ऑथेलो : प्रेम में स्वत्व बोध
अनामिका
|
एक ओर तो प्रेम अहंकार का विसर्जन है–÷जित देखौं तित लाल' के धरातल का आत्म-विस्तार, जहां एक के बहाने सारी दुनिया अच्छी-अच्छी लगने लगती है, और किसी की खातिर कुछ भी कर देने को बेचैन रहता है आदमी, पर प्रेम की इस परम अवस्था के पहले की कुछ विकट व्यवस्थाएं भी हैं। अलग-अलग क्लासिक अलग-अलग ढंग से जिस पर प्रकाश डालते हैं। अविश्वास, आत्मपीड़न, प्रिय को बॉक्सिंग बैग समझकर दुनिया के सारे जहद्दमों का बदला उससे ही ले लेने की, सारा गुस्सा उसी पर निकाल लेने की वृत्ति और दुरूह स्वत्वबोध प्रेम से जुड़ी ऐसी स्वाभाविक विकृतियां हैं जिनके आलोक में ऑस्कर वाइल्ड की इस पंक्ति का मर्म आसानी से समझा जा सकता है–÷ईच मैन किल्स द थिंग ही लव्स।'
आए दिन अखबार विवरण देते हैं कि प्रेम में ÷संदेह' हत्या और आत्महत्या की कगार पर आदमी को ले गया! एक ही कण के असमंजन से अमृत जहर हो गया। इस प्रसंग के इर्द-गिर्द बुना गया शेक्सपियर का ÷ऑथेलो' एक माइक्रो-फॉर्म में सामने रखने की कोशिश करती हूं। जिसका एक थीम ÷होने' और ÷दीखने' का फर्क रेखांकित करना भी हैं और जिसका केंद्रीय पंक्ति है–÷मेन शुड बी वॉट दे सीम'। ईर्ष्या और विश्वास का महाद्वंद्व है यह नाटक। ईर्ष्या का मंचन इओगो करता हैबाद में ऑथेलो भी और निश्छल विश्वास का मंचन करती है डिस्डिमोना जिसके बारे में उसके पिता का कहना है–÷बहू इतनी शांत और सदाशय है कि उसका कोई स्पंदन खुद पर ही शरमाकर कर लेता है गाल लाल।'
अंक-1
इआगो बड़ी जलन है इस ज्वाला में, जलना कोई खेल नहीं है। ये कैसिओ–इसकी ऐसी पदोन्नति, सिर्फ इसलिए कि बड़े घर का है ये! ये तो नहीं चलने दूंगा/बर्बाद कर दूंगा एक-एक को, दाल किसी की नहीं गलने दूंगा। कुछ ऐसा मनहर है इस कैसिओ के दैनंदिन जीवन में जो मुझको कर देता है बहुत असुंदर। और इस ऑथेलो को देखो–उच्चाशय और वीर कहलाता है, पर देखी है जात, देखा है थोबड़ा–बस में कर रखा हैं डेस्डिमोना को : जादू-टोने का ऐसा छलबल!
देखता हूं मैं कि कब तक रह पाता है/ बंदर के हाथ में नारियल/ लुत्ती लगा आता हूं उसके बाप के हृदय में/ कर आता हूं चुगली/ कि आपकी बेटी पगली/ जंगली घोड़े के संग सोने की सारी/तैयारियां कर चुकी है/ और ड्यूक वेनिस के/ साइप्रस का प्रधान बनकर इठलाए बनुमानुष ऑथेलो से/ रचा रहे हैं उसका ब्याह/ आह-दिल की
लगी...। रेडेरिगो को भी अभी चढ़ाता हूं मैं देखो कैसे झाड़ पर चने की/ कहता हूं कि आस छोड़ने की कोई जरूरत नहीं/ डेस्डिमोना की यह पुतुलशादी/ चार दिन से ज्यादा नहीं टिकने वाली/ उसको ही करता हूं सेट साइप्रस में/ ऑथेलो के नए सेनापति कैसिओ के खिलाफ/ मैं असल बाप का नहीं जो इन सब को करवाया नहीं बाप-बाप। एक बार कहने की देरी है कि कैसिओ प्रेम करता है डेस्डिमोना से/ और ये लठ्ठ लेकर पीछे पड़ जाएगा उसके!
अंक दो
इआगो : कैसिओ, यार बुरी बीती तुम पर! हां, तुमने मना तो किया था/कहा था कि ज्यादा तुमको पिलाऊं नहीं/जल्दी चढ़ जाता है तुमको/पर इसकी तो मैंने कल्पना नहीं की थी/कि पीकर तुम ऐसे लड़ लोगे रोडेरिगो से/ऐन ऑथेलो के विवाहोत्सव पर/और मदोन्मत वह ऑथेलो/सीधा कर देगा तुमको डिसमिस। अब भाई एक ही उपाय है/ऑथेलो की वापस आने का/डेस्डिमोना से करवाओ तुम, बाबू की पैवी!
(स्वगत) इसी डेस्डिमोना की भलमनसाहत का मैं/खोदूंगा ऐसा गढ़ा/उसकी ही उच्चाशयता से/जाल बुनूंगा, ऐसा/जो सबको औंधे मुंह देगा गिरा!
अंक-तीन
इआगो : सर, वैसे तो आप क्या खूब चला रहे हैं अपना प्रशासन/घर का भी रखिए मगर ध्यान/वेनिस की औरतें होती हैं जहरा मनचली/मैं मैडम के खिलाफ कुछ भी नहीं कहना चाहता/लेकिन ये सोचिए ज+रा–जो बूढ़े बाप की आंखों में धूल झोंककर घर से भागी है/पति की आंखों में वह धूल नहीं झोंकेगी–इसकी क्या गारंटी है? काफी संकोच हो रहा है यह कहते/पर आपका हूं मैं ऐसा हितैषी/कि छुपाएं भी नहीं बनती बात/मैडम को आपने दिया था क्या कोई रूमाल? यह कैसिओ/और आंहें भर रहा था...।
ऑथेलो-डेस्डिमोना, तुम्हें एक रूमाल दिया था, जरा देना, कहां है वह?
डेस्डिमोना–इस वक्त क्या करेंगे रूमाल लेकर...!
सुनिए न : कैसिओ के साथ क्या आपने ज्यादा सख्ती नहीं की?!/वापस रख लीजिए, उसे प्लीज/कितना भला है वह! आसानी से माफ की जा सकती है किसी भले आदमी की पहली गलती।
अंक-चार
इआगो (स्वगत) : अब सिर्फ एक ही चक्कर चलाना है मुझको। बिआनका बाई की बातों में कैसिओ को उलझा देना है और जब वह उसकी रंगीनियों की चर्चा में मगन हो–ऑथेलो को सुना देनी है दरवाजे के पीछे से चर्चा और जगा देना है भ्रम उसके मन में कि ये बातें डेस्डिमोना के बारे में हो रही है। इंतजाम करना है कि उसी वक्त बियानका बाई भी रूमाल लेकर आ जाए और ये बताए कि यह दिया था कैसिओ ने इसी तरह का एक दूसरा रूमाल काढ़ देने की खातिर!
ऑथेलो : इतना बड़ा धोखा!/ जहरीली अमरबेल-सूरतहराम लता/खुशबू से ऐसी लहालोट/कि इंद्रियां सारी बेचैनी में करवट बदलें। पास तेरे आते ही/अच्छा होता जो तू जनमती-पनपती नहीं जंगली पौध।
इतने में वेनिस से आता है आदेश कि ऑथेलो अपना प्रशासन कैसिओ के हाथ सौंपे/और छुट्टी लेकर आ जाए वापस/जहरीली-सी उजबुजाहट में पौरुष की ऑथेलो ने सबके सामने/डेस्डिमोना जैसी लड़की पर थर्राता हाथ उठाया और कहा उसे–वेश्या!)
अंक-पांच
इआगो ने अब भड़काया रोडेरिगो को/कि कैसिओ पर करे वह पहार, मारपीट में दोनों घायल हुए जब/और उसे ये लगा - भेद उसका खोल देगा रोडेरिगो/इआगो ने कर दिया काम उसका तमाम!)
डेस्डिमोना के शयनकक्ष में
ऑथेलो : बत्तियां बुझा दो, बुझा दो, बुझा/घोंट दूं गला/सारी मुरादों का।
एमिलिया : ये आपने, साहब, क्या कर दिया?/डेस्डिमोना का गला घोंट डाला?/सारा यह चक्कर चलाया हुआ मेरे पति का था। अनजान मैं इतना सोच भी नहीं पाई कि उसके भेजे में क्या पक रहा है/भोलेपन में मैंने यह रूमाल उसको दिखाया/कि मेमसाहब का है/गिर गया था/और उसने वह उड़ा ही लिया। शर्मिंदा हूं, साहब, कहां मुंह दिखाने लायक इस दगाबाज ने/मुझको नहीं छोड़ा/इस भंडाफोड़ के लिए अब वह मेरी जान भी लेगा/अच्छा है, ऐसी जहालत की जिंदगी से मौत अच्छी)
ऑथेलो, इआगो की हत्या और अपनी इस आत्महत्या से भी/पूरा नहीं होने का/मेरा प्रायश्चित/पर चाहता हूं ऐ वेनिस के लोगों कि मुझको याद करो तो ऐसे करना–÷न कम करके आंकना मेरा अपराध, न ज्यादती करना, कहना कि ये एक ऐसा बंदा था जिसे प्यार करने का कोई शऊर नहीं था, पर प्यार इसने किया था बहुत टूटकर।'
... |