बढ़ती उम्र का सामना
डॉ. चित्तरंजन एन्ड्राडे
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किशोरावस्था के अन्तिम तथा युवावस्था के आरंभिक वर्षों में बौद्धिक क्षमता अपने उच्चतम स्तर पर रहती है। इसके बाद इसमें लगातार गिरावट आती है, पर यह बात पचास या साठ की उम्र के बाद ही पता चलती है। बढ़ती उम्र के साथ हाल की घटनाओं की याददाश्त भी कम हो जाती है। संवेदनशील मनोवैज्ञानिक जाँचों से कॉग्निशन के अन्य क्षेत्रों में आई कमियों का पता भी चलता है।
पर जरूरी नहीं कि इस बौद्धिक गिरावट का अर्थ कार्यक्षमता में कमी ही हो। इसका एक कारण तो यह है कि पचास-साठ की उम्र तक यह गिरावट इतनी कम होती है कि अधिकांश व्यक्तिगत और व्यवसायिक गतिविधियों पर खास असर नहीं पड़ता है। दूसरा कारण यह है कि उम्र के साथ व्यक्ति कार्यक्षमता बढ़ाने वाले अनुभव विकसित कर लेता है जिनकी मदद से हल्की बौद्धिक गिरावट की भरपाई हो जाती है।
क्यों आती है गिरावट?
मस्तिष्क में तंत्रिका कोशिकाएँ धीरे-धीरे मरती रहती हैं। यह बुढ़ापे की सामान्य प्रक्रिया है। साठ वर्ष से ऊपर के लगभग 10 प्रतिशत व्यक्तियों में तंत्रिका कोशिकाओं की यह मृत्यु विभिन्न चिकित्सीय कारणों से काफी तेज हो जाती है, जिसे डीमेंशिया कहते हैं। अभी तक विज्ञान तंत्रिका कोशिकाओं की सामान्य या रोगजनित मृत्यु के कारणों को रोकने या कम करने में सफल नहीं हो पाया है।
शारीरिक सक्रियता
क्या इसका अर्थ यह कि हम मस्तिक के बुढ़ापे का सामना नहीं कर सकते ? नहीं। हाल के शोधों से पता चला है कि जीवन पद्धति में कुछ परिवर्तनों से बौद्धिक क्षमता में गिरावट को कम किया जा सकता है। कुछ ही वर्ष पहले यूनिवर्सिटी ऑॅफ इलिनॉय, यू. एस. ए. के क्रेमर तथा अन्य वैज्ञानिकों ने दर्शाया कि छह महीने तक हफ्ते में तीन दिन चालीस मिनट चलने के जैसे साधारण व्यायाम भी बौद्धिक गति तथा कई कम्यूटरीकृत कार्यों में क्षमता बढ़ाने में सहायक होते हैं। जिन्होंने सिर्फ शरीर तानने वाले व्यायाम किए उन्हें खास फायदा नहीं पहुँचा। कुछ हालिया अध्ययनों से यह दिलचस्प बात भी पता चली है कि महिलाएँ अपेक्षाकृत इन व्यायामों से अधिक लाभान्वित होती हैं। शारीरिक व्यायाम कैसे सहायक होते हैं ? इनसे रक्त संचार तेज होता है और मस्तिष्क को रक्त अधिक मिलता है। इससे बुरे कोलेस्ट्रॅाल कम होते हैं और शिराओं में सिकुड़न नहीं होती। अंततः इससे मस्तिष्क में स्वास्थ्यकर रसायनों का प्रवाह होता है।
मानसिक सक्रियता
यह देखा गया है कि जो व्यक्ति ज्यादा पढ़े-लिखे होते हैं उनके डीमेंशिया के शिकार होने की संभावना कम होती है। कई अध्ययनों ने दर्शाया है कि वयस्क उम्र में शारीरिक, मानसिक और सामाजिक गतिविधियों के स्तर से भी बाद के जीवन में बौद्धिक क्षमता को बनाए रखने में मदद मिलती है।
शिक्षा और मध्यवय की गतिविधियाँ कैसे सहायक होती हैं ?
पशुओं पर किए गए अध्ययन दर्शाते हैं कि सीखने वाली गतिविधियाँ मस्तिष्क में तंत्रिका कोशिकाओं कीद्यशाखाओं के विभाजन में प्रभावी होती हैं। अनुमान लगाया जाता है कि मानसिक सक्रियता मानव मस्तिष्क में तंत्रिक कोशिकाओं की शाखाएँ बढ़ाकर उनके बीच बेहतर संपर्क-संबंध स्थापित करने में मदद करती हैं। तंत्रिका कोशिकाओं का बेहतर संपर्क मरनेवाली कोशिकाओं से हुई क्षति की पूर्ति करता है। हाल के अध्ययन में अलजीमर्स डिज्रीज सेंटर, यू. एस. ए. के विल्सन और साथियों ने दर्शाया कि जो वृद्ध व्यक्ति स्वयं को मानसिक रूप से सक्रिय रखते हैं, उनकी याददाश्त धीमी होने तथा बौद्धिक क्षमता में गिरावट की संभावनाएँ कम होती हैं। इनकी डीमेंशिया से पीड़ित होने की संभावना भी कम होती है। मानसिक सक्रियता का अर्थ है अखबार, पुस्तकें, पत्रिकाएँ पढ़ना; ताश तथा चेकर्स जैसे खेल खेलना और क्रासवर्ड जैसी पहेलियाँ हल करना।
शोध : नीदरलैंड की रोटरडम स्टडी में शामिल 5395 लोगों से प्राप्त सूचनाओं का अध्ययन कर एंजेलहार्ट और साथियों ने पाया कि विटामिन सी और ई की अधिक खुराक़ अलज+ीमर्स बीमारी की संभावनाओं को कम करती है। अमेरिका और अन्य स्थानों पर किए गए शोधों से भी इसी प्रकार के निष्कर्ष निकले। दिलचस्प बात यह है कि ये लाभ खाने में लिए गए विटामिनों से हुए, गोलियों से लेने पर नहीं।
सलाह - आप अपनी मानसिक क्षमताओं को शारीरिक और मानसिक रूप से सक्रिय रहकर तथा स्वास्थ्यकर आहार लेकर बनाए रख सकते हैं। शारीरिक सक्रियता एरोबिक प्रकार की होनी चाहिए, चाहे वह भले ही हर रोज आधे घंटे चुस्ती से चलना ही क्यों न हो। मानसिक सक्रियताओं में मनोरंजक चीजें जैसे–पढ़ना, कलम-काग़ज के खेल, रुचियाँ विकसित करना शामिल हैं।
स्वास्थ्यकर आहार में हरी, पत्तेदार सब्जियों को पर्याप्त मात्रा में लेना जरूरी है।
अध्ययन जारी है : एसीटाइलकोलिन एक ऐसा रसायनिक पदार्थ है जो मस्तिष्क में याददाश्त तथा अन्य बौद्धिक प्रक्रियाओं में सहायक सिद्ध हुआ है। डीमेंशिया की हद तक न पहुँचने वाली भूलने की बीमारी में एसीटाइलकोलाइन को सुरक्षित रखने वाली दवाएँ किस हद तक सफल रही हैं–यह वर्तमान द्यशोधों का विषय है। वर्तमान शोध इलाज के अन्य कई तरीक़ों पर भी काम कर रहे हैं और सुनने में भले ही आश्चर्यजनक लगे, पर अलज+ीमर्स बीमारी के लिए टीके पर भी प्रयोग हो रहे हैं।
आधुनिक शोधों को गहरी दिलचस्पी के साथ नियमित पढ़नेवाले डॉ. चित्तरंजन एन्ड्राडे, निमहांस बंगलोर के साइकोफार्माकॉलॅजी विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष हैं। वे गंभीर शोधार्थी एवं कुशल वक्ता भी हैं।
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