गोरख पांडेय! यादों के आईने में
चमन लाल
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किसी भी कवि के लिए सबसे बड़ी चुनौती है–गंभीर अर्थों से भरे लोकगीत लिखना। हक की लड़ाई लड़नेवालों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलनेवाले गोरख पांडेय ने यह कठिन काम तो आसानी से किया, मगर पारानॉयड स्किजोफ्रेनिया की मुश्किलों से पार नहीं पा सके। उन्होंने आत्महत्या कर ली। क्या यह एक जनकवि की हार थी। क्या स्किजोफ्रेनिया किसी के साथ ऐसा कर सकता है? गोरख का इस तरह जाना ऐसे कई सवाल खड़े करता है।
गोरख पांडेय को स्नेह रहित बचपन मिला। अनचाहे और बेमेल विवाह को वे सुखद दामपत्य में नहीं बदल पाए। वे लोगों के दुखों को अपने दुख की तरह देखते रहे। अचरज नहीं कि इस प्रक्रिया में समाज के शत्रु उन्हें अपने शत्रु लगने लगे हों। पारानॉयड स्किजोफ्रेनिया के मरीज जाने-अनजाने शत्रुओं से आतंकित रहते हैं। लोगों के स्पर्श तक से बचने वाले गोरख ने कुल मिलाकर एक मुश्किल जीवन जीया।
वे एक रचनात्मक व्यक्ति थे। कुछ शोध हमे बताते हैं कि रचनात्मकता और स्किजोफ्रेनिया में गुणसूत्रात्मक(क्रोमोजोमल) संबंध होते हैं। दुनिया के कई जीनियस रचनाकार इस रोग के शिकार हो चुके हैं। गोरख की बीमारी को इस संदर्भ में भी देखा जा सकता है।
आत्महत्या को अक्सर निराशा और अवसाद से जोड़कर देखा जाता है। मगर सच तो यह है कि स्किजोफ्रेनिया के मरीज भी आत्महत्या करते हैं और उनके द्वारा की गयी कोशिशें अक्सर सफल हो जाती हैं। इस रोग के शिकार लोग काल्पनिक शत्रुओं के डर से, कुछ घिनौने वहमों की ग्लानि के मारे, जीवन असंभव हो जाने की चरम निराशा में या काल्पनिक आवाजों (ऑडिटरी हैल्युसिनेशन) के हुक्म से आत्महत्या करते हैं। अगर दामपत्य और परिवार का रक्षाकवच न हो तो ऐसी कोशिशें अक्सर सफल हो जाती हैं।
हक की लड़ई में शामिल होकर भी गोरख बहुत अकेले थे। उनके प्रति आत्मीय भाव रखने वाले मित्रों की कमी न थी, मगर मित्रता की एक सीमा होती है। मित्र अपना हर काम छोड़कर किसी के साथ नहीं रह सकते। ऐसे हालात में परिवार बेहतर रक्षाकवच सिद्ध होता है। अपने परिवार से छिटककर बृहदतर समाज की तरफ जाते हुए गोरख सिर्फ यात्री नहीं एक व्यक्ति भी थे। उनकी आत्महत्या एक रक्षा-कवच से रहित मनोरोगी की आत्महत्या है। इसे जीवन में गारख की असफलता से अधिक परिवार और समाज की असफलता के रूप में दखा जाना चाहिए जो अपने प्रियजन, अपने मित्र और अपने कवि को नहीं बचा सके।
जो भी हो, अपनी धारदार रचनाओं, आदर्शों के प्रति निर्भ्रांत निष्ठा और रोग के करण अकेले पड़ते जाने के बावजूद समाज के लिए लगातार सोचते-रचते रहनेवाले गोरख हमारे निष्कलंक नायक हैं–सम्पादक
28 जनवरी, 1989 की रात को किसी समय प्रखर व युवा हिंदी कवि व चिंतक गोरख पांडेय ने ÷अपनी बीमारी से तंग आकर' आत्महत्या कर ली। 29 जनवरी दोपहर को जब इस दुःखद घटना का हिंदी लेखकों-पत्रकारों-पाठकों को पता चला तो एक अजीब मनःस्थिति ने सबको जकड़ लिया। इस मनःस्थिति में विमूढ़ता, आकोश उदासी, आत्मग्लानि सबकुछ शामिल था, हर हालत में गोरख को जानने वाली प्रत्येक आत्मा पर एक बोझ था।
बाद में उनकी स्मृति में अनेक शोक व श्रद्धांजलि-सभाओं में उनकी आत्महत्या पर कई तरह की व्याख्याएं रखीं गईं, जिनसे कई तीखे वाद-विवाद भी पैदा हुए, लेकिन मित्रों से यह जानकर मुझे बहुत ही संतोष हुआ था कि उनकी शवयात्रा उनके क्रांतिकारी विचारों से अनुरूप ही थी। उनके लिखे गीत गाते हुए, क्रांतिकारी नारे लगाते हुए उनके शव को अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया व किसी भी प्रकार के अवसाद (Gloom) का प्रदर्शन उनकी अंतिम विदाई के समय नहीं किया गया।
तात्कालिक प्रतिक्रियाओं के बाद अनेक लोगों ने गोरखजी के दुःखद अंत को समझने की कोशिश की होगी। गोरखजी का अंत इतना सरल नहीं था, जैसा कुछ लोगों ने सरलीकृत फार्मूले की तरह ÷सी.पी.आई. (एम.एल.) की लाईन बदलने' को ही उनके अंत का कारण बना डाला। गोरखजी का जीवन-स्थितियां जटिल थीं और उनका व्यक्तित्व अत्यंत मृदु व बाह्य रूप से सरल होकर भी कई तरह की जटिलताओं से घिरा था। कुछ उनके व्यक्तित्व में बचपन से विकसित हुई जटिलताएं थीं, तो कुछ जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सांस्कृतिक माहौल से पैदा हुई जटिलताएं भी थीं। एक बहुत स्पष्टवादी व प्रखर बौद्धिक व्यक्तित्व होने के बावजूद यह एक दुखद सच्चाई है कि अपने व्यक्तित्व के व्यक्तिगत व सामाजिक अंतर्विरोधों को गोरख जी सुलझा नहीं पाए और क्रमशः एक दुखद अंत की ओर बढ़ते चले गए। ऐसा कहने का मतलब यह हर्गिज नहीं है कि अपनी स्थिति के लिए व्यक्तिगत रूप से सिर्फ गोरख ही जिम्मेदार थे, बल्कि वह पूरा राजनीतिक-सांस्कृतिक माहौल व्यापक रूप से ही उन स्थितियों को उलझानेवाला था, जिनमें गोरख जी इस तरह से उलझे कि फिर उसे सुलझा नहीं पाए।
गोरखजी जी से मेरा व्यक्तिगत संपर्क साढ़े ग्यारह साल तक रहा, अर्थात् 1977 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में दाखिल होने से लेकर उनके दुखद अंत से करीब दो सप्ताह पहले तक, जब उनसे मेरी अंतिम भेंट हुई (उस समय तो नहीं लगा कि यहीं अंतिम भेंट होगी)। इन साढ़े ग्यारह वर्षों में करीब चार वर्ष से अधिक हम एक ही होस्टल ÷पेरियार' में निकट पड़ोसी भी रहे। छात्र भी हम एक ही स्कूल यानी ÷स्कूल ऑफ लेंग्वेजे+ज+' के रहे। वे पाश्चात्य दर्शन में शोधकर्ता थे तो मैं भारतीय भाषा केंद्र में। राजनैतिक विचार हम लोगों के एक न सही, पर करीबी थे और कई जन-संघर्षों में हमने एक-दूसरे से सहयोग किया। परस्पर व्यक्तिगत मित्रता घनिष्ठ न होने पर भी परस्पर परिचय काफी गहरा था और इसी से नामवर जी का आदेश हुआ कि गोरख जी के कुछ संस्मरण लिखूं, ताकि उनका व्यक्तित्व उसमें से उभर सके। मेरी अपनी स्मरण-शक्ति बहुत अच्छी नहीं है, इसलिए यहां सिर्फ अपने संस्मरणों पर निर्भर न करते हुए गोरख जी के व्यक्तित्व का काफी हद तक वस्तुगत चित्र प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा, ताकि हम सबको मथनेवावले उस सवाल को कुछ समझ सकें कि एक क्रांतिकारी कवि-चिंतक का ऐसा दुखद अंत क्यों हुआ? यद्यपि यहां यह भूल न जाना चाहिए कि विश्व के क्रांतिकारियों के इतिहास में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। केवल येसेनिन या मायकोवस्की ने ही नहीं, स्वयं मार्क्स के दामाद और पुत्री तक ने अपने जीवन का ऐसा ही दुःखद अंत किया था। क्रांतिकारी भी अंततः और मूलतः इंसान ही होते हैं, बल्कि सामान्य से अधिक संवेदनशील इंसान होते हैं (उनकी अधिक संवेदनशीलता ही उन्हें क्रांतिकारी बनाती है) और उनका भीतरी व्यक्तित्व सामान्य जन से अधिक मजबूत होकर भी कई बार ऐसी मनःस्थिति में (कारण चाहे व्यक्तिगत हो या सामाजिक, जैसे क्रांति की असफलता) घिर जाता है कि जीवन का अंत ही उन्हें अपनी स्वाभाविक परिणति महसूस होने लगती है। आत्महत्या जीवन की कठोर समस्याओं से पलायन भले ही हो, कायरता हर्गिज नहीं होती। जीवन का अंत करने के लिए भी बहुत हिम्मत जुटानी पड़ती है। इसलिए आत्महत्या को गलत मानते हुए ÷आत्महत्या के विरुद्ध' होना सही हो सकता है, लेकिन आत्महत्या या आत्महत्या करने वाले के प्रति कभी अवमानना का भाव नहीं होना चाहिए।
गोरख पांडेय का सामाजिक-राजनीतिक व्यक्तित्व नक्सलवादी आंदोलन से जुड़ा हुआ था व उनके व्यक्तित्व के सकारात्म्क पक्ष को समझने के लिए इस आंदोलन से जुड़े उन बुद्धिजीवियों के ÷चरित्र' को याद कर लेना काफी है, जिन्होंने अपनी तरक्की के लिए सिद्धांत की बलि चढ़ा दी।
दूसरी ओर गोरख पांडेय थे। 1984 में पी-एच.डी. पूरी करने के बाद वे बेकार, नेहरू विश्वविद्यालय के सामने बेरसाय में एक निहायत ही खराब कमरे में रह रहे थे। नहाने तक के लिए दोस्तों के पास जाते। किसी तरह अनुवाद आदिकर महज खान-पान का प्रबंध कर पाते थे। इसी बीच केंद्रीय विश्वविद्यालय, शिलांग से फिलासफी में रीडर पद की पेशकश की गई। उनकी शोध-निर्देशिका ने जब इसे स्वीकार करने के लिए उन्हें समझाना चाहा तो बिगड़ गए–÷÷क्यों जाऊं मैं शिलांग? मेरा यहां राजनीतिक-सांस्कृतिक काम है, इसे छोड़कर कैसे जा सकता हूं।'' फटेहाल हालत में भी ऐसा फक्कड़पन, कितने मध्यवर्गीय बौद्धिक जनों में मिलता है आपको, चाहे कितने भी अतिक्रांतिकारी क्यों न कहलाएं वे?
गोरख पांडेय ने अकादमिक चमक-दमक के बीच पारंपरिक मार्क्सवाद का दामन कसकर थामे रखा व मार्क्सवाद व अस्तित्वाद में घालमेल करने की चालाकी न कर मार्क्सवादी दृष्टि से अपने शोध-प्रबंध में अस्तित्ववाद की धज्जियां उड़ाईं।
व्यक्तिगत व्यवहार व वैचारिक बहसों में गोरख जी का फक्कड़पन, सैद्धांतिक निष्ठा व दृढ़ता स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आती थी।
गोरख जी से मेरी पहली मुलाकात कब हुई, इसकी मुझे निश्चित याद तो नहीं है, लेकिन अगस्त, 1977 में जे.एन.यू. में दाखिल होने के बाद जल्द ही हम लोग परिचित हो गए थे। गोरख जी को उनके घोषित नक्सलवादी विचारों के बावजूद जे.एन.यू. में बहुत जल्दी लोकप्रियता हासिल हुई। कारण था–उनके गीत व कविताएं; विशेषतः उनके भोजपुरी गीत, जिन्हें जब वे स्वयं अपनी मधुर आवाज+ में गाते थे तो एक समा-सा बंध जाता था। दूसरे उनका मृदुभाषी व कोमल स्वभाव। अपने प्रखर बौद्धिक व्यक्तित्व के कारण जे.एन.यू. में वे कुछ ही महीनों में अध्यापकों व छात्रों के बीच लोकप्रिय हो गए थे लेकिन उनकी लोकप्रियता को जल्दी ही ग्रहण भी लग गया, उनकी चर्चा किसी अन्य कारण से होने लगी। गोरख जी झेलम होस्टल में रहते थे। झेलम होस्टल लड़के व लड़कियों का सांझा होस्टल था, अर्थात् उसके एक हिस्से में लड़के व एक में लड़कियां रहती थीं। भोजनालय एक ही था। जे.एन.यू. का माहौल पहले से भी ऐसा था कि लड़के-लड़कियों की दोस्ती में कोई रुकावटें न थीं। जे.एन.यू. के सांस्कृतिक माहौल में वैचारिक स्तर पर मार्क्सवाद का दबदबा था, लेकिन इन विचारों के वाहक प्रायः शहरी उच्च-मध्यवर्गीय व अंग्रेजीभाषी युवक-युवतियां थे, चाहे वे किसी भी संगठन में क्यों न हों। निम्न मध्यवर्गीय व ग्रामीण परिवेश से आए लड़के-लड़कियां भी वहां थे। वे मार्क्सवाद के समर्थक थे व जुझारू चेतना भी रखते थे, लेकिन जे.एन.यू. की संस्कृति में उनका वर्चस्व कम था व छात्र-संगठनों के नेता भी ऐसे वर्ग से कम ही थे। निम्न-मध्यवर्गीय ग्रामीण परिवेशी ÷मार्क्सवादियों' व शहरी उच्च्वर्गीय ÷मार्क्सवादियों' में जो मानवीय आदान-प्रदान होता था, उसमें कई सकारात्मक परिणाम भी निकलते थे। विशेष तौर पर स्त्री-पुरुष प्रेम-संबंधों जैसे नाजुक मामले में।
गोरखजी जे.एन.यू. के इस सांस्कृतिक ÷खुलेपन' में एक उच्च-मध्यवर्गीय अंग्रेजी भाषा का व्यवहार करनेवाली लड़की की ओर आकर्षित हुए। स्वभावतः उस लड़की ने गोरख जी की कविताओं की प्रशंसा की होगी, लेकिन गोरख जी के व्यक्ति के प्रति उसके मन में कोई विशेष भाव न था। गोरखजी का बचपन में विवाह हुआ था, लेकिन विवाहित जीवन उन्होंने जिया नहीं और कुछ वर्ष पूर्व शायद उनकी ÷कानूनी' पत्नी का देहांत भी हो गया था। गोरखजी वास्तव में ही औरत का गहरा प्यार चाहते थे। स्त्री के प्रति गोरख जी का सम्मानजनक भाव उनकी अनेक कविताओं में पूरी संवेदना के साथ व्यक्त हुआ देखा जा सकता है। लेकिन जहां गोरख जी ने प्यार चाहा, वहां संभवतः चमक-दमक ही अधिक थी, गहन भाव न था। इसके बावजूद गोरख जी आदर्श प्रेमी की तरह भावासक्त अवस्था में पहुंच गए और इसी अवस्था में उनका व्यवहार असामान्य होने लगा। उस लड़की ने भी उनके व्यवहार की इस असामान्यता की चर्चा अपने कुछ पुरुष मित्रों से की होगी, जिन्होंने गोरख जी से कुछ कहा होगा और उसी समय गोरख जी में उस नामुराद बीमारी–÷पैरानाइड सिज+ोफ्रेनिया' के आरंभिक लक्षण दिखाई दिए, जिसके कारण अंततः 1988 में उन्हें अस्पताल में दाखिल होना पड़ा।
गोरख जी के इस असामान्य व्यवहार की विश्वविद्यालय में चर्चा होने लगी और इससे उनकी प्रतिष्ठा में भी कुछ खरोंच आई और इसी बीच अधिकारियों ने उन्हें ÷झेलम' छात्रावास से ÷पेरियार' छात्रावास में भेज दिया। मुझे याद है कि उन्हें शुरू में कमरा नं. 013 दिया गया, जिसमें पहले हमारे मित्र राजेंद्र मिश्र रह चुके थे। उन्हीं दिनों एक दिन शाम के खाने के समय गोरख जी को मैंने आतंक में रोते देखा। उन्हें लग रहाथा कि उस लड़की के वे पुरुष मित्र उन्हें मार डालना चाहते हैं। यह बात 1978 की है। उनकी निर्देशिका डॉ. सुमन गुप्ता के अनुसार उन्हें तब आल इंडिया मेडिकल इंस्टीट्यूट के मनोरोग विभाग में भेजा गया था। उस समय वे वहां जाने के लिए आसानी से तैयार भी हो गए थे। मनोरोग विशेषज्ञों ने उस समय उनकी जांच की, लेकिन उन्हें दाखिल करने की बजाय तनाव कम करने की कुछ गोलियां देकर लौटा दिया था। शायद नियमित जांच के लिए बुलाया हो लेकिन, विशेषज्ञों ने उस समय भी उनके व्यक्तित्व में ÷आत्मघाती प्रवृत्तियों' को नोट किया था और उन्हें गोलियां देने की जिम्मेदारी किसी दूसरे छात्र को दी थी, ताकि वे बहुत-सी गोलियां एक साथ खाकर आत्महत्या न कर ले।
÷पैरानाइड सिज+ोफ्रेनिया' के जो लक्षण इधर दिखाई दिए, उनकी पृष्ठभूमि शायद पहले भी रही हो। गोरख जी अतिशय संवेदनशील व कोमल व्यक्ति थे। उनकी त्वचा के हल्के स्पर्श तक से इस संवेदनीयता को महसूस किया जा सकता था। शायद उन्हें बचपन में प्यार कम मिला, पिता का स्वभाव शायद कठोर रहा। केवल अपनी बुआ से उन्हें प्यार था, संभवतः बचपन में बुआ से ही उन्हें प्यार मिला। फिर अनचाही शादी। संस्कृत, भारतीय दर्शन व साहित्य के पंडित थे गोरख जी; ऐसी वैचारिक दीवारों को उलांघकर वे पश्चिमी दर्शन व मार्क्सवाद और उसमें भी नक्सलवाद तक पहुंचे थे। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में वे 1969 से थे। शायद वहां पुलिस ने कभी उनसे दुर्व्यवहार किया हो व इस रोग के लक्षण कभी मामूली रूप से वहां भी प्रकट हुए हों।
फिलहाल जे.एन.यू. में उनके मित्र व परिचित जानते हैं कि गोरख जी को किसी भी प्रकार का स्पर्श असहनीय है, लेकिन इस बात का पता चलते-चलते कई दुर्घटनाएं भी घट जाती थीं। स्वयं मेरे साथ ऐसा हुआ है। एक बार सप्रू हाउस से जे.एन.यू. लौटते समय जे.एन.यू. बस में मैंने उनके ऊपर से हाथ निकालकर गर्मी की वजहसे खिड़की खोलने की कोशिश की तो वे एकदम बिगड़ उठे थे–÷÷क्या कर रहे हैं आप? मारना चाहते हैं मुझे?'' मैं हत्प्रभ होउठा थाऔर स्पष्टीकरण देने की निष्फल कोशिशें की थीं। जे.एन.यू. तक हम सहज नहीं हो पाए थे। ऐसी घटनाएं अनेक लोगों के साथ घटी हैं। कई लोग इसका कारण न जानने से नाराज+ भी हो जाते थे। कई बार महीनों तक गलतफहमियां भी बनी रहती थीं। गोरख जी भीड़-भाड़ से यहां तक कि किसी के स्पर्श मात्र से बचने के लिए डी.टी.सी. बसों में सफर करने से यथासंभव बचते थे और मीलों पैदल चल लेते थे। एक बार वे मंडी हाउस से दरियागंज तक मुझे बातचीत का बहाना बनाकर पैदल ले गएथे। जब 1988 मध्य में उनकी मनःस्थिति अत्यधिक खराब हुई तो स्पर्श से संबंधित उन कीभयंकर दुष्कलपनाएं सामने आईं, स्पर्श से अतिरिक्त दुष्कल्पनाएं भी इस बीच प्रकट हुईं। मेरे बारे में उन्होंने मुझसे खुद ही कहा कि आपने पेरियार होस्टल में रहते हुए मुझे कई बार पीटा है। होता यह था कि रात का खाना खाकर हम लोग सैर के लिए निकलते तो पंजाबी स्वभाव से मैं उनके कंधे पर हाथ रख लेता या किसी बात पर पीठ थपथपा देता और वही उनकी दुष्कल्पना में पिटाई बनकर अंकित हो गया। इस मानसिक अवस्था में उन्होंने अपने जीवन में आए तमाम पुरुषों–अपने पिता से लेकर ÷जन संस्कृति मंच' व जे.एन.यू. के तमाम मित्र छात्र-अध्यापकों को ÷बलात्कारी' का दर्जा दे डाला। वे तमाम लोगों को ÷बलात्कारियों का अंतर्राष्ट्रीय संगठन' भी कह देते थे और अपने राजनीतिक विरोधियों को भी यही दर्जा देकर लपेट लेते थे। चाहे वे उनसे व्यक्तिगत रूप से कभी परिचित न रहे हों। मिसाल के तौर पर वे कभी ज्योति बसु को इस संगठन का अध्यक्ष घोषित कर देते थे, कभी अपने तमाम साथी-दोस्तों को इसके कर्ता-धर्तां
1978 में उनकी मानसिक अवस्था जो बिगड़ी, वह कुछ समय में संभल तो गई, पर उससे पूरी तरह मुक्त वे अंत तक नहीं हो पाए। वे इस बात को कभी स्वीकार न कर पाए कि उस लड़की केमन में उनके प्रति कोई भाव न था। वे हमेशा यही कल्पना करते रहे कि उन दोनों को एक भयंकर षड्यंत्र के तहत अलग रखा जा रहा है। बीच में उस लड़की से मेरा भी परिचय रहा, लेकिन गोरख जी के संबंध में कभी चर्चा नहीं हुई। कुछ हद तक उनका आतंक का भाव कम हो गया और इस बीच उन्होंने बहुत अच्छी कविताएं लिखीं, मार्क्सवादी साहित्य-चिंतन को लेकर अनेक लेख लिखे, नव-जनवादी सांस्कृतिक संगठन बनाया व अपना शोध कार्य भी किया, साथ ही पढ़ाया भी। इस समय उनका मस्तिष्क दो हिस्सों में विभाजित था। स्वस्थ हिस्से सेवे अपने यह तमाम सृजनात्मक व उत्पादक कार्य करते थे, जबकि अस्वस्थ हिस्से में उस लड़की का काल्पनिक प्रेम बसा हुआ था, यद्यपि उस हिस्से को वे जाहिर कम ही करते थे। कुछ मित्रों से वे सेक्स संबंधी चर्चाएं भी खुलकर कर लेते थे। इस बीच जे.एन.यू. में प्रगतिशील छात्र संगठन से भी वे जुड़े रहे तथा इंडियन पीपुल्ज फ्रंट आदि से भी संपर्क-सहानुभूति रखते रहे।
1982 में मैं जब अपना पी-एच.डी. थीसिस जमाकर बंबई चला गया तो गोरखपुर जी अभी होस्टल में ही थे। मई 1983 में जे.एन.यू. में पुलिस-दमन के शिकार होकर उन्हें होस्टल से निकलना पड़ा। उनकी फैलोशिप संभवतः खत्म हो गई थी। लेकिन 1983 में उनका संकलन ÷जागते रहो सोनेवालों' छपा और इस पर एक वर्ष के लिए ओंप्रकाश-स्मृति पुरस्कार भी मिला। कुछ अनुवाद भी वे करते रहे। ÷पीपुल्स लिटरेसी' ने उनकी पुस्तक ÷सार्त्र का अस्तित्ववाद' और एक अनूदित पुस्तक छापने की घोषणा भी की। बेरसराय के सड़े हुए कमरे में रहकर भी वे विश्वविद्यालय पुस्तकालय में पूरा दिन अध्ययन-लेखन में लगे रहते। इस बीच उनके राजनीतिक गुट ने ÷जन संस्कृति मंच' के गठन की योजना बनाई तो सबसे अधिक दौड़-धूप गोरख जी ने ही की। 1985 में दिल्ली में इसके स्थापना-सम्मेलन में गोरखजी ही महासचिव चुने गए। 1985 में ही चंडीगढ़ में मंच ने अपना एक कार्यक्रम रखा। वहां गोरखजी के लिए तनावपूर्ण स्थिति भी आई। गोरख जी कार्यवाही चला रहे थे कि वहीं उनकी वह मनचाही लड़की अपनी उम्र से काफी बड़े व विदेश में बसे अपने पति के साथ प्रकट हुई। यह लड़की इस बीच विदेश चली गई थी। लेकिन गोरख जी ने आत्मानुशासन का परिचय देते हुए पूरी कार्यवाही चलाई। नवंबर, 1985 में पंजाब लोक संस्कृति मंच के कार्यक्रम पर भी गोरख जी डॉ. मैनेजर पांडेय के साथ जालंधर आए। यद्यपि पंजाब में भोजपुरी गीतों की सराहना करने वाले कम थे, लेकिन उनकी मृदुभाषिता ने अवश्य लोगों को प्रभावित किया।
1985 में मैं पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला चला आया था, लेकिन बीच-बीच में दिल्ली व जे.एन.यू. आने पर गोरख जी से भेंट होती रहती थी। उन्हें यू.जी.सी. से पोस्ट-डाक्टोरल फेलोशिप मिल गई थी व रहने के लिए अच्छा कमरा, लेकिन इस बीच वे काफी अकेले पड़ने लगे थे। नवंबर, 1984 के दंगों के बाद गोरख जी ने एक बड़ी सशक्त कविता ÷खूनी पंजा' लिखी थी, जो दिल्ली में अनेक जगहों पर गाई गई थी।
÷जन संस्कृति मंच' के भीतर चाहे कुछ तनाव रहे हों या कुछ अन्य कारण, गोरख जी इस बीच आत्मकेंद्रित हो रहे थे और यह स्थिति उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए घातक थी। जीवन उनका आरामदायक था, लेकिन ऐसी स्थिति में अकेलापन और भी खलता है। उनके प्रशंसक भी जे.एन.यू. में कम रहे गए थे और उसमें वह सांस्कृतिक माहौल भी न रह गया। 1987 के अंत तक गोरखजी में फिर उनके पुराने मनोरोग के लक्षण प्रकट होने लगे थे और 1988 में अधिक स्पष्ट होने लगे। इस बार का रोग पहले से अधिक तीव्र था। गोरख जी ने बाहर खाना-पीना बंद कर दिया था। कमरे में सौंदर्य की दृष्टि से भी हल्के, अर्धनग्न स्त्री-चित्र लगा लिए थे, सुबह से ही शराब का भी सेवन करने लगे थे। पूरी उम्र इंदिरा गांधी के कटु आलोचक रहकर भी इन दिनों, स्त्री के नाते, उसकी प्रशंसा करने लगे थे। शुरू में वे कहते थे कि ÷÷मैं स्त्रियों से ही परिचालित हूं।'' अपने जन्म तक में वे पिता की भूमिका को पूरी तरह नकारकर स्त्री की ही पूरी भूमिका कल्पित करने लगे थे। 23 मार्च, 1988 को पाश की हत्या के बाद जून-जुलाई में जब उनसे भेंट हुई थी तो उन्हें पाश को स्मृति-कक्ष से बाहर लाने में मुश्किल हो रही थी, जबकि उसकी कविता के तो वे प्रशंसक रहे ही थे, नवंबर, 1985 में जालंधर में उससे मिले भी थे।
लेकिन उनके दिमाग का एक हिस्सा अभी भी स्वस्थ व सक्रिय था। वे ठीक से पढ़ाते थे। जबमैं अपने एक मित्र की पत्नी को उनसे उनके शोधकार्य में सहायता के लिए उनके पास ले गया तो करीब एक घंटे तक मनोयोग से सार्त्र के अस्तित्ववाद की व्याख्या की और कुछ पुस्तकें भी उदारता से उधार दे दीं।
इसके बाद जनवरी, 1989 तक मैं जे.एन.यू. नहीं आ पाया, लेकिन दिसंबर, 1988 में एक सेमिनार के सिलसिले में प्रो. विजय गुप्ता पटियाला आए तो उन्होंने गोरख जी के बारे में बताया कि कैसे उन्होंने खाना-पीना तक छोड़ दिया है और बेहोश होने लगे हैं। जनवरी में डॉ. सुमन गुप्ता ने बताया कि उनका खाना केले तक सीमित रह गया था, जब वह भी छोड़ दिया तो मैडम उन्हें अस्पताल ले जाने के लिए गईं। पहले तो उन्हें भी ÷गेट आउट' कहा गया, लेकिन फिर उनकी बात मानकर वे ए.आई.एम.एस. जाने के लिए राजी हुए। मनोरोग विशेषज्ञों ने जब उन्हें ÷पैरानाइड सिज+ोफ्रेनिया' की आगे बढ़ी हालत में पाया तो फौरन दाखिल कर लिया। करीब एक महीना उन्हें अस्प्ताल में रखा गया। बातचीत द्वारा उपचर के साथ-साथ बिजली के झटके भी दिए गए, जिसकी अनुमति के लिए गोरख जी के पिता को बुलाया गया, जो कुछ अन्य परिजनों के साथ आए और कुछ दिन रहे भी। बाद में गोरख जी ने जिद कर उन्हें लौटा दिया।
अस्पताल में उनकी देखभाल जे.एन.यू. के उनके पुराने परिचित मित्र छात्रों-अध्यापकों व उनके एकाध राजनीतिक संपर्कों ने की। बिजली के झटकों के बाद वे अपने ÷भ्रमों' से तो मुक्त हो गए, आतंक भी हट गया, लेकिन तब जीवन का कटु व कठोर यथार्थ अपनी पूरी भयावहता के साथ उनके सामने था। वे स्वयं को स्वस्थ होता महसूस कर रहे थे, लेकिन इन्हीं क्षणों में एक-दो मित्रों से फिर उन्होंने कहा कि पहले तो नहीं, लेकिन अब कभी-कभी जीवन समाप्त करने का मन होता है।
और मेरी गोरख जी से अंतिम भेंट उनके ऐसे अवसादपूर्ण क्षणों में ही हई। जनवरी, 1989 में दो-तीन दिन के लिए जे.एन.यू. रुका। पहले से ही मन में था कि गोरख जी से इस बार जरूर मिलना है। जे.एन.यू. में भी सांझे मित्रों ने कहा कि आप जरूर मिलें। और एक दोपहर क्लब बिल्डिंग कैंटीन में खाने के समय गोरख जी दिखाई दिए। मैं जे.एन.यू. के कुछ पुराने छात्रों–हेमंत जोशी, अजय पटनायक व बलबीर भटोला के पास बैठा था कि गोरख जी आए। आपस में सभी ने एक-दूसरे को नमस्कार किया। प्रायः सभी ने गोरखजी से उनका हालचाल पूछा। गोरखजी असामान्य रूप से उदास लग रहे थे, दाढ़ी थोड़ी-सी बड़ी लगती थी। बहुत ही उदासी से भरकर उन्होंने कहा, ÷÷आप मेरे कमरे की ओर आएंगे क्या?'' मैं उस दिन किसी काम से कहीं जाना चाहता था, लेकिन गोरखजी के स्वर में ऐसी उदासी थी कि मैंने कहा, ÷÷आता हूं, पांडेयजी!'' और पंद्रह मिनट बाद जब उनके कमरे में पहुंचा तो वे बालकनी में धूप सेंक रहे थे। हम लोग बैठे बातचीत करते रहे। मैं उनके इलाज आदि के बारे में पूछता रहा। गोरख जी ने सबकुछ बताया। दवा एकाध साल चलनी है, हर दो-तीन सप्ताह के बाद चैकअप के लिए जाना है, कौन लोग अस्पताल आते-जाते रहे हैं, आदि। शोध-संबंधी बातें भी बताईं और यह भी बताया कि डॉक्टरों ने कहा है–सामान्य जीवन जिएं, पढ़ें-लिखें। गोरखजी के भय दूर हो गए थे, अतः बाहर खाना-पीना शुरू कर दिया था। गोरख जी ने कहा कि कुछ करने का मन नहीं होता, सारा दिन कमरे में बैठा ही रहता हूं। इनकी इस बात से उदासी हुई। मैंने कहा, ÷÷पांडेय जी, पढ़ने-लिखने का मन नहीं करता तो कोई बात नहीं। चार-छह महीने न भी पढ़ेंगे तो क्या है। लेकिन सारा दिन कमरे में न रहें, बाहर निकलें, लायब्रेरी की ओर जाएं। वहां बाहर कारीडोर में सारा दिन दोस्तों से गपशप ही करें।'' लेकिन पांडेय जी का संक्षिप्त उत्तर था–÷÷मन नहीं करता।'' जब मैंने चलने की अनुमति चाही तो भी निर्विकार भाव से उन्होंने कहा–÷÷अच्छा।'' बाद में उनके इस मूड की चर्चा डॉ. मैनेजर पांडेय, शशिभूषण उपाध्याय यहां तक कि पटियाला आदि के मित्रों से भी की, लेकिन यह मन में नहीं आया था कि दो सप्ताह के भीतर ही पाांडेय जी मन न करने की स्थिति से ÷जीने का मन न करने की स्थिति' की ओर बढ़ जाएंगे। उस दुखद घटना के दो-तीन दिन बाद 31 जनवरी के ÷इंडियन एक्सप्रेस' में छोटी-सी ख़बर में पढ़ा तो एकदम जड़-सा हो गया व कई दिन तक इसके प्रभाव से मुक्त न हो सका। पटियाला में गोरख जी को जाननेवाले लोग न थे, अतः दिल्ली के मित्रों को पत्र लिखे, स्मृति-लेख लिखे, लेकिन मन पर बोझ बना रहा और मार्च में दिल्ली आया तो डॉ. सुमन गुप्ता, डॉ. मैनेजर पांडेय व रामकुमार कृषक से और कुछ छात्र-मित्रों से बहुत देर तक गोरख जी के ही बारे में चर्चा की।
ऐसा लगता है कि बिजली के झटकों के बाद गोरख जी के भ्रम तो टूट गए, लेकिन अपनी मनोरोग अवस्था में अपने तमाम स्नेहियों-संबंधी जो कुछ उन्होंने कहा (यद्यपि किसी ने भी इसका बुरा नहीं माना) वह या तो किसी के अज्ञान से उन्हें ज्ञात हो गया या उनकी स्मृति में ही वह कुछ बचा रह गया। उसका बोझ, साथ ही भयावह अकेलापन और अभी पूरी तरह से मानसिक स्वास्थ्य हासिल करने का संघर्ष सामने था। मित्रों ने बताया कि वे इस बीच किसी को अपने यहां रुकने भी न देते थे, और यह सारी स्थितियां उन्हें जीवन से चरम निराशा की ओर ले गई, यद्यपि कहीं-कहीं उन्होंने जीने की इच्छा, सृजन की इच्छा को भी इन क्षणों में व्यक्त किया था।
30 जनवरी, सोमवार को ग्यारह बजे डॉ. सुमन गुप्ता के घर पर गोरख जी के ही पी-एच.डी. प्रबंध पर फिलासफी के छात्रों-शोधकर्ताओं को चर्चा करनी थी। मैडम ने अपने एक छात्र को यह पता करने भेजा कि वे स्वयं आ जाएंगे या उन्हें लेने कोई आए और रविवार की दोपहर उस छात्र ने बार-बार दरवाज+ा खटखटाने पर कोई उत्तर न पाकर रोशनदान से जो देखा, वह अकल्पनीय था। यद्यपि एक दिन पहले वे स्वयं कह चुके थे कि मैं जरूर आऊंगा, पर सबको मन ही मन विदा कहकर वे सबसे दूर चले गए। जाते-जाते भी यही लिखकर गए कि ÷÷किसी को तंग न किया जाए।'' गोरख जी ने कभी किसी को तंग करना न चाहा था, बल्कि सबका भला ही चाहा और सोचा, लेकिन जीवन के अथाह समुद्र में भला ही चाहा और सोचा, लेकिन जीवन के अथाह समुद्र में ऐसी धार में वे बह गए कि फिर किनारा न पा सके। दूसरों को अपने गीतों-कविताओं से तृप्त कर, अपने मन में कहीं गहरे में अतृप्त, गोरख जी तो चले गए, लेकिन हम सबको यह सोचने के लिए विवश कर गए कि जीवन को इतने हल्के रूप में कभी न लेना चाहिए। अपने जीवन में गोरख ने मांगा बहुत कम (जो मांगा, वह मिला नहीं), दिया बहुत अधिक। यही कारण है कि उनके जीवन में उन्हें कोसनेवाले या उनका मजाक उड़ानेवाले भी उनके जाने के बाद उन्हें बड़ा मानने के लिए विवश हुए और अपनी लघुता का एहसास भी उन्हें हुआ। (आलोचना, अप्रैल-जून 89 से साभार)
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