता अभी बनी हुई है, क्योंकि जनमानस में यह शब्द अभी पूर्ण जीवंत रूप में कायम है। इसकी प्रासंगिकता इसलिए भी बनी हुई है क्योंकि जिन मनोशारीरिक दशाओं के लिए इसका प्रयोग किया जाता था, वे अभी भी लगभग उसी रूप में,
मनोरोगियों के परिवारों की चुनौतियां :
जे.के. त्रिवेदी/श्याम बिहारी राय/मोहन ध्यानी

मानसिक रोगों से कोई व्यक्ति, समाज अथवा देश प्रतिरक्षित नही है। इन रोगों का व्यक्ति के ऊपर गंभीर मनोवैज्ञानिक,सामाजिक व
 
मनोचिकित्सक की कलम से मनोचिकित्सक की कलम से
बढ़ती उम्र का सामना : डॉ. चित्तरंजन एन्ड्राडे
किशोरावस्था के अन्तिम तथा युवावस्था के आरंभिक वर्षों में बौद्धिक क्षमता अपने उच्चतम स्तर पर रहती है। इसके बाद इसमें लगातार गिरावट आती है, पर यह बात पचास या साठ की उम्र के बाद ही पता चलती है। बढ़ती उम्र के साथ हाल की घटनाओं की याददाश्त भी कम हो जाती है।
मनोरोगियों को बेड़ियाँ क्यों नेहा सईद सईद अख्तर
इस सभ्य समाज में भी मनोरोगियों के साथ परिवार, समाज और कभी-कभी तो विभिन्न चिकित्सा प्रणालियों के माननीय दिग्गजों के द्वारा जो व्यवहार होता है, वह बड़ा ही दिल दहलाने वाला होता है। रोगियों को आज भी हथकड़ियों से जकड़ कर रखा जाता है, रस्सियों से उनके हाथ पैर बाँध दिए जाते हैं , कमर में रस्सी बाँध कर जानवरों की तरह खींचा जाता है।
 
नोटिस बोर्ड नोटिस बोर्ड
पागलपन नहीं सायकोसिस
एक शब्द है पागल'। इस शब्द का हमारे जीवन में बड़ा महत्त्व है। दुनिया में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं जिसे कभी पागल न कहा गया हो। कोई भी मां बच्चे की ऊल-जुलूल, लेकिन मासूम हरकत पर कहती है, धत पागल और बच्चे की छोटी-सी गलती पर बड़ा दंड देने पर उतारू पिता को कहती है, पागल हो गए हैं क्या?
प्रसवोत्तर अवसाद
पुराण बताते हैं कि एक बार समुद्र का मंथन हुआ था और उससे चौदह रत्न निकले थे। यह भी बताते हैं कि किस रत्न को किस देवता अथवा किस असुर ने ग्रहण किया था, किंतु यह नहीं बताते कि मथे जाने और रत्नदान के बाद समुद्र ने क्या महसूस किया। समुद्र को ठीक वैसा ही लगा होगा जैसा फसल दे चुकने
 
नोटिस बोर्ड नोटिस बोर्ड

अटेंशन डेफिसिट हायपरएक्विविटी डिसॉर्डर
अभिभावक के रूप में आप अपने बच्चे का जीवन गढ़ने में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसी संभावना हो सकती है कि आपका बच्चा अटेंशन डेफिसिट हायपरएक्विविटी डिसॉर्डर (ए डी एच डी) का शिकार हो। आएं जानें कि–

ए डी एच डी क्या है ?

मनोरोग के लक्षण
¨ नींद में कमी , भूख में कमी , क्रोध आना , तोड़-फोड़ , मार-पीट , बेवजह डर , शक , बहुत कम या बहुत अधिक बात करना , अकेले बैठकर बुदबुदाना या मुस्कुराना , डायन या भूत का डर , कोई कहीं नहीं बोले तब भी आवाज सुनना , पत्नी को पति के अथवा पति को पत्नी के चरित्र पर बेवजह शक , गांजा , भांग , शराब , स्मैक आदि की लत।
 
बाल मन बाल मन
शिक्षा की अनोखी अवधारणा : मॉन्टेसरी स्कूल : मीनू मंजरी
रंग.विवरंगी मेज'कुर्सिया, खिलौनों से भरी अलमारी, समूहों में बैठे अपने काम में र्मग्‍न बच्‍चे यह द़श्‍य पारंपारकि पाछशाला से काफी भिन्‍न है ा पर दुनिया भर से मॅान्‍टेसरी स्‍कूलों की सफलता ने शिक्षा की इस अवधारणा को मान्‍य बनाया हैा
बच्चों को कहां ले जा रहा है मीडिया : नरेन
हलांकि प्रिट मीडिया हो चाहे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रायः हर किस्म का मीडिया वर्ग अपनी सामूहिक गतिविधियों के मद्देनजर लगभग पूरी तरह से मनी मिटिंग, वीभत्स बाजारू उत्पाद में तब्दील हो चुका है; लेकिन उसका पाखण्डी और आतंककारी दंभ उत्तरोत्तर परवान ही चढ़ता जा रहा है कि वह
 
निष्कलंक निष्कलंक
बु्रक शील्ड्स : विनोद अनुपम
14 मई 2007, दिन के दो बजे थे। सैनडिएगो(कैलिफोर्निया) के कन्वेंशन सेंटर में अमेरिका की प्रसिद्ध मनोचिकित्सक नैन्सी ऐन्ड्रियासन को सुनने के लिए हॉल में लगभग 500 मनोचिकित्सक बैठे थे। भाषण शुरू होने में कुछ विलम्ब था। मेरी सीट की दाहिनी तरफ बैठे सज्जन ने बायीं तरफ बैठे सज्जन से पूछा -
गोरख पांडेय! यादों के आईने में चमन लाल
किसी भी कवि के लिए सबसे बड़ी चुनौती है–गंभीर अर्थों से भरे लोकगीत लिखना। हक की लड़ाई लड़नेवालों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलनेवाले गोरख पांडेय ने यह कठिन काम तो आसानी से किया, मगर पारानॉयड स्किजोफ्रेनिया की मुश्किलों से पार नहीं पा सके। उन्होंने आत्महत्या कर ली।
 
क्रूरता की शिनाख्त क्रूरता की शिनाख्त
रैगिंग को सामाजिक वर्ग ढांचे में देखें : स्वतंत्र मिश्र
उच्च संस्थानों में रैगिंग एक आम समस्या बन गयी है। हाल ही में भारत के एक प्रतिष्ठित कॉलेज सेंट स्टीफेंस में कुछ सीनियर छात्रों द्वारा एक जूनियर छात्र को प्रताड़ित करने का मामला सामने आया है। इस घटना में सीनियर लड़कों ने अपने एक जूनियर के र डियोडरेंड खूशबू उत्पन्न करने वाला इत्र जैसा कुछ स्प्रेे छिड़कर उसको आग लगा दिया गया।
खुद की खबर पर खामोश मीडिया :
वर्तिका नन्दा सहाय
दो साल पहले दिल्ली पब्लिक स्कूल के दो छात्रों का जो अश्लील एमएमएस बना, वह बे्रकिंग न्यूज थी, देश भर ने वो तस्वीरें देखीं और जनता नैतिकता पर मीडिया की चिल्लाहट की गवाह बनी, लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि
 
 
इस अंक की दवा
लिथियम कार्बोनेट
   
बाल मन

शिक्षा की अनोखी अवधारणा : मॉन्टेसरी स्कूल : मीनू मंजरी

बच्चों को कहां ले जा रहा है मीडिया : नरेन

   
किताब के बहाने
श्रेष्ठता ग्रंथि से पीड़ित लोग : कुमार मुकुल
   
मनोव्यथा
हर कार मेरा पीछा कर रही थी : कमल
   
मीडिया पर निगाह
बाजार ही मीडिया का राष्ट्र और धर्म है : अनिल चमड़िया
   
क्रूरता की शिनाख्त
टीवी एंकरों की खुदकुशी और टीआरपी : मृणाल वल्लरी
   
विश्लेषण
अवसाद : चारुवाक
   
सपने
मेरे तीन सपने : उनका क्या करूं ? : बोधिसत्व
   
जनगीत
दुनिया नष्ट नहीं होगी : नचिकेता
   
कहानी
मुश्किल : सन्तोष चौबे
   
काव्य कथा
शान्ता : उद्भ्रान्त
   
फिल्म

ओंकारा : विनोद अनुपम

ऑथेलो : अनामिका

   
व्यंग्य  झूठ बोलने के फायदे : विष्णु नागर
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मनोवेद
अंक – 1 वर्ष – 1 जनवरी–मार्च, 2008

काव्‍य कथा

शान्ता
उद्भ्रांत

दशरथ मोरे ससुर लगिहें, राम मोरे सालामैं ही पिता, वो ही पुत्र हमारा।
ऋषि श्रृंग के कथन के रूप में प्रचलित इस दोहे का अर्थ समझना हो तो आपको रामजन्म की कथा के गर्भ में जाना होगा। ऋषि श्रृंग के यज्ञ कराने के बाद दी गयी खीर खाकर ही दशरथ की रानियों को मातृत्व की प्राप्ति हुई थी। शान्ता उन्हीं श्रृंग की पत्नि और दशरथ की बेटी थीं। इस काव्यकथा में उन्हीं शान्ता के मन के त्रास को स्वर दिया गया है।

शान्ता मैं–
महाराजाधिराज दशरथ की
पुत्री एकमात्र।

अकथ
मेरे जीवन की
कथा।

किन्तु वह भी
नहीं किसी का ध्यान
कर सकी आकर्षित।

कोई मुझे
जानता तक नहीं,
पहचानने की बात
क्या करूं मैं!

मेरे नाम को,
मेरे काम को,
नहीं मिला...
किसी वाल्मीकि की तूलिका का
सामान्य संस्पर्श तक।

रघुकुल जैसे,
गौरवशाली कुल में
जन्म लेकर भी
मैं रही अभागी रही।

कौशल्य मां ने जब
जन्म दिया मुझे तो
हुए मुखमंडल–निस्तेज–
रघुवंशियों के;

महाराजा दशरथ का मुख
हुआ विवर्ण,
और मस्तक पर चिन्ता की रेखाएं खिंच गईं
नंगी तलवार-सी।
बढ़ती थी
उनकी अवस्था
उत्तरोत्तर।

चिन्ता सताती थी उन्हें
होगा कौन
अयोध्या का
उत्तराधिकारी?

महारानी कौशल्या के प्रति
उनका अनुराग हुआ तिरोहित,
उसने स्थान लिया शनैः शनैः
उनकी उपेक्षा का।

उपेक्षा शनैः शनैः हुई परिवर्तित
उनके प्रति ठंडापन
रखते भाव में।

मां कौशल्या का दोष क्या था–
जो जन्म दिया,
उन्होंने एक पुत्री को?

महाराज भी तो
कारक थे
मेरे इस अभागे जन्म के!

पुत्री के प्रति ऐसा
भाव उपेक्षा का
क्या था अनुकूल
गौरवशाली रघुकूल में?

महाराज, पुरखों के–
शास्त्र-वचनों को–
कर गए थे क्यों विस्मृत?

÷यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते
रमन्ते तत्र देवताः'!

उनके राजसी चिन्तन में
न आया क्यों ऐसा भाव कि–
नारी का अस्तित्व नहीं होता तो
महाराज स्वायंभुव मनु कैसे
करते प्रारम्भ
मनुष्यों से भरी
सृष्टि का!

मां कौशल्या ने जन्म
दिया एक पुत्री को
कैसे बन गया–
उनका घोषित अपराध यह?

और जिसके कारण ही
उन्हें दंडित करने को संभवतः
महाराज दशरथ ने अपना चित्त–

केन्द्रित कर दिया
मां केकयी के
दिए की लौ जैसे
तप्त रूप पर!

मां कौशल्या होतीं दुखित,
लेकिन अपने नाम को
करते हुए सार्थक
शनैः शनैः अपनी भावनाओं को
भीतर ही भीतर
मन के बन्दीगृह में बन्द
रखने में कुशल हुईं।

विष्णु देव के पूजन-अर्चन में
उन्होंने किया
चित्त अपना केंद्रित।

अपने आंसुओं को
बनाते पत्थर।

मैं उनके दर्द का
कर सकी साक्षात्कार,
जब मैंने होश सम्हाला कुछ;
और मां की आंखों के गर्भगृह में
देखा मैंने जब
अश्रुबूंद रूपी नवजात कन्या को
थरथराकर
राजवंश की पुरुष-परम्परा के
निर्मम हाथों से अपने
महाकाव्यात्मक
अन्त की ओर
द्रुत गति से बढ़ते!

मेरी बालसुलभ
पृच्छाओं के उत्तर में
मां कौशल्या यदपि
कुछ भी नहीं मुखरित हो
कहती थीं।

लेकिन इस अभागी पुत्री के लिए
अपनी अभागिन मां की
मूक भावनाओं के
महाग्रन्थ को पढ़ना
ठीक-ठीक–
नहीं असम्भव था।

लेकिन मैं क्या करती?

महारानी के सक्षम पद पर आसीन
मेरी माता ही जब हुई असहाय तो,
मेरा बाल-मन–
क्या कर सकता था!

मैंने धीरे-धीरे
बड़े होते हुए देखा
अपनी परम साधवी मां को
रघुवंश की महारानी के पद से
च्युत होते–

और उस पर उसी गति से
शनैः शनैः समासीन होते
मां केकयी को–

महाराज दशरथ की
पितृसत्ता की ओछी लालसा के
राजसिंहासन पर।

सुना था बाद में मैंने
मां से ही–

मेरे जन्म के पश्चात्‌
नहीं गाये गए मंगल बधाए,
पुत्री का जन्म जैसे अशगुन हो!

राजदरबार से लेकर
अयोध्या की गलियों तक
पसरा था। शोकाकुल सन्नाटा

नहीं थी
कहीं भी कोई चहल-पहल।

महाराज ने तब आहूत की
मन्त्रिमण्डल की आपात बैठक एक।
जैसे राज्य पर
अनायास लगे मंडराने
कोई भयानक संकट,

कोई महामारी फैल गई हो या–
किसी प्रबल शत्रु ने
आक्रमण कर दिया हो अचानक
और घेर लिया हो समूचा राज्य!

मन्त्रिमंडल की
आपात बैठक वह
चली अपेक्षाकृत बहुत लम्बी।

भांति-भांति के विचित्र परामर्श आए
उस संकट के निवारण हेतु–

कन्या के जन्म से जो बदनामी मिली
महाप्रतापी रघुवंश को–
उसे दूर करने हेतु
कोई तात्कालिक
सफल उपाय
सूझ नहीं रहा था किसी को!

किसी ने अस्पष्ट स्वरों में
यह कहा फुसफुसाते हुए–
÷नवजात बालिका को
दूर कहीं वन में छोड़ दें अथवा
सरयू की धारा में बहा दे!'

ऐसे प्रस्ताव में
मेरी अविलम्ब हत्या की अन्तर्ध्वनियां थीं फूट रहीं!
महाराज दशरथ को
कहा जाता था परम प्रतापी पर
सिद्ध हुए वे कायर, नपुंसक।

होकर भी क्षत्रियकुल शिरोमणि
नवजात बच्ची के
नगण्य गौण अस्तित्व से वे भयभीत हुए।

उनकी उस दिन की आपात सभा में
विराजमान थे–
समाज के प्रतिष्ठित जन;
बड़े-बड़े ऋषि-महर्षि,
महामुनि वशिष्ठ–जो थे रघुकुलगुरु;

और जो मौन ही दिखे ऐसे प्रस्ताव पर–
किसी श्रेष्ठ कूटनीति के महत!

मैंने बड़े होकर
किसी शास्त्र में पढ़ा था यह आप्त वचन–
÷मौनं स्वीकृति लक्षणम्‌'!

अभी-अभी पैदा हुई
एक नन्हीं बच्चीं के अस्तित्व से घबराकर
बड़े-बड़े वीर, दार्शनिक, चिन्तक, ऋषि-महर्षि
एकजुट होकर जैसे शंखनाद कर चुके
एक महायुद्ध का उसके विरुद्ध!

अगर अपने दिव्य ज्ञान-चक्षुओं में
देख सके होते पूर्व में ही तो–
उनका यह महासमर
मां के गर्भ में हर क्षण
हर एक श्वास के सहारे,
जीवन की पहली किरण के अवलोकन के लिए
पलती-बढ़ती हुई,
उस बच्ची के विरुद्ध
कई माह पूर्व ही!

वैसी स्थिति में
जन्म से ही पूर्व
उसका दुखद अन्त भी सुनिश्चित था–
मेरी जननी के तन को,
मन को भी–
घायल और रक्त स्नान करते हुए।

महामुनि वशिष्ठ मुखर हुए नहीं तो उसका
एक सबल कारण था–
क्षत्रियकुल में भी जन्म लेकर जो
महर्षि बनने की सिद्धि तक पहुंचे,
उन महामुनि विश्वामित्र
की भी थी उपस्थिति–
उस विशिष्ट राज्य सभा के बीच!

वशिष्ठ-विश्वामित्र का वैमत्य
जगप्रसिद्ध था।

वशिष्ठ मुखर होते यदि
ऐसे घृणित प्रस्ताव की स्वीकृति-हेतु–
विश्वामित्र उन्हें सफल होने नहीं देते!
उनका मौन–सर्वोत्तम कूटनीति,
ऐसे प्रस्ताव पर!

वह भी असफल हुई!

सर्वसम्मति से
निर्णय किया गया–

÷÷महाराज दशरथ
अविलम्ब आयोजित करें
पुत्र की कामना वाला
÷पुत्रेष्टी यज्ञ'–
अपनी तीनों रानियों के साथ!

÷÷और पुत्री-जन्म के अमंगलसूचक
अशगुन के दोष के निवारणार्थ
नवजाता दान कर दी जाये
किसी विवाहित महर्षि को,
देते हुए उन्हें यथेष्ट दक्षिण–
भू-धन, गो-धन,
वस्त्रादि, कमंडल,
खड़ाऊं,
तुलसी के साथ
मौक्तिक माला भी।

÷÷तुलसी की माला महर्षि के लिए
और मौक्तिक माला–
महर्षि-पत्नी को।

÷÷पाख बीतते ही कन्या
वापस ले आई जाए
राजमहल में ही,
घोषित करते हुए कि–
÷महाराज कृपालु हुए एक निर्धन जन पर
और उसकी कन्या के
पालन-पोषण, शिक्षा-दीक्षा
और विवाहादि समस्त उत्तरदायित्वों के
निर्वहन के लिए उनने–
उसे गोद लेने का
किया उपक्रम
असाधारण!'

÷÷इससे–कन्या-जन्म का
असगुन तो मिटेगा ही,
राज्य में चहुं ओर कीर्ति फैलेगी
राजा की!

÷÷एक पन्थ
दो-दो काज!

÷÷दो-दो नहीं तीन काज!

÷÷तीन कि अनेक काज!''

मां कौशल्या जब
स्मृति की आंखों से देखकर
सुना रही थीं मुझको सारा वृत्तान्त, तब–
मैंने धृष्ठता करते हुए
मां को रोका और
पूछा सहज भाव से कि–
÷÷जिन माताओं-पिताओं को
पुत्र प्राप्त हुए जग में,
उन सबने क्या
कराया था सम्पन्न
पुत्रेष्टी यज्ञ भी?

÷÷अवश्य यह
हो जाता रहेगा सम्पन्न
बहुत कम धन का व्यय कर;

÷÷क्योंकि इस जगह में
लाखों निर्धन
असहाय जन भी
पुत्रवान दिखते हैं!

÷÷अयोध्या के महाराज तो स्वामी हैं
अकूत धन के, फिर–
निर्धनों की श्रेणी में
शामिल होने को वे
क्यों चेष्टारत थे?''

मां का हृदय होता विशाल,
मेरी अज्ञानता भरी बातों को
सुनकर भी
मौन ही रहीं वे;

किन्तु मेरी जिज्ञासा के
तरकश में तब भी
कुछ अति सामान्य प्रश्न
शेष थे–

÷÷क्या पुत्रियों की
उत्पत्ति के लिए भी
आयोजित होता है
ऐसा ही ÷पुत्रीष्टि यज्ञ'?

÷÷और क्या
उसी के पश्चात्‌
जन्मी हूं मैं भी?

÷÷क्या पुत्री की कामना वाले यज्ञ में भी
धन का होता है
असीमित व्यय?

÷÷और इसलिए ही क्या
अयोध्या के महाराज
मेरे पिता दशरथ
उसका सफल
आयोजन करने में
हो सके समर्थ?''

माता कौशल्या का
टूटा नहीं मौन
किन्तु मेरे
बाल-सुलभ प्रश्नों के उत्तर में
उनकी आंखों में,
पूरे मुखमंडल पर मैंने
उदासी के, क्षोभ के
करुणा के,
दुख के–
सम्मिश्रित भाव को
देखा मेघ बनते।

ऐसा वह मेघदूत–

धीरज की प्रतिमूर्ति मां के
पृथ्वी-अस्तित्व से छनकर आई
जीवन की पाती जो मुझ तक,
उसके माध्यम से–

पढ़कर उसे
मैं भी मौन हो गई।

क्या मेरा मौन
मां कौशल्या के
मुखर मौन का सटीक प्रत्युत्तर
बनने में हो सका समर्थ?

शायद इसलिए ही बालापन की
मेरी चपल चित्तवृत्ति
मौन होती गई
शेष जीवन में।

तब भी जब
दशों दिशाओं में व्याप्त तेज वाले रघुवंश
की इकलौती पुत्री मैं–

ब्याह दी गई
मुझसे बहुत अधिक आयुवाले
श्रंगी ऋषि के साथ
बाल्य अवस्था में ही;
देते हुए
बालिकावधू की
अप्रतिम पदवी;

भूलकर यह तथ्य
कि आयु मेरी थी
क्रीड़ा करने की
आमोद और प्रमोद की;

और साथ में
ज्ञान अर्जित करने की भी।

मेरी आकांक्षा
उस दिशा में थी
सर्वाधिक।

पर अपनी
यह विचित्र आकांक्षा
मैं रखती अंततः
किसके समक्ष?

क्यों वह पूरी होती?

महाराज मनु की
पावन वैदिक-संहिताओं ने
माता पृथ्वी के कर्ण-विवरों को
किया बन्द;
और जिह्ना पर बैठी
वीणा झंकृत करती
माता वाणी को
कर दिया मौन!

सब कुछ देख-सुन
और समझकर,
मैं हुई परिपक्व
समय से पहले–
चिन्तन और
मनन की दिशा में।

मुझमें जो आया
यह आकस्मिक परिवर्तन
उसने शान्त कर दी
मेरी प्रकृति–

–सार्थक कर दिया
मेरा नाम भी!

÷शांताकारम्‌ भुजंगशयनम्‌'!

तीनों रानियों के साथ
पुत्रेष्टी यज्ञ किया
महाराज दशरथ ने
समारोहपूर्वक!

पता नहीं
उसका ही प्रभाव था या–

महाराज की पौरुष-वर्षा ने
सूख चुकी पृथ्वी को
किया रस में सराबोर;

और जिसके कारण ही
निर्धारित अवधि के व्यतीत होते–

मैंने सभी रानियों के
रनिवासों से निःसृत होतीं
हर्षध्वनियां सुनीं,
–÷महारजा की जय हो';

महाराज को मिला अन्ततः
अयोध्या का भावी युवराज और
उसे तीन गुना
शक्तिशाली बनाने को–

तीन छोटे राजकुंवर!

राजधानी अयोध्या
रसरंग में नहा उठी;

चेतन-अवचेतन मन में मेरे
उठाते हुए
एक नहीं–

कई-कई प्रश्न भी!

(कवि के शीघ्र प्रकाश्य महाकाव्य त्रेता का एक सर्ग)
÷अनहद', बी-463, केन्द्रीय विहार, सेक्टर-51, नौएडा-201307
फोन : 0120-2481530, 09818854678

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