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एक शब्द है पागल'। इस शब्द का हमारे जीवन में बड़ा महत्त्व है। दुनिया में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं जिसे कभी पागल न कहा गया हो। कोई भी मां बच्चे की ऊल-जुलूल, लेकिन मासूम हरकत पर कहती है, धत पागल और बच्चे की छोटी-सी गलती पर बड़ा दंड देने पर उतारू पिता को कहती है, पागल हो गए हैं क्या? एक मैचिंग ब्लाऊज के लिए शहर के तमाम कपड़ा दुकानों के काउंटर पर कपड़ों का अम्बार लगवा देने वालियों के पति अक्सर खीझकर कहते हैं–तुम तो पागल हो।
इस संसार में हर व्यक्ति दूसरे को पागल समझता है। कोई किसी को प्यार में पागल समझता है तो कोई किसी को धन के पीछे और कोई किसी को पद के मद में। किसी की जान लेनेवाला भी पागल कहलाता है और किसी के लिए जान देने वाला भी। अनलहक कहने वाला मंसूर, विष पीने वाले सुकरात, ऐवरेस्ट पर पांव रखने के ख्वाहिशमंद हिलेरी और तेनजिंग, बौद्ध पांडुलिपियों के लिए दर्रा-दर-दर्रा पारकर तिब्बत पहुंचने वाले राहुल सांकृत्यायन, अंग्रेजों के खिलाफ निहत्था खड़ा होने वाले महात्मा गांधी, प्रेम का संदेश देनेवाले ईसा और ज्ञान की खोज में अपने मन के भीतर और बाहर भटकते बुद्ध सबको उनके जीवन में कभी न कभी पागल समझा गया।
क्या सचमुच ये पागलपन की परिधि में आते हैं? इस प्रश्न पर विचार करने से पहले पागलपन के एक अलग आयाम का जायजा लें। पेश हैं कुछ नमूने।
मोहन अपने खेत में हल चला रहा था। कल दोपहर में अचानक उसका व्यवहार बदल गया। वह बैलों को अकारण पीटने लगा। हर आने-जाने वाले को ढेला उठाकर मारने लगा। वह इधर-उधर भागने लगा। उसे लगने लगा कि कुछ लोग उसे मारने आ रहे हैं। उसे ÷मारो-मारो' की आवाज सुनाई देने लगी। वह भागते-भागते कुएं में कूद गया।
गांव के लोगों ने समझा कि मोहन जरूर कल बंसवाड़ी में फारिग होने के लिए गया होगा और उसे भूत ने पकड़ लिया है। गांव का सरपंच समझदार था। उसने लोगों की मदद से उसे कुएं से निकाला और इलाज कराने के बाद मोहन ठीक हो गया।
45 वर्षीय सुधा जी अपनी नयी पड़ोसन के घर एक दिन चाय पीने गयीं। लौटकर घर आने के बाद उनके सर में दर्द होने लगा। उन्हें थोड़ी घबराहट होने लगी। अचानक उनके दिमाग में आया कि कहीं पड़ोसन ने चाय में कुछ मिला तो नहीं दिया था। शक का यह अंकुर एक साल में विशाल वृक्ष बन गया। उन्हें हर इंसान के भीतर अपनी पड़ोसन ही नजर आती है। घर और बाहर के लोग उन्हें पागल समझते हैं। उनके घर में पिछले कुछ महीनों से उन्हें बांधकर पागलखाने में भर्ती कराने के विषय पर विचार चल रहा है।
सुरेश पर बंबई जाने का भूत सवार है। वह सुनील शेट्टी की तरह दिखना चाहता है। कभी-कभी तो वह रात भर कसरत करता रह जाता है। खूब खाना, खूब कसरत करना, दोस्तों पर पैसे खर्च करना और शाम को भांग खाना, यही उसकी दिनचर्या है। वह बोलता है तो बोलता ही चला जाता है। एक सांस में हजार अफसाने कह डालने को बेताब नजर आता है, उसके चाटुकार उसे हीरो कहते हैं और घरवाले पागल।
हमारे सामने विचार के लिए दो सेट हैं। पहले सेट का पागल विशेषण एक छिछली प्रतिक्रिया भर है–मानवीय गुण और क्षमताओं के असामान्य अथवा विशिष्ट विस्तार पर। लेकिन यहां समझ है, सुरक्षा है, त्याग है और कल्याण की कामना है। यहां भावना, विचार और व्यवहार में सामंजस्य और संतुलन है। यहां हर हरकत विचार सम्मत कर्म है। हर कर्म के पीछे कोई सार्थक और रचनात्मक उद्देश्य है। यहां काफी सकारात्मक चीजें हैं नहीं है तो केवल अपनी सुधबुध और अपने स्वार्थ की चिंता। बड़ी मुबारक बात है इस तरह का पागलपन। ऐसे पागलपन से ही बनी है यह दुनिया जिसमें सही और सामान्य की सीमा में आने वाले अरबों लोग रहते हैं।
इस दुनिया में ऐसे लोग भी हैं जिन्हें हम उपेक्षा, घृणा और तिरस्कार से पागल कहते हैं। दरअसल ये लोग मानसिक रूप से बीमार होते हैं। बीमारी इन्हें दुनिया से अलग करती है। इनके द्वारा उत्तेजना में कभी-कभी की गई कोई आक्रामक हरकत इन्हें डरावना बनाती है। ये बेहतर तरीके से काम नहीं कर पाते, इसलिए परिवार और समाज इन्हें अनुपयोगी मानने लगता है।
तो इन पागलों का क्या किया जाए? क्या इन्हें गोली मार दी जाए या इन्हें समुद्र में डुबा दिया जाए या चहारदीवारियों के बीच इन्हें बंद कर दिया जाए? जी नहीं ऐसा कुछ भी नहीं किया जाये।
सबसे पहले ÷पागल' शब्द का सामाजिक बहिष्कार किया जाए। जिन्हें यह समाज पागल कहता है, उनमें कुछ महान लोग होते हैं और कुछ बीमार। महान लोग तो स्वयं हमारी चिंता करते हैं और बेहद सार्थक चिंता करते हैं, अतः हमें इनकी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। हमें चिंता करनी है बीमार लोगों की। पागलपन एक मनोरोग है, इसे अंग्रेजी में सायकोसिस कहते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम ÷पागलपन' की जगह सायकोसिस का प्रयोग करें। भूमंडलीकरण के इस युग में आखिर किसी भी भाषा के शब्द से परहेज क्यों
हो।
सायकोसिस एक मनोरोग है। इसके पूर्व निर्धारित और सुविचारित लक्षण हैं। ऊपर लिए तीनों उदाहरणों पर गौर करें। आप पाएंगे कि रोगी के व्यवहार में अचानक या क्रमशः बदलाव आता है। ये बदलाव प्रकृति और समाज के संदर्भ में पूरी तरह असंतुलित नजर आते हैं। रोगी की समझ का संबंध वास्तविक जगत से टूट जाता है। उनकी संवेदना ऐसी चीज ग्रहण करती हैं जो कहीं नहीं हो रही होती हैं। उनकी निर्णय क्षमता अंशतः या पूर्णतः ध्वस्त हो जाती है। भूत और डायन जैसे काल्पनिक शत्रुओं से आतंकित ये लोग मनोरोगी होते हैं। इन्हें देख-रेख चाहिए, सुरक्षा चाहिए, इलाज चाहिए और सबसे अधिक वह प्यार जिसकी जड़ मनुष्यता की सरस भूमि में बहुत गहराई तक धंसी हो।
(प्रस्तुति : मनोवेद डेस्क)
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