माइंड योर लैंग्वेज यानी जुबान सँभाल के
डॉ विनय कुमार
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शब्दों के अर्थ शुरुआती अर्थों तक ही सीमित नहीं रहते। सभ्यता की विकास-यात्र में समय-समय पर नए अर्थ जुड़ते जाते हैं। यह आवश्यक नहीं कि नए अर्थों की आमद सकारात्मक ही हो। कुछ शब्द बेहद घिनौने और अमानवीय अर्थ भी ग्रहण कर लेते हैं। उदाहरणार्थ उन शब्दों को लिया जा सकता है, जो कभी किसी काम, किसी धंधे के लिए प्रयुक्त्त होते होंगे, मगर कालान्तर में जातिसूचक होकर उपेक्षा, अपमान और तिरस्कार के पर्याय हो गए। ऐसे शब्दों से मुक्त होना आसान नहीं क्योंकि भाषा कोई कंप्यूटर सॉफ्टवेयर नहीं कि ÷डेलिट' बटन पर उँगली मारी और शब्द परिदृश्य से ग़ायब। जटिल समाजिक अर्थों से बोझिल शब्दों से निपटने का काम गहरी संवदेनशीलता, व्यापक सूझबूझ और सचेतता की माँग करता है।
भाषा और शब्दार्थ की बहस में मनोवेद डाइजेस्ट का हस्तक्षेप अकारण नहीं है। दुनिया की हर भाषा में ऐसे शब्द हैं जो मानसिक रोगों से परेशान लोगों के लिए नकारात्मक और अपमानजनक अर्थों में इस्त्तेमाल होते हैं। ये शब्द न सिर्फ फब्तियों की तरह कसे और गालियों की तरह दिए जाते हैं, पत्थरों की तरह बरसाए भी जाते हैं। ये शब्द पत्थरों की तरह सख्+त हैं और साँपों की तरह विषैले। जब हम इन शब्दों से पूछते हैं कि डँसना कहाँ सीखा और विष कहाँ पाया, तो वे कहते हैं–इतिहास से पूछो। और जब यह पूछते हैं कि तुम्हारा विषैलापन बढ़ता क्यों जा रहा है तो वे शान से कहते हैं–मीडिया से पूछो।
मनोचिकित्सा विज्ञान ने अपने तरीक़े से पूछने की कोशिश की है। इतिहास से हम ज्+यादा नहीं पूछ सकते क्योंकि गुज+रे ज+माने की सारी जानकारियाँ हमारे सामने हों यह संभव नहीं। उपलब्ध जानकारियों के आधार पर अनुमान-भर लगाए जा सकते हैं। मगर, मीडिया से पूछना संभव है क्योंकि वह हमारे सामने होता है-हमसे बोलता-बतियाता, एकदम लाइव। पूछना भी मीडिया से ही उचित है, क्योंकि इतिहास के साथ हम ÷इंटरएक्ट' नहीं कर सकते, जबकि मीडिया के साथ कर सकते हैं। बहस और संवाद के माध्यम से हम इसमें सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।
हमारे समय में मीडिया ही वह स्रोत है जो मानसिक रोगों से संबधित सूचनाओं और सरोकारों को लोगों तक पहुँचाता है।1 अपनी व्यापक पहुँच के कारण टीवी समाचार और अख़बार बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। सूचना देनेवालों को अक्सर यह लगता है कि वे सिर्फ सूचना दे रहे हैं और विवादास्पद और जटिल स्थितियों में वे यही कहकर बरी होने की कोशिश भी करते हैं, मगर सच तो यही है कि एक लोकतांत्रिक समाज में मीडिया जनमत (पब्लिक ओपिनियन) बनाने में अहम ÷भूमिका' निभाता है।
कई शोध मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में मीडिया की असावधान और गै+रजिम्मेवार भूमिका के आँकड़े पेश करते हैं।
l जार्ज मैसन यूनिवर्सिटी, वर्जिनिया में 1999 में प्रकाशित 6 अमेरिकी अखबारों के 300 लेखों–समाचार कथाओं का अध्ययन किया गया। शोध-दल ने पाया कि 10 प्रतिशत से भी कम प्रस्तुतियों में मानसिक रोगियों की सरात्मक छवि पेश की गयी थी और उनके विचारों को स्थान दिया गया था। इसी तरह के एलबर्टा में हुए एक शोध के अनुसार 72 समाचार कथाओं में से सिर्फ एक में मनोरोगी को अपना पक्ष रखने का मौका दिया गया था।2
l ग्लासगो विश्वविद्यालय के एक दल ने पाया कि 62 प्रतिशत समाचार कथाएँ मनोरोगियों के हिंसक व्यवहार पर केंद्रित होती हैं।3
l एक अन्य शोध के अनुसार मनोरोगियों से जुड़ी दो-तिहाई से अधिक समाचार कथाएं अपराध केन्द्रित होती हैं। जबकि मात्र 10 प्रतिशत समाचार ही अपराध समाचार होते हैं।4
l टेलिविजन कार्यक्रमों की अंतर्वस्तु के विश्लेषण से पता चलता है कि मनोरोगों को हिंसा के साथ जोड़ दिया जाता है। अध्ययन में मनोरोगियों के रूप में प्रस्तुत चरित्रों में 72 प्रतिशत हिंसक और हत्यारे पाए गए। जितनी हिंसक घटनाएँ मनोरोगियों द्वारा 15 दिनों के भीतर टीवी पर दिखायी गयीं, वे सचमुच के मनोरोगियों के नाम से जुड़ी साल-भर की घटनाओं से बीस गुना अधिक थीं।5
इन शोधों से प्राप्त सूचनाएँ हमें बताती हैं कि मानसिक रोगों से ग्रसित लोग अनुत्पादक, हिंसक और समाज पर भार होते हैं। समाचार कथाओं में मनोरोगियों को अपना पक्ष प्रस्तुत करने के अवसर नहीं दिए जाने से संदेश जाता है कि वे विचारशून्य और अपना पक्ष रखने में अक्षम होते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि मनोरोगी यदि गाँजा, शराब, स्मैक जैसे मादक पदार्थों का सेवन न कर रहे हों तो वे आम लोगों से अधिक हिंसक नहीं होते6 और यह भी कि 97 प्रतिशत हिंसक अपराध उनके द्वारा किए जाते हैं, जिन्हें कोई मनोरोग नहीं होता।7
इन निष्कर्षों की रोशनी में अगर देखें तो साफ पता चलता है कि मानसिक रोगों के चित्रण और विवरण के संदर्भ में मीडिया अपना दायित्व ठीक से नहीं निभा रहा है। मीडिया का काम लोक धारणाओं की अविकल प्रस्तुति भर नहीं है। 10 प्रतिशत से भी अधिक आबादी से संबद्ध इस समस्या से जुड़े मुद्दों को पूरी संवेदनशीलता के साथ वैज्ञानिक कसौटी पर कसकर ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए। वैज्ञानिक तथ्यों तक पहुँचना जितना कठिन प्रतीत होता है, उतना है नहीं। संचार क्रांति के इस युग में मनोरोग एवं मनोविज्ञान से संबिधित लाखों किलोबाइट सूचनाएँ इंटरनेट पर अहर्निश उपलब्ध हैं। अगर मीडियाकर्मी इतनी जहमत न उठाना चाहें या इंटरनेटीय सूचनाओं की भाषा बोधगम्य न लगे तो वे अपने शहर में उपलब्ध किसी मनोचिकित्सक से संपर्क कर सकते हैं।
मीडिया की अवैज्ञानिक और तथ्यहीन प्रस्तुतियाँ लोगों की धारणाओं को ही प्रदूषित नहीं करतीं, मनोरोगों से संबंधित शब्दों में नकारात्मक अर्थ ठूँसने का काम भी करती हैं। 1950 के बाद हुए वैज्ञानिक आविष्कारों की प्रचुरता और मानसिक रोगों से ग्रस्त लोगों के अधिकारों की चर्चाओं के बावजूद ऐसी चूकों का सिलसिला थमा नहीं है। 15 अक्त्तूबर 2007 के दैनिक हिंस्दुस्तान में एक ख़बर का शीर्षक था -÷÷पागल ने थाने की जीप में आग लगाई।'' इस ख़बर में आग लगाने वाले व्यक्ति का नाम और पता भी लिखा है। ख़बर में दिए गये विवरणों से यह भी पता चलता है कि वह व्यक्ति कई बार पटना के चिड़ियाघर में बाघ के पिंज+ड़े में घुस चुका है और दो बार जिप्सी का शीशा तोड़ चुका है।
अख़बार से पूछा जाना चहिए कि क्या यह खबर ÷थाने की जीप में आग' और ÷एक पागल की ख़तरनाक हरक़त' की सूचना देकर रुक जाती है ? क्या यह मनोरोग से ग्रस्त व्यक्ति को ख़तरनाक बताकर कलंकित नहीं करती। क्या ख़बर यह संदेश नहीं देती कि ÷आक्रामकता' और ÷पागलपन' एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। क्या यह ख़बर ÷पागल' नामक शब्द को हिंसा से नहीं जोड़ती ? अख़बार में थाने की सूचना और पब्लिक ओपिनियन को तो प्रकाशित किया गया, मगर कथित ÷पागल' के वक्तव्य को कोई जगह नहीं दी गयी। अगर ख़बर और उसकी पंक्तियों के बीच की ख़बरों को ध्यान से पढ़ा जाए तो पता चलता है कि उस व्यक्ति को ढूँढ़ने या उससे बात करने की कोशिश भी नहीं की गयी, उसकी हरक़तों के पीछे की त्रासदियों या स्थ्तियों को पढ़ने-परखने की बात तो दूर। कथित मनोरोग-ग्रस्त व्यक्ति का नाम-पता छापते वक्त नहीं सोचा गया कि एक दुखी मनुष्य को ÷अखबार तक में घोषित पागल' के कलंक से नवाज+ा जा रहा है। ÷सजगता' के लिए शुक्रिया, मगर क्या आपको ÷संवेदनशील' भी नहीं होना चाहिए ? तनिक नहीं सोचा गया कि ऐसे लापरवाह अख़बारी ठप्पे अपने नकारात्मक संदेश की वजह से एक बीमार मनुष्य को ठीक होने के बाद समाज में स्वीकृत-समंजित होने के अधिकार से वंचित कर सकते हैं।
मैंने आरंभ में जिन पथराये-ज+हराये शब्दों का जि+क्र किया था उनमें एक शब्द है ÷पागल'। यह शब्द अपने नकारात्मक, भयोत्पादक और घिनौने अर्थों के कारण मनोरोग से ग्रसित मनुष्यों के लिए इस्तेमाल होने के लायक नहीं है। पूरी सजगता के साथ इस शब्द के प्रयोग से बचा जाना चाहिए। इन दिनों ब्रिटेन में मनोरोग से जुड़े कलंक और कंलक को बढ़ानेवाली भाषा के विरूद्ध एक अभियान चलाया जा रहा है–÷माइंड योर लैंग्वेज'। हम इसी अभियान के शीर्षक का तर्जुमा करते हुए समाज से गुज+ारिश करना चाहते हैं–÷जुबान सँभाल के।'
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