बच्चों को कहाँ ले जा रहा है , मीडिया !
नरेन
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हलांकि प्रिट मीडिया हो चाहे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रायः हर किस्म का मीडिया वर्ग अपनी सामूहिक गतिविधियों के मद्देनजर लगभग पूरी तरह से मनी मिटिंग, वीभत्स बाजारू उत्पाद में तब्दील हो चुका है; लेकिन उसका पाखण्डी और आतंककारी दंभ उत्तरोत्तर परवान ही चढ़ता जा रहा है कि वह लोकतंत्र का सबसे जागरूक और दायित्वबोध से लैस चौथा स्तंभ है। वह अपने आपको एक नागरिक समाज का चौकन्ना पहरूआ मानता नहीं अघाता है। लेकिन वर्तमान समय में हमारे देश में मीडिया का जो क्रिया-कलाप है, जो चरित्र है उसे देख कर यह समझना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भूत भगाने वाले अभिमंत्रित सरसों में ही भूत छिपा हुआ है, कुयें ने ही अपने में भांग घोल रखी है।
आजादी के बाद जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का हमारे देश में पदार्पण हुआ था तब देश के नवनिर्माण में रुचि रखने वाले स्वप्नदर्शी नीति निर्धारकों ने परिकल्पना की थी कि टीवी जैसे दूर-दराज तक अपनी पहुंच बना पाने में सक्षम माध्यम की जो खूबियां हैं उनका सार्थक सदुपयोग करते हुये देश के कोने-कोने में शिक्षा का व्यापक प्रचार-प्रसार करने में सहूलियत होगी। लेकिन आज के उन्मुक्त आर्थिक उदारीकरण के निर्मम मुनाफाखोर बाजारवादी दौर में भारत जैसे कथित लोकतांत्रिक ÷पीपुल वेलफेयर कंट्री' का नीति निर्धारक चेहरा विद्रूपात्मक ढंग से विकसित हो कर रह गया है। आज के ÷इंडियन डेमोक्रेटिक सेटअप' में जहाँ एक लाख से अधिक अरबपति हैं उसी ÷लोकतांत्रिक भारत' में अच्छी-खासी संख्या में किसान आत्म-हत्या कर रहे हैं। इस ÷भारत' की लगभग आधी आबादी गरिमामय जिंदगी जीने की बात तो दूर जीने की बेहद आवश्यक और बुनियादी सुविधाओं से भी महरूम हैं। उस भद्दी सच्चाई को हमारे ÷इंडिया' ने ही पनाह दे रखी है कि यह विश्व के कई विकसित देशों की अपेक्षा चरम उपभोक्तावादी सामग्रियों के लिये अत्यंत संभावनाशील बाजार बन चुका है। विश्व के सभी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की निगाहें भारत के वृहद् बाजार पर टिकी हुई है। ऐसे ÷इंडिया' में मीडिया येन-केन-प्रकारेण अधिक से अधिक दलाली हासिल करने वाले लोलुप, आम जनविरोधी बनिया की भूमिका में अवतरित हो चुकी है।
भारतीय मीडिया ने एक स्वर में ÷सुख', ÷प्रतिष्ठा' और ÷समृद्वि' की इकलौती परिभाषा यह रचने की कोशिश की है कि जो आदमी उपभोक्तावादी सामग्रियों को जितना ज्यादा से ज्यादा हासिल करने की क्षमता रखता है वह उतना ही ÷सुखी' और सामाजिक रूप से ÷प्रतिष्ठित' है। इलेक्ट्रॉनिक चैनलों की बाढ़ और तमाम अखबारों तथा पत्र-पत्रिकाओं की गलाकाटू अर्थ लोलुप प्रतिस्पर्धा ने मानवीय सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को ठेंगें पर लेते हुये निर्ल्लज्ज तानाशाह की तरह स्वयं को बाजार के हित में दलाल बना डाला है। ÷विकसित हो रहे इंडिया' के भौतिकवादी उपभोक्तावादी ÷रैट रेस' में शेष भारत भले ही महज जीवित रहने की जद्दोजेहद में जुटा रहकर अपने प्राण हलकान कर रहा हो लेकिन दिग्गज आर्थिक विश्लेषकों का आकलन है कि इस वर्ष भारत का बाजार हर लिहाज से उत्सवमय है। इस साल दशहरा-दिवाली में लगभग 45 हजार करोड़ रूपये की खरीदारी की गई है अपने देश में। क्या आप अंदाजा लगाना चाहेंगे कि यह आंकड़ा कितना बड़ा है? यह राशि भारत के स्वास्थ्य विभाग के कुल बजट की लगभग तीन गुनी है! विकास से कटे ग्रामीण इलाकों में ग्रामीण स्वास्थ्य योजनाओं के लिये आवंटित राशि से यह दो गुना अधिक है और आश्चर्यचकित मत हों - 10 अरब डालर से अधिक की यह राशि नेपाल, मॉरिशस, अफगानिस्तान और यहां तक की बहरीन आदि देशों के सकल घरेलू उत्पाद से भी अधिक बैठती है। इतने विशाल बाजार में उपभोक्तावादी उत्पादों के खपाये जाने की अनंत संभावनाएं बनती हैं और हमारा मीडिया उपभोक्तावादी उत्पाद तैयार करने वाले बहुराष्ट्रीय कंपनियों को हाथ धोकर ÷वन टू का फोर' कराने में एक मंजे कमीशनखोर की तरह गंजों को कंघी बिकवाने के दक्ष कर्म में लिप्त है।
हम चाहें या न चाहें, सूचनाओं के महाविस्फोट के इस दौर में हमारा समाज चौंधियाया हुआ है और हमारे सुकुमार बच्चों की मानसिकता पर इसका क्या प्रभाव/दुष्प्रभाव पड़ रहा है इसके प्रति संवेदनशील रहना हर अभिभावक का दायित्व बनता है। यह चिंतनीय विषय है कि आम भारतीय अभिभावक इस बात को कोई खास तरजीह नहीं देते हैं कि अपने वर्तमान चरित्र के साथ मीडिया उनके बच्चों पर क्या प्रभाव छोड़ रहा है। इलेक्ट्रॉनिक चैनलों की बात करें तो वहाँ नैतिकता मूलक ऐसा कोई वर्गीकृत प्रतिबंध ही परिलक्षित नहीं होता है कि कौन सी प्रस्तुति वयस्कों के लिए है और कौन सी प्रस्तुति में यह ख्याल रखा गया है कि उससे बाल मन पर क्या प्रभाव पड़ेगा। टीवी कार्यक्रम और विज्ञापन कच्चे सेक्सी मसालों, हिंसा और मार-धाड़ तथा फंदेबाजी भरे मुआमलों से भरे पड़े हैं। तय जानें कि आज हमारे बच्चे समय से काफी पहले उन ढेर सारी अनुभूतियों से मीडिया की ÷कृपा' से गुजर कर ÷प्री मैच्चयोर' हो जाते हैं जो उनके सुकुमार मन के लिये सेहतमंद नहीं है। आपको सजग रहना होगा कि जिस प्रकार आप अपने बच्चों की सेहत की बेहतरी के लिये यह तय करते हैं कि क्या खाना उनके लिये मुफीद रहेगा और क्या न खाना उनकी सेहत के लिये हितकर होगा उसी प्रकार आपको संवेदनशील ढंग से अनुशासनात्मक अंदाज में यह तय करने की भी जरूरत है कि आपके बच्चों की मानसिक सेहत के लिये किस प्रकार की मीडिया खुराक मुफीद होगी।
आपका बच्चा नाना प्रकार के छद्म अंदाज में टीवी पर यह देखता है कि सिगरेट और शराब पीना मर्दों को ÷माचो मैन' बनाता है, लेकिन उन विज्ञापनों के जरिये उन्हें यह नहीं समझाया जाता है कि इन नशीले पदार्थों के सेवन के खतरे क्या हैं। उन्हें पोषक तत्वहीन शीतल पेय पदार्थों को ग्रहण करने के लिये पे्ररित किया जाता है। उन्हें मेदबहुल पिज्जा-बर्गर का लुत्फ उठाने के लिये उसकाया जाता है जो उन्हें खाने में भले ही खूब लज्जतदार लगे, लेकिन उसकी पौष्टिकता के प्रति कदापि आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता है। भारतीय जनमानस के लिये ÷आइकन' बन गये अमिताभ बच्चन और सचिन तेंदुलकर टीवी पर अभिभावकों से पोलियो वैक्सिन की खुराक पिलाने के लिये गुजारिश करते नजर आते हैं, वहीं दूसरी तरफ वे शान से हानिकारक शीतल पेयों की शान में कशीदे काढ़ते हुए भी नजर आते हैं। हमारे बच्चे कन्फ्युज हो जा सकते हैं - यह समझते हुए कि उनका ÷हीरो' जितनी शिद्दत से बच्चों को पोलियो से बचाने के मुहिम में सक्रिय भूमिका निभाता नजर आता है उतनी ही शिद्दत से कोला पीने के लिये भी पे्ररित करता है - दोनों समान रूप से लोकहित की बात है!
मीडिया जिस अंदाज में हमारे बच्चों के सामने हिंसा परोस रही है, उसके मद्देनजर उनमें यह मनोभाव विकसित होता चला जाता है किसी परिस्थिति से निबटने के लिये आत्म-विवेक और आत्म नियंत्रण जरूरी नहीं है, जरूरी है उग्र रूप से स्थितियों पर काबू पाने के लिये हिंसक हो जाना। इस प्रवृत्ति के परवान चढ़ते चले जाने से कल के नागरिक ये बच्चे भविष्य में वास्तविक हिंसा को अनायास ही ग्रहण करने की मनोवृत्ति का शिकार हो जाएंगे और दूसरों के प्रति अनुदारता उनकी सहजता प्रवृत्ति बन जाएगी। हमारे बच्चे हैरी पॉटर या शक्तिमान की फंतासी भरी दुनिया के प्रति खूब आकर्षित होते हैं। उस दुनिया के प्रति कोई ÷रैशनल सोच' विकसित कर पाने के काबिल नहीं होती उनकी बौद्विकता। और स्थिति तब खासी खतरनाक हो जाती है जब फंतासी की दुनिया का असर उनके जेहन पर हावी हो जाता है। हमने कई दर्दनाक खबरें पढ़ी हैं कि शक्तिमान की अद्वितीय शक्ति से आसेबज+दा होकर कई बच्चों ने ऊंची ईमारतों से छलांग लगाकर उड़ने की कोशिश की और मौत के मुंह में समा गये!
हम प्रायः अपने घरों में पाते हैं कि हमारे बच्चे अपने मत मुताबिक घंटों टीवी खोल कर सोफे पर पसरे रहते हैं। ऐसे बच्चों को ही ÷काउच पोटैटो' कहा जा सकता है। अमेरिका में हाल ही में हुए एक शोध से पता चला है कि जो बच्चे दो से चार घंटों के लिए अपनी टीवी से चिपके रहते हैं उन्हें हाईपरटेंशन हो जाने की संभावना ढ़ाई गुना बढ़ जाती है, जिसके कारण भविष्य में उन्हें दिल की बीमारी और स्ट्रोक हो सकता है। चाईल्ड हेल्थ क्लीनिक कैलिफोर्निया ने 4 से 17 वर्ष के 546 बच्चों को उनके मोटापे के कारण इस शोध कार्य को संपन्न किया था और पाया था कि 2 घंटों से अधिक टीवी देखने वाले बच्चे न सिर्फ शारीरिक रूप से आलसी हो जाते हैं, बल्कि हाई फैट और जंक फूड की हिमायत करने वाले विज्ञापनों के मोहजाल में फंस कर अपने स्वास्थ्य को बिगाड़ लेते हैं।
आज के अभिभावकों को यह स्वीकारना शायद अच्छा न लगे कि आज के शहरी टीन एजर्स एक से ज्यादा सेक्स संबंध बना रहे हैं। अभी हाल ही में पॉश माने जाने वाले साउथ दिल्ली में 2 कॉलेजों और 3 स्कूलों के 550 विद्यार्थियों के बीच एक सरकारी एजेंसी ÷दी डिपार्टमेंट ऑफ कम्युनिटी मेडिसिन' ने जो सर्वेक्षण किया था उसके परिणाम आम भारतीय माता-पिताओं को चौंका देने के लिए काफी है। सर्वे में पाया गया कि 10 में से एक बालिका अपना कौमार्य खो चुकी है और 10 में से 4 लड़कों ने 13 साल की उम्र में पहली बारी यौन संबंध बना लिया था। सबसे चौंकाने वाली बात यह पाई गई कि उनमें से 50 फीसदी टीन एजरों ने यह बताया कि वह एक से ज्यादा लोगों के साथ यौन संबंध बना चुके हैं और उनमें से अधिकांश लोगों ने सेक्स संबंध बनाते हुए कोई सुरक्षात्मक सावधानी नहीं बरती थी! एचआईव्ही/एड्स जब हमारे देश में लगभग एक महामारी की शक्ल अख्तियार कर चुका है वैसे हालात में जरा इस बात की कल्पना तो करें कि ये बच्चे यदि असुरक्षित तरीके से उन्मुक्त यौन संबंध कायम करने के अभ्यस्त होते चले जा रहे हैं तो वे किस भयानक खतरे के मुंह में अनायास ही समा जाने की प्रक्रिया में संलग्न हैं। हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से जारी किये गए एक रपट में यह चिंता व्यक्त की गई है कि कम उम्र में होने वाली ज्यादातर मौतों का कारण कम उम्र में सेक्स संबंध कायम करना, स्मोकिंग और हिंसा है।
सूचना क्रांति ने हमें एक और नायाब तोहफा दिया है - इंटरनेट! इसने समूची दुनिया को आपके घर की मेज पर ला छोड़ा है। बस आप माउस क्लिक करिये और समूची दुनिया का ज्ञान आपके मॉनिटर की स्क्रीन पर झिलमिलाने लगता है। इंटरनेट बड़े काम की चीज है लेकिन देखा जा रहा है कि लोगों को, खास कर बच्चों और किशोरों को इसकी भयानक लत लग जाती है। बगैर नेट पर गये इन्हें बेचैनी होने लगती है। यह ÷इंटरनेट एडिक्शन डिसआर्डर' है। तेल अबीब युनिवर्सिटी के सेकुलर फैकल्टी और मेडिसन विभाग के मनोवैज्ञानिक डॉ. पिन्हास डेनन इस बीमारी को अन्य खतरनाक बीमारियों जैसे जुआ खेलना, सेक्स की लत और चोरी करने की आदतों सा बताकर लोगों को इससे दूर रहने की सलाह देते हैं। डॉ. डेनन ने कहा है कि ÷इंटरनेट एडिक्शन डिसआर्डर' भी ÷आब्सेसिव कम्पल्सिव डिसआर्डर' के समान ही एक मनोवैज्ञनिक समस्या है, जिसके कारण व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य में ऐसी कठिन परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं जिसके चलते वह किसी काम के विचार और व्यवहार में खोया रहता है। डॉ. डेनन मानते हैं कि इंटरनेट की लत स्पष्ट रूप से एक उसकावे या उत्तेजना की अवस्था नहीं है बल्कि यह उससे भी बढ़कर है। यह लत एक गहरी और अपूर्ण इच्छा है। यदि हम इंटरनेट के प्रति वर्तमान नजरिये में बदलाव नहीं लाते हैं तो समुचित तरीके से इसका इलाज करने में मुश्किल होगी।
इन तमाम परिस्थितियों के आलोक में अभिभावकों के लिये यही श्रेयस्कर होगा कि वे अपने घरों में बच्चों को अत्यंत सजगता से मीडिया शिक्षण दें। सबसे अधिक यह आवश्यक है कि बच्चों के लिए कुल मीडिया स्क्रीनिंग की समय सीमा तय कर दें। इसी तयशुदा समय सीमा के भीतर वे टीवी के कार्यक्रम देखेंगे, वीडियो-सीडी कार्यक्रम देखेंगे, गेम खेलेंगे, कम्प्युटर गेम खेलेंगे तथा इंटरनेट सफिर्ंग करेंगे। इसके लिए आप एक टाइमर का इस्तेमाल कर सकते हैं। जैसे ही टाईमर इंगित करे आपके बच्चे का मीडिया टाइम खतम। इस प्रक्रिया में कोई अपवाद नहीं होना चाहिये। अमेरिकी पेडियाट्रिक्स एकेडेमी ने अनुशंसा की है कि बड़े बच्चों के लिए बढ़िया स्तर का टीवी या वीडियो कार्यक्रम दर्शन के लिए एक से दो घंटा काफी है। और 2 साल से कम उम्र के बच्चों को कोई कार्यक्रम दिखाया ही नहीं जाना चाहिए। आप अपने बच्चों को सुगम लेकिन स्पष्ट लहजे में बतायें कि आप क्यों उन्हें कोई खास कार्यक्रम ही देखने पर बल देते हैं। अपने बच्चों के बेडरूम से टीवी सेट, वीसीआर, वीडियागेम और कम्प्यूटर आदि को बाहर रखें। इन उपकरणों को आप ऐसी जगह रखें जहां आप स्वयं उनके साथ कार्यक्रम देखने में शामिल हो सकें। यदि आप अपने किशोर बच्चों को यह इजाजत देते हैं कि वे टीवी या मनपसंद पत्र-पत्रिकाएं अपने कमरों में ले जाकर रखें तब आप इस बात पर अवश्य निगाह रखें कि वे क्या देख या पढ़ रहे हैं। अगर आपके पास इंटरनेट एक्सेस है, तब आप गाहे-बगाहे यह अवश्य मॉनिटर करें कि वे क्या सर्फ करते हैं, जब वे ऑन लाईन रहते हैं। ऑन लाईन जाने वाले बच्चों की सुरक्षा की जानी बेहद आवश्यक है। उन्होंने एक गलत ÷क्लिक' किया और वे यौन शोषण, हिंसा, और बहलाने-फुसलाने वाले लोगों के चंगुल में फंस जा सकते हैं। ऐसे अनगिनत उदाहरण पाये गये हैं कि किस प्रकार महिलायें और खास कर के किशोरियां शातिर लोगों के चंगुल में फंस कर हलकान हुई हैं और कुछ का यौन शोषण हुआ है तथा कुछ जान से हाथ धो बैठी हैं।
जब बच्चे ऑन लाईन जा रहे हों, तो उन्हें सावधान करें कि वे कभी भी लोगों को अपनी व्यक्तिगत जानकारियां न दें। वे किसी को अपना नाम, फोन नम्बर, स्कूल और घर का पता न दें। अपने माता-पिता और घर के लोगों के बारे में कोई जानकारी न दें। अगर आपका बच्चा पढ़ाई में अच्छा नहीं कर रहा हो, दूसरे बच्चों के साथ हिंसक व्यवहार करने लगा हो, बड़ों के साथ बददिमाग लहजे में बातें करें, रात को दुःस्वप्न देखे, ढेर सारा जंक फुड जैसा अस्वस्थकर खाना खाने में लगा रहे, सिगरेट, शराब या ड्रग आदि लेने लग जाये तब इस संदर्भ में आप अपने बच्चों के चिकित्सक को अवश्य अवगत करायें। संभवतः आपके बच्चे का डॉक्टर आपके बच्चे के मीडिया हिस्ट्री को जानना चाहें।
एक जागरूक नागरिक और सजग अभिभावक के रूप में आपका यह दायित्व निर्वहन अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि मीडिया द्वारा परोसी जा रही कोई सामग्री आपको नागवर लगे, तो उसके बारे में आप संबद्व पत्र-पत्रिका या चैनेल के अधिकारियों को अवश्य लिखें। उन उपभोक्ता सामग्रियों के उत्पादकों को भी आप फोन, ई-मेल या पत्र द्वारा अपनी राय अवश्य जता दें कि आपको क्या अच्छा और क्या खराब लगा। आपका एक प्रतिवादी पत्र या ई-मेल सारी स्थितियों को सकारात्मक रुख प्रदान कर सकने में सक्षम साबित हो सकता है।
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