इस अंक में
मन माने की बात बातचीत
माइंड योर लैंग्वेज यानी जुबान सँभाल के
डॉ विनय कुमार
शब्दों के अर्थ शुरुआती अर्थों तक ही सीमित नहीं रहते। सभ्यता की विकास-यात्र में समय-समय पर नए अर्थ जुड़ते जाते हैं। यह आवश्यक नहीं कि नए अर्थों की आमद सकारात्मक ही हो।
दुख को बेहतर समझती है मनोचिकित्सा...
डॉ. नरेन्द्रनाथ विग से डॉ. विनय कुमार की बातचीत
जीवन और ज्ञान की विविधताओं के गहरे अध्येता डॉ. एन.एन.विग भारतीय मनोचिकित्सा जगत की उज्ज्वलतम उपस्थितियों में से एक हैं।
 
मन माने की बात डायरी
रचनाकार की पूंजी होती है बचपन की ...
डॉ. नरेन्द्रनाथ विग से डॉ. विनय कुमार की बातचीत
अपनी कविताओं में मनुष्य और उसके जीवन के प्रति समाहित होनेवाले कथ्य को आप किस रूप में देखते हैं ? पानी में घिरे हुए लोग शीर्षक कविता की रचना प्रक्रिया के बारे में बताएं।
....फ्रायड ग़ायब और इन्द्र मुस्कुरा रहा था
लीलाधर मंडलोई
हिन्दी कविता के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर और दूरदर्शन के महानिदेशक लीलाधर मंडलोई कविता के अतिरिक्त गद्य लेखन के लिए भी जाने जाते हैं। वर्षों से वे अपनी मनःस्थितियां डायरी में दर्ज करते रहे हैं।
 
मनोचिकित्सक की कलम से मनोचिकित्सक की कलम से
हिस्टीरिया की कहानी : डॉ. प्रमोद कुमार सिंह
सचमुच यह अब एक कहानी मात्र ही रह गयी है, क्योंकि विशेषज्ञों ने इस शब्द का प्रयोग बन्द कर दिया है। किन्तु इस शब्द की प्रासंगिकता अभी बनी हुई है, क्योंकि जनमानस में यह शब्द अभी पूर्ण जीवंत रूप में कायम है। इसकी प्रासंगिकता इसलिए भी बनी हुई है क्योंकि जिन मनोशारीरिक दशाओं के लिए इसका प्रयोग किया जाता था, वे अभी भी लगभग उसी रूप में,
मनोरोगियों के परिवारों की चुनौतियां :
जे.के. त्रिवेदी/श्याम बिहारी राय/मोहन ध्यानी

मानसिक रोगों से कोई व्यक्ति, समाज अथवा देश प्रतिरक्षित नही है। इन रोगों का व्यक्ति के ऊपर गंभीर मनोवैज्ञानिक,सामाजिक व
 
मनोचिकित्सक की कलम से मनोचिकित्सक की कलम से
बढ़ती उम्र का सामना : डॉ. चित्तरंजन एन्ड्राडे
किशोरावस्था के अन्तिम तथा युवावस्था के आरंभिक वर्षों में बौद्धिक क्षमता अपने उच्चतम स्तर पर रहती है। इसके बाद इसमें लगातार गिरावट आती है, पर यह बात पचास या साठ की उम्र के बाद ही पता चलती है। बढ़ती उम्र के साथ हाल की घटनाओं की याददाश्त भी कम हो जाती है।
मनोरोगियों को बेड़ियाँ क्यों नेहा सईद सईद अख्तर
इस सभ्य समाज में भी मनोरोगियों के साथ परिवार, समाज और कभी-कभी तो विभिन्न चिकित्सा प्रणालियों के माननीय दिग्गजों के द्वारा जो व्यवहार होता है, वह बड़ा ही दिल दहलाने वाला होता है। रोगियों को आज भी हथकड़ियों से जकड़ कर रखा जाता है, रस्सियों से उनके हाथ पैर बाँध दिए जाते हैं , कमर में रस्सी बाँध कर जानवरों की तरह खींचा जाता है।
 
नोटिस बोर्ड नोटिस बोर्ड
पागलपन नहीं सायकोसिस
एक शब्द है पागल'। इस शब्द का हमारे जीवन में बड़ा महत्त्व है। दुनिया में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं जिसे कभी पागल न कहा गया हो। कोई भी मां बच्चे की ऊल-जुलूल, लेकिन मासूम हरकत पर कहती है, धत पागल और बच्चे की छोटी-सी गलती पर बड़ा दंड देने पर उतारू पिता को कहती है, पागल हो गए हैं क्या?
प्रसवोत्तर अवसाद
पुराण बताते हैं कि एक बार समुद्र का मंथन हुआ था और उससे चौदह रत्न निकले थे। यह भी बताते हैं कि किस रत्न को किस देवता अथवा किस असुर ने ग्रहण किया था, किंतु यह नहीं बताते कि मथे जाने और रत्नदान के बाद समुद्र ने क्या महसूस किया। समुद्र को ठीक वैसा ही लगा होगा जैसा फसल दे चुकने
 
नोटिस बोर्ड नोटिस बोर्ड

अटेंशन डेफिसिट हायपरएक्विविटी डिसॉर्डर
अभिभावक के रूप में आप अपने बच्चे का जीवन गढ़ने में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसी संभावना हो सकती है कि आपका बच्चा अटेंशन डेफिसिट हायपरएक्विविटी डिसॉर्डर (ए डी एच डी) का शिकार हो। आएं जानें कि–

ए डी एच डी क्या है ?

मनोरोग के लक्षण
¨ नींद में कमी , भूख में कमी , क्रोध आना , तोड़-फोड़ , मार-पीट , बेवजह डर , शक , बहुत कम या बहुत अधिक बात करना , अकेले बैठकर बुदबुदाना या मुस्कुराना , डायन या भूत का डर , कोई कहीं नहीं बोले तब भी आवाज सुनना , पत्नी को पति के अथवा पति को पत्नी के चरित्र पर बेवजह शक , गांजा , भांग , शराब , स्मैक आदि की लत।
 
बाल मन बाल मन
शिक्षा की अनोखी अवधारणा : मॉन्टेसरी स्कूल : मीनू मंजरी
रंग.विवरंगी मेज'कुर्सिया, खिलौनों से भरी अलमारी, समूहों में बैठे अपने काम में र्मग्‍न बच्‍चे यह द़श्‍य पारंपारकि पाछशाला से काफी भिन्‍न है ा पर दुनिया भर से मॅान्‍टेसरी स्‍कूलों की सफलता ने शिक्षा की इस अवधारणा को मान्‍य बनाया हैा
बच्चों को कहां ले जा रहा है मीडिया : नरेन
हलांकि प्रिट मीडिया हो चाहे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रायः हर किस्म का मीडिया वर्ग अपनी सामूहिक गतिविधियों के मद्देनजर लगभग पूरी तरह से मनी मिटिंग, वीभत्स बाजारू उत्पाद में तब्दील हो चुका है; लेकिन उसका पाखण्डी और आतंककारी दंभ उत्तरोत्तर परवान ही चढ़ता जा रहा है कि वह
 
निष्कलंक निष्कलंक
बु्रक शील्ड्स : विनोद अनुपम
14 मई 2007, दिन के दो बजे थे। सैनडिएगो(कैलिफोर्निया) के कन्वेंशन सेंटर में अमेरिका की प्रसिद्ध मनोचिकित्सक नैन्सी ऐन्ड्रियासन को सुनने के लिए हॉल में लगभग 500 मनोचिकित्सक बैठे थे। भाषण शुरू होने में कुछ विलम्ब था। मेरी सीट की दाहिनी तरफ बैठे सज्जन ने बायीं तरफ बैठे सज्जन से पूछा -
गोरख पांडेय! यादों के आईने में चमन लाल
किसी भी कवि के लिए सबसे बड़ी चुनौती है–गंभीर अर्थों से भरे लोकगीत लिखना। हक की लड़ाई लड़नेवालों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलनेवाले गोरख पांडेय ने यह कठिन काम तो आसानी से किया, मगर पारानॉयड स्किजोफ्रेनिया की मुश्किलों से पार नहीं पा सके। उन्होंने आत्महत्या कर ली।
 
क्रूरता की शिनाख्त क्रूरता की शिनाख्त
रैगिंग को सामाजिक वर्ग ढांचे में देखें : स्वतंत्र मिश्र
उच्च संस्थानों में रैगिंग एक आम समस्या बन गयी है। हाल ही में भारत के एक प्रतिष्ठित कॉलेज सेंट स्टीफेंस में कुछ सीनियर छात्रों द्वारा एक जूनियर छात्र को प्रताड़ित करने का मामला सामने आया है। इस घटना में सीनियर लड़कों ने अपने एक जूनियर के र डियोडरेंड खूशबू उत्पन्न करने वाला इत्र जैसा कुछ स्प्रेे छिड़कर उसको आग लगा दिया गया।
खुद की खबर पर खामोश मीडिया :
वर्तिका नन्दा सहाय
दो साल पहले दिल्ली पब्लिक स्कूल के दो छात्रों का जो अश्लील एमएमएस बना, वह बे्रकिंग न्यूज थी, देश भर ने वो तस्वीरें देखीं और जनता नैतिकता पर मीडिया की चिल्लाहट की गवाह बनी, लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि
 
 
इस अंक की दवा
लिथियम कार्बोनेट
   
बाल मन

शिक्षा की अनोखी अवधारणा : मॉन्टेसरी स्कूल : मीनू मंजरी

बच्चों को कहां ले जा रहा है मीडिया : नरेन

   
किताब के बहाने
श्रेष्ठता ग्रंथि से पीड़ित लोग : कुमार मुकुल
   
मनोव्यथा
हर कार मेरा पीछा कर रही थी : कमल
   
मीडिया पर निगाह
बाजार ही मीडिया का राष्ट्र और धर्म है : अनिल चमड़िया
   
क्रूरता की शिनाख्त
टीवी एंकरों की खुदकुशी और टीआरपी : मृणाल वल्लरी
   
विश्लेषण
अवसाद : चारुवाक
   
सपने
मेरे तीन सपने : उनका क्या करूं ? : बोधिसत्व
   
जनगीत
दुनिया नष्ट नहीं होगी : नचिकेता
   
कहानी
मुश्किल : सन्तोष चौबे
   
काव्य कथा
शान्ता : उद्भ्रान्त
   
फिल्म

ओंकारा : विनोद अनुपम

ऑथेलो : अनामिका

   
व्यंग्य  झूठ बोलने के फायदे : विष्णु नागर
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मनोवेद
अंक – 1 वर्ष – 1 जनवरी–मार्च, 2008

क्रूरता की शिनाख्‍त 1

रैगिंग को सामाजिक वर्ग-ढांचे में देखें
स्वतंत्रा मिश्र

उच्च संस्थानों में रैगिंग एक आम समस्या बन गयी है। हाल ही में भारत के एक प्रतिष्ठित कॉलेज सेंट स्टीफेंस में कुछ सीनियर छात्रों द्वारा एक जूनियर छात्र को प्रताड़ित करने का मामला सामने आया है। इस घटना में सीनियर लड़कों ने अपने एक जूनियर के र डियोडरेंड खूशबू उत्पन्न करने वाला इत्र जैसा कुछ स्प्रेे छिड़कर उसको आग लगा दिया गया। संयोगवश पीड़ित छात्र गंभीर रूप से घायल होने से बच गया। इस घटना का सबसे गंदा पक्ष तो यह है कि कॉलेज प्रशासन ने उत्पीड़न के शिकार जूनियर छात्र को चुप्पी सा लेने को कहा। सेंट स्टीफेंस कॉलेज के लिए यह कोई नयी घटना नहीं थी। वहां ऐसी कई घटनाएं पहले भी आकार ले चुकी हैं जिन्हें सुनने मात्र से किसी भी संवेदनाशील व्यक्ति का रौंगटा खड़ा हो जा सकता है। 1996-99 के सत्र में जितेन्द्र राम नाम के एक लड़के ने इसी कॉलेज में बी.ए. दर्शनशास्त्र में नामांकण लिया था। जितेन्द्र राम बिहार के औरंगाबाद जिले के एक मेहनत, मजदूरी करनेवाले घर से आता था। एक तो गरीब दूसरा बिहारी और तीसरा जाति से चमार, रैगिंग के लिए इससे अच्छी पृष्ठभूमि और कुछ नहीं हो सकती थी। सामान्यतः इस कॉलेज में रैंगिंग सभ्य लोगों की जुबान में इंटरेकशन परिचय करने का एक तरीका को कहा जाता है और व्यावहारिक रातल पर भी यह और जगहों की तुलना में न्यूनतम कू्ररता अपने में समेटे हुए था। जितेन्द्र की रैगिंग की कोशिश यूं तो कई लोगों ने की परंतु वह इसे अपने आत्मसम्मान की लड़ाई से जोड़ कर देखता था और इससे लड़ने की भरपूर कोशिश भी करता था। वह बराबरी का भाव समाज के हरेक लोगों से हरेक स्तर पर चाहता था। शायद यही आत्मसम्मान और बराबरी का भाव कुछ नपशुओं के बिगड़ैल और सामंती मानसिकता वाले बच्चों को रास नहीं आते थे। अंग्रेजी से बी.ए. कर रहे एक वरिष्ठ छात्र शमशेर सिंह ने उसे किस हद तक जलील किया होगा, उसकी कल्पना शायद बहुत सचेत लोग ही कर सकते हैं। शमशेर सिंह का बाप सेना में किसी बड़े ओहदे पर था जिसकी ताप से उसकी मनियों में हरकतें पैदा होती थीं। वह मूंछे रखता था। उन मूंछों पर वह घड़ी-घड़ी ताव देता रहता था शायद इसलिए कि कहीं वह नीचे की ओर झुक गयी तो उसका रौब-दाब जो उसके खुद के दावे हुआ करते थे कहीं कॉलेज में फीके न पड़ जाए। वह अपने को आर्य बताते हुए अंग्रेजी में कहता - ÷बल्डी, रासकल आई एम एन आर्यन।' उसके इस खेल से कॉलेज प्रशासन को कोई दिक्कत नहीं महसूस होती थी परंतु जितेन्द्र राम को कॉलेज के शुल्क जमा करने में अक्सर आती रही दिक्कतों को कॉलेज ने कभी महसूस करने की कोशिश नहीं की। तात्पर्य यह है कि जितेन्द्र राम केवल शमशेर सिंह की ही नहीं बल्कि कॉलेज प्रशासन की भी गालियां खाता रहा। मालूम हो कि शमशेर सिंह ने उसे उस शौचालय को व्यवहार में लाने की इजाजत नहीं दे रखी थी जिसको वह खुद इस्तेमाल में लाता था। जबकि छात्रावास का शौचालय सामूहिक उपयोग की चीज थी। शमशेर उसे शौचालय के मग से पानी पीने को कहता था। इस सबकी शिकायत जितेन्द्र ने कॉलेज प्रशासन से भी की थी। इस मामले को कभी कॉलेज प्रशासन ने कोई खास महन्व नहीं दिया। एक विद्यार्थी रासिद ने भी इसी सत्र में इतिहास के पाठ्यव्म में दाखिला लिया था। रासिद को अयोऽा विवाद पर दो अन्य फच्चों यानी प्रथम वर्ष के साथ भिड़ाया गया। अंततः हिंदूवादी तौर-तरीकों या सोच के नतीजे के तौर पर रासिद को पीटा गया था। रासिद को पीटने वाले लड़कों में शमशेर सिंह भी एक था। इस घटना में मुझे भी शामिल कराया गया था। मेरे इस हिन्दूवादी रवैये पर विरो किये जाने पर मुझे भी डराने भर की कोशिश की गयी थी। मेरे नहीं डरने पर मुझे कमरे से चले जाने को कहा गया था। बाद में पता चला कि रासिद को कुछ सीनियर्स ने उठाकर झाड़ियों पर फेंका था। मामला कॉलेज के डीन तक गया था। रासिद के साथ हिकारत भरे व्यवहार का साक्षी मैं था और मैंने गवाही भी दी थी। बावजूद इसके उन लोगों को कोई मामूली सी सजा दी गयी थी। शायद दो या तीन दिन के लिए उन लड़कों को कॉलेज कैंपस से बाहर रहने को कहा गया था। इन मामलों के अलावे आप हाल के दिनों के भी प्रकाश में आये कुछ उदाहरणों को देख सकते हैं। रैगिंग के लगभग मामलों की जड़ में दो ही बातें मुख्य तौर पर होती हैं - 1. जातिगत भेद और 2. वर्ग के आघर पर भेदभाव।
सच तो यह है कि रैगिंग, उत्पीड़न का एक ऐसा यंत्र बन चुकी है जिसके कारण नये छात्र-छात्राओं को गंभीर मानसिक-शारीरिक क्षति उठानी पड़ती है। इससे हर साल न जाने कितने छात्रों का कैरियर या कभी-कभी जीवन भी खतरे में पड़ जाता है। रैगिंग में छात्र एक-दूसरे के प्रति इतने कू्रर हो जाते हैं जो समाज में सामंतवाद के अवशेष मौजूद होने के लिए पर्याप्त प्रमाण पेश करते हैं। इसके कारण कई छात्रों को अपनी पढ़ाई छोड़कर चले जाना पड़ता है। कई छात्र विकलांग तक हो जाते हैं। खास तौर से मारपीट से कान के पर्दे फट जाने की घटनाएं तो आम हैं। कई छात्र तो अवसाद डिप्रेशन के शिकार होकर आत्महत्या तक करने पर उतारू हो जाते हैं। 2001 में रैगिंग पर प्रतिबन् लगाये जाने के बावजूद यह अब तक बंद नहीं हुई है। अनेकों होनहार नौजवानों की मौत के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अनुभव किया कि रैगिंग पर केवल प्रतिबन् लगाना ही पर्याप्त नहीं है। रैगिंग को रोकने के लिए कठोर कदम उठाने पड़ेंगें। इसी बात को ऽान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने रैगिंग की पूर्णतया रोकथाम के लिए केन्द्र और राज्य सरकारों को राघवन कमेटी की सिफारिशों को लागू करने के निर्देश दिये।
मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ही केन्द्र सरकार ने आर के राघवन कमेटी का गठन किया था। राघवन कमेटी ने देश के अनेकों शिक्षण संस्थानों में जाकर 10 हजार 470 छात्र-छात्राओं से बातचीत के आघर पर एक रिपोर्ट तैयार कर सर्वोच्च न्यायालय को सौंपीं। राघवन कमेटी की कुछ सिफारिशों को यहां पेश करना उचित होगा :
1. सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में एंटी रैगिंग कमेटी/स्कॉड का गठन करें ताकि इस बुराई को रोका जा सके।
2. सभी शिक्षण संस्थाओं के अपनी विवरणिकाओं प्रोस्पेक्टस में स्पष्ट रूप से लिखें कि जो भी छात्र रैगिंग में लिप्त पाये जायेंगे, उनका प्रवेश रद्द कर दिया जाएगा। और अगर सीनियर छात्र ऐसा करेंगे तो उन्हें निष्कासित कर दिया जाएगा।
3. संस्थान में रैगिंग होने पर संस्थान दोषी छात्र के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करायें। शिकार छात्र या उसके अभिभावक द्वारा पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराये जाने के बावजूद संबंति शिक्षण संस्थान ऐसे मामलों में प्राथमिकी दर्ज कराने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं होगा।
4. सभी शिक्षण संस्थानों को अपने यहां रैगिंग के खिलाफ जागरूकता शुरू करनी चाहिए।
5. जो शिक्षण संस्थान अपने यहां रैगिंग रोकने में असफल रहेंगे उन्हें सरकार की ओर से मिलने वाला अनुदान या आर्थिक सहायता रोक दी जाएगी।
राघवन कमेटी की सिफारिशों के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रैगिंग करने वाले छात्रों के खिलाफ आपराकि मुकदमा दर्ज किया जाये और दोषी छात्रों को संस्थानों से निकाल दिया जाये और यह सुनिश्चित किया जाये कि उन्हें दोबारा भी दाखिला न मिल पाये। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिये कि रैगिंग के मामलों की प्राथमिकता के आघर पर सुनवाई की जाये। ताकि दोषियों को जल्दी से जल्दी कठोर दंड दिया जा सके। जाहिर है रैगिंग के खिलाफ कड़ाई बरतने को लेकर सुप्रीम कोर्ट का आदेश स्वागतयोग्य है परन्तु रैगिंग को आपराकि मामलों की श्रेणी में रखकर दोषी छात्रों के साथ अपरायिों की तरह पेश आने से इस समस्या को समाप्त नहीं किया जा सकता। इससे तो उल्टा छात्रें के अपराीकरण को प्रोत्साहन मिलेगा। रैगिंग के दोषी छात्रों का कैरियर तो बर्बाद ही होगा। साथ ही जेलों में अन्य अपरायिों के संसर्ग में आने से ऐसे छात्रों के अपराघें की ओर जाने की संभावना बढ़ जाएगी। रैगिंग केवल कानून व्यवस्था का मामला नहीं है जिसे कठोर कानून बनाकर हल किया जा सके। रैंिगंग की समस्या को समाप्त करने के लिए हमें समाज में मौजूद उन कारणों को समाप्त करना होगा जो रैगिंग के फलने-फूलने के लिए खाद, पानी का काम करते हैं। रैगिंग हिन्दुस्तान की जमीन पर पैदा नहीं हुई है। यह विक्टोरियाई इंग्लैंड की एक ऐसी कुप्रथा है जो अंग्रेजी राज्य के साथ भारत आई है। उन्नीसवीं सदी में इंग्लैंड में बड़ी शिक्षण संस्थानों में दाखिला पाना अभिजात्य संस्ति का एक हिस्सा था और रैंगिंग उस कुलीनता में प्रवेश का एक वित रिवाज।
औपनिवेशिक काल में हिन्दुस्तान में ब्रिटिश द्वारा कॉलेज खोले गये जहां अंग्रेजों व भारतीय अभिजातों के बच्चे पढ़ते थे। इन शिक्षण संस्थानों में अंग्रेजों के साथ ही रैगिंग का प्रवेश हुआ और वहीं से हिन्दुस्तान में यह कुप्रथा फैली है। लेकिन हिन्दुस्तान में आजादी के साठ साल बाद भी रैगिंग न केवल मौजूद है बल्कि इसके तौर-तरीके दिन-प्रतिदिन अकि वीभत्स व वित हुए हैं। हमारे देश में आज भी इंजीनियरिंग या मेडिकल कॉलेजों में दाखिला, कुलीन वर्ग में दाखिले के समान है। इन कॉलेजों में भयावह रैगिंग होती है। जिसकी देखादेखी अन्य कॉलेजों के छात्र भी रैगिंग करते हैं। कुछ साल पहले दिल्ली के इंजिनियरिंग कॉलेज में एक लड़के से कुछ सीनियर लड़कों ने इलेक्टिक हीटर पर पेशाब करने को कहा। उस लड़के की वहीं मौत हो गयी। ऐसी दिल दहला देने वाली घटनाओं की बहुत लंबी फेहरिस्त तैयार की जा सकती है। रैगिंग का आलम यह है कि थोराट कमिटि की रिपोर्ट अभी पेश हुई है। उस रिपोर्ट के अनुसार अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली में आज की तारिख में कुछ खेल दलित तबके से संबं रखनेवाले छात्र नहीं खेल सकते हैं। दरअसल रैगिंग च-नीच जैसे भावों को जन्म देता है। बिहार में 12 और 13 की संख्या का कोड विश्वविद्यालय में चलता है। 12 का 1 और 2 को एक-दूसरे जोड़ने पर अंग्रेजी का अक्षर श्त्श् तैयार होता है जो राजपूत की जाति के लिए इस्तेमाल होता है। 13 को मिलाने पर अंग्रेजी का अक्षरश्श्ठश् तैयार होता है। बी का इस्तेमाल ब्रांण और भूमिहार जातियों के लिए होता है। ये कोड इनकी रक्षा और विशिष्टता के लिए ड़ल्ले से व्यवहार में लाया जाता है। समाज में व्याप्त जातिगत भेद और दुराव के पेंच इतने ज्यादा हैं कि उसे केवल कानून के इस्तेमाल से ठीक नहीं किया जा सकता है। इसे दूर करने के लिए जातिगत भेदभावों की लड़ाई और आर्थिक समानता की लड़ाई को लड़ना और जीतना होगा।
आजादी के बाद भी हिन्दुस्तान में पूंजीवादी विकास ने निम्न तबकों के कुछ एक हिस्सों को भी उच्च शिक्षा के अवसर प्रदान किये परंतु उच्च शिक्षण संस्थानों में अंग्रेजों के जाने के बाद भी इस देश के अभिजात्यों का दबदबा रहा है जिनके भीतर श्रेष्ठ होने के भाव, अमीर होने का गर्व कूट-कूटकर भरा है। वे भला ये कैसे बर्दाश्त करे कि निम्न वर्ग के छात्र आकर उनके साथ बराबरी में बैठकर पढ़े। उनके भीतर गरीब तबके से आये छात्रों के प्रति घृणा व द्वेष पनपनता है और जो रैगिंग के दौरान बाहर निकलता है। हिन्दुस्तानी समाज में आर्थिक असमानता के साथ-साथ अन्य कई असमानताएं भी हैं जो समस्या को और भी अकि जटिल बना देती है जिसकी अभिव्यक्ति हमें रैगिंग के दौरान देखने को मिलती है। रैंिगंग में जातीय उत्पीड़न से लेकर यौन-उत्पीड़न तक की घटनायें देखने-सुनने को मिलती हैं। यदि समाज में व्यक्ति के व्यक्तित्व का संकट ही बहुत गंभीर हो तो वह हालातों को और गंभीर बना देता है। समाज में अपरा और हिंसा को बढ़ाता है। जिसके दर्शन हमें रैगिंग के दौरान भी होते हैं।
पता : स्वतंत्र मिश्र, सी-1/118, मुस्कान अपार्टमेंट, सेक्टर-17,
रोहिणी, दिल्ली-110089, मो. - 09868951301

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