इस अंक में
मन माने की बात बातचीत
माइंड योर लैंग्वेज यानी जुबान सँभाल के
डॉ विनय कुमार
शब्दों के अर्थ शुरुआती अर्थों तक ही सीमित नहीं रहते। सभ्यता की विकास-यात्र में समय-समय पर नए अर्थ जुड़ते जाते हैं। यह आवश्यक नहीं कि नए अर्थों की आमद सकारात्मक ही हो।
दुख को बेहतर समझती है मनोचिकित्सा...
डॉ. नरेन्द्रनाथ विग से डॉ. विनय कुमार की बातचीत
जीवन और ज्ञान की विविधताओं के गहरे अध्येता डॉ. एन.एन.विग भारतीय मनोचिकित्सा जगत की उज्ज्वलतम उपस्थितियों में से एक हैं।
 
मन माने की बात डायरी
रचनाकार की पूंजी होती है बचपन की ...
डॉ. नरेन्द्रनाथ विग से डॉ. विनय कुमार की बातचीत
अपनी कविताओं में मनुष्य और उसके जीवन के प्रति समाहित होनेवाले कथ्य को आप किस रूप में देखते हैं ? पानी में घिरे हुए लोग शीर्षक कविता की रचना प्रक्रिया के बारे में बताएं।
....फ्रायड ग़ायब और इन्द्र मुस्कुरा रहा था
लीलाधर मंडलोई
हिन्दी कविता के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर और दूरदर्शन के महानिदेशक लीलाधर मंडलोई कविता के अतिरिक्त गद्य लेखन के लिए भी जाने जाते हैं। वर्षों से वे अपनी मनःस्थितियां डायरी में दर्ज करते रहे हैं।
 
मनोचिकित्सक की कलम से मनोचिकित्सक की कलम से
हिस्टीरिया की कहानी : डॉ. प्रमोद कुमार सिंह
सचमुच यह अब एक कहानी मात्र ही रह गयी है, क्योंकि विशेषज्ञों ने इस शब्द का प्रयोग बन्द कर दिया है। किन्तु इस शब्द की प्रासंगिकता अभी बनी हुई है, क्योंकि जनमानस में यह शब्द अभी पूर्ण जीवंत रूप में कायम है। इसकी प्रासंगिकता इसलिए भी बनी हुई है क्योंकि जिन मनोशारीरिक दशाओं के लिए इसका प्रयोग किया जाता था, वे अभी भी लगभग उसी रूप में,
मनोरोगियों के परिवारों की चुनौतियां :
जे.के. त्रिवेदी/श्याम बिहारी राय/मोहन ध्यानी

मानसिक रोगों से कोई व्यक्ति, समाज अथवा देश प्रतिरक्षित नही है। इन रोगों का व्यक्ति के ऊपर गंभीर मनोवैज्ञानिक,सामाजिक व
 
मनोचिकित्सक की कलम से मनोचिकित्सक की कलम से
बढ़ती उम्र का सामना : डॉ. चित्तरंजन एन्ड्राडे
किशोरावस्था के अन्तिम तथा युवावस्था के आरंभिक वर्षों में बौद्धिक क्षमता अपने उच्चतम स्तर पर रहती है। इसके बाद इसमें लगातार गिरावट आती है, पर यह बात पचास या साठ की उम्र के बाद ही पता चलती है। बढ़ती उम्र के साथ हाल की घटनाओं की याददाश्त भी कम हो जाती है।
मनोरोगियों को बेड़ियाँ क्यों नेहा सईद सईद अख्तर
इस सभ्य समाज में भी मनोरोगियों के साथ परिवार, समाज और कभी-कभी तो विभिन्न चिकित्सा प्रणालियों के माननीय दिग्गजों के द्वारा जो व्यवहार होता है, वह बड़ा ही दिल दहलाने वाला होता है। रोगियों को आज भी हथकड़ियों से जकड़ कर रखा जाता है, रस्सियों से उनके हाथ पैर बाँध दिए जाते हैं , कमर में रस्सी बाँध कर जानवरों की तरह खींचा जाता है।
 
नोटिस बोर्ड नोटिस बोर्ड
पागलपन नहीं सायकोसिस
एक शब्द है पागल'। इस शब्द का हमारे जीवन में बड़ा महत्त्व है। दुनिया में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं जिसे कभी पागल न कहा गया हो। कोई भी मां बच्चे की ऊल-जुलूल, लेकिन मासूम हरकत पर कहती है, धत पागल और बच्चे की छोटी-सी गलती पर बड़ा दंड देने पर उतारू पिता को कहती है, पागल हो गए हैं क्या?
प्रसवोत्तर अवसाद
पुराण बताते हैं कि एक बार समुद्र का मंथन हुआ था और उससे चौदह रत्न निकले थे। यह भी बताते हैं कि किस रत्न को किस देवता अथवा किस असुर ने ग्रहण किया था, किंतु यह नहीं बताते कि मथे जाने और रत्नदान के बाद समुद्र ने क्या महसूस किया। समुद्र को ठीक वैसा ही लगा होगा जैसा फसल दे चुकने
 
नोटिस बोर्ड नोटिस बोर्ड

अटेंशन डेफिसिट हायपरएक्विविटी डिसॉर्डर
अभिभावक के रूप में आप अपने बच्चे का जीवन गढ़ने में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसी संभावना हो सकती है कि आपका बच्चा अटेंशन डेफिसिट हायपरएक्विविटी डिसॉर्डर (ए डी एच डी) का शिकार हो। आएं जानें कि–

ए डी एच डी क्या है ?

मनोरोग के लक्षण
¨ नींद में कमी , भूख में कमी , क्रोध आना , तोड़-फोड़ , मार-पीट , बेवजह डर , शक , बहुत कम या बहुत अधिक बात करना , अकेले बैठकर बुदबुदाना या मुस्कुराना , डायन या भूत का डर , कोई कहीं नहीं बोले तब भी आवाज सुनना , पत्नी को पति के अथवा पति को पत्नी के चरित्र पर बेवजह शक , गांजा , भांग , शराब , स्मैक आदि की लत।
 
बाल मन बाल मन
शिक्षा की अनोखी अवधारणा : मॉन्टेसरी स्कूल : मीनू मंजरी
रंग.विवरंगी मेज'कुर्सिया, खिलौनों से भरी अलमारी, समूहों में बैठे अपने काम में र्मग्‍न बच्‍चे यह द़श्‍य पारंपारकि पाछशाला से काफी भिन्‍न है ा पर दुनिया भर से मॅान्‍टेसरी स्‍कूलों की सफलता ने शिक्षा की इस अवधारणा को मान्‍य बनाया हैा
बच्चों को कहां ले जा रहा है मीडिया : नरेन
हलांकि प्रिट मीडिया हो चाहे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रायः हर किस्म का मीडिया वर्ग अपनी सामूहिक गतिविधियों के मद्देनजर लगभग पूरी तरह से मनी मिटिंग, वीभत्स बाजारू उत्पाद में तब्दील हो चुका है; लेकिन उसका पाखण्डी और आतंककारी दंभ उत्तरोत्तर परवान ही चढ़ता जा रहा है कि वह
 
निष्कलंक निष्कलंक
बु्रक शील्ड्स : विनोद अनुपम
14 मई 2007, दिन के दो बजे थे। सैनडिएगो(कैलिफोर्निया) के कन्वेंशन सेंटर में अमेरिका की प्रसिद्ध मनोचिकित्सक नैन्सी ऐन्ड्रियासन को सुनने के लिए हॉल में लगभग 500 मनोचिकित्सक बैठे थे। भाषण शुरू होने में कुछ विलम्ब था। मेरी सीट की दाहिनी तरफ बैठे सज्जन ने बायीं तरफ बैठे सज्जन से पूछा -
गोरख पांडेय! यादों के आईने में चमन लाल
किसी भी कवि के लिए सबसे बड़ी चुनौती है–गंभीर अर्थों से भरे लोकगीत लिखना। हक की लड़ाई लड़नेवालों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलनेवाले गोरख पांडेय ने यह कठिन काम तो आसानी से किया, मगर पारानॉयड स्किजोफ्रेनिया की मुश्किलों से पार नहीं पा सके। उन्होंने आत्महत्या कर ली।
 
क्रूरता की शिनाख्त क्रूरता की शिनाख्त
रैगिंग को सामाजिक वर्ग ढांचे में देखें : स्वतंत्र मिश्र
उच्च संस्थानों में रैगिंग एक आम समस्या बन गयी है। हाल ही में भारत के एक प्रतिष्ठित कॉलेज सेंट स्टीफेंस में कुछ सीनियर छात्रों द्वारा एक जूनियर छात्र को प्रताड़ित करने का मामला सामने आया है। इस घटना में सीनियर लड़कों ने अपने एक जूनियर के र डियोडरेंड खूशबू उत्पन्न करने वाला इत्र जैसा कुछ स्प्रेे छिड़कर उसको आग लगा दिया गया।
खुद की खबर पर खामोश मीडिया :
वर्तिका नन्दा सहाय
दो साल पहले दिल्ली पब्लिक स्कूल के दो छात्रों का जो अश्लील एमएमएस बना, वह बे्रकिंग न्यूज थी, देश भर ने वो तस्वीरें देखीं और जनता नैतिकता पर मीडिया की चिल्लाहट की गवाह बनी, लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि
 
 
इस अंक की दवा
लिथियम कार्बोनेट
   
बाल मन

शिक्षा की अनोखी अवधारणा : मॉन्टेसरी स्कूल : मीनू मंजरी

बच्चों को कहां ले जा रहा है मीडिया : नरेन

   
किताब के बहाने
श्रेष्ठता ग्रंथि से पीड़ित लोग : कुमार मुकुल
   
मनोव्यथा
हर कार मेरा पीछा कर रही थी : कमल
   
मीडिया पर निगाह
बाजार ही मीडिया का राष्ट्र और धर्म है : अनिल चमड़िया
   
क्रूरता की शिनाख्त
टीवी एंकरों की खुदकुशी और टीआरपी : मृणाल वल्लरी
   
विश्लेषण
अवसाद : चारुवाक
   
सपने
मेरे तीन सपने : उनका क्या करूं ? : बोधिसत्व
   
जनगीत
दुनिया नष्ट नहीं होगी : नचिकेता
   
कहानी
मुश्किल : सन्तोष चौबे
   
काव्य कथा
शान्ता : उद्भ्रान्त
   
फिल्म

ओंकारा : विनोद अनुपम

ऑथेलो : अनामिका

   
व्यंग्य  झूठ बोलने के फायदे : विष्णु नागर
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मनोवेद
अंक – 1 वर्ष – 1 जनवरी–मार्च, 2008

मीडिया पर निगाह

बाजार ही मीडिया का राष्ट्र और धर्म है
अनिल चमड़िया

नमक मनुष्य और जानवर दोनों के लिए बहुत जरूरी है। नवम्बर को भारत सरकार के राजपत्र में एक अधिसूचना जारी की गई इसके बाद से आम लोगों को खाने के लिए नमक बाजार में कम होता गया और सरकार ने आयोडीन युक्त नमक को खरीदना अनिवार्य कर दिया। साधारण नमक अधिकतम दो रुपए किलोग्राम की दर से मिल जाता था। आदेश के लागू होने के बाद कई कम्पनियों का उत्पाद आयोडीन युक्त नमक का पैकेट लगभग आठ रुपए किलोग्राम की दर से बिकने लगा। भूमंडलीकरण का दौरा शुरू होने के बाद से ही देश में डेढ़ हजार करोड़ सालाना के नमक के कारोबार पर नजर लगी हुई हैं। आयोडीन युक्त नमक की अनिवार्यता से नमक का सालाना बाजार आठ-दस गुना बढ़ जाएगा। लेकिन आश्चर्यजनक है कि देश के विभिन्न हिस्सों में दौरा करने के दौरान यह देखा गया कि इस सरकारी जबरबाँदी की जानकारी आम आबादी को नहीं है। जबकि गाँव-गाँव में समाचार पत्रों की पहुँच काफी तेजी से बढ़ी है। पल-पल की खबर देने का दावा करने वाले टेलीविजन चैनलों की तादाद बढ़ती चली जा रही है। यह खबर लोगों के बीच में बाद में पहुँची है उससे पहले समाचार पत्रों और टेलीविजन चैनलों एवं रेडियो ने आयोडीन नमक की जरूरत की सूचना पहुँचा दी। यह सूचना इस तरह की खोज के साथ कि आयोडीन की कमी से बच्चे पढ़ने में पिछड़ जाते है। परीक्षा में बार-बार फेल हो जाते हैं।
अब इसी नमक के मसले को पिछले दौर में जाकर देखें। जब चैनल नहीं थे। रेडियो पर सरकार का एकाधिकार था। समाचार पत्रों में बहुुसंस्करण भी नहीं होते थे। आज उसी कांग्रेस की सरकार का यह फैसला है जिसने तब महात्मा गांधी के नेतृत्व में अंग्रेज शासकों द्वारा नमक बनाने और नमक पर कर लगाए जाने के खिलाफ दांडी मार्च किया था। तब गांधी के साथ महज कार्यकर्ता थे। लेकिन तब के बारे में बॉम्बे क्रानिकल लिखता है–इस महान राष्ट्रीय घटना से पहले साथ-साथ और बाद में जो दृश्य देखने में आए, वे इतने उत्साहपूर्ण, शानदार और जीवन फूँकने वाले थे कि वर्णन नहीं किया जा सकता। इस महान अवसर पर मनुष्यों के हृदय में देश प्रेम की जितनी प्रबल धारा बह रही थी उतनी पहले कभी नहीं बही थी। यह एक महान आन्दोलन का महान प्रारम्भ था, और निश्चय ही भारत की राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के इतिहास में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान रहेगा।
मीडिया अंग्रेज सरकार द्वारा नमक पर कर की मुखालफत को राष्ट्र निर्माण के आन्दोलन के रूप में चित्रित करता है। लेकिन अब लोगों के उपयोग के लिए साधारण नमक बनाने पर पाबन्दी की सूचना भी नहीं भेजना चाहता। नमक के मसले पर ही बातचीत को केन्द्रित करें? अंग्रेजों पर कर लगाए जाने और नमक बनाने पर रोक के विरोध और भूमंडलीकरण के दौर में आयोडीन युक्त नमक की अनिवार्यता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। तब गुजरात के कलेक्टर ने आज की तरह ही सरकारी विक्षप्ति में बताया था कि समुद्र तट से बटोरा गया नमक खाने के काम का नहीं होता है इसीलिए कम्पनी सरकार उसे नष्ट कर देती है। सरकार भरपाई कर (टैक्स) से करेगी। सरकारी पक्ष का यह भी कहना था कि सरकार नमक से अपना एकाधिकार हटा लें तो लोगों को नमक का अधिक मूल्य देना पड़ेगा और एकाधिकार के हटाने से सरकार को जो हानि होगी वह भी लोगों को पूरी करनी होगी। तब अंग्रेज सरकार ने यह भी बताया था कि वयस्क लोग प्रतिवर्ष ढाई सेर नमक खाते हैं और तीन आना कर देते हैं। लेकिन गांधी ने नमक आन्दोलन के कारण कुछ इस तरह बताए थे। पहला तो कि प्रति व्यक्ति कम-से-कम नौ आना कर देता है। यह ठीक उसी तरह की बात थी जैसे आज संसद में सरकार कहती है कि नमक को आयोडीन युक्त करने का बोझ लगभग दस पैसे प्रतिकिलो से ज्यादा नहीं पड़ेगा लेकिन तथ्य है कि समुद्र तट से लगभग पचास पैसे किलोग्राम की दर से खरीदे जाने वाला नमक आयोडीन युक्त करने के बाद कम्पनियाँ आठ रुपए से ज्यादा किलोग्राम के दाम पर बेच रही हैं। यदि इस व्यापार पर कम्पनियों का एकाधिकार हो जाए तो कीमत के बढ़ने का अन्दाज नहीं लगाया जा सकता है। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान आयोडीन युक्त नमक अनिवार्य किए जाने के बाद पैंतालीस रुपए किलोग्राम तक आयोडीन युक्त नमक का पैकेट बिका था। अंग्रेज सरकार के फैसले पर गांधी ने टिप्पणी की थी कि देश के आम लोगों की औसत आमदनी दो आना है जबकि वायसराय की आमदनी उससे पाँच हजार गुना ज्यादा है। भूमंडलीकरण के दौर में पूँजीवादी मीडिया के विस्तार के साथ निचले स्तर पर आमदनी और ऊपर आमदनी का फासला नब्बे लाख गुना तक बढ़ गया है। आज भी बड़ी आबादी की क्षमता आठ-दस रुपए पैकेट नमक खरीदने की नहीं है। वह पच्चीस पचास पैसे में खरीदे गए खुले नमक को कई दिन तक खाने में इस्तेमाल करती है।
कम्पनी सरकारी नमक के जरिए राज्य (व्यवस्था) की ताकत का एहसास घर तक करवाना चाहती थी। नमक पर कर और उस बनाने पर पाबन्दी महज राजस्व प्राप्ति के लिए नहीं था। यह नमक बनाने के लोकतांत्रिक अधिकार को छीनने का राजनीतिक फैसला भी था। यह कम्पनी का एकाधिकार स्थापित करने का फैसला भी था जो साम्राज्यवादी मूल्यों को स्थापित करता दिखा। आज भी यह प्रश्न आर्थिक दृष्टिकोण से वहीं खड़ा है। स्वतंत्र भारत में पूँजीवाद कम्पनियाँ और सरकार दो अलग संगठन के रूप में दिखते हैं। अब पब्लिक पार्टनरशिप के रूप में हो गया है। कल टैक्स का मतलब सरकार का राजस्व था। भूमंडलीकरण में आयोडीन युक्त नमक की अनिवार्यता इस जमाने के टैक्स का ही नाम है। आयोडीन युक्त नमक का फैसला लोगों के खाने-पीने (कोका कोला जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी के उत्पाद को छोड़कर) की चीजों के चुनाव करने की स्वतंत्रता पर हमला है।
अंग्रेजों के कार्यकाल में मीडिया ने नमक को भारतीय राष्ट्रवाद के केन्द्रक के रूप में स्थापित करने पर पूरा जोर लगाया। उस दौर में मीडिया ने अंग्रेजोत्तर भारत के लिए नमक के राजनीतिक पक्ष को आजादीे समतुल्य माना। लेकिन भूमंडलीकरण के दौर में लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ होने का दावा करने वाला मीडिया अपने नमक की खबरों से भी वंचित रखने और नमक की मार से होने वाली तकलीफों की साझेदारी करने से भी राष्ट्र के लोगों को वंचित कर रहा है। नमक का व्यापार यदि दस गुना ज्यादा बढ़ जाएगा तो उसमें कम्पनी के आयोडीन युक्त नमक के उत्पाद का विज्ञापन के रूप में मीडिया को उसका हिस्सा मिलना सुनिश्चित हो जाएगा जबकि साधारण नमक का कोई विज्ञापन तो होता नहीं है। इसका मतलब यह नहीं है कि मीडिया के हित महज विज्ञापन जैसे सीमित दायरे में सिमटे हैं।
मीडिया के राष्ट्रवाद के मायने वे नहीं होते जो उसके आम नागरिकों के राजनीतिक दृष्टिकोण के बीच बना होता है। मीडिया का राष्ट्रवाद उनके हितों से जुड़ा होता है। मीडिया का हित अपनी पूँजी के साथ है। अंग्रेजोत्तर भारत में पूँजीवादी मीडिया अपने हितों का विकास और सुरक्षा की अपार सम्भावना महसूस कर रहा था। इसीलिए वह राष्ट्र के लिए वैसे केन्द्रों की खोज कर रहा था जो राज्य के अंग्रेजों से मुक्त करा सकें। उसके लिए वह मन मिजाज तैयार कर रहा था। भूमंडलीकरण के दौर में वह नमक के साथ सरकार के पुराने व्यवहार के साथ और राष्ट्रवाद की भावना को वैसे एक नए रूप में विकसित करना चाहता है जोकि उसके हितों को पूर्ववत जारी रख वैश्विक में पूँजीवाद में उसका स्थान सुनिश्चित करा सके। आखिर भारतीय क्रिकेट मीडिया पर क्यों छाया रहता है? इसका जरा सा विश्लेषण करें तो ढेर सारी परतें खुलकर सामने आती हैं। नमक की जगह जिन्हें भारतीय राष्ट्र के आधार के रूप में तैयार किए जा रहा है उनमें एक क्रिकेट है तो दूसरा शेयर बाजार का सूचकांक। इनके निम्न वर्गीय विरोध के चरित्र को समझना और मीडिया के मध्यवर्गीय बाजार के विकास की बढ़ती सम्भावनाओं को एक साथ समझना जरूरी है। यह राष्ट्र के इन आधारों का एक बड़ा राजनीतिक पक्ष है।
मनोवैज्ञानिक तैयार करने की कई परिभाषाएँ हो सकती है। कहा जाता है कि मीडिया ओपेपिनयन मेकर यानी विचार बनाने का काम करता है। जाहिर सी बात है कि मीडिया अपने हितों के अनुरूप ही विचार बनाने और स्थापित करने की कोशिश करेगा। विचार बनाने और स्थापित करने की प्रक्रिया को मनोविज्ञान तैयार करना ही कहा जाएगा। व्यक्ति के तार्किक होने और किसी के प्रभाव में मनोविज्ञान के बनने के जो नतीजे होते हैं। तार्किकता अपने नतीजों पर ले जाकर छोड़ती है जबकि मनोविज्ञान ह्लोतों को नतीजों पर ले जाकर छोड़ता है। मनोविज्ञान के विभिन्न पहलू होते हैं। वह राजनीतिक भी होता है। वर्चस्ववादी संस्कृति का वाहक भी है। जैसे एक उदाहरण से इसका खुलासा किया जा सकता है। पाकिस्तानी जेल में बन्द सरबजीत को अन्तर्राष्ट्रीय जासूसी संस्थान रों का आदमी माना जाता है। पाकिस्तान की अदालत में उस बम विस्फोट के मामले में फाँसी की सजा सुनाई। भारतीय मीडिया ने सरबजीत की बाँदी के खिलाफ अभियान सा चलाया। मीडिया ने अपने इस अभियान को चलाने की स्वीकृति सरबजीत के मसले को राष्ट्रवाद से जोड़कर हासिल की। वह किसी भी देश में गैर कानूनी ढंग से किसी भी मनुष्य को बन्दी बनाने के विरोध के मूल्य के पक्ष में अभियान नहीं था। वह इस्लामिक देश पाकिस्तान में एक गैर मुस्लिम के बन्दी को राष्ट्रवाद का मुद्दा बनाया। जबकि इस देश में असम के सिल्पा गाँव के लालुंग जेल में अर्से से बन्द रहें। उन पर कोई दोष सिद्ध नहीं हुआ और वे 2006 तक जेल में ही पड़े रहे।
मीडिया का राष्ट्र उनका अपना बाजार है। उसके बाजार को सुरक्षित रखने वाला भूगोल ही उसका राष्ट्र है। इसके बाद उसके लिए राज्य के क्या मायने होते है। यह समझने की कोशिश की जा सकती है। नमक के जरिये ही हम इस पहलू को विस्तारित कर सकते हैं। दांडी मार्च के शुरू होने के बाद 1930 में 27 अप्रैल को वाइसराय ने 1910 के प्रेस एक्ट में कुछ संशोधन कर उसे अध्यादेश के रूप में फिर से जीवित कर दिया। तब महात्मा गांधी ने अपने नवजीवन प्रेस के व्यवस्थापक को कह दिया कि सरकार जमानत माँगे तो न दी जाए और प्रेस को जब्त होने दिया जाए। नवजीवन गया और उसके साथ-साथ नवजीवन प्रेस द्वारा प्रकाशित अन्य पत्र भी जाते रहे। देश के अधिकांश पत्रकारों ने जमानतें दाखिल कर दीं। भारतीय मीडिया के इतिहास में कई मौके पर यह देखा है कि अंग्रेजी से लेकर अंग्रेजोत्तर भारत में आपातकाल तक पूँजीवादी मीडिया घुटने टेकता रहा है।
भूमण्डलीकरण के दौर में भी वह राज्य के साथ ही खड़ा नहीं है। बल्कि राज्य को अपने हितों के अनुकूल ढालने की स्थिति में आ गया है। आधुनिकतम तकनीक का इस्तेमाल वह इसी रूप में कर रहा है। वह राज्य की लगभग उन सभी योजनाओं की वैधता सिद्ध करने पर जोर देता है जो कि बाजारवाद को बढ़ावा देते हैं। साम्राज्यवाद विरोधी राजनीतिक चेतना को खुद करने की कोशिश करता है। 21 अक्टूबर को भारत सरकार द्वारा आयोडीन नमक के पक्ष में जारी विज्ञापनों को इसके उदाहरण के रूप में देख सकते हैं। इस विज्ञापन पर उसका समर्थन उसके जन स्वास्थ्य का पक्षधर होना नहीं है। उसकी स्वास्थ्य नीति में अपने पूँजी का ही स्वास्थ्य है। टी.वी. चैनल हेपेटाइटीस ए का टीका जरूरी बता रहे थे। टेलीविजन चैनलों पर पट्टी में केवल सूचनाएँ दी जाती थीं। लेकिन आज तक ने एक नया प्रयोग शुरू किया। उसने विज्ञापन देना शुरू कर दिया और यह बिना बताए कि यह विज्ञापन है। अखिल भारतीय अर्युविज्ञान संस्थान (एम्स) में विभाग प्रमुख और लीवर के अध्ययन के लिए गठित भारतीय राष्ट्रीय संघ के अध्यक्ष डॉक्टर एस. के. आचार्या ने पट्टी पर यह सूचना देखकर आज तक को पत्र लिखा। उन्होंने बहुराष्ट्रीय दवा कम्पनी स्मिथ, क्लाईन एवं बीकैम द्वारा प्रयोजित इस सूचना की शक्ल में विज्ञापन पर आपत्ति प्रगट की। उन्होंने आज तक की हेपेटाइटीस ए के टीके की जरूरत की पेशकश पर ही प्रश्न चिद्द खड़ा किया। लोगों को मनोवैज्ञानिक रूप से भयभीत करने और अपना माल बेचने का एक सिलसिला-सा बड़ी-बड़ी कम्पनियों ने शुरू कर रखा है और उसमें मीडिया ही उसका हथियार है। जिस समय डिसपीरीन नामक दवा बन्द हो रही थी और उसकी जगह पर डिस्पीरीन प्लस बाजार में उतारा जा रहा था, उस समय हिन्दुस्तान टाइम्स ने बड़ी प्रमुखता से इस आशय की खबर प्रकाशित की थी। इस खबर में तब बताया गया था कि डिसपीरीन में एसपीरीन नामक रयासन होता है। जिससे पेट में रक्तह्लाव हो सकता है। और दमा ज्यादा बढ़ सकता है। हिन्दुस्तान टाइम्स के मुताबिक डिसपीरीन प्लस ज्यादा सुरक्षित है क्योंकि उसमें पारासीटामॉल होता है। लेकिन हिन्दुस्तान टाइम्स ने दवा कम्पनियों की सूचनाओं को अपने पाठकों के बीच एक सच के रूप में स्थापित किया। जबकि डिसपीरीन के बाद करने का वही सच नहीं है। सच यह भी है कि एसपीरीन की महत्ता इसके एण्टी प्लेटलेट गुण के कारण है जिसके कारण खून में थक्का नहीं जमता है। खून साफ रहता है। यहाँ तक कि हृदय आधात होने के तुरन्त बाद एसपीरीन की एक गोली खा ली जाए तो मृत्युदर में तेईस प्रतिशत की कमी हो जाती है। दरअसल एसपीरीन को अचानक खतरनाक रसायन बताने के कारण हैं। भारत सरकार के दवा नियंत्रण विभाग ने एसपीरीन को जीवन रक्षक की श्रेणी में रखते हुए उसके मूल्य को जब काफी कम कर दिया तो इससे दवा कम्पनी को करोड़ों का नुकसान होने लगा। तब उसने डिसपीरीन की जगह पर डिसपीरीन प्लस नाम की दवा को बाजार में उतार दिया। मीडिया ने डिसपीरीन प्लस के बाजार में उतारने की घटना को तो प्रकाशित किया लेकिन करोड़ों लोगों के अपने सच को निगल लिया। स्थिति ऐसी बनाई गई है कि यह कल्पना भी नहीं की जा सकती है कि दूसरे अखबार या माध्यम सच को सामने लाने की कोशिश भी करें। आयोडीन नमक के प्रचार के संबंध में भी जब डॉ. संतोष शर्मा ने जयपुर स्थित भारत सरकार के नमक आयुक्त को पत्र लिखा कि वे नमक को जिस पदार्थ के जरिए आयोडीनयुक्त करने का दावा अपने विज्ञापनों में कर रहे हैं वह तो विस्फोट के काम में आता है। उनके पत्र के बाद विज्ञापन में उस पदार्थ का नाम छपना बन्द हो गया। यह बात आयोडीन नमक के प्रचार के पक्ष में कई साल पहले शुरुआती दिनों के विज्ञापन की है।
सत्ता पर काबिज वर्ग और पूँजीवादी मीडिया एक-दूसरे के पूरक के रूप में सामने आए हैं। इन स्थितियों को इस तरह समझने की कोशिश की जा सकती है। सबरजीत के बहाने राष्ट्रवाद का एक रूप दिखाई देता तो है लेकिन यहाँ मीडिया बाजारवाद के विस्तार के लिए जनहित सा मुखौटा लगाता है। धार्मिक आस्थाओं को साम्प्रदायिकता के रूप में विकसित करता है क्योंकि साम्प्रदायिकता अपने अनुकूल राजनीतिक विचारधारा निर्मित करती है। साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलनों के बीच लोगों द्वारा हासिल किए गए तमाम बुनियादी अधिकारों का वह दो रूपों में इस्तेमाल करता है। वह लोगों द्वारा हासिल किए गए अभिव्यक्ति के अधिकार का इस्तेमाल कर खुद को राज्य का चौथा स्तंभ होने का दावा करता है लेकिन कामगारों के अधिकारों पर अंकुश लगाने का पक्षधर भी होता है। वह एक साथ साँवले राम को भी मुद्दे के रूप में जीवित रखता है और अपने उपभोक्ताओं के अन्दर गोरी चमड़ी का सौन्दर्यबोध भी पैदा करने में सफल होता है। दरअसल मीडिया आम लोगों के अधिकारों के जरिए पूँजी के विस्तार का माध्यम है।

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