.... फ्रायड ग़ायब और इन्द्र मुस्कुरा रहा था
लीलाधर मंडलोई
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हिन्दी कविता के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर और दूरदर्शन के महानिदेशक लीलाधर मंडलोई कविता के अतिरिक्त गद्य लेखन के लिए भी जाने जाते हैं। वर्षों से वे अपनी मनःस्थितियां डायरी में दर्ज करते रहे हैं। ये छोटी-छोटी टिप्पणियां , फोटो-विडियोग्राफी की भाषा में कहें तो एक रचनाकार के मन को जूमइन करके दिखा रही हैं। इनकी बाबत उनका खुद का कहना है–'' मेरी इस बीच की डायरी या कहें आधी-अधूरी डायरियों में सभी विधाओं का कच्चा माल दूंदराज+ होता रहा। यह भी सही है कि इनसे गुज+रे बिना मेरी कोई भी रचना कभी पूरी नहीं हुई। अगर ये न होतीं तो एक लेखक के रूप में, मैं भी न होता। मैं इनके साथ कुछ वैसा ही भागता रहा हूं जैसे एक मां भागती-दौड़ती हुई अपने बच्चों के कामों के साथ अपने काम में भी सदैव डूबी हुई पाई जाती है।
टुकड़ों-टुकड़ों में लिखी जीवन और समाज की कुछ छवियां। भाषा के निरायास शिल्प में। यह डायरी अगर डायरी की परिभाषा में न अटे तो मुझे माफ करें। जो डायरी में गोदता रहा यकीकन उसी से यह किताब जन्मी है।
दो-एक बातें और...। यह पारंपरिक रूप से डायरी की स्थापित छवि का इस अर्थ में निषेध करती हैं कि यह पूरी तरह तिथिहीन है। ''
आवाज के पांव में
दिल्ली की सड़कों पे चलते हुए आवाज के पांव में ये कैसे फफोले...। आसमान इतना अजनबी कि बचपन से परिचित चांद से उतरती दर्द की नदी। मैं प्यासा रेत के ऐसे ढेर पर कि पानी की एक बूंद कठिन...। अल्फाज अपनी आवाज के बोझ से पस्त...। रूह तक तिश्नगी में कराहती...। यह एकदम अजनबी रास्ता कि जिसपे एकाएक फेंका गया...। हर सिम्त महरूमियां पसरीं बहोत। मैं किसी जहर को पीते हुए रोज, रोज जिदगी के दिन बढ़ाते हुएऽऽऽ।
हमारे डर
नींद अमूमन नहीं आती...। पूरा घर इस बीमारी से प्रभावित...। बेटी रात को कभी उठके घूमने लगती है...बेटा करवटें बदलता रहता है...। पत्नी को भ्रम हो चला है कि दिन में लेट लेने की वजह से नींद नहीं आती...।
कितना कठिन है एक दूसरे को ढांढस बंधाना...। हम सब अपने-अपने तर्कों को गढ़ लेने में उस्ताद हो चले हैं...हमारा क्या लेकिन सुंदर सपने देखने की उम्र में बच्चों की नींद से यह दुश्मनी...कि हमारे डर में शामिल वे सो नहीं पा रहे।
कोमल छुअन
मुमकिन है पढ़के हंसी आए...कि फिजूल बात। लेकिन हक़ीक़त है यह कि आंसुओं को छुपाते हुए जब मैं सांसों के दलदल में उस रोज+ छटपटा रहा था तुम्हारे बोसों की कोमल गर्मी ने मुझे पूरी तरह धंसने की कगार से निकाल लिया। और मैं खुश रंग किन्हीं अदृश्य पंखों पे उड़ निकला...। वो एक जादू सा अहसास है अब भी जि+ंदा...याद है मुझे...वह तारीख़...वह दिन...जब मैं अदालत से लौटा था।
टुटा सामान
मन अजीब है। आंखें भी जैसे मन के अनक़रीब। जब देखती हैं इन दिनों तो बारह टूटा-फूटा...सामान। टूटी हुई बांसुरी। टूटा हुआ गुलदान। फटी हुई कमीज+। उधड़े हुए जूते। तिड़का हुआ कप। बिना पांव की कुर्सी। टूटी-फूटी नातेदारियां। ऐसा क्यों लगता है कि जैसा होना चाहिए वैसा नहीं बचा कुछ भी। यह संयोग नहीं कि मैंने गली की मज+ार को टूटा हुआ देखा...। कुछ है जो भीतर टूट रहा है...लगातार।
भागता फिरे है
पहले गोरे रूप ने लुभाया। फिर देह ने आकर्षित किया। योग कुछ ऐसा बना कि स्पर्श-रोमांच से वह पुलकित हुआ। गोकि यह रोमांच रागात्मक न था। भलामानुष दैहिक सुख को प्रेम समझने लगा। उसके भीतर और आस-पड़ोस फ्रायड था इन्द्र की जगह मुस्कराता। एक युवती दिखने में आधुनिक, मांसल और भोगने योग्य। जिसकी देह से वह खेलना चाहता था। इत्तफाकन आधुनिक किन्तु संस्कारों से ठेठ भारतीय राग भैरवी के आलाप समय उसके वामपक्ष में जा विराजी। समय से पूर्व वह शादीशुदा हुआ। खेलकूद सकता था जितना, कूद-फांद लिया। हर खेल में होती है ऊब और खासकर खेल जो फ्रायड के सिद्धांत के हों ऊब कुछ जल्दी आ जाती है। वह ऊबा। देह का रोमांच अब त्याज्य वस्तु में तब्दील होने लगा। आधुनिक बनने के फेर में पत्नी अब बिस्तर पर सुबक रही थी। नीली रोशनी फेंकती निर्वस्त्र आधुनिकता की ललक में, फ्रायड अब गायब और इन्द्र मुस्कुरा रहा था। वह अब भी अज्ञानता के एाकलाप में सहानुभूति की आड़ लिए खेल को उत्सुक था। प्रेम होता कहीं तो सच होता। सच होती घृणा तक। दुर्योग से उसे भौतिक अवसाद को प्राप्त होना था, वह हुआ। भोग विलास से इस भोगविलाप तक वह मित्रों द्वारा पहचान लिया गया। पहचान लिया जाना उसके कष्ट का कारण है। वह सिर्फ़ भाग सकता है और भागता फिरे है अब! खुदा उसे सुकून बख्+शे, आमीन!!
विदा
रेलवे स्टेशन पे किसी को विदा करना...मेरे लिए सदैव...एक पीड़ाकारी काम होता है...जिसके साथ दो-एक दिन ही सही सघन आत्मीय रूप से रहे...उसे एक झटके में रेलगाड़ी के पहिये दूर कर दें
...यह बेहद मार्मिक और कष्टप्रद होता है...न केवल मनुष्य यहां तक ग्रीष्म का मौसम...जो मुझे क़तई पसंद नहीं जब विदा होता है...तो उसके बिंब महीनों चेतना को घेरे रहता हैं...ग्रीष्म दिलकश नहीं...पर उसके बीच में खिड़की पर दस्तक देते झोंके जितना सुकून देते हैं कि आपको लगता है आग के कुंड में भी चेहरे से आत्मा पर उतरती जल बूंदे हैं...जैसे नवजात शिशु का सजल स्पर्श...
हर विदाई का दृश्य अद्वितीय प्रेम से जन्मा है...विदाई प्रेम के बिना मुमकिन नहीं।
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