ब्रुक शील्ड्स : कैशोर्य और मातृत्व का द्वन्द्व
विनोद अनुपम
|
14 मई 2007, दिन के दो बजे थे। सैनडिएगो(कैलिफोर्निया) के कन्वेंशन सेंटर में अमेरिका की प्रसिद्ध मनोचिकित्सक नैन्सी ऐन्ड्रियासन को सुनने के लिए हॉल में लगभग 500 मनोचिकित्सक बैठे थे। भाषण शुरू होने में कुछ विलम्ब था। मेरी सीट की दाहिनी तरफ बैठे सज्जन ने बायीं तरफ बैठे सज्जन से पूछा - क्या आपने ब्रुक शील्ड्स को सुना ? वो बोले – हां। इन्होंने फिर पूछा – क्या वह टॉम क्रूज के बारे में भी कुछ बोली। वे बोले – नहीं। पहले सज्जन ने लगभग भावुक होकर कहा – डिप्रेशन से उबरने के बाद वह बेहतर आत्मा हो गयी है , एक ज्यादा सहृदय और साहसी स्त्री।
अज्ञेय कहते हैं – दुख सबको मांजता है। नागार्जुन कहते हैं – दुख कटहल के छिलके जैसी जीभ से चाटता है। और मेरे बगल में बैठे अमेरिकी मनोचिकित्सक महोदय प्रसवोत्तर अवसाद ( पोस्ट पार्टम डिप्रेशन) से उबरी ब्रुक शील्ड्स को बेहतर आत्मा की तरह देखते हैं।
उदासियां हमारे रास्ते की अनिवार्य धूल और थकान की तरह होती हैं – कभी हल्की , कभी गहरी। चलने वाले धूल-धूसरित भी होंगे और थकेंगे भी। वे देखनेवाले की परवाह क्यों करें। सैनडियागो में ब्रुक शील्ड्स ने भले कुछ न कहा हो , मगर लाइफ नामक पत्रिका से बातचीत में उसने बेहद उदारता से कहा था कि उसकी(टाम क्रूज की) होने वाली पत्नी के बुलावे पर हम उसकी शादी में गए थे। अगर नहीं जाते तो शायद एक करारा जवाब होता। हमें वहां जाना अच्छा लगा था।
अपने मन पर जमी अवसाद की धूल झाड़कर ब्लू लैगून की नायिका पुनर्नवा हो चुकी हैं। प्रसवोत्तर अवसाद से अपनी लड़ाई को डाउन केम द रेन नामक किताब में लिख चुकी है। अपनी मां का जिक्र करते वह कहती हैं कि वे रोज शराब पीती हैं। रोज शराब पीना मनोरोग का लक्षण हो सकता है। कई मनोरोगी अनुवांशिक होते हैं। 28 वर्ष की उम्र तक स्नेहिल मगर नियंत्रणशील मां के साये में रहने के बाद खुदमुख्तार हुई शील्ड्स का मां से लगाव बना हुआ है मगर वह यह भी कहती है कि आत्मनिर्भर होकर जीने से मुझमें जीवन की बेहतर समझ और संवेदनशीलता का विकास हुआ है।
ब्रुक शील्ड्स की तुलना अपनी बुराइयों को निःसंकोच स्वीकार करने वाले अमेरिकी समाज के आचरण से नहीं की जानी चाहिए। बिल क्लिंटन को मोनिका प्रकरण के बाद भी सेलेब्रिटी बनाए रखनेवाले अमेरिकी समाज में अवसाद एक स्टिग्मा है। बहुत कम लोग उसे स्वीकार करने का साहस जुटा पाते हैं। ब्रुक शील्ड्स का यह साहस उसे स्टिग्मा विरोधी अनुकरणीय प्रतीक के रूप में स्थापित करता है।
अपने अवसाद का अनुभव जाहिर करते हुए वे कहती हैं – कितना अजीब था कि मैं अपनी बेटी रोवन से तनिक भी लगाव महसूस नहीं कर रही थी। पैरोक्सिटीन ( अवसाद की दवा) ने मुझे अपनी बेटी को प्यार करने लायक बनाया। नाटक के अंत में कहे जाने वाले भरत वाक्य की तरह यहां कहना उपयुक्त होगा कि जिस तरह हॉलीवुड की हीरोइन ब्रुक शील्ड्स के दिन फिरे वैसे ही प्रसवोत्तर अवसाद से ग्रसित अन्य माताओं के भी फिरें – संपादक।
मानव मन की यह सीमा है कि असुरक्षा का अहसास उसे शिखर पर भी नहीं छोड़ता। शायद और बढ़ जाता है, कभी-कभी तो मानसिक रोग की हद तक। आज जब सदी के सबसे बड़े सितारे को एक ओर छोटे-छोटे स्वार्थों की पूर्ति के लिए ओछे कामों में संलग्न देखते हैं या फिर महीने में चार बार किसी मन्दिर या मजार पर मत्था टेकते देखते हैं तो यही अहसास होता है। वास्तव में यदि ये भी ब्रुक शील्ड्स की तरह हिम्मती होते तो जरूर अपनी मानसिक स्थिति को खुद भी विश्लेषित करने की स्थिति में होते। लेकिन ब्रुक शील्ड्स होना आसान नहीं।
1970 के दशक में ब्रुक शील्ड्स ने अपने कैरियर की शुरुआत बाल मॉडल के रूप में की। इसे समय की रफ्तार से तेज चलना ही कह सकते हैं कि वह 1980 के दशक में मात्र 14 वर्ष की उम्र में मशहूर फैशन पत्रिका ÷वोग' के आवरण पर अवतरित हुई, सबसे कम उम्र की मॉडल के रूप में। 15 वर्ष की उम्र में इन्हें कैल्विन क्लेन जींस जैसा प्रतिष्ठित ब्रांड हासिल हुआ तो 16 की उम्र में इन्हें अमेरिकी फैशन जगत के सबसे परिचित चेहरों में शुमार किया जाने लगा। आश्चर्य नहीं कि जहाँ ÷वोग' के आवरण पर एक बार आना मॉडलों के लिए अवसर होता है, ब्रुक शील्ड्स 1983 के सितम्बर से दिसम्बर तक लगातार ÷वोग' की कवर गर्ल बनती रहीं। बनती भी क्यों नहीं, समय से होड़ लेती ब्रुक शील्ड्स अपनी विशिष्ट पहचान की जिद पर जो कायम थी। 1978 में 11 वर्ष की उम्र में अपनी पहली ही फिल्म ÷प्रेटी बेबी' में नग्न दृश्य देकर ब्रुक शील्ड्स ने हॉलीवुड को भी चौंका दिया था। 1980 में ÷ब्लू लैगून' में नीले समुद्र में किसी जलपरी सी दिखती ब्रुक शील्ड्स के मासूम सौंदर्य ने सारी दुनिया का ध्यान आकृष्ट किया। लेकिन यह एक ब्रुक शील्ड्स थी जिसने सफलता का शीर्ष ही नहीं देखा, पीपुल्स च्वाइस और गोल्डन ग्लोब अवार्ड के रूप में बौद्धिक जगत की भी स्वीकृति हासिल की।
दूसरी ब्रुक शील्ड्स के रूप में हमारा सामना एक ऐसी लड़की के साथ होता है जो समय से आगे भागने की होड़ में थककर थोड़ा आराम करना चाहती है। थोड़ा अपना आत्म-निरीक्षण करना चाहती है। लोकप्रियता के शिखर पर पहुंची ब्रुक शील्ड्स कुछ वर्ष के लिए फिल्मों को अलविदा कह देती है और प्रिंसटन विश्वविद्यालय से फ्रेंच साहित्य में ग्रेजुएशन करती है। लेकिन उम्र से पहले बड़ी हो चुकी ब्रुक शील्ड्स को यह ठहराव इतना धैर्य नहीं दे सका कि वह अपने मातृत्व को सहजता से स्वीकार कर सके। शायद ब्रुक शील्ड्स की उम्र बढ़ रही थी लेकिन किशोरावस्था में मिली अपार लोकप्रियता उसे स्वीकार नहीं करने दे रही थी कि वह बड़ी हो चुकी है। 2003 में वे एक बच्ची रोवेन फ्रांसिस को जन्म तो देती हैं, लेकिन ...... बाद में कुछ इन शब्दों में अपनी स्थिति बयान करती हैं, ÷जबसे मैंने उसे पैदा किया, कोई जुड़ाव महसूस नहीं किया। यहाँ तक कि मुझे इस बच्ची को दूध पिलाने की भी इच्छा नहीं होती, डायपर्स पर पाउडर की महक से मुझे बेहोशी होने लगती है। उसका रोना मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता।' चिकित्सा की भाषा में कहें तो ब्रुक शील्ड्स यह कहते हुए अपने ÷पोस्टपार्टेम डिप्रेशन' के गंभीर लक्षण को अभिव्यक्त कर रही थी।
वास्तव में किशोरावस्था में जी रही ब्रुक शील्ड्स में अपनी बच्ची को सामने देखते हुए भी मातृत्व का अहसास जग ही नहीं पा रहा था। शायद उसे लग रहा हो कि उसका मातृत्व उसकी लोकप्रियता को कायम नहीं रहने दे। शिखर पर पहुंचने और फिर शिखर पर टिके रहने की जिद किसी व्यक्ति को अंदर से कितना असुरक्षित कर देती है, यह हम देखते रहे हैं। ब्रुक शील्ड्स भी उससे अलग नहीं। अपने पेडियाटीशियन के साथ मुलाकात कर वह स्पष्ट कहती हैं, मैं यह बच्चा पैदा नहीं कर सकती। लेकिन बच्ची पैदा होती है, और ब्रुक शील्ड्स को अपनी मानसिक स्थिति का अहसास भी होता है, यही ब्रुक शील्ड्स को बाकी सेलिब्रिटिज से अलग करती है।
2007 में अमेरिकन सायकाएट्रिक एसोसिएशन की मीटिंग में शील्ड ने खुलकर अपने अनुभव बांटे, उन्होंने कहा, यह केवल बेबी ब्लूज याने बच्चे के प्रति उदासीनता का मामला नहीं था। मुझे लगता है बेबी ब्लूज कह कर समस्या की गंभीरता को कम करने की कोशिश की जाती है। यह इतने गंभीर मसले को कार्टून की तरह बना देता है। लोग आमतौर पर कहते थे ओह, यह तो ÷बेबी ब्लूज' है अपने आप ठीक हो जाएगा।
÷÷पर एक दिन जब अपने पति हॉलीवुड स्क्रिप्ट राइटर क्रिस हेंची मेरे सामने रो पड़े तो मुझे गंभीरता का अहसास हुआ'', ब्रुक शील्ड्स बताती हैं, ÷÷वे बच्चे के लिए कुछ सामान लाने गये थे और वापस आकर रो पड़े। उन्होंने मेरी ओर देखकर कहा, क्या हो गया है तुम्हें? औरतें कितनी खुश होती हैं माँ बनकर और तुम ? आश्चर्य कि मुझे अपने स्वभाव के विपरीत उन्हें संभालने का मन भी नहीं हुआ।''
लेकिन यही एक स्वप्नपरी के धरातल पर उतरने का प्रस्थान बिन्दु भी बना। ब्रुक शील्ड्स को अहसास हुआ कि कहीं न कहीं मामला सामान्य नहीं और वे अपने इलाज के लिए तैयार हो गयीं। स्थिति सुधरने लगी तो उन्हें अहसास हुआ किस कठिन और खतरनाक दौर से वे गुजर रही थीं। यह सिर्फ बच्चे के प्रति उदासीनता का मामला नहीं था, बल्कि मानसिक स्थिति बदलने पर यह बच्चों को नुकसान भी पहुंचा सकते थे। ब्रुक शील्ड्स कहती हैं, ÷अब मैं कई मंजिल नीचे से भी अपनी बच्ची का रोना महसूस कर सकती हूँ और इसका अर्थ समझ सकती हूँ, पर तब मुझे उसे उठाने या चूमने की कोई इच्छा ही नहीं होती थी।' लेकिन अपनी इस मानसिक अवस्था को स्वीकार करना किसी भी आम जन की तरह ब्रुक शील्ड्स के लिए भी आसान नहीं था। शील्ड के आब्स्टेट्रीशियन ने जब उन्हें समझाने की कोशिश की कि उन्हें पोस्टपार्टेम डिप्रेशन हो सकता है तो उन्होंने इसे सिर्फ मजाक में नहीं उड़ाया, बल्कि थोड़ी नाराज भी हुईं। ब्रुक ने अपने डॉक्टर से स्पष्ट कहा, ÷ऐसी किसी समस्या से निपटने के लिए मैं गोली नहीं ले सकती। मैं टूट कर दवाओं के सहारे ठीक होने वालों में से नहीं हूँ।' यही ब्रुक शील्ड्स दवाओं के सहारे सामान्य होने के बाद अपने अनुभवों के आधार पर एक पुस्तक भी लिखती हैं, ÷डाउन केम द रैन–माई जर्नी थ्रू पोस्टपार्टेम डिप्रेशन'।
शायद ब्रुक शील्ड्स को भी अहसास नहीं होगा कि मानसिक बीमारी के प्रति लोगों का हिचक तोड़ने की उसकी कोशिश एक सार्वजनिक बहस का मुद्दा बन जाएगी। अमूमन सेलिब्रिटिज की तरह यदि अपनी बीमारी का इलाज कराकर भी ब्रुक शील्ड्स चुप रह जाती तो समस्या नहीं होती। लेकिन ब्रुक अपनी विडम्बना से सबक लेते हुए मानती थी कि इस मुद्दे को रोशनी में लाना अनिवार्य है। ऐसा करने से शर्म और सामाजिक कलंक के भय से दबे इस रोग का सामाजिक निषेध बंद हो जाएगा और इसके इलाज के लिए प्रयास होंगे।
लेकिन अपनी इस कोशिश के लिए ब्रुक शील्ड्स को सर्वाधिक विरोध अपने ही साथी टॉम क्रूज से झेलना पड़ा। मनोवैज्ञानिक इलाज का विरोध करने वाली संस्था ÷चर्च ऑव साइंटोलॉजी' का प्रतिनिधित्व करने वाले टॉम क्रूज ने ब्रुक शील्ड्स की सार्वजनिक भर्त्सना करते हुए कहा कि रासायनिक असंतुलन की बात बेमानी है। यह एक सामान्य समस्या है जिसका इलाज मामूली विटामिन की गोलियों से हो सकता है। पोस्टपार्टेम के नाम पर ली जाने वाली दवाइयां खतरनाक हैं।
वास्तव में पोस्टपार्टेम डिप्रेशन की चिकित्सकीय अवधारणा है कि यह हारमोनल परिवर्तन के कारण होता है। गर्भावस्था में इस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरॉन का स्तर काफी ज्यादा हो जाता है जो प्रसव के 24 घंटे के अन्दर सामान्य पर आ जाता है। इस अन्तर से विभिन्न महिलाओं पर भिन्न-भिन्न प्रभाव पड़ता है।
ब्रुक शील्ड्स ने ÷साइंटोलॉजी' के प्रति टॉम क्रूज के समर्पण को ÷फैशनेबल पैनेशिया' बताते हुए कहा कि हॉलीवुड एक असुरक्षित इंडस्ट्री है। लोग यहाँ भेड़चाल में यकीन रखते हैं और किसी मसीहानुमा चीज के प्रति ज्यादा आकर्षित होते हैं बजाय यथार्थवादी इलाज के। उन्होंने कहा, ÷टॉम क्रूज की टिप्पणियाँ सभी माताओं के लिए अपमानजनक हैं। इससे यदि कुछ भला हो सकता है तो यही कि एक गंभीर समस्या की ओर लोगों का ध्यान जाएगा।
ब्रुक शील्ड्स और टॉम क्रूज के सीधे विवाद ने अमेरिका के सिनेमा और चिकित्सा जगत को ही नहीं, वहाँ के बौद्धिक समुदाय को भी विचलित कर दिया। चर्चित स्तम्भकार चेरिल लेविस ने इस विवाद पर हस्तक्षेप करते हुए लिखा, ÷मुझे यह विश्वास नहीं हो रहा है कि यह ÷आदमी'; टॉम क्रूज एक ÷औरत' को पोस्टपार्टेम अवसाद के बारे में नसीहत दे रहा है। ब्रुक शील्ड्स इसे ब्लैकहोल कहती है। मैं तो इसे नर्क कहती हूँ। मैंने इसका सामना किया है। मुझे यकीन नहीं होता कि टॉम क्रूज इतनी गैर-जिम्मेदारी से कोई बात कहेंगे, क्योंकि उनके आकर्षण के कारण उनके कहे का भी बहुत प्रभाव पड़ता है।
ब्रुक शील्ड्स के मनोचिकित्सा के पक्ष में डटकर खड़े होने के सिर्फ भावनात्मक कारण नहीं, बल्कि व्यावहारिक कारण हैं। पहले बच्चे के जन्म के बाद उन्होंने इलाज शुरू करवाया। लेकिन आमतौर पर जैसा मनोरोगियों के साथ होता है। ब्रुक शील्ड्स ने भी सुधार होते ही दवा छोड़ दी। स्थिति दोबारा बिगड़ने लगी और शील्ड्स का अवसाद इस हद तक बढ़ गया कि वे आत्महत्या के बारे में सोचने लगीं। लेकिन उन्होंने दोबारा अपना इलाज शुरू करवाया और वापस अपना संतुलन हासिल किया। वे कहती हैं, ÷क्रूज के साथ मेरी लड़ाई व्यक्तिगत नहीं, मैं अपने जैसी और भी मांओं के लिए लड़ रही हूँ। क्रूज ने कहा मुझे मनोचिकित्सा का इतिहास नहीं मालूम। मैं भी बस यही कहूंगी कि क्रूज ने कभी पोस्टपार्टेम का सामना नहीं किया।'
वास्तव में कुछ दर्द ऐसे होते हैं, जिनका सिर्फ सामना किया जा सकता है, अहसास नहीं। इस अहसास के लिए जिस संवेदनशीलता की जरूरत होती है, अमूमन हम उसके अभाव में रहते हैं। लेकिन जब यह अभाव दूर होता है तो सामने वाले के दर्द का अहसास भी होता है और मनोचिकित्सा की जरूरत भी होती है। ब्रुक शील्ड्स का पोस्टपार्टम के पक्ष में खड़े होना, टॉम क्रूज की तरह एक सेलिब्रिटी का शो नहीं, वास्तव में एक मां और एक महिला की संवेदनशीलता है। आश्चर्य नहीं कि आज ब्रुक शील्ड्स की याद सिर्फ ÷ब्लू लैगून' के लिए नहीं आती, उसकी हिम्मत और संवेदनशीलता के लिए भी आती है।
53-ए, सचिवालय कॉलोनी, कंकड़बाग, पटना-800020
मोबाइल : 09334406442
... |