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माना तो यही जाता था कि दवाओं से शरीर के रोग ठीक हो सकते हैं, मन के नहीं। मगर 1950 के बाद मनुष्य के मस्तिष्क और मन पर प्रभाव डालने वाली इतनी दवाएं विकसित की गई हैं कि मन के रोगों का तेजी से असरदार और सुरक्षित इलाज संभव हो गया है। आंकड़े गवाह हैं कि लोग इन पर भरोसा भी कर रहे हैं। मगर इस खुशखबरी के आनंद में नहीं भूलना चाहिए कि दवा आखिर दवा हैदृएक बाहरी चीज जो हमारे जिस्म में जाकर सिर्फ वही नहीं करती, जिसके लिए उसे तैयार किया गया है वह आदमी के शरीर में घुसकर कई ऐसी हरकतें कर डालती है जो अनावश्यक ही नहीं अनुचित भी होती है और कई बार तो खतरनाक भी। तो क्या हम दवाओं से डरने लगें? नहीं, डरने की कोई बात नहीं। हमें बस थोड़ी-सी सावधानी बरतने की जरूरत है। और इस सावधानी की पहली शर्त है , जानकारी। अगर मरीज और उसके परिजनों को दवाओं से संबंधित सावधानियों की खबर हो तो संभावित खतरों से आसानी से बचा जा सकता है। मनोवेद डाइजेस्ट का मानना है कि एक सावधान और सजग समाज में स्वास्थ्य सेवाओं का बेहतर इस्तेमाल होता है।
हमारी कोशिश होगी कि हम हर अंक में एक दवा के बारे में ज+रूरी सूचनाएं अपने पाठकों तक पहुंचाएं। इस अंक की दवा हैदृलिथियम कार्बोनेट।-संपादक
रसायन शास्त्र की भाषा में लिथियम कार्बोनेट एक लवण है जिसका उपयोग बाइपोलर मूड डिजार्डर के इलाज के लिए होता है। अमेरिका में इसे 1970 में चिकित्सकीय उपयोग के लिए स्वीकृति मिली। उसके कुछ सालों बाद से ही यह भारत में भी उपलब्ध है।
उपयोग
जैसा कि नाम से ही जाहिर है बाइपोलर मूड डिजार्डर भावना (मूड) का रोग ह,ै जिसमें दो धु्रव होते हैं। एक धु्रव को कहते हैं मैनिया या उन्माद और दूसरे को डिप्रेशन या अवसाद। इस रोग से ग्रस्त मरीज अलग-अलग समय पर अलग-अलग आचरण करते हैं। मैनिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें रोगी अधिक बातें करता है, औसत से बढ़कर खर्च करता है, स्वयं को अपनी औकात से बड़ा समझता है, उसकी नींद की जरूरत कम हो जाती है, बात-बात पर क्रोध और उत्तेजना से भर जाता है और परिणाम के बारे में बिना सोचे खतरे उठाता रहता है। इसके ठीक विपरीत अवसाद के मरीज उदासी और आत्महीनता से ग्रस्त रहते हैं। आनंद की चीजें हो या जीवन की सामान्य गतिविधियां सबमें इनकी रुचि घट जाती है। वो अच्छी तरह सो नहीं पाते। उन्हें बात-बात पर रुलाई आती है। मन में हीनभाव के कारण वह स्वयं को बेकार समझने लगता है। कई बार गहरी निराश और हताशा के भाव उन्हें आत्महत्या की तरफ ले जाते हैं।
बाइपोलर मूड डिजार्डर का मरीज कभी मैनिया में होता है, कभी डिप्रेशन में। मैनिया हो कि डिप्रेशन, लिथियम दोनों ही स्थितियों में काम करता है। दरअसल लिथियम कार्बोनेट एक मूड स्टेबलाइजर दवा है। यह एक तरफ रोग ग्रस्त व्यक्ति को उन्माद के पहाड़ से उतारती है तो दूसरी तरफ अवसाद की खाई से उबारती है। लिथियम सेवन ÷मूड' को समतल करता है। लिथियम का उपयोग गहरे अवसाद और कुछ खास तरह के स्किजोफ्रेनिया में भी होता है।
सावधानियां
अगर आपको लिथियम खाने की सलाह दी जाए तो आप सुनिश्चित करें कि सलाह देनेवाला व्यक्ति मनोचिकित्सक ही है। इस दवा के साथ इतनी सीमाएं हैं कि इसका उचित उपयोग एक पूर्ण प्रशिक्षित मनोचिकित्सक (टे्रंड सायकएट्रिस्ट) ही कर सकता है, फिजिसियन या न्यूरोफिजिसियन नहीं। जैसे ही आपको लिथियम खाने की सलाह दी जाए, आप अपने चिकित्सक से पूछें–
–क्या आप मनोचिकित्सक हैं?
–क्या मुझे ऐसा मनोरोग है जिसमें लिथियम देना अनिवार्य है?
–अगर उत्तर ÷हां' मिले तो आप समझ लें कि लिथियम आपके लिए अत्यावश्यक है और आप सुरक्षित हाथों में हैं। बस आप निम्नांकित बातों का ध्यान रखें–
1. जिन रोगों में लिथियम सेवन से लाभ मिलता है, उनका इलाज लंबे समय तक चलता है। सिर्फ एक मनोचिकित्सक ही तय कर सकता है कि आपके इलाज की अवधि क्या होगी।
2. लिथियम एक ऐसी दवा है जो एक खास खुराक में ही सही काम करती है। अगर खुराक कम हो जाए तो असर नहीं होता और अधिक हो जाए तो दुष्प्रभाव पड़ने लगते हैं। समय-समय पर आपके मनोचिकित्सक रक्त में लिथियम की मात्रा की जांच की सलाह देंगे। कृपया बेहिचक और तत्परता से जांच कराएं। अगर आपके रक्त में लिथियम की मात्रा 0.6 और 12 मिलि मॉल प्रति लीटर के बीच है तो आप निश्चिंत रहें, आपको लिथियम का लाभ भी मिलेगा और कोई खतरा भी नहीं होगा।
3. बताई गई विधि से लिथियम का सेवन नियमित करें। लाभ मिलने लगे तब भी दवा बंद न करें। 4. शरीर में पानी की मात्रा कम होने पर लिथियम गंभीर दुष्प्रभाव डालता है। इसलिए धूप में पैदल चलने या काम करने या व्यायाम और हॉट बाथ या सोना बाथ से पहले खूब पानी पी लें। संभव हो तो बीच में भी पीएं और अंत में अवश्य पिएं।
5. अगर उलटी/पतला पखाना हो तो लिथियम बंद कर दें।
6. बुखार शरीर में पानी की मात्रा कम करता है। इसलिए अगर बुखार हो तो पानी अधिक पिएं। अपने फिजिसियन को अवश्य बताएं कि आप लिथियम खा रहे हैं। कहीं आपका शरीर दवाओं की आपसी जंग का मैदान न बन जाए। मनोचिकित्सक से भी संपर्क कर लें।
7. लिथियम का सेवन कर रही महिलाएं मनोचिकित्सक की सलाह लेकर ही गर्भधारण करने की योजना बनाएं। अगर असावधानीवश गर्भ ठहरने के संकेत (जैसे मासिक धर्म बंद होना) मिलने लगें तो अविलम्ब मनोचिकित्सक से मिलें। गर्भावस्था के पहले तीन महीनों में लिथियम के सेवन बच्चे को एबस्टीन एनॉमली नामक हृदय रोग होने का खतरा बढ़ जाता है। आमतौर पर यह रोग 20000 नवजात शिशुओं में से 1 को होता है। लिथियम सेवन कर रही महिलाओं के बच्चों में इसके होने का डर 10 से 20 गुना होता है। मगर इन सूचनाओं से घबराने की जरूरत नहीं है। आप, आपका मनोचिकित्सक और आपका परिवार मिलकर सही फैसला ले सकते हैं।
8. लिथियम का सेवन कर रही महिलाएं बच्चे को स्तनपान न कराएं क्योंकि यह दवा दूध में आ जाती है, जिसके दुष्प्रभाव से बच्चा सुस्त हो जाता है और उसके हृदय की धड़कनें असामान्य हो जाती हैं।
9. लिथियम चिकित्सा के दौरान मना है–
अधिक चाय, कॉफी एवं कोक वाले शीतल पेय।
शराब या किसी अन्य नशीले पदार्थ का सेवन।
10. लिथियम के प्रभाव से मन और शरीर सुस्त हो जाते हैं। अतः दवा लेने के बाद गाड़ी चलाने या किसी मशीन पर काम करने जैसे खतरनाक कामों से परहेज करें, खासकर शुरू के दिनों में।
11. लिथियम के शुरुआती साइडइफेक्टस–मितली, भूख में कमी तथा पतला पाखाना, चक्कर, मुंह सूखना आदि–एक दो हफ्तों में कम हो जाते हैं। धैर्य रखें।
12. अगर खुश्क त्वचा, बाल झड़ना, आवाज में रुखड़ापन, अधिक ठंड लगना, मानसिक सुस्ती या वजन बढ़ने की शिकायत हो तो मनोचिकित्सक से तुरंत मिलें।
13. अगर कमजोरी, शरीर की गतिविधियों में असंतुलन आवाज में लड़खड़ाहट, अधिक हाथ कांपना, उल्टी, पतला पाखाना और समझदारी में गड़बड़ी जैसे लक्षण दिखने लगे तो लिथियम लेना बंद करें और मनोचिकित्सक से तुरंत मिलें।
14. अगर कोई और दवा ले रहें हो तो मनोचिकित्सक को अवश्य बताएं। कुछ दवाओं के साथ लिथियम लेने से रक्त में इसकी मात्रा बढ़ जाती है।
15. लिथियम का असर दो से तीन सप्ताह में होता है। धैर्य
रखें।
16. लिथियम का प्रयोग आमतौर पर लंबे समय के लिए किया जाता है–कभी-कभी तो जीवन भर। मनोचिकित्सक के साथ आपका नियमित संपर्क एवं सजगता बरकरार है तो आप निश्ंिचत रहे।
लिथियम का गुर्दे पर असर
पढ़े-लिखे लोगों के बीच आज भी एक पुरानी गलतफहमी कायम है। वे इस भ्रामक सूचना पर विश्वास करते हैं कि लिथियम से गुर्दे खराब हो जाते हैं। उनकी जानकारी के लिए प्रस्तुत है, सिडनी विश्वविद्यालय के डॉ. गार्डन जॉनसन के वैज्ञानिक लेख के निष्कर्ष की कुछ पंक्तियां–ताजा जानकारियां यह बताती हैं कि लिथियम के लगातार सेवन से गुर्दे के कार्य में गड़बड़ी हो ही जाएगी ऐसा कोई नियम नहीं है। अगर किसी मरीज में ऐसा देखा जाता है तो उसे नियम नहीं, नियम का अपवाद समझा जाना चाहिए। ऐसा तभी होता है जब रक्त में लिथियम की मात्रा अधिक हो या मरीज कोई और दवा खा रहा हो या मरीज को कोई और शारीरिक बीमारी भी हो। न्यूरोसॉयको फास्माकॉलॅजी (1998) (2000-05)
(प्रस्तुति : मनोवेद डेस्क)
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