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इस अंक में
मन माने की बात बातचीत
माइंड योर लैंग्वेज यानी जुबान सँभाल के
डॉ विनय कुमार
शब्दों के अर्थ शुरुआती अर्थों तक ही सीमित नहीं रहते। सभ्यता की विकास-यात्र में समय-समय पर नए अर्थ जुड़ते जाते हैं। यह आवश्यक नहीं कि नए अर्थों की आमद सकारात्मक ही हो।
दुख को बेहतर समझती है मनोचिकित्सा...
डॉ. नरेन्द्रनाथ विग से डॉ. विनय कुमार की बातचीत
जीवन और ज्ञान की विविधताओं के गहरे अध्येता डॉ. एन.एन.विग भारतीय मनोचिकित्सा जगत की उज्ज्वलतम उपस्थितियों में से एक हैं।
 
मन माने की बात डायरी
रचनाकार की पूंजी होती है बचपन की ...
डॉ. नरेन्द्रनाथ विग से डॉ. विनय कुमार की बातचीत
अपनी कविताओं में मनुष्य और उसके जीवन के प्रति समाहित होनेवाले कथ्य को आप किस रूप में देखते हैं ? पानी में घिरे हुए लोग शीर्षक कविता की रचना प्रक्रिया के बारे में बताएं।
....फ्रायड ग़ायब और इन्द्र मुस्कुरा रहा था
लीलाधर मंडलोई
हिन्दी कविता के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर और दूरदर्शन के महानिदेशक लीलाधर मंडलोई कविता के अतिरिक्त गद्य लेखन के लिए भी जाने जाते हैं। वर्षों से वे अपनी मनःस्थितियां डायरी में दर्ज करते रहे हैं।
मनोचिकित्सक की कलम से मनोचिकित्सक की कलम से
हिस्टीरिया की कहानी : डॉ. प्रमोद कुमार सिंह
सचमुच यह अब एक कहानी मात्र ही रह गयी है, क्योंकि विशेषज्ञों ने इस शब्द का प्रयोग बन्द कर दिया है। किन्तु इस शब्द की प्रासंगिकता अभी बनी हुई है, क्योंकि जनमानस में यह शब्द अभी पूर्ण जीवंत रूप में कायम है। इसकी प्रासंगिकता इसलिए भी बनी हुई है क्योंकि जिन मनोशारीरिक दशाओं के लिए इसका प्रयोग किया जाता था, वे अभी भी लगभग उसी रूप में,
मनोरोगियों के परिवारों की चुनौतियां :
जे.के. त्रिवेदी/श्याम बिहारी राय/मोहन ध्यानी

मानसिक रोगों से कोई व्यक्ति, समाज अथवा देश प्रतिरक्षित नही है। इन रोगों का व्यक्ति के ऊपर गंभीर मनोवैज्ञानिक,सामाजिक व
मनोचिकित्सक की कलम से मनोचिकित्सक की कलम से
बढ़ती उम्र का सामना : डॉ. चित्तरंजन एन्ड्राडे
किशोरावस्था के अन्तिम तथा युवावस्था के आरंभिक वर्षों में बौद्धिक क्षमता अपने उच्चतम स्तर पर रहती है। इसके बाद इसमें लगातार गिरावट आती है, पर यह बात पचास या साठ की उम्र के बाद ही पता चलती है। बढ़ती उम्र के साथ हाल की घटनाओं की याददाश्त भी कम हो जाती है।
मनोरोगियों को बेड़ियाँ क्यों नेहा सईद सईद अख्तर
इस सभ्य समाज में भी मनोरोगियों के साथ परिवार, समाज और कभी-कभी तो विभिन्न चिकित्सा प्रणालियों के माननीय दिग्गजों के द्वारा जो व्यवहार होता है, वह बड़ा ही दिल दहलाने वाला होता है। रोगियों को आज भी हथकड़ियों से जकड़ कर रखा जाता है, रस्सियों से उनके हाथ पैर बाँध दिए जाते हैं , कमर में रस्सी बाँध कर जानवरों की तरह खींचा जाता है।
नोटिस बोर्ड नोटिस बोर्ड
पागलपन नहीं सायकोसिस
एक शब्द है पागल'। इस शब्द का हमारे जीवन में बड़ा महत्त्व है। दुनिया में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं जिसे कभी पागल न कहा गया हो। कोई भी मां बच्चे की ऊल-जुलूल, लेकिन मासूम हरकत पर कहती है, धत पागल और बच्चे की छोटी-सी गलती पर बड़ा दंड देने पर उतारू पिता को कहती है, पागल हो गए हैं क्या?
प्रसवोत्तर अवसाद
पुराण बताते हैं कि एक बार समुद्र का मंथन हुआ था और उससे चौदह रत्न निकले थे। यह भी बताते हैं कि किस रत्न को किस देवता अथवा किस असुर ने ग्रहण किया था, किंतु यह नहीं बताते कि मथे जाने और रत्नदान के बाद समुद्र ने क्या महसूस किया। समुद्र को ठीक वैसा ही लगा होगा जैसा फसल दे चुकने
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अटेंशन डेफिसिट हायपरएक्विविटी डिसॉर्डर
अभिभावक के रूप में आप अपने बच्चे का जीवन गढ़ने में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसी संभावना हो सकती है कि आपका बच्चा अटेंशन डेफिसिट हायपरएक्विविटी डिसॉर्डर (ए डी एच डी) का शिकार हो। आएं जानें कि–

ए डी एच डी क्या है ?

मनोरोग के लक्षण
¨ नींद में कमी , भूख में कमी , क्रोध आना , तोड़-फोड़ , मार-पीट , बेवजह डर , शक , बहुत कम या बहुत अधिक बात करना , अकेले बैठकर बुदबुदाना या मुस्कुराना , डायन या भूत का डर , कोई कहीं नहीं बोले तब भी आवाज सुनना , पत्नी को पति के अथवा पति को पत्नी के चरित्र पर बेवजह शक , गांजा , भांग , शराब , स्मैक आदि की लत।
बाल मन बाल मन
शिक्षा की अनोखी अवधारणा : मॉन्टेसरी स्कूल : मीनू मंजरी
रंग.विवरंगी मेज'कुर्सिया, खिलौनों से भरी अलमारी, समूहों में बैठे अपने काम में र्मग्‍न बच्‍चे यह द़श्‍य पारंपारकि पाछशाला से काफी भिन्‍न है ा पर दुनिया भर से मॅान्‍टेसरी स्‍कूलों की सफलता ने शिक्षा की इस अवधारणा को मान्‍य बनाया हैा
बच्चों को कहां ले जा रहा है मीडिया : नरेन
हलांकि प्रिट मीडिया हो चाहे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रायः हर किस्म का मीडिया वर्ग अपनी सामूहिक गतिविधियों के मद्देनजर लगभग पूरी तरह से मनी मिटिंग, वीभत्स बाजारू उत्पाद में तब्दील हो चुका है; लेकिन उसका पाखण्डी और आतंककारी दंभ उत्तरोत्तर परवान ही चढ़ता जा रहा है कि वह
निष्कलंक निष्कलंक
बु्रक शील्ड्स : विनोद अनुपम
14 मई 2007, दिन के दो बजे थे। सैनडिएगो(कैलिफोर्निया) के कन्वेंशन सेंटर में अमेरिका की प्रसिद्ध मनोचिकित्सक नैन्सी ऐन्ड्रियासन को सुनने के लिए हॉल में लगभग 500 मनोचिकित्सक बैठे थे। भाषण शुरू होने में कुछ विलम्ब था। मेरी सीट की दाहिनी तरफ बैठे सज्जन ने बायीं तरफ बैठे सज्जन से पूछा -
गोरख पांडेय! यादों के आईने में चमन लाल
किसी भी कवि के लिए सबसे बड़ी चुनौती है–गंभीर अर्थों से भरे लोकगीत लिखना। हक की लड़ाई लड़नेवालों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलनेवाले गोरख पांडेय ने यह कठिन काम तो आसानी से किया, मगर पारानॉयड स्किजोफ्रेनिया की मुश्किलों से पार नहीं पा सके। उन्होंने आत्महत्या कर ली।
क्रूरता की शिनाख्त क्रूरता की शिनाख्त
रैगिंग को सामाजिक वर्ग ढांचे में देखें : स्वतंत्र मिश्र
उच्च संस्थानों में रैगिंग एक आम समस्या बन गयी है। हाल ही में भारत के एक प्रतिष्ठित कॉलेज सेंट स्टीफेंस में कुछ सीनियर छात्रों द्वारा एक जूनियर छात्र को प्रताड़ित करने का मामला सामने आया है। इस घटना में सीनियर लड़कों ने अपने एक जूनियर के र डियोडरेंड खूशबू उत्पन्न करने वाला इत्र जैसा कुछ स्प्रेे छिड़कर उसको आग लगा दिया गया।
खुद की खबर पर खामोश मीडिया :
वर्तिका नन्दा सहाय
दो साल पहले दिल्ली पब्लिक स्कूल के दो छात्रों का जो अश्लील एमएमएस बना, वह बे्रकिंग न्यूज थी, देश भर ने वो तस्वीरें देखीं और जनता नैतिकता पर मीडिया की चिल्लाहट की गवाह बनी, लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि
 
मनोवेद
अंक – 1 वर्ष – 1 जनवरी–मार्च, 2008

मनोचिकित्‍सक के कलाम से

हिस्टीरिया की कहानी
डॉ. प्रमोद कुमार सिंह

सचमुच यह अब एक कहानी मात्र ही रह गयी है, क्योंकि विशेषज्ञों ने इस शब्द का प्रयोग बन्द कर दिया है। किन्तु इस शब्द की प्रासंगिकता अभी बनी हुई है, क्योंकि जनमानस में यह शब्द अभी पूर्ण जीवंत रूप में कायम है। इसकी प्रासंगिकता इसलिए भी बनी हुई है क्योंकि जिन मनोशारीरिक दशाओं के लिए इसका प्रयोग किया जाता था, वे अभी भी लगभग उसी रूप में, मामूली अंतर के साथ, पूरे विश्व और हर समाज में देखी जाती हैं। उनका रहस्य आज भी उसी परिमाण में कायम है। सिर्फ उन दशाओं का नाम आंशिक रूप से बदल दिया गया है। नये नामकरण की आवश्यकता इसलिए पड़ी, क्योंकि कई हज+ार वर्षो में फैले हिस्टीरिया की कहानी में फिक्शन और फंतासी कुछ इस कदर घुल-मिल गए कि इससे जुड़े मूल प्रश्न ही गायब-से होने लगे। कल्पना इस क़दर हावी हुई कि हिस्टीरिया अपनी ज+मीन ही
खो बैठा।
सत्रहवीं शताब्दी के यूरोप में बीमारियों की सूची में बुखार के बाद हिस्टीरिया ही नम्बर-दो स्थान पर था। उन्नीसवीं शताब्दी में एक चिकित्सक ने जब हिस्टीरिया के लक्षणों की सूची बनाई तो पचहत्तर पन्ने भर गये, फिर भी सूची अधूरी थी। दरअसल हिस्टीरिया की कहानी मनुष्य के मन और शरीर के अनसुलझे आपसी रिश्श्ते के रहस्य में भटक रही उसकी जिज्ञासा की कहानी है। अज्ञानता के अंधेरे में अनवरत जारी इस संघर्ष में ÷अंधे' अध्ययनकर्ताओं को ÷हाथी' के हजार रूप दिखाई पड़ते हैं। हिस्टीरिया के इसी हजार-रूपी बहुरूपियापन के कारण, इस शब्द को मनोरोगों की आधिकारिक नामावली से हटा दिया गया है ताकि इसके पूरे परिदृश्य पर नए सिरे और खुलेपन से विचार किया जा सके।
हिस्टीरिया शब्द ग्रीक शब्द हिस्टेरा से बना है, जिसका अर्थ होता है गर्भाशय। इस शब्द के चयन का कारण हिपोक्रेटस, उनके समकालीनों तथा कुछ पूर्ववर्ती अध्ययनकर्ताओं का यह विश्वास था कि यह रोग महिलाओं तक ही सीमित है तथा इस रोग का कारण गर्भ्शाशय का शरीर के विभिन्न अंगों में यौन इच्छा तथा संतान की लालसा में भटकना है। इसी कारण इन लोगों ने हिस्टीरिया के इलाज के रूप में यौन इच्छाओं के तुष्टीकरण पर जोर दिया। अविवाहितों के लिए विवाह तथा विवाहित रोगियों के लिए ÷पेल्विक-मॅसाज' को उपचार का उपाय बताया गया। आज के वैज्ञानिक हिस्टीरिया के कारण तथा उपचार सम्बधी इन मान्यताओं को स्वीकार नहीं करते हैं। किन्तु आश्चर्य तब होता है, जब हम पाते हैं कि जनजीवन में, भारतीय ग्रामीण जनजीवन में भी, इन मान्यताओं तथा इस शब्द का आज भी प्रचलन है। कई बार अपने क्लिनिक में, अनेक अभिभावकों द्वारा यह प्रश्न मनोचिकित्सकों से पूछा जाता है कि कहीं उनके रोगी को हिस्टीरिया तो नहीं है? दबी जुबान और बदले हुए शब्दों से वे यही पूछना चाहते हैं कि कहीं रोगी के लक्षण यौवन-सुलभ यौन-इच्छाओं के दमन का प्रतिफल तो नही हैं। संभव है कि इस तरह की मान्यताएँ हमारे समाज में भी स्वतः उत्पन्न हुई हों, किन्तु यह विशिष्ट शब्द ÷हिस्टीरिया' जिसका जन्म हजारों वर्ष पहले एक दूसरी भाषा और दूसरे देश में यहाँ से हजारों मील दूर हुआ; वह कैसे देश और काल की सीमाओं को लाँघता हुआ, हिन्दुस्तान के गाँवों में भी, जहाँ उसकी आत्मा बसती है, गहरी पैठ बना गया ! यह अपने आप में एक स्वतंत्र अध्ययन का विषय है।
दमित यौन इच्छाओं से जुड़े शुरूआती सिद्धान्तों के साथ-साथ मध्य-काल में अन्य मानसिक रोगों की ही तरह हिस्टीरिया भी भूत-प्रेतों के द्वारा हुआ माना जाने लगा। किन्तु 19वीं शताब्दी के फ्रांसीसी स्नायुविशेषज्ञ जे. एम. शारको ने हिस्टीरिया के अध्ययन में गहरी रुचि दिखाई। इन्हें आधुनिक स्नायुविज्ञान का जनक भी माना जाता है। यद्यपि कि इनके अनेक सिद्धान्त बाद में ग़लत सिद्ध हुए, क्योंकि वे अपने समय की सीमाओ से बंधे थे, तथापि वे एक प्रतिष्ठित विशेषज्ञ के रूप में जाने जाते हैं। इन्होंने हिस्टीरिया का कारण व्यक्त्ति की अनुवांशिक दुर्बलता को माना तथा यह कहा कि बाहरी तनाव या आघात की स्थिति में ये दुर्बलताएँ हिस्टीरिया के लक्षण के रूप में प्रकट होती हैं।
सिगमंड फ्रॉयड, जो बाद में मनोविश्लेषण यानी सायकोएनालिसिस के अपने सिद्धान्तों के लिए जग-प्रसिद्ध हुए, शारको के शिष्यों में से एक थे। इन्होंने हिस्टीरिया के अध्ययन को आगे बढ़ाया। उसे एक नए नज++रिए से देखने की कोशिश की। उन्होंने पाया कि हिस्टीरिया के लक्षण आघात से अनावृत्त तो ज+रूर होते है, किन्तु ये आघात बाहरी नहीं बल्कि मनुष्य के अंदर ही स्थित और उत्पन्न होते हैं। इन आघातों का आधार मनुष्य अन्दर ही दबी हुई कुछ वर्षों पुरानी आहत स्मृतियाँ होती हैं, जो परिस्थिति विशेष में जागृत एवं सक्रिय हो जाती हैं। इन आहत स्मृतियों का स्वरूप बच्चों का अपने अग्रजों या वयस्कों द्वारा यौन उत्पीड़न होता है। उन्होंने कहा कि यदि इन दबी हुई अवचेतन स्मृतियों को मनोविश्लेषण की तकनीक द्वारा चेतना के स्तर पर लाकर उनका निराकरण किया जाय तो उन स्मृतियों का प्रभाव समाप्त हो जाता है तथा व्यक्ति रोग के लक्षणों से मुक्त हो जाता है। बाद में फ्राँयड के समकालीनों एवं शिष्यों ने इन सिद्धान्तों में अनेक सुधार एवं संशोधन किए।
फ्राँयड के समय ही इस बात से एक बवंडर उठ खड़ा हुआ था कि क्या सचमुच ही समाज में बच्चों का यौन-उत्पीड़न इस परिमाण में होता है ? बाद में फ्राँयड ने अपने विचार बदल दिए। उन्होंने कहा कि मनोविश्लेषण क्रम में स्मृति के गर्भ से बाल्यकाल में हुए यौन उत्पीड़न जैसी घटनाओं का जिक्र निकलता तो है, किन्तु उनका आधार उस व्यक्ति की बाल-सुलभ कल्पनाशीलता है, न कि वास्तविकता। विचारों के इस परिवर्तन का उद्देश्य समाज में उठे बंवडर को शान्त करना था या अध्ययन के क्रम में प्रकट हुए नये तथ्यों को सिद्धान्त में समाविष्ट करना–यह कहना बहुत मुश्किल है। वैसे इतना अवश्य है कि हिस्टीरिया सम्बन्धी फ्राँयड के सारे सिद्धान्त यौन उत्पीड़न एवं यौन फंतासी के इर्द-गिर्द ही घूमते रहे। यह बात और रोचक प्रतीत होती है जब हम इसके इतिहास पर ध्यान देते हैं। वहाँं भी यह मनुष्य के यौन आयाम के आस-पास ही मंडराती हुई दीखती है। यौनाचार से जुड़े यही अनेक तार सम्भवतः हिस्टीरिया को सदियों से रहस्यमय तथा कौतूहल और आकर्षण का कारण बनाते रहे हैं। हिस्टीरिया से थोड़ा हटकर देखें तो फ्रॉयड का क्रान्तिकारी योगदान यह था कि उन्होंने पहली बार ऐसा कहा कि अवचेतन में दबी स्मृतियाँ भी मनुष्य के कुछ रोगों या कष्टों का कारण हो सकती हैं। ऐसा कहकर उन्होंने एक बिल्कुल ही अभिनव बात कही, जिसके कारण वे अपने समय के समाज, साहित्य और विज्ञान पर छा गए। ऐसा कहकर उन्होंने एक और बात कही। वो यह कि व्यक्ति के कष्टों के लिए उसके वर्तमान के साथ-साथ उसके अतीत के पारिवारिक -समाजिक परिवेश भी प्रासंगिक और महत्त्वपूर्ण होते हैं।
वैसे हिस्टीरिया न्यूरोसिस संवर्ग का एक बहुरूपिया मनोरोग रहा है। इस शब्द को वैज्ञानिक शब्दावली से आज भले ही हटा दिया गया हो, लेकिन जिस प्रकार के रोगों के लिए इसका प्रयोग होता था, वे आज भी देखे जाते हैं। अपने लम्बे इतिहास तथा सैद्धान्तिक भटकाव के कारण हिस्टीरिया अनेक अर्थों से जुड़ गया था। चूँकि मनोरोगों के वर्गीकरण की वर्तमान प्रणाली में लक्षणों के विवरण मात्र को ही आधार बनाया गया है और उसके सम्भावित कारणों को वर्गीकरण की प्रणाली से बाहर रखा गया है, इसलिए भी इस शब्द को मनोरोगों के नामावली की आधिकारिक सूची में सम्मिलित नहीं किया गया है।
पराम्परागत रूप से हिस्टीरिया के समस्त लक्षणों को दो श्रेणियों में बाँटा गया है। एक है कर्न्वसन यानी सम्प्रिवर्तन रोग तथा दूसरा डिस्सोसिएशन यानि वियोजन रोग। सम्परिवर्तन प्रकार के रोग के ही एक बड़े उपसमूह, जिसमें दैहिक लक्षणों की संख्या अनगिन होती है, को हाल के वर्षों मे एक नया नाम दिया गया है। इसे सोमाटाइजेशन यानी कायाकरण रोग कहा जाता है। कायाकरण और सम्परिवर्तन रोग अनेकानेक दैहिक लक्षणों के रूप में प्रकट होते हैं, जो व्यक्ति को वर्षों परेशान करते हैं। ऐसे रोगियों में भी जाँच द्वारा किसी भी शारीरिक विकार के प्रमाण प्रकट नहीं होते, किन्तु उनका कष्ट यथावत बना रहता है। उसी प्रकार वियोजन रोग व्यक्ति की चेतना, उसके आत्मबोध या स्मृति सम्बन्धी क्षमताओं की गड़बड़ी के लक्षण के रूप में प्रकट होते हैं। यहाँ भी किसी भी जाँच में कुछ भी असामान्य नहीं पाया जाता है। माना यह जाता है कि इन रोगों के पहले प्रकार में मानसिक विकार शारीरिक लक्षण के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं तथा दूसरे प्रकार में मन का एक हिस्सा मूल भाग से वियोजित होकर स्वतंत्र व स्वच्छंद रूप से कार्य करने लगता है। दोनों ही प्रकार के हिस्टीरिया संवर्ग के ये रोग अपने अनेकानेक बदलते हुए रूपों से सदियों से चिकित्सकों को चुनौती देते आए हैं। आज कल इन्हीं उपरोक्त तीन नामों से उन रोगों को जाना जाता है, जिन्हें पूर्व में एक साथ हिस्टीरिया कहकर पुकारा जाता था।
वैसे तो जितने प्रकार के लक्षण इस पूरे हिस्टीरिया संवर्ग के रोगों के हो सकते हैं, उनकी संख्या बहुत अधिक है, तथपि मैं कुछ प्रमुख प्रकार के लक्षण समूहों की चर्चा यहाँ करूँगा। एक समय ऐसा भी था, जब यह कहा जाता था कि अगर आपने हिस्टीरिया और स्किजोफ्रेनिया को समझ लिया है, तो आपने पूरे मनोचिकित्सा विज्ञान को समझ लिया है। अभी तो खैर इस पूरे संवर्ग का पुनर्नामकरण ही हो गया है। हिस्टीरिया संवेदी तंत्र और क्रिया तंत्र (सेन्सरी-मोटर सिस्टम) में विभिन्न प्रकार की गड़बड़ी के रूप में प्रकट हो सकता है। यह मिर्गी से मिलते-जुलते बेहोशी के दौरे सा दिख सकता है या फिर एक, दो, तीन या चारों हाथ-पैरों के आंशिक या पूर्ण अंग-घात(लकवा) के रूप में प्रकट हो सकता है। यह अंधापन, बहरापन और गूंगापन का भी रूप ले सकता है। असामान्य प्रकार की खाँसी, उल्टी और हिचकी भी इस रोग के लक्षण हो सकते हैं। किसी भी अंग का असंवेदी हो जाना या अतिसंवेदी हो जाना भी इसी संवर्ग के रोग के लक्षण हो सकते हैं। व्यक्ति की चाल में एक विचित्र एवं नाटकीय प्रकार की अस्थिरता आ जाना, जिसे अस्टेसिया-अबेसिया (Astasia-abasia) कहते हैं, भी इसी रोग का एक प्रकार है।
÷वियोजन' प्रकार के अंतर्गत भी यह रोग कई रूपों में दिखाई देता है। निद्राचरण, यानी नींद में रात में चलना तथा मानसिक तनाव के प्रभाव से स्मृति-लोप का होना भी इसी रोग के प्रकार हैं। बहुव्यक्तित्विक मनोरोग यानि मल्टिपल पर्सनैलिटी, जिसमें एक ही व्यक्ति अलग-अलग समय में अलग-अलग नाम एवं व्यक्ति के रूप में आचरण करता है, भी इसी रोग का एक प्रकार है। फ्यूग स्थिति (Fugue state), जिसमें व्यक्ति बदली हुई मनोदशा में घर से बाहर निकल अनायास और निरुद्देश्य विचरता रहता है, भी इसी प्रकार का एक रोग है। इनके अतिरिक्त पे्रत-माध्यमों की मूर्च्छा-स्थितियँा, स्वचालित लेखन, राजमार्ग-सम्मोहन इत्यादि भी मानसिक वियोजन की ही विभिन्न स्थितियाँ हैं।
इतने विविध स्वरूपों और लक्षणों वाले इस बहुआयामी और बहुरूपिये रोग के उत्पन्न होने के क्या कारण हैं तथा मन और शरीर की कौन सी प्रक्रिया इसका माध्यम बनती है, इस सम्बन्ध में आधिकारिक और निश्चित तौर पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता। इस की प्रक्रिया के सम्बन्ध के मत-मतान्तर व्यक्त किए गये हैं जिनका कोई आधार आधुनिक वैज्ञानिक कसौटी पर दिखाई नहीं पड़ता है। यह एक प्रमुख कारण है हिस्टीरिया शब्द के प्रयोग को पूर्णाहुति दिए जाने का। दो अन्य प्रमुख बातें इस रोग के लक्षणों के साथ दीखती हैं। एक तो यह कि इस रोग के लक्षण शरीर संरचना और क्रिया के नियमों का पालन करते प्रतीत नहीं होते। यद्यपि कि ये लक्षण शरीर के माध्यम से प्रकट होते है फिर भी वे शरीर के कम व्यक्ति के रोग सम्बन्धी विचार के ज्यादा करीब होते हैं। दूसरी बात यह है कि इन रोगियों में अपने ही रोग के प्रति एक विरक्ति का भाव देखा जाता है ? मानो वह अंधापन या पक्षाघात उनका अपना न होकर किसी और का हो। कष्ट के कारण भावात्मक स्तर पर जो पीड़ा दिखाई पड़नी चाहिए वह सामान्यतः अनुपस्थित रहती है। इसके ठीक विपरीत अक्सर ही उनके व्यवहार में अतिशय नाटकीयता, अतिरंजना तथा ध्यानाकृष्ट करने की प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है।
कोई भी सिद्धान्त जो हिस्टीरिया की व्याख्या करने को सामने आयेगा, उसे उपरोक्त अतिरिक्त प्रवृत्तियों की भी समुचित व्याख्या देनी होगी। फ्राँयड तथा कुछ अन्य अध्ययनकर्त्ताओं की चर्चा हमने पहले की है तथा पाया है कि अलग-अलग कारणों से वे सभी असंतोषप्रद हैं। हर परिस्थिति में वे लागू भी नहीं होतीं। आधुनिक विज्ञान भी इतने विविध लक्षण समूहों के पीछे की कहानी जानने को सतत प्रयत्नशील है। न्यूरोफिजियॉलोजी तथा ब्रेन-स्कैन के तरीकों का भी प्रयोग किया गया है। जानकारी मिली है कि इस संवर्ग के रोगियों में भी ब्रेन यानि मस्तिष्क में कुछ विशिष्ट परिवर्तन होते हैं। किन्त्तु उनके आधार पर इसके विशाल लक्षण समूह की कोई समुचित और सुसंगत व्याख्या दे पाना अभी बहुत दूर की बात है।
कई मनोचिकित्सकों ने हिस्टीरिया के लक्षणों को पारस्परिक संवाद के एक माध्यम के रूप में देखने-विचारने की चेष्टा की है। उनके अनुसार जहाँ परिस्थिति, समाज या संस्कृति के कारण शब्द एक दूसरे के बीच संवाद स्थापित करने का कार्य नहीं कर पाते वहाँ शब्दों से परे शरीर के माध्यम से पारस्परिक संवाद स्थापित करने का कार्य रोग के ये लक्षण करते हैं। इन लक्षणों का मुख्य उद्देश्य गैर-शाब्दिक तरीकों से सहानुभूति या मदद की याचना करना अथवा किसी कार्य विशेष के लिए अपने परिवेश को बाध्य व प्रेरित करना होता है। कई बार इन उद्देश्यों की प्राप्ति भी हो जाती है तथा रोग के कारण जो अतिरिक्त सहानुभ्ूति, सहायता तथा सुश्रुषा का लाभ इन्हे मिलता है, वह रोग के लक्षणों को दीर्घकालिक बनाये रखने का कारण बन जाता है। भूतकाल की तनावपूर्ण स्थितियों की स्मृति के सक्रिय हो जाने से हिस्टीरिया जैसे लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं, इसकी चर्चा पहले हो चुकी है। किन्त्तु वर्तमान समय की प्रतिकूल परिस्थितियाँ भी अत्यन्त तीव्र हो जाने पर वैसे ही लक्षणों को जन्म दे सकती हैं, विशेषकर तब, जब रोग की वजह से चिंता, परेशानी तथा खतरे से मुक्ति मिलती है।
हिस्टीरिया का उपचार करना भी उतना ही कठिन कार्य है। कोई भी ऐसी दवा उपलब्ध नहीं है जो सीधे हिस्टीरिया के लक्षणों या उसके पीछे की प्रक्रिया पर विशिष्ट रूप से प्रहार करती हो। चिन्ता तनाव तथा उदासी के लिए प्रयुक्त दवाएँ इन रोगियों को दी जाती हैं, जो कई बार उपयोगी और लाभप्रद सिद्ध होती हैं। इसके अतिरिक्त मनोविश्लेषण या अन्य प्रकार के सायकोथेरैपी द्वारा रोगी के मन के अनसुलझे ताने-बाने में गहरे उतर कर स्थायी तथा व्यापक परिवर्तन लाने का प्रयास किया जा सकता है। सम्मोहन, औषध निद्रा-विश्लेषण, परिवेश-परिवर्तन, इत्यादि कुछ अन्य उपाय हैं, जिनसे ऐसे रोगियों की मदद की जा सकती है। उपचार के इन तरीकों के साथ-साथ रोगी के व्यक्तिगत जीवन में भी जो मूलभूत कठिनाइयाँ या द्वन्द्वात्मक परिस्थितियाँ हैं, उनके निवारण में भी सहयोग उपल्ब्ध करवाना चाहिए, ताकि उनके पूरे मन और शरीर की व्यवस्था पर पड़ रहा दबाव कम हो सके। वैसे असल जीवन में ऐसा कर पाना अत्यन्त कठिन या कई बार असम्भव ही होता है।
हिस्टीरिया की यह कहानी समाप्त होने को है। एक दृष्टिकोण से हिस्टीरिया की कहानी समाप्त हो चुकी है, क्योंकि इस शब्द को तिलांजलि दे दी गयी है। दूसरे दृष्टिकोण से हिस्टीरिया की कहानी अभी बिल्कुल अधूरी है, क्योंकि इसके सारे रहस्य अभी अनसुलझे हैं। यह अधूरी कहानी कब तक अधूरी रहेगी, इसका आकलन हम आज नहीं कर सकते। हिस्टीरिया का बहुरूपियापन भी बहुत सारी बातें कहता है। यह हमारी अज्ञानता और साथ ही ज्ञान की सीमाओं को भी रेखंकित करता है। यह मनुष्य के मन और शरीर की अज्ञात सीमा रेखा पर उनके असंख्य आपसी सम्भावित समीकरणों का प्रतिबिम्ब मात्र है। इन प्रतिबिम्बों के सहारे हमें उस सीमा रेखा, उस क्षितिज की खोज करनी है, जहाँ उन दोनों का मिलन होता है।

डॉ. प्रमोद कुमार सिंह पटना मेडिकल कॉलेज के मनोचिकित्सा विभाग में प्रोफेसर
और अध्यक्ष हैं। संपर्क : रोड नं-3, राजेन्द्र नगर, पटना

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