इस अंक में
मन माने की बात बातचीत
माइंड योर लैंग्वेज यानी जुबान सँभाल के
डॉ विनय कुमार
शब्दों के अर्थ शुरुआती अर्थों तक ही सीमित नहीं रहते। सभ्यता की विकास-यात्र में समय-समय पर नए अर्थ जुड़ते जाते हैं। यह आवश्यक नहीं कि नए अर्थों की आमद सकारात्मक ही हो।
दुख को बेहतर समझती है मनोचिकित्सा...
डॉ. नरेन्द्रनाथ विग से डॉ. विनय कुमार की बातचीत
जीवन और ज्ञान की विविधताओं के गहरे अध्येता डॉ. एन.एन.विग भारतीय मनोचिकित्सा जगत की उज्ज्वलतम उपस्थितियों में से एक हैं।
 
मन माने की बात डायरी
रचनाकार की पूंजी होती है बचपन की ...
डॉ. नरेन्द्रनाथ विग से डॉ. विनय कुमार की बातचीत
अपनी कविताओं में मनुष्य और उसके जीवन के प्रति समाहित होनेवाले कथ्य को आप किस रूप में देखते हैं ? पानी में घिरे हुए लोग शीर्षक कविता की रचना प्रक्रिया के बारे में बताएं।
....फ्रायड ग़ायब और इन्द्र मुस्कुरा रहा था
लीलाधर मंडलोई
हिन्दी कविता के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर और दूरदर्शन के महानिदेशक लीलाधर मंडलोई कविता के अतिरिक्त गद्य लेखन के लिए भी जाने जाते हैं। वर्षों से वे अपनी मनःस्थितियां डायरी में दर्ज करते रहे हैं।
 
मनोचिकित्सक की कलम से मनोचिकित्सक की कलम से
हिस्टीरिया की कहानी : डॉ. प्रमोद कुमार सिंह
सचमुच यह अब एक कहानी मात्र ही रह गयी है, क्योंकि विशेषज्ञों ने इस शब्द का प्रयोग बन्द कर दिया है। किन्तु इस शब्द की प्रासंगिकता अभी बनी हुई है, क्योंकि जनमानस में यह शब्द अभी पूर्ण जीवंत रूप में कायम है। इसकी प्रासंगिकता इसलिए भी बनी हुई है क्योंकि जिन मनोशारीरिक दशाओं के लिए इसका प्रयोग किया जाता था, वे अभी भी लगभग उसी रूप में,
मनोरोगियों के परिवारों की चुनौतियां :
जे.के. त्रिवेदी/श्याम बिहारी राय/मोहन ध्यानी

मानसिक रोगों से कोई व्यक्ति, समाज अथवा देश प्रतिरक्षित नही है। इन रोगों का व्यक्ति के ऊपर गंभीर मनोवैज्ञानिक,सामाजिक व
 
मनोचिकित्सक की कलम से मनोचिकित्सक की कलम से
बढ़ती उम्र का सामना : डॉ. चित्तरंजन एन्ड्राडे
किशोरावस्था के अन्तिम तथा युवावस्था के आरंभिक वर्षों में बौद्धिक क्षमता अपने उच्चतम स्तर पर रहती है। इसके बाद इसमें लगातार गिरावट आती है, पर यह बात पचास या साठ की उम्र के बाद ही पता चलती है। बढ़ती उम्र के साथ हाल की घटनाओं की याददाश्त भी कम हो जाती है।
मनोरोगियों को बेड़ियाँ क्यों नेहा सईद सईद अख्तर
इस सभ्य समाज में भी मनोरोगियों के साथ परिवार, समाज और कभी-कभी तो विभिन्न चिकित्सा प्रणालियों के माननीय दिग्गजों के द्वारा जो व्यवहार होता है, वह बड़ा ही दिल दहलाने वाला होता है। रोगियों को आज भी हथकड़ियों से जकड़ कर रखा जाता है, रस्सियों से उनके हाथ पैर बाँध दिए जाते हैं , कमर में रस्सी बाँध कर जानवरों की तरह खींचा जाता है।
 
नोटिस बोर्ड नोटिस बोर्ड
पागलपन नहीं सायकोसिस
एक शब्द है पागल'। इस शब्द का हमारे जीवन में बड़ा महत्त्व है। दुनिया में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं जिसे कभी पागल न कहा गया हो। कोई भी मां बच्चे की ऊल-जुलूल, लेकिन मासूम हरकत पर कहती है, धत पागल और बच्चे की छोटी-सी गलती पर बड़ा दंड देने पर उतारू पिता को कहती है, पागल हो गए हैं क्या?
प्रसवोत्तर अवसाद
पुराण बताते हैं कि एक बार समुद्र का मंथन हुआ था और उससे चौदह रत्न निकले थे। यह भी बताते हैं कि किस रत्न को किस देवता अथवा किस असुर ने ग्रहण किया था, किंतु यह नहीं बताते कि मथे जाने और रत्नदान के बाद समुद्र ने क्या महसूस किया। समुद्र को ठीक वैसा ही लगा होगा जैसा फसल दे चुकने
 
नोटिस बोर्ड नोटिस बोर्ड

अटेंशन डेफिसिट हायपरएक्विविटी डिसॉर्डर
अभिभावक के रूप में आप अपने बच्चे का जीवन गढ़ने में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसी संभावना हो सकती है कि आपका बच्चा अटेंशन डेफिसिट हायपरएक्विविटी डिसॉर्डर (ए डी एच डी) का शिकार हो। आएं जानें कि–

ए डी एच डी क्या है ?

मनोरोग के लक्षण
¨ नींद में कमी , भूख में कमी , क्रोध आना , तोड़-फोड़ , मार-पीट , बेवजह डर , शक , बहुत कम या बहुत अधिक बात करना , अकेले बैठकर बुदबुदाना या मुस्कुराना , डायन या भूत का डर , कोई कहीं नहीं बोले तब भी आवाज सुनना , पत्नी को पति के अथवा पति को पत्नी के चरित्र पर बेवजह शक , गांजा , भांग , शराब , स्मैक आदि की लत।
 
बाल मन बाल मन
शिक्षा की अनोखी अवधारणा : मॉन्टेसरी स्कूल : मीनू मंजरी
रंग.विवरंगी मेज'कुर्सिया, खिलौनों से भरी अलमारी, समूहों में बैठे अपने काम में र्मग्‍न बच्‍चे यह द़श्‍य पारंपारकि पाछशाला से काफी भिन्‍न है ा पर दुनिया भर से मॅान्‍टेसरी स्‍कूलों की सफलता ने शिक्षा की इस अवधारणा को मान्‍य बनाया हैा
बच्चों को कहां ले जा रहा है मीडिया : नरेन
हलांकि प्रिट मीडिया हो चाहे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रायः हर किस्म का मीडिया वर्ग अपनी सामूहिक गतिविधियों के मद्देनजर लगभग पूरी तरह से मनी मिटिंग, वीभत्स बाजारू उत्पाद में तब्दील हो चुका है; लेकिन उसका पाखण्डी और आतंककारी दंभ उत्तरोत्तर परवान ही चढ़ता जा रहा है कि वह
 
निष्कलंक निष्कलंक
बु्रक शील्ड्स : विनोद अनुपम
14 मई 2007, दिन के दो बजे थे। सैनडिएगो(कैलिफोर्निया) के कन्वेंशन सेंटर में अमेरिका की प्रसिद्ध मनोचिकित्सक नैन्सी ऐन्ड्रियासन को सुनने के लिए हॉल में लगभग 500 मनोचिकित्सक बैठे थे। भाषण शुरू होने में कुछ विलम्ब था। मेरी सीट की दाहिनी तरफ बैठे सज्जन ने बायीं तरफ बैठे सज्जन से पूछा -
गोरख पांडेय! यादों के आईने में चमन लाल
किसी भी कवि के लिए सबसे बड़ी चुनौती है–गंभीर अर्थों से भरे लोकगीत लिखना। हक की लड़ाई लड़नेवालों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलनेवाले गोरख पांडेय ने यह कठिन काम तो आसानी से किया, मगर पारानॉयड स्किजोफ्रेनिया की मुश्किलों से पार नहीं पा सके। उन्होंने आत्महत्या कर ली।
 
क्रूरता की शिनाख्त क्रूरता की शिनाख्त
रैगिंग को सामाजिक वर्ग ढांचे में देखें : स्वतंत्र मिश्र
उच्च संस्थानों में रैगिंग एक आम समस्या बन गयी है। हाल ही में भारत के एक प्रतिष्ठित कॉलेज सेंट स्टीफेंस में कुछ सीनियर छात्रों द्वारा एक जूनियर छात्र को प्रताड़ित करने का मामला सामने आया है। इस घटना में सीनियर लड़कों ने अपने एक जूनियर के र डियोडरेंड खूशबू उत्पन्न करने वाला इत्र जैसा कुछ स्प्रेे छिड़कर उसको आग लगा दिया गया।
खुद की खबर पर खामोश मीडिया :
वर्तिका नन्दा सहाय
दो साल पहले दिल्ली पब्लिक स्कूल के दो छात्रों का जो अश्लील एमएमएस बना, वह बे्रकिंग न्यूज थी, देश भर ने वो तस्वीरें देखीं और जनता नैतिकता पर मीडिया की चिल्लाहट की गवाह बनी, लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि
 
 
इस अंक की दवा
लिथियम कार्बोनेट
   
बाल मन

शिक्षा की अनोखी अवधारणा : मॉन्टेसरी स्कूल : मीनू मंजरी

बच्चों को कहां ले जा रहा है मीडिया : नरेन

   
किताब के बहाने
श्रेष्ठता ग्रंथि से पीड़ित लोग : कुमार मुकुल
   
मनोव्यथा
हर कार मेरा पीछा कर रही थी : कमल
   
मीडिया पर निगाह
बाजार ही मीडिया का राष्ट्र और धर्म है : अनिल चमड़िया
   
क्रूरता की शिनाख्त
टीवी एंकरों की खुदकुशी और टीआरपी : मृणाल वल्लरी
   
विश्लेषण
अवसाद : चारुवाक
   
सपने
मेरे तीन सपने : उनका क्या करूं ? : बोधिसत्व
   
जनगीत
दुनिया नष्ट नहीं होगी : नचिकेता
   
कहानी
मुश्किल : सन्तोष चौबे
   
काव्य कथा
शान्ता : उद्भ्रान्त
   
फिल्म

ओंकारा : विनोद अनुपम

ऑथेलो : अनामिका

   
व्यंग्य  झूठ बोलने के फायदे : विष्णु नागर
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मनोवेद
अंक – 1 वर्ष – 1 जनवरी–मार्च, 2008

मनोव्‍यथा

हर कार मेरा पीछा कर रही थी
कमल

इस रामकहानी के नायक कमल(काल्पनिक नाम) इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान ही मनोरोग ग्रस्त हो गए थे और दवाओं के सहयोग से ही बी.टेक की पढ़ाई पूरी कर सके थे। भारत के लाखों युवाओं की तरह उनका सपना भी बिल गेट्स के महान देश अमेरिका में उच्च शिक्षा प्राप्त करना था। अपनी मनोगत परेशानियों के बावजूद उन्होंने कोशिश की और अमेरिका जाने में सफल भी रहे। पर अमेरिकी स्वस्थ्य सेवा का व्यावसायिक स्वरूप उनके सपनों के अनुकूल नहीं था। यहां मनोवेद डाइजेस्ट के प्रवेशांक में अपने साक्षात्कार में कही गयाी प्रख्यात भारतीय मनोचिकित्सक डॉ. श्रीधर शर्मा की वह बात याद आती है कि '' स्वास्थ्य सेवा के दृष्टिकोण से अमेरिका एक असफल राज्य रहा है।''कमल अगर भारत में होता तो उसका इलाज किसी सरकारी अस्प्ताल में मुफ्‌त होता और उसका सपना नहीं टूटता। -संपादक

बीस विद्यार्थियों के एक दल के साथ मैं 28 अप्रैल 2003 को अमेरिका पहुंचा। हमलोग कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, इर्विन में एक सर्टिफिकेट प्रोग्राम के लिए गए थे। उस समय मैं आलांजापिन के न्यूनतम 5 एमजी की खुराक पर था।
लॉस ऐंजेलस हवाई अड्डे पर उतरना मेरे लिए सपने सा था। तब तक मैं समझता था कि अमेरिका बड़ी जनसंख्या वाला अराजक विशाल देश है। पर वहां जीवन के हर क्षेत्र में सामान्य अनुशासन दिखाई देता था चाहे यातायात हो अथवा लोगों की अभिवादन शैली। विश्वविद्यालय के क्लास के लिए हमें बस पकड़नी होती थी। अमेरिका में मौसम सुहावना था और खुली सड़कों पर तेज गति से ट्रक और कारें दौड़ती थीं। बस में चढ़ना मैं पसंद करता था। बसें बड़ी-बड़ीे वातानुकूलित थीं किन्तु उसमें बहुत कम लोग होते थे। निजी कारों को खरीदना आसान था, जो वहां एक आवश्यकता बन गई थी। मेरे मित्र उत्साही थे, जिन्होंने अतिरिक्त आय के लिए निकट के दुकान में काम पकड़ लिया था। मैं प्रारंभ में संकोच कर रहा था किन्तु बाद में मैं भी अपने को रोक ना सका। चार महीने के सर्टिफिकेट प्रोग्राम को सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद मेरे अधिकांश मित्रों ने भारत लौटने के लिए अपने सामान बांध लिए। किन्तु मैं अमेरिका को धीरे-धीरे पसंद करने लगा था और ज्+यादा दिन ठहरना चाहता था। दुकान के मालिक ने भी मुझे रुकने का सुझाव दिया। ऐसा लगता था जैसे जीवन आसान और आनन्ददायक हो गया हो। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, इर्विन के छात्र केंद्र को भी मैं पसंद करने लगा था जहां विश्व के हर भाग के विद्यार्थी होते थे। जिस तरह लोग कम खर्च पर रहते थे उसे मैं पसंद करता था, यह भी हो सकता है कि डॉलर में मापने के कारण मुझे सब सस्ता मालूम पड़ता हो। दुकान में कड़ी मेहनत करके मैंने मालिक को प्रभावित किया। उन्होंने मुझे यू सी रीवरसाइड में नामांकन के लिए पैसों से मदद भी की, जहां मैं दूसरा सर्टिफिकेट प्रोग्राम प्रारंभ करने वाला था। आकर्षक भवन के साथ यूसी रीवरसाइड मनमोहक था, जिसके दाहिने भाग में काफी की दुकान थी। रीवरसाइड जाने के लिए ट्रेन से लंबी दूरी तय करनी होती थी। अब तक मैंने जिन ट्रेनों को देखा था उसमें यह सबसे सुंदर थी और जिसमें लोग भी काफी कम थे। वहां स्टेशन अच्छा और साफ सुथरा होता था जहां लोग इक्के-दुक्के होते थे। क्लास के बाद दुकान के मालिक मुझे साथ कर लेते थे।
यह सिलसिला बढ़ता गया, अब वहां जीवन और आसान हो चला था और मैं अमेरिका छोड़ना नहीं चाहता था। इसलिए मैंने यूसी, इर्विन में पुनः तीसरे सर्टिफिकेट प्रोग्राम में नामांकन कराया और इस बार मेरे भाई ने मदद की। मेरे मित्रों और शुभचिंतकों ने मुझे इंडिया अपने घर लौटने के सुझाव दिए किंतु मैंने अपना काम जारी रखा। दुकान पर कड़ी मेहनत करके जीवन का आनन्द लिया। अच्छी बिक्री हो रही थी और मेरा अच्छे से ध्यान भी रखा जा रहा था।
आखिर वह समय आया जब यूसी इर्विन में मेरी पढ़ाई पूरी हो गई और मुझे दुकान छोड़नी थी। अपने सहयोगियों का अभिवादन मैं अपने भाई के पास डब्लिन आ गया। यह बिल्कुल शांत और सुंदर शहर था जहां काफी शॉपिंग क्षेत्र और घूमने वाली जगह थी। मैं अभी भी आलांजापिन कीे न्यूनतम खुराक पर बिना किसी परेशानी के था। एक कम्प्यूटर कम्पनी में मुझे नौकरी मिल गई और हर रोज काम करने के लिए मुझे अपने भाई के साथ जाना होता था। कड़ी मेहनत की कर कम्पनी में 10 महीने पूरे किए मैंने।
मेरी खूराक नहीं बदली और मैं सामान्य जिन्दगी जी रहा था। इसी बीच दुर्भाग्यवश मेरे पिताजी गुजर गए। हमने काम जारी रखा और पढ़ाई भी। संत क्लैरा विश्वविद्यालय, संत क्लैरा, सी ए के मास्टर प्रोग्राम में मैंने नामांकन भी कराया।
यहां से फिर विघटन का दौर प्रारंभ हो गया और मेरी सामान्य जि+ंदगी बेहाल होती गयी। मैंने सांता क्लैरा विश्वविद्यालय के एक वृद्ध मनोचिकित्सक डॉ. इरिक रोथेनवर्ग से परामर्श लेने का निश्चय किया। मैंने उन्हें बताया कि मैं बाईपोलर डिसआर्डर और डिप्रेशन का शिकार हूं। मैंने उन्हें अपनी पिछली जि+ंदगी के बारे में बताया।
संदर्भ की अपनी मोटी पुस्तकें देख उन्होंने बताया कि आलांजापिन के साइड इफेक्ट से टारडिव डिसकायनेसिया होता है इसलिए मुझे कुछ अन्य दवाओं का प्रयोग करना पड़ेगा। मुझे आलांजापिन के बदले लिथियम कार्बोनेट का प्रयोग करने का निर्देश दिया गया जो उन्माद और अवसाद में फायदे पहुंचाता है, किन्तु भ्रम दूर नहीं करता। आलांजापिन उच्च और निम्न अवसाद में फायदा तो पहुंचा सकता है किन्तु इसके साइड इफेक्ट को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। फिर लिथियम कार्बोनेट पुरानी और सस्ती दवा है। यह विश्व में कहीं भी आसानी से मिल जाती है। शंका होने पर वे हमेशा अपनी पुस्तकों से संदर्भ लेते थे और वास्तव में अपनी पुस्तकें पढ़कर ही उपचार करते थे। वे रोग की जांच के समय कही गई बातों का रिकार्ड रखते थे। मुझसे उन्होंने कुछ सवाल पूछे, जैसे–
÷÷क्या आपमें आत्महत्या संबंधी कोई मनोवृत्ति है?''
÷÷क्या आपको रात में अच्छी नींद आती है?''
इत्यादि।
अब मैंने आलांजापिन छोड़कर लिथियम कार्बोनेट लेना प्रारंभ कर दिया। खून में दवा की मात्रा बढ़ाने के लिए उन्होंने मुझे लिथियम कार्बोनेट की बड़ी खुराक लेने के लिए कहा। मैं हर रोज 1200 मिलीग्राम लिथियम कार्बोनेट लेने लगा। समय बीतता गया और तत्काल मुझे किसी तरह की परेशानी नहीं हुई।
अब मैं दौड़ लगाने लगा। मैं हर रोज तीन कि.मी. दौड़ता। यह क्रम चार महीने चला। मेरा वजन काफी घट गया और भाई काफी चिंतित हो गया।
हर रोज चार बजे सुबह मैं सोकर उठता तब सड़क पर टहलता। सात बजे मैं दौड़ने जाता। संगीत का शौकीन होने के कारण मैं गिटार पर अपना गाना स्वयं रचता। एक गाना मैंने अपनी मां की याद में भी बनाया था।
पर मेरी परेशानी बनी हुई थी पर डॉक्टर को अभी भी लग रहा था कि मुझे कुछ नहीं है। इधर मुझे विचित्र तरह की शंका होने लगी थी कि सड़क पर चल रही कारें मेरा पीछा कर रही हैं। मुझे लगता कि मैं जहां कहीं जाता हूं, ये मेरे पीछे रहती हैं। कारों की रोशनी खुद पर पड़ते ही मैं व्यग्र हो जाता।
मुझे पक्का विश्वास हो गया था कि कोई मेरा पीछा कर रहा है, यहां तक कि मीडिया और टीवी भी कवरेज के लिए खड़ी है। बिना किसी स्पष्ट कारण के मैं सोचने लगा कि इसे अगले दिन पूरे देश में दूरदर्शन पर प्रसारित किया जाएगा। मैं सोचने लगा कि तब मेरा भाई भी दूरदर्शन पर इसे देखेगा। और मैं चिंतित हो गया कि वह क्या सोचेगा!
यह सब सोचता पुलिस से बचने के लिए मैं कई बार पास की दुकान में चला जाता जो उसकी ही एक शाखा थी, जिसमें मैंने पहले काम किया था। मुझे हमेशा लगता कि पुलिस मेरा पीछा कर रही है और वह मुझे दुकान से खोज निकालेगी।
एक दिन मैंने खाने के लिए कुछ खरीदा और अपने कमरे की ओर बढ़ गया। तभी एक कार की रोशनी मुझ पर पड़ी और मुझे लगा कि कोई मेरा पीछा कर रहा है। मैं स्तब्ध खड़ा हो गया तब एक लड़की ने इशारा कर मुझे झुक जाने को कहा। तब मैं एक बूढ़े आदमी की तरह करीब 100 गज झुककर चला। मैं अपने कमरे तक पहुंचा और फिर बूढ़े आदमी की तरह झुका हुआ वापस होने लगा। अंत में कैम्पस के लान में मैं गिर पड़ा फिर उठा।
अब शो के अंतिम दृश्य की तरह मैं सड़क पर दौड़ा। मैं यह सोचकर काफी खुश था कि मैं विश्वविद्यालय का नायक हूं। मैंने अपनी मां को यह बताने के लिए फोन किया कि उसका लड़का अब एक नायक हो गया है। मैंने सोचा कि मैं अगले दिन राष्ट्रीय दूरदर्शन पर रहूंगा और लोगों को पूरी घटना की जानकारी होगी।
मैंने सड़कों पर मीलों तक फूल बिछे देखा। पर मैं हैरान था कि सड़कें बिल्कुल वीरान थीं, उस पर एक भी आदमी नहीं चल रहा था। और जैसे ही मैंने चलना प्रारंभ किया लोग अपने-अपने घरों से निकलकर मेरे साथ चलने लगे। मैं दिशाहीन चलने लगता और मुझे कभी पता नहीं चलता कि मैं कहां हूं।
मैं सुबह में चलन प्रारंभ करता और शाम तक चलता और जब खो जाता तब अपने भाई को साथ करने के लिए फोन करता। फिर भी डाक्टर को लग रहा था कि मुझे कुछ नहीं है। अब मैंने इंडिया ंअपनी मां के पास लौटने की योजना बनाई और अपने उन सभी सगे-संबंधियों को फोन करना प्रारंभ किया जिनसे मेरी बातचीत प्रायः नहीं होती होती थी।
इससे व्यग्र होकर एक रात मेरे भाई ने मुझे किसी और जगह दिखाने को कहा। अब मुझे सांता क्लॉरा के मनोचिकित्सा वार्ड में ले जाया गया। दरअसल यह सब डॉ. रोथेनबर्ग के सुझाव पर ही हो रहा था। मुझे भर्ती कर लिया गया और बैठने के लिए कहा।
मुझे लग रहा था जैसे मनोचिकित्सा वार्ड में सभी लोग अभिनेता हैं जो गंभीरता का नाटक कर मुझे सुधारना चाहते हैं। कमरे में बहुत सारे लोग शपथ ले रहे थे। उबकर मैं उस स्थान से बाहर निकलना चाह रहा था परंतु मुझे अनुमति नहीं मिली। समय बीतता गया और उस रात मैं नहीं सो सका। अगले दिन मैं डिस्चार्ज होने के लिए किसी अधिकारी से बात करना चाह रहा था कि तब एक अमेरिकी महिला ने सहानुभूति दिखाई और चौबीस घंटे के इंतजार के बाद अगली दोपहर मैं डिस्चार्ज हो गया।
अब मुझे पहले अपने विश्वविद्यालय और वहां से हथकड़ी लगाकर फ्रीमोंट हॉस्टिपटल ले जाया गया। यहां मेरा रूममेट कोडी से परिचय कराया गया। पहले मैं नहीं समझ सका कि वे हॉस्पिटल में क्या कर रहे हैं। आगे मैंने उन्हें अपना दोस्त बना लिया और कहानी की एक किताब दी जो मुझे पिताजी ने दी थी।
वहां का स्नानघर विचित्र था जिसमें न तो आईना था, न दाढ़ी बनाने का सामान और न साबुन। हमलोगों को आपस में बातचीत के लिए समूह-बैठक में ले जाया जाता था। हॉस्पिटल के आम लोगों के बीच मैं शीघ्र काफी लोकप्रिय हो गया क्योंकि मैं बैठक में सबसे ज्यादा बोलता था।
एक बार एक सुंदर लड़की को मैंने एक फूल का स्केच बनाते देखा। मैंने उसे काफी पसंद किया और उसके कौशल को सराहा। मैंने कोडी को भी उसके रेखाचित्र संबंधी कौशल के बारे में बताया। मुझे रूसी लड़की से प्यार हो गया और उसे मैंने लम्बे-लम्बे प्रेमपत्र लिखे। सचमुच, खचाखच भरे एक कमरे में उसे मैंने एक पत्र सौंपा जिसमें मैंने उसके प्रति अपने प्रेम के लिए खेद प्रकट किया। प्रथम तीन दिन हमलोगों को अपना निवास-स्थान छोड़ने की मनाही थी किन्तु तीसरे दिन हमलोगों को नीचे की सीढ़ी से बाहर लाउंज में ले जाया गया। मैंने उस लड़की को एक फूल भेंट किया जिसे उसने आत्मीयता के साथ स्वीकार कर लिया। अन्त में मैंने उसे लिखा कि मैं उससे शादी करना चाहता हूं। संयोगवश उसका भाई उस हॉस्टिपटल में मौजूद था जिससे मैंने शादी के बारे में बातचीत की। मैंने उन्हें रूस से हमलोगों के संबंध के बारे में बताया। यह भी कि एक बार मेरे पिताजी के कैम्प में रूसी जनरल थे और कैसे वे लोग दोस्त हो गए थे और कैसे उन्होंने रूस में स्थानांतरण का दमन किया था। हमलोग हर रोज नीचे की सीढ़ी में स्थित भोजन क्षेत्र में दो बार भोजन करते थे। खाना स्वादिष्ट होता था जिसमें बहुत सारा सालाद और पस्ता हुआ करता था। मेरी एक बूढ़ी औरत से भी दोस्ती हो गयी। वह मेरी बहुत ज्यादा सराहना करती थी और हमलोग साथ-साथ बैठते और खाना खाते थे। मैंने हॉस्पिटल के स्टाफ से श्ीाघ्र डिस्चार्ज करने की मिन्नत की क्योंकि मुझे फोन करना था और इसलिए भी कि प्यार के लिए मेरे खेद प्रकट करने के बाद सन्द्रा (रूसी लड़की) अपने कमरे से बाहर नहीं निकलती थी। यह सच है कि हॉस्पिटल का प्रत्येक व्यक्ति मुझे प्यार करता था और मेरी सराहना करता था। मैंने शिष्टतापूर्वक अपनी हर चीज को सभी ज+रूरतमंद को बांटा जिनसे मेरी मुलाकात हुई। अंत में पांच दिनों बाद मैं डिस्चार्ज हुआ। हॉस्पिटल से बाहर आने के बाद मैंने अपने सभी संबंधियों को बहुत सारे फोन किए। उस समय मेरी मां हमलोगों के साथ यूएस में थी। रूसी लड़की से शादी करने के लिए मैंने उससे लड़ाई भी की।
डॉ. रोथेनवर्ग को अब महसूस हो गया कि आलांजापिन मेरे लिए आवश्यक है। मुझे आलांजापिन का अधिकतम बीस एमजी और लिथियम कार्बोनेट का 1200 एमजी दिया जाने लगा। मैं धीरे-धीरे सामान्य हो गया और मेरे सारे भ्रम दूर हो गए। फ्रीमोंट हॉस्पिटल में मेरे दो हजार पांच सौ डॉलर खर्च हुए। मेरे लिए यह बड़ी रकम थी। मुझे लगा कि अब भारत लौट जाना चाहिए और मैं लौट गया और अपने पुराने मनोचिकित्सक से मिला। उन्होंने लिथियम और आलांजापिन दोनों की मात्रा कम कर दी। मैं अब बेहतर महसूस कर रहा था।
... आज मैं दक्षिण भारत के एक शहर में काम कर रहा हूं


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