|
जड़ों की एक गुलाबी सुबह।
रत्ना ने रज+ाई से मुंह निकाला। परदे की पतली-सी फांक में से झांकती किरणों ने उसे बता दिया–समय सात बजे से ऊपर हो चुका था।
रज+ाई सुखद गरमाहट से भरक रही थी। अरुण उससे सटकर लेटा था और उसने अपने हाथों से उसकी कमर को बांध रखा था। उसकी उठती-गिरती सांसें रत्ना को अपनी पीठ पर महसूस हो रही थीं। रत्ना ने सोचा–आज छुट्टी क्यों नहीं है?
उसने फिर आंखें बंद कर लीं। बाहर से खटर-पटर की आवाज+ें आनी शुरू हो गई थीं। घर में जागर हो चुकी थी।
रत्ना का मीठा आलम धीरे-धीरे कम होने लगा।
आठ बजे नीति को स्कूल भेजना था। उसे तैयार करने के लिए पूरा एक घंटा चाहिए। पहले तो वह बिस्तर से बाहर ही नहीं निकलती, फिर अगर उठ जाए तो मम्मी की शॉल ओढ़कर टी.वी. के सामने बैठ जाती है। जैसे-तैसे उसे टी.वी. से दूर हटाओ तो उसे पानी ठंडा लगने लगता है। तरह-तरह के नखरे दिखाते हुए वह आधा घंटे में मुंह-हाथ धो पाती है। फिर उसे अपनी ड्रेस पसंद नहीं आती। कभी वह मैली होती है, कभी उस पर प्रेस ठीक नहीं होती, कभी वह ढीली है, कभी टाइट! नाश्ते के लिए वह दस बार ना-नुकर करेगी पर स्कूल के डब्बे में रखने के लिए उसे सुंदर दिखनेवाली चीज+ें चाहिए।
आठ बजते-न-बजते वह एक बार डांट ज+रूर खाती है, एक-दो बार रोती है फिर अनमने ढंग से, कंधे पर भारी-भरकम बस्ता लादकर स्कूल जाने को तैयार हो जाती है। तभी बग़ल वाले दीपू और दिव्या आवाज+ लगाते हैं और उसकी पूरी चिड़चिड़ाहट तुरंत काफूर हो जाती है। वह दौड़कर गेट के बाहर खड़ी हो जाती है और पापा से जल्दी स्कूल छोड़ने की जि+द करने लगती है। तब अरुण तीनों को स्कूटर पर बिठाते हैं और स्कूल छोड़ने जाते हैं।
रत्ना ने चौंककर देखा, अरुण का हाथ अब भी उसकी कमर को घेरे में लिए हुए था और वह मज+े से नींद ले रहा था। उसने धीरे-से उसका हाथ हटाया और उठने का उपक्रम करने लगी। पर आज उसने एक अजीब बात देखी।
नीति पहले से उठकर बिस्तर के सिरहाने बैठी थी।
सात-सवा सात का वक्+त था और रत्ना को उठने की जल्दी थी। पर मुश्किल ये थी कि उसके और अरुण के शरीर पर एक भी वस्त्र नहीं था।
रत्ना ने धीरे-से रज+ाई से बाहर निकलने की कोशिश की, पर नीति चाक-चौबंद बिल्कुल सिरहाने पर ही बैठी थी।
उसे थोड़ी शर्म-सी लगी। ये ठीक था कि नीति उसकी बेटी थी और अभी पांच साल की ही थी, पर फिर भी, ऐसी हालत में उसे देखकर उससे अचानक कुछ पूछ बैठे तो? फिर बाहर जाकर पड़ोसियों को कुछ बक-झक कर दे तो? नहीं-नहीं, एकदम इस तरह निकलना ठीक नहीं होगा।
उसने आसपास नज+रें दौड़ाई, कपड़े कोने में टेबल पर रखे थे, वहां जाए बिना काम नहीं चलनेवाला था। उसने नीति को फुसलाने की कोशिश की, ÷÷नीति बेटे, आज तुम बहुत जल्दी सोकर उठ गईं। अभी वक्+त है, थोड़ी देर और सो जाओ, हम तुम्हें उठा लेंगे।''
÷÷मम्मी-मम्मी, सूरज तो निकल आया, देखो चमक अंदर आ रही है।''
÷÷वो तो ऐसे ही है बेटा, हमने घड़ी देखी है, अभी साढ़े छह बजे हैं, तुम आधा घंटा और सो लो।''
÷÷नहीं मां, चलो न घूमने चलते हैं।''
÷÷मान जाओ बेटा, अभी जल्दी है, ओढ़ लो और सो जाओ। हम तुम्हें उठा लेंगे।''
÷÷नहीं मां...''
÷÷सो जाओ...''
÷÷नहीं...''
रत्ना समझ गई, अब ये जि+द पर आ गई है, इसे समझाना मुश्किल है। उसने धीरे-से अरुण को टहोका लगाया।
अरुण ने जमुहाते हुए कहा, ÷÷क्या बात है भई, ये सुबह-सुबह क्यों परेशान कर रही हो?''
÷÷देखो न, ये नीति इतनी सुबह से उठकर बैठ गई है।''
÷÷तो क्या हुआ? ठीक तो है। उसे सुबह उठना ही चाहिए।''
÷÷क्या ठीक है? कुछ समझते तो हो नहीं...''
अरुण ने रत्ना की ओर देखा, फिर अपनी ओर, और फिर नीति की ओर। बात वाक़ई समझने की थी।
उसने नीति को पुचकारते हुए कहा, ÷÷आओ नीति बेटे, हमारे पास आ जाओ।''
पर इस बुलावे के साथ ही उसके दिल में खटका-सा हुआ।
कहीं नीति उनके पास आकर, छाती पर हाथ रखकर और जांघों पर पैर रखकर, चिपककर लेटने की जि+द करने लगी तो? ऐसा वह अक्सर करती है। उसका हाथ यहां-वहां भी जा सकता है। नहीं, उसे उनके पास नहीं आना चाहिए।
अच्छा हुआ नीति ने उसके बुलावे को खुद अमान्य कर दिया। उसने कहा, ÷÷पापा उठिए न, चलिए थोड़ी देर बाहर घूमेंगे।''
अरुण का मन हुआ कि वह उठे और कपड़े पहनकर बाहर निकल जाए, आख़िर अपनी छोटी-सी बिटिया से शर्म कैसी? उसने मनोविज्ञान की कई विदेशी किताबों में पढ़ रखा था कि बच्चे अगर कभी माता-पिता को इस तरह देख भी लें, तो इनमें कोई हर्ज नहीं, इससे उन्हें सामान्य बनने में मदद मिलती है। पर जाने क्यों, इस समय उसे उस मनोवैज्ञानिक पर बहुत विश्वास नहीं हुआ।
÷÷नीति बेटे, देखो तो दादी क्या कर रही है?''
÷÷पूजा कर रही है।''
÷÷तुम्हें कैसे मालूम?''
÷÷घंटी की आवाज+ आ तो रही है।''
अरुण का ये वार ख़ाली गया। अब उसने पूछा–
÷÷आज तुम टी.वी. देखने नहीं गईं।''
÷÷नहीं पापा, हम आजकल टी.वी. देखकर बड़ा बोर होते हैं।''
बच्चे बड़ों की भाषा कितनी जल्दी पकड़ते हैं, अरुण ने सोचा।
अब उन्होंने आख़िरी कोशिश की।
÷÷तुमने सूसू कर ली?''
÷÷हां पापा।''
उसे लगा इस बात पर पापा शाबाशी देंगे पर उन्होंने कुछ नहीं कहा।
अब अरुण ने रत्ना की ओर देखा और इशारे से पूछा–क्या करें?
उसने इशारे से ही जवाब दिया–इसे खिसकाओ भई। बड़ी देर हो चुकी है।
÷÷क्यों पापा?''
÷÷हम कह रहे हैं न, चली जाओ।''
÷÷पापा आप भी चलिए न।''
÷÷देखो जि+द नहीं करते, तुम जाओ, हम आते हैं।''
÷÷पा...पा, चलिए न।''
अरुण ने अचानक आवाज+ तेज+ करते हुए कहा, ÷÷हमने कहा न, तुम जाओ, सुनती क्यों नहीं?''
इस बार नीति ने धीरे-से तकिया हटाया, पैरों में चप्पलें डालीं, पापा की ओर देखा और बाहर निकल गई।
रत्ना ने जल्दी से रज+ाई हटाई और वहीं कोने में पड़े कपड़े पहनने लगी।
अचानक दरवाज+े के पीछे से एक चंचल मुखड़े ने झांककर कहा, ÷÷मम्मी, शेम-शेम...'' और भाग खड़ा हुआ।
रत्ना ने जैसे-तैसे मैक्सी पहनी और पीछे भागते हुए कहा, ÷÷ठहर शैतान...''
रेस्त्रां में दोपहर से साभार
... |