इस अंक में
मन माने की बात बातचीत
माइंड योर लैंग्वेज यानी जुबान सँभाल के
डॉ विनय कुमार
शब्दों के अर्थ शुरुआती अर्थों तक ही सीमित नहीं रहते। सभ्यता की विकास-यात्र में समय-समय पर नए अर्थ जुड़ते जाते हैं। यह आवश्यक नहीं कि नए अर्थों की आमद सकारात्मक ही हो।
दुख को बेहतर समझती है मनोचिकित्सा...
डॉ. नरेन्द्रनाथ विग से डॉ. विनय कुमार की बातचीत
जीवन और ज्ञान की विविधताओं के गहरे अध्येता डॉ. एन.एन.विग भारतीय मनोचिकित्सा जगत की उज्ज्वलतम उपस्थितियों में से एक हैं।
 
मन माने की बात डायरी
रचनाकार की पूंजी होती है बचपन की ...
डॉ. नरेन्द्रनाथ विग से डॉ. विनय कुमार की बातचीत
अपनी कविताओं में मनुष्य और उसके जीवन के प्रति समाहित होनेवाले कथ्य को आप किस रूप में देखते हैं ? पानी में घिरे हुए लोग शीर्षक कविता की रचना प्रक्रिया के बारे में बताएं।
....फ्रायड ग़ायब और इन्द्र मुस्कुरा रहा था
लीलाधर मंडलोई
हिन्दी कविता के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर और दूरदर्शन के महानिदेशक लीलाधर मंडलोई कविता के अतिरिक्त गद्य लेखन के लिए भी जाने जाते हैं। वर्षों से वे अपनी मनःस्थितियां डायरी में दर्ज करते रहे हैं।
 
मनोचिकित्सक की कलम से मनोचिकित्सक की कलम से
हिस्टीरिया की कहानी : डॉ. प्रमोद कुमार सिंह
सचमुच यह अब एक कहानी मात्र ही रह गयी है, क्योंकि विशेषज्ञों ने इस शब्द का प्रयोग बन्द कर दिया है। किन्तु इस शब्द की प्रासंगिकता अभी बनी हुई है, क्योंकि जनमानस में यह शब्द अभी पूर्ण जीवंत रूप में कायम है। इसकी प्रासंगिकता इसलिए भी बनी हुई है क्योंकि जिन मनोशारीरिक दशाओं के लिए इसका प्रयोग किया जाता था, वे अभी भी लगभग उसी रूप में,
मनोरोगियों के परिवारों की चुनौतियां :
जे.के. त्रिवेदी/श्याम बिहारी राय/मोहन ध्यानी

मानसिक रोगों से कोई व्यक्ति, समाज अथवा देश प्रतिरक्षित नही है। इन रोगों का व्यक्ति के ऊपर गंभीर मनोवैज्ञानिक,सामाजिक व
 
मनोचिकित्सक की कलम से मनोचिकित्सक की कलम से
बढ़ती उम्र का सामना : डॉ. चित्तरंजन एन्ड्राडे
किशोरावस्था के अन्तिम तथा युवावस्था के आरंभिक वर्षों में बौद्धिक क्षमता अपने उच्चतम स्तर पर रहती है। इसके बाद इसमें लगातार गिरावट आती है, पर यह बात पचास या साठ की उम्र के बाद ही पता चलती है। बढ़ती उम्र के साथ हाल की घटनाओं की याददाश्त भी कम हो जाती है।
मनोरोगियों को बेड़ियाँ क्यों नेहा सईद सईद अख्तर
इस सभ्य समाज में भी मनोरोगियों के साथ परिवार, समाज और कभी-कभी तो विभिन्न चिकित्सा प्रणालियों के माननीय दिग्गजों के द्वारा जो व्यवहार होता है, वह बड़ा ही दिल दहलाने वाला होता है। रोगियों को आज भी हथकड़ियों से जकड़ कर रखा जाता है, रस्सियों से उनके हाथ पैर बाँध दिए जाते हैं , कमर में रस्सी बाँध कर जानवरों की तरह खींचा जाता है।
 
नोटिस बोर्ड नोटिस बोर्ड
पागलपन नहीं सायकोसिस
एक शब्द है पागल'। इस शब्द का हमारे जीवन में बड़ा महत्त्व है। दुनिया में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं जिसे कभी पागल न कहा गया हो। कोई भी मां बच्चे की ऊल-जुलूल, लेकिन मासूम हरकत पर कहती है, धत पागल और बच्चे की छोटी-सी गलती पर बड़ा दंड देने पर उतारू पिता को कहती है, पागल हो गए हैं क्या?
प्रसवोत्तर अवसाद
पुराण बताते हैं कि एक बार समुद्र का मंथन हुआ था और उससे चौदह रत्न निकले थे। यह भी बताते हैं कि किस रत्न को किस देवता अथवा किस असुर ने ग्रहण किया था, किंतु यह नहीं बताते कि मथे जाने और रत्नदान के बाद समुद्र ने क्या महसूस किया। समुद्र को ठीक वैसा ही लगा होगा जैसा फसल दे चुकने
 
नोटिस बोर्ड नोटिस बोर्ड

अटेंशन डेफिसिट हायपरएक्विविटी डिसॉर्डर
अभिभावक के रूप में आप अपने बच्चे का जीवन गढ़ने में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसी संभावना हो सकती है कि आपका बच्चा अटेंशन डेफिसिट हायपरएक्विविटी डिसॉर्डर (ए डी एच डी) का शिकार हो। आएं जानें कि–

ए डी एच डी क्या है ?

मनोरोग के लक्षण
¨ नींद में कमी , भूख में कमी , क्रोध आना , तोड़-फोड़ , मार-पीट , बेवजह डर , शक , बहुत कम या बहुत अधिक बात करना , अकेले बैठकर बुदबुदाना या मुस्कुराना , डायन या भूत का डर , कोई कहीं नहीं बोले तब भी आवाज सुनना , पत्नी को पति के अथवा पति को पत्नी के चरित्र पर बेवजह शक , गांजा , भांग , शराब , स्मैक आदि की लत।
 
बाल मन बाल मन
शिक्षा की अनोखी अवधारणा : मॉन्टेसरी स्कूल : मीनू मंजरी
रंग.विवरंगी मेज'कुर्सिया, खिलौनों से भरी अलमारी, समूहों में बैठे अपने काम में र्मग्‍न बच्‍चे यह द़श्‍य पारंपारकि पाछशाला से काफी भिन्‍न है ा पर दुनिया भर से मॅान्‍टेसरी स्‍कूलों की सफलता ने शिक्षा की इस अवधारणा को मान्‍य बनाया हैा
बच्चों को कहां ले जा रहा है मीडिया : नरेन
हलांकि प्रिट मीडिया हो चाहे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रायः हर किस्म का मीडिया वर्ग अपनी सामूहिक गतिविधियों के मद्देनजर लगभग पूरी तरह से मनी मिटिंग, वीभत्स बाजारू उत्पाद में तब्दील हो चुका है; लेकिन उसका पाखण्डी और आतंककारी दंभ उत्तरोत्तर परवान ही चढ़ता जा रहा है कि वह
 
निष्कलंक निष्कलंक
बु्रक शील्ड्स : विनोद अनुपम
14 मई 2007, दिन के दो बजे थे। सैनडिएगो(कैलिफोर्निया) के कन्वेंशन सेंटर में अमेरिका की प्रसिद्ध मनोचिकित्सक नैन्सी ऐन्ड्रियासन को सुनने के लिए हॉल में लगभग 500 मनोचिकित्सक बैठे थे। भाषण शुरू होने में कुछ विलम्ब था। मेरी सीट की दाहिनी तरफ बैठे सज्जन ने बायीं तरफ बैठे सज्जन से पूछा -
गोरख पांडेय! यादों के आईने में चमन लाल
किसी भी कवि के लिए सबसे बड़ी चुनौती है–गंभीर अर्थों से भरे लोकगीत लिखना। हक की लड़ाई लड़नेवालों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलनेवाले गोरख पांडेय ने यह कठिन काम तो आसानी से किया, मगर पारानॉयड स्किजोफ्रेनिया की मुश्किलों से पार नहीं पा सके। उन्होंने आत्महत्या कर ली।
 
क्रूरता की शिनाख्त क्रूरता की शिनाख्त
रैगिंग को सामाजिक वर्ग ढांचे में देखें : स्वतंत्र मिश्र
उच्च संस्थानों में रैगिंग एक आम समस्या बन गयी है। हाल ही में भारत के एक प्रतिष्ठित कॉलेज सेंट स्टीफेंस में कुछ सीनियर छात्रों द्वारा एक जूनियर छात्र को प्रताड़ित करने का मामला सामने आया है। इस घटना में सीनियर लड़कों ने अपने एक जूनियर के र डियोडरेंड खूशबू उत्पन्न करने वाला इत्र जैसा कुछ स्प्रेे छिड़कर उसको आग लगा दिया गया।
खुद की खबर पर खामोश मीडिया :
वर्तिका नन्दा सहाय
दो साल पहले दिल्ली पब्लिक स्कूल के दो छात्रों का जो अश्लील एमएमएस बना, वह बे्रकिंग न्यूज थी, देश भर ने वो तस्वीरें देखीं और जनता नैतिकता पर मीडिया की चिल्लाहट की गवाह बनी, लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि
 
 
इस अंक की दवा
लिथियम कार्बोनेट
   
बाल मन

शिक्षा की अनोखी अवधारणा : मॉन्टेसरी स्कूल : मीनू मंजरी

बच्चों को कहां ले जा रहा है मीडिया : नरेन

   
किताब के बहाने
श्रेष्ठता ग्रंथि से पीड़ित लोग : कुमार मुकुल
   
मनोव्यथा
हर कार मेरा पीछा कर रही थी : कमल
   
मीडिया पर निगाह
बाजार ही मीडिया का राष्ट्र और धर्म है : अनिल चमड़िया
   
क्रूरता की शिनाख्त
टीवी एंकरों की खुदकुशी और टीआरपी : मृणाल वल्लरी
   
विश्लेषण
अवसाद : चारुवाक
   
सपने
मेरे तीन सपने : उनका क्या करूं ? : बोधिसत्व
   
जनगीत
दुनिया नष्ट नहीं होगी : नचिकेता
   
कहानी
मुश्किल : सन्तोष चौबे
   
काव्य कथा
शान्ता : उद्भ्रान्त
   
फिल्म

ओंकारा : विनोद अनुपम

ऑथेलो : अनामिका

   
व्यंग्य  झूठ बोलने के फायदे : विष्णु नागर
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मनोवेद
अंक – 1 वर्ष – 1 जनवरी–मार्च, 2008

बातचीत

दुख को बेहतर समझती है मनोचिकित्सा...
डॉ. नरेन्द्रनाथ विग से डॉ. विनय कुमार की बातचीत

जीवन और ज्ञान की विविधताओं के गहरे अध्येता डॉ. एन.एन.विग भारतीय मनोचिकित्सा जगत की उज्ज्वलतम उपस्थितियों में से एक हैं। वे सामान अधिकार के साथ मनोचिकित्सा, दर्शन, इतिहास, संगीत एवं कला पर बात करते हैं। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी डॉ. विग से बात करना एक सुखद एवं ज्ञानप्रद अनुभव है। वे जितने विद्वान हैं, उतने ही सहज और मिलनसार।
लखनऊ से मेडिसिन में स्नातकोत्तर डिग्री लेने के बाद वे निमहांस, बैंगलोर, इंगलैंड तथा स्कॅाटलैंड में मनोचिकित्सा में प्रशिक्षित हुए। रॉयल कॉलेज ऑफ सायकाएट्रिस्ट्स, लंदन से मानद फेलोशिप प्राप्त डॉ. विग नेशनल एकेडमी ऑफ सांइस के फेलो तथा पी. जी. आइ. चंडीगढ़ के मनोचिकित्सा विभाग में मानद आजीवन प्रोफेसर हैं। वे इस विभाग में लंबे समय तक अध्यक्ष के पद पर रहे तथा इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर के शोध क्रेन्द्र के रूप में विकसित किया। वे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली में भी मनोचिकित्सा विभाग के अध्यक्ष रहे। वे 1984 से 1990 तक विश्व स्वास्थ्य संगठन के क्षेत्रीय सलाहकार रहे। इस बीच उन्होंने 22 एशियाई और उत्तरी अफ्र्रीकी देशों में मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम को विकसित करने का काम किया। 300 से अधिक शोधपत्रांें व वैज्ञानिक निबंधों के लेखक डॉ. विग एक सम्मानित अंतर्राष्ट्रीय व्यक्तित्व हैं।
संप्रति वे विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानसिक स्वास्थ्य सलाहकार एवं विश्व मनोचिकित्सा संघ की स्टिग्मा एवं पक्षपात घटाने के लिए बनी समिति के सदस्य हैं। कई राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित डॉ. विग के 70वें जन्मदिन पर प्रकाशित पुस्तक ÷मेंटल हेल्थ इन इंडिया 1950-2000' उनके सहकर्मियों, पूर्व छात्रों एवं अंतर्राष्ट्रीय मनोचिकित्सकों के लेखों एवं उद्गारों का संग्रहणीय संकलन है। इनके योगदानों के प्रति आभार स्वरूप फाउंटेन हाउस सायकाएट्रिक सेंटर, लाहौर ने पुनर्वास केन्द्र का नाम प्रोफेसर एन. एन. विग युनिट रखा है। इन दिनों वे पंचकूला में रहकर मनोचिकित्सक एवं समाजसेवी के रूप में सक्रिय हैं।
आम तौर पर लोग आसान दिखते रास्ते का चुनाव करते हैं। मगर 50 के दशक में जेनेरल मेडिसिन में एम.डी. करने के बाद आपने अपने लिए वैचारिक स्तर पर एक दोराहे की स्थिति पैदा की और एक ऐसी मुश्किल राह चुनी, जो बमुश्किल एक छोटी-सी पगडंडी थी जो थोड़ी दूरी के बाद घने जंगल के भीतर गुम होती नज+र आती थी। जेनेरल मेडिसिन की पक्की सड़क को छोड़कर मनोचिकित्सा की मुश्श्किल पगडंडी के चुनाव के पीछे क्या कारण और उद्देश्य थे ?
मेरे मन में ऐसी कोई दुविधा नहीं थी क्योंकि मैं मेडिकल के पहले-दूसरे साल में ही तय कर चुका था कि मुझे मनोचिकित्सक ही बनना है। मैंने छात्र जीवन में ही मेडिकल कॉलेज की पत्रिका के लिए एक लेख लिखा था -÷प्रॅाब्लम्स ऑफ पर्सनालिटि'। इस लेख को उस वर्ष का ÷बेस्ट आर्टिकल अवार्ड' और स्वर्ण पदक मिला था। एम. बी. बी. एस. की पढ़ाई के बाद जब मैंने अपनी इच्छा अपने एक प्रोफेसर को बतायी तो वे कहने लगे कि क्यों करियर ख़राब करना चाहते हो। मेडिसिन पढ़ो। दरअसल उस वक्+त सायकाएट्री की विधिवत पढ़ाई के लिए देश में कोई केन्द्र था ही नहीं। मेरे चाचा डॉ. के. एल. विग, जो बाद में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली के निदेशक बने, की सलाह थी कि पहले मेडिसिन में एम. डी. कर लो उसके बाद सायकाएट्री पढ़ना। लाभ यह होगा कि एम. डी. मेडिसिन की डिग्री तो पक्की हो जाएगी। मैंने चाचा की बात मानकर मेडिसिन में एम. डी. कर लिया। अब सवाल था कि आगे क्या करूँ–विलायत जाकर एम. आर. सी. पी. या मनोचिकित्सा। मगर मैं अपनी पसंद पर कायम रहा। पहले निमहांस बैंगलोर गया, उसके बाद मॉड्स्ले, लंदन और..। यूँ बना मैं मनोचिकित्सक।

आप भारत में मनोचिकित्सा को सेवा, शिक्षा एवं शोध के क्षेत्रों में स्थापित करने वाले गिने-चुने व्यक्तित्वों में आते हैं। एक मनोचिकित्सक एवं मनोचिकित्सकों के मार्गदर्शक के रूप में आप आज भी सक्रिय हैं। इस संघर्ष-यात्रा की उपलब्धियों और कठिनाइयों के बारे में हमें बताएँ।
मनोचिकित्सा की पढ़ाई के बाद मैं भारत आया तो मेरे सामने कोई रोल मॉडल नहीं था। चँूकि उस वक्+त यहाँ के मेडिकल कॉलेजों में सायकाएट्री का अलग से कोई विभाग नहीं था, इसलिए किंग जार्ज मेडिकल कॉलेज लखनऊ हो या पी. जी. आइ. चंडीगढ़, मैं जहाँ भी गया मुझे एक शुरुआत करनी पड़ी और वह भी अकेले। मुझे अपनी उस वक्+त की स्थिति पर फ्रायड का यह वाक्यांश याद आ रहा है–÷इयर्स ऑफ ग्लोरियस आइसोलेशन–गौरवशाली एकाकीपन के साल'। वे साल यक़ीनन कुछ नया, कुछ खास करने के गौरव के थे, मगर उनमें एकाकीपन का तत्त्व भी शामिल था। मैंने जहाँ भी काम किया, विभाग का प्रमुख रहा (हँसते हुए) क्योंकि मेरे ऊपर कोई था ही नहीं। सकारात्मक बात यह रही कि मुझे जो सहयोगी मिले, वे बड़े अच्छे क़ाबिल और कमिटेड (प्रतिबद्ध) मिले। उनमें से अधिकांश आज मनोचिकित्सा जगत के बड़े नामों में शुमार हैं।

किन जीवन-मूल्यों के सहारे आपकी यह संघर्ष-यात्रा संभव हुई और हो रही है ?
जीवन मूल्य मुझे अपने विषय सायकाएट्री से ही मिले हैं। दरअसल सायकाएट्री चिकित्सा विज्ञान की सभी शाखाओं के ऊपर है। यह विषय, अगर मैं अंग्रेजी मे कहूँ, तो ÷बेस्ट ऑफ मेडिकल साइंस विथ बेस्ट ऑफ आर्ट ऑफ हीलिंग' है। इसमें दोनों का मिश्रण है, विज्ञान भी आला दर्जे+ का और उपचार की कला भी उच्च स्तर की। इसीलिए मैं उपने छात्रों से कहता रहा हूँ कि गर्व से कहो–मैं सायकाएट्रिस्ट हूँ। मैं उन्हें समझाता रहा हूँ कि तुम सबके बराबर तो हो ही मगर देखा जाए तो तुम उनसे ऊपर भी हो क्योंकि तुम सिर्फ सायंस की ही प्रैक्टिस नहीं करते, कला की भी करते हो। चिकित्सा विज्ञान की अन्य शाखाओं की तुलना में सायकाएट्री मनुष्य के दुख को ज्+यादा गहराई से जानती-पहचानती है। यहाँ पर मैं अपनी एक चिंता प्रकट करना चाहूँगा। इन दिनों टेक्नॉलॉजी का प्रभाव बहुत है। लोगों का ध्यान आर्ट ऑफ हीलिंग की तरफ कम होता जा रहा है। चिकित्सा, खासकर मनोचिकित्सा के क्षेत्र में आना लोगों की मदद के लिए होता है, इसी में गर्व होना चाहिए, खुशी होनी चाहिए।

आपकी दृष्टि में पिछले 50-60 वषोर्ं में भारतीय मनोचिकित्सा जगत की उपलब्धियाँ क्या हैं?
मैं इस सवाल का जवाब बायलॅाजिकल रीसर्च और दवाओं के आविष्कार आदि की चर्चा से हटकर अलग तरीके+ से देना चाहूँगा। याद करें कि 1950 के आसपास जब अपने यहाँ सायकाएट्री उभरी तो हमारी प्राथमिकताएँ क्या थीं। इंडियन सायकाएट्रिक सोसायटी की पुरानी फाइलों में वे दर्ज+ होंगी। उस वक्+त हमारी तीन प्राथमिकताएँ थीं–मानसिक अस्पतालों की दशा में सुधार, एम. बी. बी. एस. के पाठ्यक्रम में मनोचिकित्सा को शामिल कराना और इंडियन ल्युनैसी एक्ट (1912) को बदलना। अब देखें कि उस दिशा में क्या हासिल हुआ? मानसिक अस्पतालों में कुछ सुधार हुए हैं, कुछ चल रहे हैं; मगर बिल्कुल बदलने वाली कोई बात नहीं हुई आज तक। पचास साल से अधिक हुए, मगर बेहद दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि हम एम. बी. बी. एस में अभी तक सायकाएट्री को शामिल नहीं करा सके। इंडियन ल्युनैसी एक्ट की जगह हम मेंटल हेल्थ ऐक्ट ले तो आए मगर उसमें भी कई समस्याएँ हैं। मैं यहाँ उनकी चर्चा नहीं करना चाहता। कुल मिलाकर इन तीनों प्राथमिक दिशाओं में हम कोई बड़ा काम नहीं कर पाए।
मेरे ख़याल से विगत 50 वर्षों को इस नज+रिये से देखना चाहिए कि लोगों की मनोचिकित्सकीय ज+रूरतें क्या थीं और उस दिशा में हम क्या कर पाए? आमलोगों की ज+रूरत थी कि उनके घरों के आसपास ऐसे केन्द्र हों जहाँ असानी से पहुँचकर वे अपना इलाज करा सकें। मेरा मानना है कि हमने इस दिशा में तेजी से प्रगति की है। मनोचिकित्सा की शिक्षा के लिए 1955 में बैंगलोर में निमहांस के खुलने के बाद से अबतक हम काफी आगे आए हैं। आज कम से कम 40-50 केन्द्र तो अवश्य हैं, जहाँ 100-125 मनोचिकित्सक हर साल तैयार हो रहे हैं। आज देश का शायद की कोई ऐसा मेडिकल कॉलेज अस्पताल हो, जहाँं मनोचिकित्सा का विभाग न हो। तो समान्य अस्पतालों में मनोचिकित्सा की सेवा उपल्ब्ध कराकर हमने लोगों की ज+रूरत की दिशा में एक ठोस पहल की है। एक हद तक हम इससे भी आगे गए हैं। हमने मनोचिकित्सा को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने की कोशिश की है। इस दिशा में हमें और भी बहुत कुछ करना है। हमें मनोचिकित्सा की सुविधा को प्राथमिक चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों के मार्फत गाँव-गाँव तक पहुँचाना है।
मैं कुछ और अच्छे बदलावों की तरफ भी इंगित करना चाहूँगा। डब्लू. एच. ओ. के लिए कार्य करने के बाद जब मैं भारत लौटा तो देखा कि देश में सायकाएट्री का नक्+शा बदला हुआ थ। मुझे दो बदलाव दिखे। पहला था देश में प्राइवेट सायकाएट्री का विस्तार। हर वर्ष डिग्री लेकर निकलने वाले मनोचिकित्सकों ने जगह-जगह पर अपनी निजी क्लिनिक खोल ली थी। वे बड़े-बड़े शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बे तक छाये हुए थे और लोगों को मनोचिकित्सकीय सुविधाएँ उपलब्ध करा रहे थे। दूसरा बदलाव था फार्मा इंडस्ट्री का विकास। आज दुनिया की बड़ी दवा कम्पनियों में भरतीय दवा कम्पनियाँ शुमार होती हैं-खास कर मनोचिकित्सा की दवाएँ बनाने वाली कम्पनियाँ।
1990 के बाद देश में नागरिक आधिकारों की चेतना का फैलाव दिखा। न्यायालयों का सक्रिय हस्तक्षेप दिखा। यहाँं सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला गा+ैरतलब है कि आप किसी मानसिक रोगी को जेल में नहीं रख सकते। उन्हें अस्पताल में रखना होगा। बहुत बड़ा फैसला है यह !
पिछले 50-60 सालों के पुनरावलोकन से यह प्रश्न उठता है कि सायकाएट्री की प्राथमिकताएँ कौन तय करेगा–मानसिक स्वास्थ्यकर्मी या समाज। मेरा मानना है कि मानसिक अस्पतालों में सुधार, एम. बी. बी. एस. में सायकाएट्री को शामिल कराना और इंडियन ल्युनैसी एक्ट को बदलना मनोचिकित्सकों द्वारा तय प्राथमिकताएँ थीं। लेकिन सायकाएट्री के विकास की दिशा तय हुई लोगों की आकाक्षाओं और आवश्यकताओं के दबाव में।
आपके अनुसार मानसिक स्वास्थ्य की राह में मुख्य बाधाएँ क्या हैं?
मानसिक स्वास्थ्य की राह में कई बाधाएँ है–जैसे स्टिग्मा, मानसिक स्वास्थ्य के लिए बजट में अत्यन्त कम राशि का प्रावधान आदि। स्टिग्मा एक बड़ी बाधा है, मगर लोग इसे अपने तरीके+ से दूर कर रहे हैं। लोगों ने मानसिक बीमारियों के कई अलग-अलग तरह के नाम रख लिए हैं। ये नाम डॉक्टरों के द्वारा नहीं दिए गए हैं। मगर लोग अपनी तकलीफों की पहचान इन नामों से ही करते हैं और मनोचिकित्सकों के पास जाते हैं। मैं अपने उत्तर भारत के अनुभवों से कुछ नाम बताता हूँ। यहाँ एक बड़ा ही प्रचलित शब्द हैं–टेंशन। आम लोगों के मुंह से अक्सर सुनने को मिल जाता है-बड़ा टेंशन है, ये टेंशन बहुत करते है या सिनेमा का यह जो डायलॅग है-भाई टेंशन नहीं लेने का। तो इस शब्द को जन साधारण ने अपना लिया है। इसके सहारे काफी लोग मनोचिकित्सकों के पास पहुँचते हैं और लोगों को बेहिचक बताते भी हैं कि कोई ऐसी-वैसी बात नहीं है, थोड़ा सा टेंशन था। दूसरा शब्द जिसे लोगों ने अपनाया है-वह है डिप्रेशन। हमारे लिए डिप्रेशन का अर्थ भले ही अवसाद हो मगर आम लोग गंभीर मानसिक समस्या को डिप्रेशन कहते हैं। क्लिनिक में अक्सर सुनने को मिलता है-यह आदमी कमरे में बंद रहता है, किसी से बात नहीं करता, अपने-आप में खोया, बुदबुदाता रहता है। इसे डिप्रेशन हो गया है। ये लक्षण भले स्क्जि+ोफ्रोनिया के हों, उन्हें डिप्रेशन कहते हुए मनोचिकित्सक के पास जाने में ख़राब नहीं लगता। यह शब्द उन्हें दिलासा देता है कि उनके परिवार का सदस्य पागल नहीं हुआ है। स्टिग्मा घटानेवाले शब्दों की सूची में एक और शब्द जुड़ा है काउंसलिंग। लोग इलाज के लिए इस शब्द का इस्तेमाल करते हैं।
लोग बड़ी सहजता से मनोचिकित्सक के पास पहुँचकर कहते हैं–बच्चे की काउंसलिंग करवानी है, पढ़ाई में थोड़ा पिछड़ रहा है। मैं लोगों की इस प्रवृत्ति को ग़लत नहीं मानता। कुछ शब्दों के सहारे ही सही, वे मनोचिकित्सक के पास आ तो रहे हैं। मनोचिकित्सक चाहे जो डायग्नोसिस करें। लोग तो अपना काम कर रहे हैं, मगर सरकार अपनी जिम्मेवारी ठीक से नहीं निभा रही है। नेशनल मेंटल हेल्थ प्रोग्राम बना अवश्य है मगर उसपर ठीक से अमल नहीं हो पा रहा है। खेद की बात यह है कि मनोचिकित्सक भी इन कार्यक्रमों में कम रुचि ले रहे हैं।
मानसिक स्वास्थ्य की राह में एक बड़ी बाधा यह भी है कि सायकाएट्री को अभी तक मेडिकल साइंस की मुख्य धारा में शामिल नहीं किया जा सका है। चाहे वह चिकित्सा-शिक्षा हो या चिकित्सा-सेवा। भारत में सायकाएट्री के बेहतर भविष्य के लिए तीन बातों पर ध्यान देने की ज+रूरत है। पहली बात तो यह कि आधुनिक और वैज्ञानिक उपलब्धियों का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुँचना चाहिए- अमीर और ग़रीब, शहरी और ग्रामीण, स्त्री-पुरुष और बच्चे, सब तक। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आधुनिक मनोचिकित्सा का लाभ अमीरों, शहर में रहने वालों और पुरुषों को अधिक मिल रहा है। हम औरतों, ग़रीबों और गँावों तक इस लाभ को नहीं पहुँचा पा रहे हैं। दूसरी बात यह कि हमें सिर्फ बायोलॉजिकल (जैविक) या सिर्फ सायकोएनालिटिकल (मनो- विश्लेषणात्मक) दृष्टिकोण की जगह संतुलित रवैया अपनाना चाहिए। आधार अवश्य बॉयोलॉजिकल हो मगर सायकोसोशल (मनोसामाजिक) तत्त्वों को जोड़कर चलना चाहिए। मनोसामाजिक तत्त्वों के समावेश से ही मनोचिकित्सा को अलग पहचान और शक्ति मिलती है। तीसरी बात यह है कि जो संबद्ध चीज+ें हमारी सभ्यता संस्कृति में हैं, हमें उन्हें शमिल करना चाहिए। हमें योरोप, अमेरिका के सिद्धान्तों और अवधारणाओं पर नहीं चलना चाहिए। हमें मनोचिकित्सा को भारतीय मनोचिकित्सा के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है।

संस्कृति और मनोरोगों के अंतर्संबंधों का अध्ययन आपकी रुचि का विषय रहा है। ऐसा क्यों होता है कि कुछ मनोरोग किसी खास संस्कृति में ही पाए जाते हैं। आपके द्वारा परिभाषित ÷धात सिंड्रोम' भी एक ऐसा ही मनोरोग है। हम यह जानना चाहेंगे कि ÷धात सिंड्रोम' क्या है और उसकी पहचान किस प्रकार हुई?
संस्कृति हमारे जीवन में बेहद महत्त्वपूर्ण है। वही यह तय करती है कि व्यक्ति अपने दुखों को किस तरह अभिव्यक्त करे। मानसिक रोगों के लक्षण जो हमें दिखते हैं, उनके प्रकट होने में व्यक्ति के सांस्कृतिक परिवेश की एक भूमिका होती है। व्यक्ति अपने इन लक्षणों को लेकर झाड़-फूॅक वाले, डॉक्टर, वैद्य या नीमहकीम–किसके पास जाए, इसे तय करने में भी संस्कृति एक भूमिका निभाती है और डॉक्टरी सलाह पर अमल, रोगी का खाना-पीना आदि में भी। सांस्कृतिक तत्त्व रोग के उपचार और रोगी की रोग से मुक्ति में भी महत्त्वपूर्ण होते हैं। कुछ मनोरोग किसी संस्कृति में ही होते हैं, उसकी किसी खासियत या सीमा के कारण।
आपने मेरे द्वारा परिभाषित ÷धात सिंड्रोम' के बारे में जानना चाहा है। दरअसल जब मैंने देखा कि लखनऊ में रोज+ ओपीडी में एक खास तरह के मरीज+ आते हैं, जिनकी शिकायत होती है कि उन्हें पेशाब में ÷धात' आता है साथ ही साथ वे सिरदर्द, बदन दर्द, कमजोरी, थकान आदि की शिकायत भी करते हैं। मुझे शुरू से ही लगता था कि इन रोगियों की समस्याओं को ठीक से नहीं समझा जा रहा है। ऐसे ही मरीजो+ं से जुड़ा एक वाकया सुनाता हूँ। हमारे एक प्रोफेसर थे-अंग्रेज+ी और अंग्रेजि+यत के सख्+त हिमायती। वार्ड में बिना टाई लगाए हम जा नहीं सकते थे और सारी बातचीत अंग्रेज+ी में ही होती थी। एक लड़की ने एक ÷धात' की शिकायतवाले मरीज+ की हिस्ट्री ली थी। प्रोफेसर के सामने केस प्रस्तुत करते हुए उसने कहा कि ÷÷ दिस यंग मैन हैज बैकेक एन्ड पासेज मेटल इन द युरिन''। इस पर सब हँस पड़े, लड़की का मजाक बन गया। दरअसल वह लड़की, मरीज+ की बात को ठीक से समझ नहीं पायी थी। चँूकि धात (धातु) को अंग्रेज+ी मंंें ÷मेटल' कहते हैं इसलिए उससे यह चूक हुई। हमारे प्रोफेसर ने अपनी राय देते हुए कहा कि पेशाब में मेटल-वेटल नहीं आता, फास्फेट लवण आता है। इसे फास्फटुरिया कहते हंंैं। धीरे-धीरे मुझे लगने लगा कि यह बात ठीक नहीं। फास्फेटुरिया कहकर न तो हम इन मरीज+ों की तकलीफों की सही पहचान कर रहे हैं, न सही इलाज।
बाद में जब मैं वहाँ मनोचिकित्सा विभाग का अध्यक्ष बना तो एक लेख में लिखा कि इन्हें फास्फेटुरिया या ऐंक्जायटी न्यूरोसिस कहना सही नहीं है और जब तक व्यापक शोध नहीं होता तब तक इन्हें ÷धात सिंड्रोम' के अंतर्गत रखना बेहतर होगा। इस प्रकार पहली बार ÷धात सिंड्रोम' की अवधारणा सामने आयी। बाद में जब मैं पी. जी. आइ. गया तो वहाँ इसपर मेरे निर्देषन में कई शोध हुए और शोध-प्रबंध लिखे गए। आज इस विषय पर सौ-डेढ़ सौ शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। इस डायग्नोसिस को चिकित्सकों ने भारत में ही नहीं पड़ोसी देशों में भी अपना लिया है। मेरा मानना है कि पेशाब मे धात की तकलीफ के लिए कोई अंग्रेज+ी नाम नहीं हो सकता। यह रोग सोचने के भारतीय तरीके से संबंधित है, इसलिए इसका कोई भारतीय नाम ही हो सकता है। क्या धात सिंड्रोम के मरीज+ भरत के बाहर भी पाये जाते है हॉ, थोड़े-बहुत अंतर के साथ। पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका आदि दक्षिण एशियाइ देशो में तो यक़ीनन। पश्चिम मे धात सिंड्रोम तो नहीं मगर हस्तमैथुन को मनोरोगों से जोड़ कर अवश्य देखा जाता था। स्किज+ोफ्रेनिया को भी ÷मास्टरबेशन-इनसैनिटी' कहने की परंपरा थी। ÷ब्रिटिश जरनल आफ मेंटल सांइस' में डॉ. एडवर्ड हेयर का एक लेख प्रकाशित हुआ था- ÷मास्टरबेशन इनसैनिटी : हिस्ट्री ऑफ एन आइडिया'। इस लेख में उन्होंने इस अवधारणा से मध्ययुग से लेकर आज तक जुड़े पहलुओं की गहरी पड़ताल की है। यह लेख बेहद चर्चित हुआ था। पश्चिमी देशों में हस्तमैथुन से जुड़ी समस्याएँ तो हैं मगर ÷धात' गिरने की अवधारणा नहीं है। यह विचार दक्षिण एशियाइ देशों में ही पाया जाता है।

क्या यौन शिक्षा के द्वारा इस रोग से बचाव संभव है ?
यौन शिक्षा से फर्क तो पड़ेगा। हम इस फर्क को देख भी रहे हैं। आज शहर के युवा ÷धात' की शिकायत कम करते हैं, जबकि यह शिकायत कस्बों और गाँवों में अभी भी आम है।
आज यौन शिक्षा पर पूरे देश में बहस छिड़ी हुई है। पाठ्यक्रम भी तैयार हो गया है। मगर राज्य सरकारें इसे लागू करने में हिचक रही हैं। स्कूली स्तर पर यौन शिक्षा प्रदान करने के विषय में आपकी क्या राय है ?
मेरी समझ यह है कि किसी भी संस्कृति में सारी चीज+ें एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। एक-दो गंदी ईंटें निकालकर आप दीवार को ठीक नहीं कर सकते। बची हुई दीवार हिलने लगती है। अगर आप यौन शिक्षा के क्रम में यह बताते हैं कि हस्तमैथुन से कोई नुकसान नहीं तो कई किशोरों के मन में कई सवाल उठते हैं–कब, कहाँ, कैसे, कितनी बार आदि। वैसे ही यदि आप सिर्फ सुरक्षित यौन संबंध की बात करते हैं तो विवाह पूर्व यौन संबंध के औचित्य का प्रश्न उठता है। सच्ची बात तो यह है कि ये डॉक्टरी सवाल नहीं हैं। ये मूलतः सामाजिक-सांस्कृतिक सवाल हैं। डॉक्टर का यह कहना कि ÷कुछ नहीं होता' नयी समस्यायें पैदा कर सकता है। इसलिए मैं तो कहूँगा कि सेक्स एजुकेशन का सिलेबस सोच-समझकर लागू करो। पहले किसी एक जि+ले में, फिर समाजिक-सांस्कृतिक रूप से भिन्न कुछ अन्य जि+लों में। देखो कि क्या प्रभाव पड़ते हैं। उन प्रभावों का अध्ययन करो। दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे देश में अच्छे समाजिक अध्ययन का रिवाज+ बहुत कम है। लोग सिर्फ बातों में कहते हैं-यह कर दो, वह कर दो। किसी बात से होने वाले नफा-नुकसान को समझे बगै+र। ज+रूरत इस बात की है कि विभिन्न प्रयोगों के द्वारा सेक्स एजुकेशन का एक मॉडल विकसित जाए।

हज+ारों सालों में विकसित होकर विभिन्न संस्कृतियाँ अपनी पहचान पाती हैं। मगर वैश्वीकरण नामक उत्तर-आधुनिक तूफान में तमाम सांस्कृतिक पहचानें मिट रही हैं। दिल्ली की पराठेवाली गली हो कि बनारस का गोदौलिया चौक, किसी को भी पहचानना मुश्किल होता जा रहा है। वेश-भूषा ही नहीं भाषा और संगीत तक को ÷एक-सा-पन' संक्रमित कर रहा है। क्या हम ÷एक रस' (मानोटोनस) दुनिया की तरफ बढ़ रहे हैं अगर हाँ तो इस दुनिया में मानव-मन की क्या स्थिति होगी?
बहुत अच्छा सवाल है। पराठेवाली गली में मैं भी गया हूँ कई बार। पराठे तो अब भी मिलते हैं मगर माहौल बदल गया है। वहाँ जगह-जगह वीसा के्रडिट कार्ड के बोर्ड लगे हैं। ग्लोबलाइजेशन का असर साफ दिखता है। मॉडर्निज्म, पोस्ट-मॉडर्निज्म.....उत्तर आधुनिकता की जो बात आपने की, मैं भी उसपर सालों से पढ़ता-सोचता रहा हँू। पोस्ट-माडर्निज्म का रवैया है कि कुछ भी स्थायी नहीं है, कुछ भी निश्चित नही है, सारी चीज+े रिलेटिव (सापेक्ष) हैं।
इस बात से हमें परेशान नहीं होना चाहिए। यूरोप बदलता रहता है और अपनी मान्यताओं को दूसरों पर लादता रहता है। पहले हमपर उपनिवेशवाद लादा कि हम श्रेष्ठ और तुम हमसे कमतर। सौ बरस बीतते-बीतते वे आधुनिकता की बात करने लगे। कहने लगे कि तुम टै्रडिशनल हो पुरानी चीजा+ें में फँसे रहते हो। हम साइंटिफिक हैं, माडर्न हैं, इसलिए हम श्रेष्ठ हैं। और अब कहते हैं कि न तुम श्रेष्ठ, न हम श्रेष्ठ। कहीं कुछ नहीं है। याद आता है कि जब मैंने सायकाएट्री शुरू की थी, तो अस्तित्वाद का जोर था। उन दिनो सार्त्र, काफ्का, कामू जैसे नामों की धूम थी। अस्तित्ववााद में जो निहिलिज्म
(नास्तिकवाद) था, पोस्टमाडर्निज्म एक तरह से उसी का विस्तार है। उत्तर-आधुनिकतावादी कहते हैं कि परंपरा महत्त्वपूर्ण नहीं है, संस्कृति्‌ महत्त्वपूर्ण नहीं है। हमें नीचा दिखाने के लिए कहते हैं कि तुम्हारी संस्कृति का कोई महत्त्व नहीं है क्योंकि किसी भी संस्कृति का कोई महत्त्व नहीं है। मुझे लगता है कि पिछली सदियों में यूरोप का जो दर्शन, चिंतन, ज्ञान-विज्ञान में वर्चस्व था, वह टूट रहा है। उसकी लीडरशिप खत्म हो रही है। शायद इसीलिए वे ऐसी बातें कर रहे हैं। हमारे लिए नास्तिकवाद कोई नया नहीं है। हम बुद्ध के भी पहले से इस दर्शन से परिचित हैं कि जगत मिथ्या है, नश्वर है। इसलिए हमें उत्तर-आधुनिकता के दर्शन से आतंकित नहीं होना है। वैश्वीकरण की चकाचौंध से भी नहीं घबराना है।
वैश्वीकरण के साथ एक-सा -पन आएगा ज+रूर, मगर मेरा विश्वास है कि हमारी पहचान बची रहेगी। बचा रहेगा भारतीय मन। मुझे इक़बाल याद आ रहे हैं–
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,
सदियों रहा है दुश्मन दौरे-ज+मां हमारा।
हजारो सालों का सांस्कृतिक अनुभव यह बताता है कि हम थोड़े-बहुत बदल सकते हैं, नष्ट नहीं हो सकते।

कई बार मनुष्य के स्वाभाव और व्यवहार का अध्ययन करते-करते मनोविज्ञान मिथकों से टकराता है और अपने निष्कर्षों के लिए कोई उपयुक्त मिथकीय संज्ञा प्राप्त कर लेता है–जैसे ÷इडिपस कॉम्प्लेक्स'। आपके द्वारा प्रस्तावित ÷हनुमान कॉम्प्लेक्स' पर मनोचिकित्सा जगत में काफी चर्चा हुई है। हमें इसके बारे में कुछ बताएँ।
मिथक के बारे में लोग सोचते हैं कि ये सच नही हैं, झूठ हैं या पुरानी कहानियाँ हैं। इस विषय में पहली बात मैं कहना चाहूँगा कि माइथॉलॉजी अपनी तरह का अलग सत्य है। उसकी भाषा अलग है। जैसे कविता की भाषा आम भाषा से अलग होती है। कविता का सत्य दुनिया के बाक़ी सत्य से कमतर नहीं होता; बल्कि बड़ा होता है। वह सत्य जो कविता की भाषा में कवि कहता है, एक और तरह का होता है। मनोवेद के प्रवेशांक में जो कविता है–÷एक ख़त पागलख़ाने से', उसे जब आप पढ़ते हैं तो वह कविता आपका दिल हिला देती है। क्या वह सत्य नहीं है अगर आप दूसरी तरह से देखें तो कह सकते हैं एक पागल लड़की क्या बकबक कर रही है। पर वह सत्य कवि का अपना सत्य है। वह सत्य कविता का सत्य है। इसी तरह माइथॅालॉजी का सत्य उसका अपना सत्य होता है। सपना सत्य नहीं होता है। मगर एक सत्य उसका भी होता है जिसका प्रभाव हम पर पड़ता है। हम कई दिनों तक चर्चा करते रहते हैं कि हमने एक ऐसा या वैसा सपना देखा था। जोजफ कैम्पबेल ने माइथॉलॅजी पर काफी लिखा है। (सामने बुकशेल्फ की ओर इशारा करते हुए)
पाँच-छः किताबें यहाँ लगी हैं। मैं इस विषय में उसे अपना गुरु मानता हूँ। उसने सारी दुनिया के मिथकों का अध्ययन किया है। जानकारियों और चिकित्सकीय अनुभवों के आधार पर कहना चाहूॅगा कि माइथालॅजी का सत्य कविता के सत्य की ही तरह शक्तिशाली होता है। यह हमारे तर्कशील चेतन के पार अवचेतन की गहराई तक पहुँचता है।
दूसरी बात यह कि भारतीय सभ्यता ही वह एकमात्र सभ्यता है जहाँ माइथॉलॅजी अब भी प्रधान है, जी रही है। शिव, दुर्गा, गणेश, हनुमान, राम और कृष्ण हमारे लिए कहानियों के पात्र नहीं, जीवन के अंग हैं। बाक़ियों ने तो अपनी-अपनी माइथॉलॅजी को म्युजियम में रखवा दिया है। कहानियाँ किताबो में और मूर्तियाँ म्युजियम में। रोम और ग्रीस से लेकर इजिप्ट तक, हर जगह एक ही हाल है। उन्होने रोज के जीवन से मिथकों के सच को निर्वासित कर दिया है। ÷हनुमान कॉम्प्लेक्स' की अवधारणा पर विचारते समय मेरे मन में यही ख़याल था कि मनोचिकित्सा में मिथकों की एक अहम भूमिका हो सकती है और हमें उनका इस्तेमाल करना चाहिए। मैं अपने मरीजों से हनुमान की कथा का जि+क्र करते हुए कहता हूँ कि तुम्हारी आँखों पर भी हनुमान की ही तरह पर्दा पड़ा हुआ है। हनुमान की तरह तुझे भी नहीं मालूम कि तुझ में शक्ति कितनी है। हनुमान को जब जाम्बवन्त ने बताया कि तू चाहे तो सारी पृथ्वी के सात चक्कर लगा ले, यह लंका क्या चीज+ है–तब उसकी शक्ति जागी। हनुमान ने सारे चमत्कार जाम्बवन्त की सायकोथेरापी के बाद दिखाए। पहले बेचारा साधारण-सा था। इस तरह के संस्कृतिक स्रोतों से ऐसी कहानियाँ लेकर सायकोथेरापी में इस्तेमाल करना चाहिए।

कभी-कभी मुझे लगता है कि मिथक हमारी ग्रंथियों के ही आख्यान हैं। आपकी क्या राय है?
ग्रंथियाँ और मिथक दोनों अवचेतन से निकलते हैं, तर्कशील चेतन मन से नहीं। इसलिए दोनो में संबध ज+रूर होगा। आपकी बात ठीक लगती है।

हरियाणा के रायपुर रानी ब्लॉक में आपके द्वारा सामुदायिक मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में किए गए काम को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना जाता है। किस प्रकार आपने वह मॉडल विकसित किया जो भारत ही नहीं कई अन्य देशों के कम्युनिटि मेंटल हेल्थ प्रोग्राम (सामुदायिक मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम) का आधार बना ?
मैनें शुरू में ही इस तरफ इशारा किया था कि आधुनिक वैज्ञानिक मनोचिकित्सा का लाभ सब तक पहुँचना चाहिए। मुझे सबसे प्रभावी तरीक़ा यही लगा कि उसे प्राथमिक चिकित्सा से जोड़ दिया जाय। कुछ लोग इस मॉडल में त्रुटियाँ निकालते हैं, मगर इससे बेहतर मॉडल पेश नहीं कर पाते। सिर्फ सायकाएट्रिक सेन्टर में सिमटकर हम सायकाएट्री को लोगों तक नहीं ले जा सकते, इस विषय की बुनियादी जानकारियाँ हमें अन्य स्वास्थ्यकर्मियों को देनी ही होंगी। मुझे इस बात की खुशी है कि मैंने इस मॉडल को विकसित और कार्यान्वित करने की दिशा में अपने देश के लिए ही नहीं, पड़ोसी देशों के लिए भी काम किया है। अपने देश के लिए 1982 में किया, 1984 में बँगलादेश में, पाकिस्तान में 1986-87 में, नेपाल में 1994 में और श्रीलंका में 2001 में। तो भारत में जो पहल हुई उसका लाभ पड़ोसी देशों तक पहुँचा। जब विश्व स्वास्थ्य संगठन में था, तब ईरान, अरब और मिस्र के लिए भी इस दिशा में काम किया। इन दिनों मेरे पुराने सहयोगी डॉ. श्रीनिवास मूर्ति जार्डन, इराक़, लेबनान आदि देशों में कम्युनिटि सायकाएट्री पर काम कर रहे हैं। मैंने जो किया था, डॉ. मूर्ति उससे आगे का काम कर रहे हैं।

आप अपने स्नातकोत्तर छात्रों को प्रथम वर्ष एम.डी. में सब कुछ पढ़ने को कहते थे–मनोचिकित्सा को छोड़कर। इस अद्भुत सलाह की क्या वजह थी ?
अपने बिल्कुल ठीक याद दिलाया है। मैं अपने छात्रों से कहा करता था कि शुरू में अपने को मनोरोगों के कारणों, लक्षणों डायोग्नोसिस और इलाज के ज्ञान तक सीमित मत रखो। अपने ज्ञान का विस्तार करो। और भी चीज+ें पढ़ो, जैसे–दर्शन, मनोविज्ञान, संगीत, कला, इतिहास आदि। छात्रजीवन में मैंने पढ़ा था कि ÷सायकाएट्रिस्ट शुड हैव शेक्सपीरियन ब्रेड्थ ऑफ नॉलेज'। शेक्सपीयर का जो रेंज था वह काफी बड़ा था। एक मनोचिकित्सक के ज्ञान का रेंज भी वैसा ही बड़ा होना चाहिए। आपकी समझ जितनी व्यापक होगी, आप में मरीज+ को एक मनुष्य के रूप में जानने की उत्सुकता भी उतनी ही ज्+यादा होगी। मरीजो+ं की रुचियों और क्षमताओं की जानकारी की मदद से आप न सिर्फ बेहतर इलाज कर सकते हैं बल्कि रोगी के भीतर के मनुष्य को निखारने-सँवारने का काम भी। दूसरी बात यह कि आपके ज्ञान की परिधि का जितना विस्तार होगा आप उतने ही बेहतर मनुष्य होंगे। मेरा मानना है कि एक अच्छा डॉक्टर बनने के लिए सिर्फ तकनीकी ज्ञान ही काफी नहीं है। आपको बेहतर मनुष्य भी होना चाहिए। ÷मनोवेद' में आप जो कहते हैं कि ÷मन ही मनुष्य है' उस बात को आगे बढ़ाते हुए मैं कहना चाहूँगा कि आप अच्छे मनुष्य तभी हैं जब आपकी मनोवृत्ति अच्छी है। ये चीज+ें व्यापक और संवेदनशील अध्ययन के द्वारा विकसित की जा सकती हैं।

पटना में जब आपसे मुलाकात हुई थी तो आपने बताया था कि ग़ालिब आपको बहुत पसंद हैं और आपने उनका मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया है। मेरा ख़याल है कि भारत के किसी कवि का कृतित्व के आधार पर किसी मनोचिकित्सक द्वारा किया गया यह एकमात्र अध्ययन है। मनोवेद डाइजेस्ट के पाठकों के लिए यह जानना दिलचस्प रहेगा कि ÷अंदाज+े-बयाँ और' के शायर के बारे में आप क्या सोचते हैं?
साहित्यिक रचनाओं की आलोचना दो तरह की होती रही है–साहित्यिक और सामाजिक। मनोवैज्ञानिक आलोचना बहुत ही कम है। मुझे नहीं मालूम कि भारत में यह काम किसी और ने किया है या नहीं, मगर करना चाहिए। मेरा ख़याल है कि इस तरह की आलोचना को कवि, लेखक और कलाकर अवश्य पसंद करेंगे। दरअसल ग़ालिब मुझे बहुत पसंद हैं और मैं उन्हें पढ़ता रहता हूँ। ग़ालिब के परिवार से बात शुरू करते हुए मैं आपको बता दूँ कि उनके अपने भाई को मनोरोग था। यह तय करना मुश्किल है कि स्किज+ोफ्रेनिया था या बाईपोलर मूड डिजार्डर, मगर था कोई सायकोटिक किस्म का ही मनोरोग। इस जानकारी की रोशनी में ग़ालिब को पढ़ते हुए मैंने पाया कि उनके क़लाम में कहीं डिप्रेशन (अवसाद) के लक्षण दिखते हैं तो कहीं उत्तेजना के। अवसाद के लक्षण देखिए–कोई उम्मीद बर नही आती /कोई सूरत नजर नही आती/मौत का एक दिन मोअइय्‌यन है/नींद क्यों रात भर नही आती। इस ग़ज+ल मे अनिद्रा, हताशा, निराशा, आत्मग्लानि, आनंदहीनता आदि का इतना स्पष्ट चित्रण है कि मानना पड़ता है कि शायर गहरी उदासी के दौरे का शिकार रहा होगा। और दूसरी तरफ वह कहता है–बाज+ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे /होता है शबो-रोज+ तमाशा मेरे आगे। इस ग़ज+ल के अशआर में इलेशन है, उन्माद है। मनोचिकित्सा में जिसे कहते हैं आइडिया ऑफ गै्रन्डियॉसिटी, खुद के बहुत बड़ा होने का वहम। वहम है यह कहना कि दुनिया मेरे सामने बच्चों का खेल है। उस लेख में इसी बात की विवेचना है। इधर के दिनों में मैनें सोचा कि ग़ालिब में बाइपोलरिटी तो है, क्या पारानॉयड रंग भी है, कोई शक, कोई वहम भी है। यह विचार उनके भाई की बीमारी के बारे में सोचने से भी आया। मैंने पाया कि कई अशआर में आइडिया ऑफ रेफरेंस और ससपिशन के संकेत हैं। इस पर एक शेर पेश करूँगा। मुझ तक कब उनकी वज्म मे आता था दौरे जाम/साक़ी ने कुछ मिला न दिया हो शराब में। मनोचिकित्सक के दृष्टिकोण से देखें कि यह शक कितना स्पष्ट है।

जब दुनिया स्किज+ोफ्रेनिया दीर्घकालिक (क्रोनिक) स्वरूप की गुत्थियों से जूझ रही थी और उसका ध्यान अल्प अवधि (ट्रांसिएन्ट) सायकोसिस से पीड़ित मरीज+ों की तरफ नहीं जा रहा था तब आपने 1967 में पहली बार इस विषय पर एक शोधपत्र लिखा। सायकोसिस के इस स्वरूप की पहचान एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसे मान्यता दिलाने में किए गए प्रयासों के बारे में हमें बताएँ। हम यह भी जानना चाहेंगे कि इस शोध से पीड़ित मानवता को किस प्रकार लाभ हुआ?
1962 में जब मैं लौटकर भारत आया तो मुझे लगता था कि मैं सायकाएट्री के बारे में काफी कुछ जान चुका हूँ। मेरे सोच पर इंगलैंड और अमेरिका की पढ़ाई का असर था। मगर मैंने यहाँ आकर देखा कि पाठ्य-पुस्तकों वाली सायकाएट्री तो यहाँ है ही नहीं। पुस्तकों में वर्णित बाइपोलर मूड डिजार्डर और स्किज+ोफ्रेनिया के मरीज+ों से ज्+यादा तो अलग तरह के मरीज+ मिल रहे हैं। इनके लक्षण काफी तेजी से प्रकट होते हैं और एन्टीसायकोटिक दवाएँ दो, तो 4-6 हफ्ते में ठीक होकर घर चले जाते हैं। डायग्नोसिस को लेकर पुनर्विचार तो इन दिनों भी चल रहा है कि स्क्जि+ोेफ्रेनिया और बाइपोलर मूड डिजार्डर इतने अलग-अलग नहीं हैं, जितना सौ साल पहले इनके बारे में सोचा गया था। तो उन दिनों मेरे मन में यह विचार आया कि अपने देश के लिए, अपने पड़ोसी देशों के लिए एक अलग तरह की सायकाएट्री हो। आजकल यह बात बहुत लोग कह रहे हैं। यह क्या बात हुई कि अमेरिका और यूरोप के शोध-अनुभवों को आप सारी दुनिया पर लागू कर रहे हैं। 15 प्रतिशत लोगों की बीमारियों को सारी दुनिया के लोगों की बीमारियाँ बना रहे हैं। एक्यूट सायकोसिस की अवधारणा पर काम करने के पीछे मेरा यह अनुभव था कि सायकोसिस के जो मरीज+ हम यहाँ देखते हैं, वे स्किज+ोफ्रेनिया और बाइपोलर-दो श्रेणियों में फिट नहीं बैठते। मैं जब बैंगलोर गया तो 90 प्रतिशत मरीजों+ के बारे में यही चर्चा होती थी कि बाइपोलर है या स्किज+ोफ्रेनिक। मुझे लगता था कि और कोई डायग्नोसिस क्यों नहीं। क्या सिर्फ इसलिए कि किताबों में इन दो नामों के अलावा और कुछ नहीं लिखा है। इसी सोच के तहत एक्यूट सायकोसिस या ट्रांन्जिएन्ट सायकोसिस की अवधारणा पर काम हुआ। यह शोध कार्य कई वर्षों तक चला। निष्कर्ष यह निकला कि अपने यहाँ इस तरह के काफी मरीज+ होते हैं जो कम समय के लिए असामान्य होते है और इलाज से पूरी तरह ठीक हो जाते हैं। यहाँ मुझे विकृति विज्ञान के लेखक बॉयड की बात याद आती है-लुक, नेवर माइंड व्हाट इज रिटेन इन द बुक। तो किताबों में लिखी बातों से आगे देखो, दिमाग खोलकर शोध करो।

आपके छात्रों और सहकर्मियों का कहना है कि कुछ खास परफ्यूम की महक से वे समझ जाते थे कि आप विभाग में आ रहें हैं या आ चुके हैं। यह एक आम राय है कि आपकी सामाजिक उपस्थिति शालीन और आदरणीय ही नहीं सुसज्जित (वेल ड्रेस्ड) भी हुआ करती है। इसे हम आपके स्वभाव की अभिव्यक्ति मानें या मनोचिकित्सकों की मीडिया निर्मित छवि को तोड़ने का सजग (डेलिबरेट) प्रयास।
छात्र अपने अध्यापकों के बारे में बहुत तरह की बातें करते हैं। मैं इसमें नहीं जाना चाहता। हो सकता है कुछ छात्र मेरी बुराई भी करते हों। ख़ैर, आपने दूसरी बात जो कही है, मनोचिकित्सा की छवि के बारे में, मैं उसी पर आता हूँ। मुझे शुरू से यह लगता रहा है कि मनोचिकित्सा की छवि को बदलना कितना ज+रूरी है। अपने विषय की ग़लत छवि, पागलों का विभाग और पागलों का डॉक्टर वाली छवि मुझसे बर्दाश्त नहीं होती थी। मैं अपने छात्रों-सहकर्मियों सबसे कहता रहा हूँ कि गर्व से कहो कि मैं सायकाएट्रिस्ट हूँ। मैं हर सभा-सम्मेलन में सर्तक रहा करता हूँ कि कहीं कोई मेरे बिषय की हँसी न उड़ा दे। एक घटना याद आ रही है। यह तब की बात है जब मैं एम्स, दिल्ली में मनोचिकित्सा विभाग का अध्यक्ष था। वहाँ इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की एक सभा हो रही थी, जिसमें हर विभाग से एक व्यक्ति को बोलना था। मैं अपनी बात कहकर मंच से उतर ही रहा था कि सभा के अध्यक्ष डॉ. बी. एन. सिन्हा जो लखनऊ में आर्थोपीडिक्स के विभागाध्यक्ष रह चुके थे और बाद में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयर मैन बने, ने एक मजाक किया। वे बोले कि मरीज+ मनोचिकित्सकों को बहुत पसंद करते हैं। एक मरीज+ ने कहा कि मुझे मनोचिकित्सक इसलिए पसंद हैं क्योंकि वे बिल्कुल हमारे जैसे होते हैं। लोग हंँसे। मगर मैं उनकी बात सुनकर रुक गया। मैं बोला क्षमा करेंगे, मुझे दो बातें और कहनी हैं। पहला तो यह सवाल कि क्या जैसी विशेषज्ञता होती है, डॉक्टर भी वैसा हीे बन जाता है? क्या बच्चों का डॉक्टर बच्चा बन जाता है ? क्या आर्थोपीडिक्स (अस्थिरोग) का डॉक्टर मिस्त्री बन जाता है ? और दूसरी बात यह कि मैं शरीर के रोग भी देख चुका हूँ और मानसिक रोग भी। जितना दुख मानसिक रोग में होता है उतना शारीरिक रोगों में नहीं। और दुख की बात तो यह है कि इन दुखियों की सेवा करनेवाला कोई नहीं। अगर इन दुखियों की सेवा करना पागलपन है तो हाँ, मैं पागल हूँ और मुझे इस पागलन पर गर्व है। मेरी इस बात पर सभा में सन्नाटा छा गया। नीचे आने पर दिल्ली के सायकाएट्रिस्ट
डॉ. मलिक और उनकी पत्नी ने कहा कि बहुत अच्छा जवाब दिया आपने। तो हमें अपने विषय की कुप्रचारित छवि को बदलने के लिए लड़ना ही होगा। 2004 में जब मुझे एवार्ड दिया जा रहा था तो मैंने कहा था कि अगर मुझे फिर से मेडिकल की पढ़ाई करने का मौका मिले तो सायकाएट्री ही पढ़ना चाहूँगा क्योंकि यह विषय मनुष्य के दुखों को सबसे अधिक गहराई से समझता है।

मनोरोगों के जैविक रासायनिक आधारों की एक हद तक हुई खोज के कारण कुछ संशयवादी मानने लगे हैं कि सायकाएट्री अंततः समाप्त हो जाएगी। आपके अनुसार सायकाएट्री का क्या भविष्य है ?
अगर सायकाएट्री बायो-सायको-सोशल (जैव-मनो-सामाजिक) मार्ग पर चलती रहेगी तो इस विषय का अंत असंभव है क्योंकि मनुष्य के दुख को पूरेपन में समझने की आवश्यकता हमेशा बनी रहेगी। दूसरी बात यह कि अगर मनोचिकित्सक अपनी ही वृद्धि में लगे रहेंगे तो मनोचिकित्सा की हानि होगी। अगर आपका लक्ष्य है कि प्राइवेट पै्रक्टिस को बचाकर रखना है तो समझ लें उसे भी नहीं बचा पाएँगे। धीरे-धीरे अन्य विषय के लोग भी उसी क्षेत्र में घुसने लगेंगे। विदेशों में दवाएँ बनें, और आप यहाँ लिखें उससे मनोचिकित्सा का भविष्य नहीं सँवरेगा। इसका भविष्य लोगों की मानसिक समस्याओं को समझने और उन्हें सुलझाने की व्यापक पहल में है। आप लोगों तक पहुँचें। लोगों के लिए काम कारने वाली संस्थाओं को साथ लें। भले आप शहर के बड़े मनोचिकित्सक के रूप न जाने जाएँ, मगर लोगों का और मनोचिकित्सा का भला इसी रास्ते से होगा।

सार्क सायकाएट्रिक एसोसिएशन के आगरा सम्मेलन में जब पाकिस्तान से आए डा. हारुन रशीद चौधरी ने विजुअल क्लिप दिखाते हुए बताया कि लाहौर के मेंटल हास्पीटल में आपके नाम पर रिहैबिलिटेशन सेंटर (पुनर्वास केन्द्र) का नामकरण हुआ है तो मुझे जितना गर्व हुआ उससे अधिक आनंद आया। मुझे लगा कि मैं मेंहदी हसन या आबिदा परवीन को सुन रहा हूँ। इस सूचना में एक मानवीय संदेश था। एक सुकून था। राजनयिक और सैन्य कटुताओं से हुए ज+ख्मों पर मरहम का लेप था। आप इस सम्मान को कैसे देखते हैं ?
मनवता देश-धर्म-भाषा की कृत्रिम दीवारों से परे है। अपने जीवन में मैं उन सीमाओं के पार जा कर काम करता रहा हूँ। पाकिस्तान, मिस्र, ईरान, बंगलादेश, श्रीलंका, नेपाल आदि कई देशों के लिए मैंने काम किया है। अभी हाल में नेपाल में जब वहाँ का पहला सायकाएट्रिक जरनल प्रकाशित हुआ तो उसका प्रवेशांक मुझे समर्पित था। चिकित्सा सेवा जबसे बनी है, दुखियों के साथ रही है। डॉक्टर का धर्म है जान बचाना। लड़ाई के दिनों में भी, दुश्मन हो या दोस्त सबकी। तो मुझे इस बात का मान है कि पाकिस्तान ने मुझे यह सम्मान दिया है। यह बहुत खास है क्योंकि वह मेरी जन्मभूमि भी है।

मनोवेद डाइजेस्ट के पाठकों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे ?
मनोवेद डाइजेस्ट के प्रकाशन को मैं एक नयी शुरुआत की तरह देखता हूँ। मैं इस बात को स्पष्ट करने के लिए थोड़े विस्तार से चर्चा करूँगा। मैंने अभी जि+क्र किया था कि यूरोप का बौद्धिक नेतृत्व समाप्त हो रहा है। मुझे लगता है कि एक नये चिंतन को आगे आना चाहिए। आज भारत में हर तरफ एक नया उभार दिख रहा है। इस बदली हुई परिस्थिति में हमें मानसिक स्वास्थ के क्षेत्र में भी एक नए चिंतन की ज+रूरत है। इस संदर्भ में एक उदाहरण देता हूँ। यह मानी हुई बात है कि किसी भी संस्कृति में मनोभावनाओं (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि) का अतिरेक नुकसानदेह होता है। यूरोप ने दो मनोभावनाओं चिंता और उदासी को लेकर बीमारी बना दी। डबलिन (आयरलैंड) में एक बार एक भाषण में मैंने यह प्रश्न उठाया था कि अगर चिंता और उदासी का अतिरेक बीमारी है तो लोभ, काम और क्रोध का अतिरेक क्यों नहीं, क्या इसीलिए कि उन्हें बीमारी मानना आपकी संस्कृति के अनूकूल नही। चिंता और उदासी के अतिरेक को बीमारी घोषित करने का लाभ किसे मिला, आपकी औद्योगिक कम्पनियों को। इसी बात के संदर्भ एक भारतीय प्रसंग की चर्चा करता हूँ तुलसीकृत रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में वर्णित काकभुशुंडि-गरुड़ संवाद की कुछ चैापाइयाँ देखिए-
सुनहु तात अब मानस रोगा। जिन्हते दुख पाएँ बहु लोगा॥
मोह सकल व्यधिन्ह कर मूला। तिनते पुनि उपजे बहुशूला॥
काम वात कफ लोभ उपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा॥
प्रीति करें जो तीनिउ भाई। उपजइ सन्यपात दुखदाई॥
आप देखिए कि कितने सुंदर और सार्थक ढंग से तुलसी ने काम, क्रोध, लोभ, कफ, पित्त, वायु आदि को जोड़ा है। इसमें मुझे दो बातें दिखती हैं। पहली तो यह कि तुलसीदास ने मन और शरीर की तकलीफों को एक साथ रखकर देखा है। दोनों के बीच एक सामंजस्य, एक अंतर्संबंध की पड़ताल की है। और दूसरी बात, जिससे मैं खसतौर से मनोवेद डाइजेस्ट के पठकों तक पहुँचाना चाहता हूँ कि उस समय मरीज, डॉक्टर और कवि एक ही भाषा बोल रहे थे–कफ, पित्त, वायु, काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि। डॉक्टर मरीज+ और कवि सब एक जैसे शब्दों का व्यवहार कर रहे थे। अब ये हालत है कि मरीज+ कुछ भाषा बोलते हैं, डॉक्टर कुछ और कवि कुछ और। सच तो यह है कि दुखी लोगो की भाषा हम सही-सही नहीं समझते और न ही वे हमारी। मैं उम्मीद करता हँू कि मनोवेद डाइजेस्ट का प्रकाशन जैसे-जैसे आगे होता जाएगा मरीज+, मनोचिकित्सक और कवि एक ही भाषा बोलने लगेंगे। प्रवेशांक में आपके संपादकीय को पढ़कर मेरे मन में यह विश्वास जागा है।

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