मनोरोगियों को बेड़ियां क्यों ?
नेहा सईद एवं डॉ. सईद अख्तर
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इस सभ्य समाज में भी मनोरोगियों के साथ परिवार, समाज और कभी-कभी तो विभिन्न चिकित्सा प्रणालियों के माननीय दिग्गजों के द्वारा जो व्यवहार होता है, वह बड़ा ही दिल दहलाने वाला होता है। रोगियों को आज भी हथकड़ियों से जकड़ कर रखा जाता है, रस्सियों से उनके हाथ पैर बाँध दिए जाते हैं , कमर में रस्सी बाँध कर जानवरों की तरह खींचा जाता है। कथित सभ्य समाज का यह घिनौना रूप हमें अक्सर जहाँ-तहाँ दिखाई पड़ता है। कभी पड़ोस में, कभी स्टेशन पर, कभी चिकित्सालयों में तो कभी मजारों पर। हम आज जानवरों के अधिकारों की बात करते हैं, उन पर क्रूरता के विरुद्ध कानून बनाते हैं और इसके लिए आन्दोलन भी करते हैं, मगर मनोरोगियों के साथ जो निश्चय ही जानवर नहीं है, ऐसा दुर्वव्यहार क्यों ? हम इस विषय पर यदाकदा टिप्पणी तो कर देते हैं पर गहराई से विचार और इस दिशा में ठोस पहल नहीं करते। मानसिक बीमारी के कारण रोगी बेचैन रहते हैं। वे अपने सगे-संबंधियों एवं पड़ोसियों के साथ कभी-कभी मारपीट एवं असामान्य व्यवहार कर सकते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि मनोरोगी हिंसक होते हैं। शोधों से यह सिद्ध हो चुका है कि अधिकांश मनोरोगी दूसरों को हानि नहीं पहुँचाते तथा उनके द्वारा जानलेवा हमला करने की संभावना अत्यंत क्षीण होती है।
मानसिक रोग का इतिहास बहुत पुराना है। कह सकते हैं कि मानव जाति के इतिहास के साथ ही मानसिक रोग का इतिहास भी जुड़ा हुआ है। समय पर इनके उपचार के तरीके एवं स्वरूप में बदलाव आता रहा है। यदि इतिहास पर नजर डालें तो हम यह पायेंगे कि ये बदलाव सकारात्मक एवं विकासशील रहे हैं। यदि आधुनिक चिकित्सा पद्धति या मानसिक स्वास्थ्य आंदोलन से पूर्व की स्थिति पर ग़ौर करते हैं, तो यह पाते हैं कि पूर्व में मानसिक रोगियों की स्थिति बदतर थी, साथ ही साथ रोग को आसाध्य माना जाता था। दैव प्रकोप के सिद्धांत का बोलवाला था।
प्राक्इतिहास काल में मनोरोगों के बारे में लोगों का यह मत था कि ये रोग भूत-प्रेत, जादू-टोना के परिणाम हैं। इनका उपचार वे अपने पारम्परिक रीति-रिवाजों के अनुसार झाड़-फँूक से करते थे। लोगों का ऐसा विश्वास था कि झाड़-फूँक के प्रभाव से शरीर के अन्दर से रोग पैदा करने वाली बुरी आत्मायें बाहर आ जायेंगी। इस काल में एक अद्भुत सर्जरी का भी प्रचलन था। लोगों की ऐसी धारणा थी कि मानसिक रोग से ग्रस्त व्यक्ति की खोपड़ी में छेद कर देने से बुरी आत्मा बाहर आ जाती है, और व्यक्ति सामान्य व्यवहार करने लगता है।
अरबी चिकित्सक रोहजेस ने अल-मनसूरी तथा अल-वाही नामक पुस्तकें 10वीं शताब्दी में लिखीं। इन्हें मील का पत्थर माना जाता है। इस पुस्तक में मानसिक रोगों को पारिभाषित किया गया है तथा लक्षण एवं उपचार का वर्णन किया गया है। इस काल में बग़दाद में मानसिक अस्पताल की स्थापना की भी सूचना मिलती है। जुडिज्म ने व्यक्ति को समझने में व्यक्तित्व की भिन्नता पर जोर दिया था। इस्लाम की मान्यता यह रही कि मानसिक रोग बनावटी नहीं हो सकते तथा मानसिक प्रक्रिया में परिवर्तन, अच्छे एवं बुरे दोनों हो सकते हैं।
मानसिक रोगों को मध्य युग में भी शैतान का प्रकोप समझा जाता था। जो व्यक्ति अतार्किक विचारों एवं वहमों से पीड़ित रहते थे, उन्हें बुरी तरह प्रताड़ित किया जाता था। कहीं-कहीं तो उन्हें मार भी दिया जाता था। 17वीं शताब्दी में सभी असामान्य व्यवहार करने वालों को दूसरे अपराधियों के साथ जेल में डाल दिया जाता था। वहाँ इन रोगियों के साथ क़ैदियों से भी ज्यादा बुरा व्यवहार होता था। इन्हें बेड़ियों में बाँधकर रखा जाता था।
19वीं शताब्दी के अन्त तक मानसिक रोगियों को पिंजड़े में रखना, बेड़ियों में जकड़ना एवं उन्हें अभिशप्त मानना जारी रहा। इन बेड़ियों को तोड़ने की दिशा में तीन मनोचिकित्सकों के काम को महत्त्वपूर्ण माना जाता है। पिनेल फ्रांस में, बेजामिन रश अमेरिका में एवं विलियम ड्यूक इंग्लैण्ड में। इन लोगों ने अपने-अपने देश के बहुत सारे अस्पतालों में मानसिक रोगियों के उत्थान के लिए सार्थक प्रयास किए तथा मानसिक रोगियों के उपचार के लिए अपने सुझाव व्यक्त किये। इन लोगों के अनुसार मानसिक रोगियों का भी सामान्य रोगियों की ही तरह प्रेम एवं आत्मीयता के साथ उपचार किया जाना चाहिए। पिनेल को मनोचिकित्सा का जनक माना जाता है तथा विलियम ड्यूक के विचारों को काफी महत्त्वपूर्ण। उनके अनुसार मानसिक रोगियों का उपचार मानवतापूर्ण बिना बेड़ियों के किया जाना चाहिए। बेजामिन रश ने मानसिक रोगों को मन एवं मस्तिष्क की बीमारी की संज्ञा दी। उन्होंने मानसिक बीमारी के उपचार के लिए रचनात्मक एवं व्यावसायिक चिकित्सा पर ज्यादा जोर डाला।
भारत में भी प्राचीन काल से ही मानसिक रोगियों को बेड़ियों में बाँधकर रखा जाता था ताकि परिवार एवं अन्य लोग सुरक्षित रह सकें। यहाँ के लोगों को भी लगता था कि भूत-प्रेत के प्रवेश करने पर व्यक्ति ऐसा व्यवहार करने लगता है।
अतः इस प्रकार के लोगों को सन्त, ओझा, आदि से झाड़-फूंक कराया जाता था ताकि उनका असामान्य व्यवहार ठीक हो जाय। इसके बाद भी जब रोगी ठीक नहीं हो पाता था तब इसके इलाज के बारे में सोचा जाता था। प्राचीन समय में ऐसे रोगियों का उपचार जड़ी-बूटियों से किया जाता था। जब जड़ी-बूटी के प्रयोग से रोगियों में सुधार दिखने लगे, तब लोगों को लगा कि मानसिक बीमारी या पागलपन को दवा से ठीक किया जा सकता है। दुर्भाग्य यह रहा कि संचार एवं आवागमन की सुविधा की कमी के कारण वैद्यों के अनुभवों का बड़े पैमाने पर उपयोग नहीं हुआ।
विश्व भर में मानसिक रोगियों की स्थिति में सुधार के लिए अनेक आंदोलन हुए हैं। सभ्यता के विकास एवं संचार और आवागमन की सुविधाओं के विकास के साथ लोगों को काफी हद तक महसूस होने लगा है कि मनोरोग भूत-प्रेत के द्वारा नहीं बल्कि जैविक कारणों से होते हैं। जागरुकता के बावजूद उपचार की उचित व्यवस्था के अभाव में मानसिक रोगियों को बांधकर रखने की परम्परा कायम है।
20वीं शताब्दी में भारत में कुछ जगहों पर मानसिक अस्पताल खोले गए। प्रारम्भिक चरण में अस्पताल में मानसिक रोगियों के उपचार हेतु उचित सुविधाओं का अभाव होने के कारण कुछ रोगियों को बांधकर रखा जाता था। इतने बड़े देश में गिनती के मानसिक अस्पतालों के द्वारा गांव-गांव तक मनोरोगों के बारे में जागरुकता नहीं फैलायी जा सकती है। इसके अलावा केन्द्र एवं राज्य सरकारों का उपेक्षात्मक रवैया भी एक बड़ी बाधा है। आजादी के बाद अन्य रोगों की रोकथाम संबंधी जानकारियों के प्रचार पर जितना खर्च किया गया, उसकी तुलना में मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में बहुत कंजूसी बरती गयी।
विभिन्न अध्ययनों में यह पाया गया है कि वर्तमान समय में भी मानसिक रोगियों को बेड़ियों में बांधकर अस्पताल ले जाया जाता है। लेखक ने 1993 में इस समस्या का अध्ययन किया था। अध्ययन के क्रम में यह देखा गया कि परिजन 64.3 प्रतिशत मानसिक रोगियों को रस्सी से, 25.7 प्रतिशत रोगियों को कपड़े से एवं 10 प्रतिशत रोगियों को लोहे की जंजीरों में बांधकर अस्पताल लाते हैं। अध्ययन से यह भी स्पष्ट होता है कि अधिकतर रोगी निम्न सामाजिक-आर्थिक स्थिति के, ग्रामीण एवं युवा होते हैं। ये रोगी उन्माद या स्किजोफ्रेनिया के मरीज होते हैं।
इस शोध में यह भी पाया गया है कि अधिकांश मरीजों के परिवार वाले उन्हें बिना किसी स्पष्ट कारण बाँधकर लाते हैं। कारण संभवतः वह डर होता है जिसे वे अपने मन में संजोए रहते हैं। उदाहरणतः उन्हें डर होता है कि रोगी अकस्मात उनपर हमला न कर दे अथवा रोगी जाने के क्रम में बस या ट्रेन से कूद न जाए या कहीं बिना बोले निकल कर भटक न जाए। बहुत से रोगियों के हाथ-पैरों में बेड़ियों के कारण घाव पाए गये, जिनसे मवाद आता दिखा। कुछ रोगियों की हड्डियों में हलकी टूट पायी गयी और कई रोगियों के हाथों की नस ख़राब होने के कारण हाथ नहीं काम करते दिखे। प्रश्न यह है कि मनोरोगियों को जंजीरों या रस्सियों से बांधना जब जरूरत नहीं तो केवल निराधार भय के कारण क्यों किया जाता है। प्रश्न यह भी है इस प्रकार के मानवाधिकार के उल्लंघन के विषय में हमारा समाज आंखें मूंदे क्यों रहता है।
20वीं शताब्दी में मानसिक रोगियों की स्थिति में सुधार की व्यापक कोशिश की गयी। इस दिशा में आधुनिक दवाओं एवं मनोचिकित्सा की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। नई-नई औषधियों का क्रमिक विकास हो रहा है। इन औषधियों के प्रभाव से मानसिक अस्पतालों की जरूरत कम होती जा रही है। अब हम बाह्य रोगी विभाग में ही दवाओं एवं मनोचिकित्सा से मानरोगों का प्रभावी इलाज कर सकते हैं।
भारत सरकार ने कई अधिनियम पारित किये हैं, जो मनोरोगियों के मानवाधिकारों की रक्षा करते हैं। इनमें प्रमुख हैं–मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम (1987), परसन विथ डिसएबिलिटी अधिनियम (1995) तथा मंदबुद्धि, ऑटिज्म और सेरेब्रल पाल्सी के रोगियों के लिए 1999 में पारित अधिनियम।
इन अधिनियमों और मनोचिकित्सा जगत की कोशिशों के कारण मानसिक रोगियों को बेड़ियों में बाँधने की दर में कमी तो आयी है मगर मनोचिकित्सा-सेवाओं के समुचित विस्तार के अभाव में लक्ष्य अभी दूर है। हम जानते हैं कि साधनों और सुविधाओं की कमी है, मगर इस कारण हमारी मनुष्यता में कमी क्यों हो ? वह व्यक्ति जो कल तक समाज और परिवार का अभिन्न अंग था, आपका प्यारा बेटा था, आपकी सुघड़ बहू थी–मानसिक रोग होने से वह इस क़दर तिरस्कार योग्य क्यों हो गया ? आज के युग में जब औषधियाँ इतनी प्रभावशाली हैं कि चन्द मिनटों में वांछित परिवर्तन ला देती हैं, तो फिर बेड़ियाँ क्यों?
नेहा सईद, स्नातकोत्तर मनोविज्ञान-विभाग राँची विश्वविद्यालय राँची।
डा. सईद अख्तर, मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी, केंद्रीय मनोचिकित्सा संस्थान, राँची।
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