इस अंक में
मन माने की बात बातचीत
माइंड योर लैंग्वेज यानी जुबान सँभाल के
डॉ विनय कुमार
शब्दों के अर्थ शुरुआती अर्थों तक ही सीमित नहीं रहते। सभ्यता की विकास-यात्र में समय-समय पर नए अर्थ जुड़ते जाते हैं। यह आवश्यक नहीं कि नए अर्थों की आमद सकारात्मक ही हो।
दुख को बेहतर समझती है मनोचिकित्सा...
डॉ. नरेन्द्रनाथ विग से डॉ. विनय कुमार की बातचीत
जीवन और ज्ञान की विविधताओं के गहरे अध्येता डॉ. एन.एन.विग भारतीय मनोचिकित्सा जगत की उज्ज्वलतम उपस्थितियों में से एक हैं।
 
मन माने की बात डायरी
रचनाकार की पूंजी होती है बचपन की ...
डॉ. नरेन्द्रनाथ विग से डॉ. विनय कुमार की बातचीत
अपनी कविताओं में मनुष्य और उसके जीवन के प्रति समाहित होनेवाले कथ्य को आप किस रूप में देखते हैं ? पानी में घिरे हुए लोग शीर्षक कविता की रचना प्रक्रिया के बारे में बताएं।
....फ्रायड ग़ायब और इन्द्र मुस्कुरा रहा था
लीलाधर मंडलोई
हिन्दी कविता के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर और दूरदर्शन के महानिदेशक लीलाधर मंडलोई कविता के अतिरिक्त गद्य लेखन के लिए भी जाने जाते हैं। वर्षों से वे अपनी मनःस्थितियां डायरी में दर्ज करते रहे हैं।
 
मनोचिकित्सक की कलम से मनोचिकित्सक की कलम से
हिस्टीरिया की कहानी : डॉ. प्रमोद कुमार सिंह
सचमुच यह अब एक कहानी मात्र ही रह गयी है, क्योंकि विशेषज्ञों ने इस शब्द का प्रयोग बन्द कर दिया है। किन्तु इस शब्द की प्रासंगिकता अभी बनी हुई है, क्योंकि जनमानस में यह शब्द अभी पूर्ण जीवंत रूप में कायम है। इसकी प्रासंगिकता इसलिए भी बनी हुई है क्योंकि जिन मनोशारीरिक दशाओं के लिए इसका प्रयोग किया जाता था, वे अभी भी लगभग उसी रूप में,
मनोरोगियों के परिवारों की चुनौतियां :
जे.के. त्रिवेदी/श्याम बिहारी राय/मोहन ध्यानी

मानसिक रोगों से कोई व्यक्ति, समाज अथवा देश प्रतिरक्षित नही है। इन रोगों का व्यक्ति के ऊपर गंभीर मनोवैज्ञानिक,सामाजिक व
 
मनोचिकित्सक की कलम से मनोचिकित्सक की कलम से
बढ़ती उम्र का सामना : डॉ. चित्तरंजन एन्ड्राडे
किशोरावस्था के अन्तिम तथा युवावस्था के आरंभिक वर्षों में बौद्धिक क्षमता अपने उच्चतम स्तर पर रहती है। इसके बाद इसमें लगातार गिरावट आती है, पर यह बात पचास या साठ की उम्र के बाद ही पता चलती है। बढ़ती उम्र के साथ हाल की घटनाओं की याददाश्त भी कम हो जाती है।
मनोरोगियों को बेड़ियाँ क्यों नेहा सईद सईद अख्तर
इस सभ्य समाज में भी मनोरोगियों के साथ परिवार, समाज और कभी-कभी तो विभिन्न चिकित्सा प्रणालियों के माननीय दिग्गजों के द्वारा जो व्यवहार होता है, वह बड़ा ही दिल दहलाने वाला होता है। रोगियों को आज भी हथकड़ियों से जकड़ कर रखा जाता है, रस्सियों से उनके हाथ पैर बाँध दिए जाते हैं , कमर में रस्सी बाँध कर जानवरों की तरह खींचा जाता है।
 
नोटिस बोर्ड नोटिस बोर्ड
पागलपन नहीं सायकोसिस
एक शब्द है पागल'। इस शब्द का हमारे जीवन में बड़ा महत्त्व है। दुनिया में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं जिसे कभी पागल न कहा गया हो। कोई भी मां बच्चे की ऊल-जुलूल, लेकिन मासूम हरकत पर कहती है, धत पागल और बच्चे की छोटी-सी गलती पर बड़ा दंड देने पर उतारू पिता को कहती है, पागल हो गए हैं क्या?
प्रसवोत्तर अवसाद
पुराण बताते हैं कि एक बार समुद्र का मंथन हुआ था और उससे चौदह रत्न निकले थे। यह भी बताते हैं कि किस रत्न को किस देवता अथवा किस असुर ने ग्रहण किया था, किंतु यह नहीं बताते कि मथे जाने और रत्नदान के बाद समुद्र ने क्या महसूस किया। समुद्र को ठीक वैसा ही लगा होगा जैसा फसल दे चुकने
 
नोटिस बोर्ड नोटिस बोर्ड

अटेंशन डेफिसिट हायपरएक्विविटी डिसॉर्डर
अभिभावक के रूप में आप अपने बच्चे का जीवन गढ़ने में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसी संभावना हो सकती है कि आपका बच्चा अटेंशन डेफिसिट हायपरएक्विविटी डिसॉर्डर (ए डी एच डी) का शिकार हो। आएं जानें कि–

ए डी एच डी क्या है ?

मनोरोग के लक्षण
¨ नींद में कमी , भूख में कमी , क्रोध आना , तोड़-फोड़ , मार-पीट , बेवजह डर , शक , बहुत कम या बहुत अधिक बात करना , अकेले बैठकर बुदबुदाना या मुस्कुराना , डायन या भूत का डर , कोई कहीं नहीं बोले तब भी आवाज सुनना , पत्नी को पति के अथवा पति को पत्नी के चरित्र पर बेवजह शक , गांजा , भांग , शराब , स्मैक आदि की लत।
 
बाल मन बाल मन
शिक्षा की अनोखी अवधारणा : मॉन्टेसरी स्कूल : मीनू मंजरी
रंग.विवरंगी मेज'कुर्सिया, खिलौनों से भरी अलमारी, समूहों में बैठे अपने काम में र्मग्‍न बच्‍चे यह द़श्‍य पारंपारकि पाछशाला से काफी भिन्‍न है ा पर दुनिया भर से मॅान्‍टेसरी स्‍कूलों की सफलता ने शिक्षा की इस अवधारणा को मान्‍य बनाया हैा
बच्चों को कहां ले जा रहा है मीडिया : नरेन
हलांकि प्रिट मीडिया हो चाहे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रायः हर किस्म का मीडिया वर्ग अपनी सामूहिक गतिविधियों के मद्देनजर लगभग पूरी तरह से मनी मिटिंग, वीभत्स बाजारू उत्पाद में तब्दील हो चुका है; लेकिन उसका पाखण्डी और आतंककारी दंभ उत्तरोत्तर परवान ही चढ़ता जा रहा है कि वह
 
निष्कलंक निष्कलंक
बु्रक शील्ड्स : विनोद अनुपम
14 मई 2007, दिन के दो बजे थे। सैनडिएगो(कैलिफोर्निया) के कन्वेंशन सेंटर में अमेरिका की प्रसिद्ध मनोचिकित्सक नैन्सी ऐन्ड्रियासन को सुनने के लिए हॉल में लगभग 500 मनोचिकित्सक बैठे थे। भाषण शुरू होने में कुछ विलम्ब था। मेरी सीट की दाहिनी तरफ बैठे सज्जन ने बायीं तरफ बैठे सज्जन से पूछा -
गोरख पांडेय! यादों के आईने में चमन लाल
किसी भी कवि के लिए सबसे बड़ी चुनौती है–गंभीर अर्थों से भरे लोकगीत लिखना। हक की लड़ाई लड़नेवालों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलनेवाले गोरख पांडेय ने यह कठिन काम तो आसानी से किया, मगर पारानॉयड स्किजोफ्रेनिया की मुश्किलों से पार नहीं पा सके। उन्होंने आत्महत्या कर ली।
 
क्रूरता की शिनाख्त क्रूरता की शिनाख्त
रैगिंग को सामाजिक वर्ग ढांचे में देखें : स्वतंत्र मिश्र
उच्च संस्थानों में रैगिंग एक आम समस्या बन गयी है। हाल ही में भारत के एक प्रतिष्ठित कॉलेज सेंट स्टीफेंस में कुछ सीनियर छात्रों द्वारा एक जूनियर छात्र को प्रताड़ित करने का मामला सामने आया है। इस घटना में सीनियर लड़कों ने अपने एक जूनियर के र डियोडरेंड खूशबू उत्पन्न करने वाला इत्र जैसा कुछ स्प्रेे छिड़कर उसको आग लगा दिया गया।
खुद की खबर पर खामोश मीडिया :
वर्तिका नन्दा सहाय
दो साल पहले दिल्ली पब्लिक स्कूल के दो छात्रों का जो अश्लील एमएमएस बना, वह बे्रकिंग न्यूज थी, देश भर ने वो तस्वीरें देखीं और जनता नैतिकता पर मीडिया की चिल्लाहट की गवाह बनी, लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि
 
 
इस अंक की दवा
लिथियम कार्बोनेट
   
बाल मन

शिक्षा की अनोखी अवधारणा : मॉन्टेसरी स्कूल : मीनू मंजरी

बच्चों को कहां ले जा रहा है मीडिया : नरेन

   
किताब के बहाने
श्रेष्ठता ग्रंथि से पीड़ित लोग : कुमार मुकुल
   
मनोव्यथा
हर कार मेरा पीछा कर रही थी : कमल
   
मीडिया पर निगाह
बाजार ही मीडिया का राष्ट्र और धर्म है : अनिल चमड़िया
   
क्रूरता की शिनाख्त
टीवी एंकरों की खुदकुशी और टीआरपी : मृणाल वल्लरी
   
विश्लेषण
अवसाद : चारुवाक
   
सपने
मेरे तीन सपने : उनका क्या करूं ? : बोधिसत्व
   
जनगीत
दुनिया नष्ट नहीं होगी : नचिकेता
   
कहानी
मुश्किल : सन्तोष चौबे
   
काव्य कथा
शान्ता : उद्भ्रान्त
   
फिल्म

ओंकारा : विनोद अनुपम

ऑथेलो : अनामिका

   
व्यंग्य  झूठ बोलने के फायदे : विष्णु नागर
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मनोवेद
अंक – 1 वर्ष – 1 जनवरी–मार्च, 2008

फिल्‍म

ओंकारा : शक की नियति
विनोद अनुपम

ओंकारा (ऑथेलो सिंड्रोम)
प्यार कवियों का अविष्कार नहीं है और न ही प्यार पर एकाधिकार की भावना सामंतवादी युग की विरासत। ÷लव बग' के नाम से प्रसिद्ध एक कीड़े और चिम्पैंजियों के प्रेम-व्यवहार में भी एकाधिकार की भावना के पक्ष में प्रमाण मिलते हैं। इसी प्रकार प्रतियोगिता और ईर्ष्या को भी औद्योगिक क्रांति के ÷प्रोडक्ट' की जगह, प्रेम और उस पर एकाधिकार भावना को उत्पन्न करने वाली मानसिक प्रक्रिया के ÷बाइप्रोडक्ट' के रूप देखा जाना चाहिए। मनोविज्ञान ईर्ष्या के भाव को एक ऐसे डिफेंस मेकैंनिज्म की तरह देखता है, जो प्यार को खो देने के डर और उसे बचाने की चिंता से उत्पन्न होता है। सामान्य तौर पर ईर्ष्या एक उपयोगी भावना है। इसने परिवार नामक संस्था से लेकर देश की अवधारणा तक के विकास में भूमिका निभायी है। मगर ईर्ष्या एक सीमा तक ही सकारात्मक भूमिका निभाती है। अपरिपक्व सोच से उत्पन्न होने के कारण उसके बीमार होने की संभावना अधिक होती है।
ऑथेलो सिंड्रोम बीमार ईर्ष्या का एक नाम है। यह नाम जॉन टॉड तथा के. ड्यूहर्स्ट ने ÷जरनल ऑफ मेंटल डिजार्डर' के 1953 के अंक में प्रकाशित एक आलेख में दिया था। शेक्सपीयर के प्रसिद्ध नाटक ÷ऑथेलो' के नायक (? ) को अपनी पत्नी के चरित्र पर शक होता है। यह शक उसे इस हद तक परेशान और क्रुद्ध कर देता है कि वह अपना विवेक खोकर उसकी हत्या कर बैठता है। ऑथेलो के लिखे जाने के बहुत पहले से लोग इस बीमार ईर्ष्या के शिकार होते आ रहे हैं। अपने मनोचिकित्सकीय जीवन के ऐसे ही मरीजों को देखकर टॉड और ड्यूहर्स्ट ने ऑथेलो सिंड्रोम नामक डॉयग्नोसिस को प्रस्तावित किया।
ऑथेलो सिंड्रोम की बीमार ईर्ष्या दरअसल एक डिल्यूजन (वहम) है। परिभाषा के हिसाब से डिल्यूजन एक ऐसा झूठा विचार है जिसे डिगाया-मिटाया नहीं जा सकता और जिससे परिवार-समाज के संबद्ध लोग इत्तफाक़ नहीं रखते। ऑथेलो सिंड्रोम एक रोग है, जो स्त्रियों की तुलना में पुरूषों में अधिक पाया जाता है। यह रोग अकेले या पारानॉयड स्किजेफ्रेनिया, अत्यधिक शराबखोरी और कोकेन-व्यसन के लक्षण के रूप में प्रकट होता है।
इस सिंड्रोम से ग्रस्त लोग अपने ÷पार्टनर' पर बार-बार विश्वासघात का आरोप लगाते हैं, जबकि इस आरोप का कोई तार्किक आधार नहीं होता। वे अक्सर अपने ÷पार्टनर' के सामाजिक मेलजोल पर प्रतिबंध लगाते हैं और उनकी निगरानी करते-कराते हैं। दिनचर्या की छोटी-छोटी घटनाओं को भी वे अपने शक के पक्ष के प्रमाण की तरह देखते हैं और परेशान करते हैं। वे आरोप और प्रताड़ना के द्वारा अपने पार्टनर के व्यक्तित्व और आत्मसम्मान को कुंठित और आहत करने का प्रयास भी करते हैं। घरेलू प्रमुख कारणों में से एक है-ऑथेलो सिंड्रोम। इस शक की वजह से ÷अरेंज्ड' ही नहीं, प्रेम-विवाह भी टूटते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि लोगों तक यह बात पहुँचायी जाए कि जिसे स्वभाव समझा जा रहा है, दरअसल वह एक रोग है। मनोचिकित्सकों के क्लिनिक में अक्सर ऐसी स्त्रियाँ आती हैं, जो गहरे अवसाद से ग्रस्त होती हैं और उनके अवसाद का कारण होता है - पति का शक्की स्वभाव और अपमानजनक व्यवहार। कई पुरुष ÷बीमार पत्नी' पत्नी के शक्की स्वभाव के कारण परेशान रहते हैं और इस परेशानी के कारण तनावजनित शारीरिक एवं मानसिक रोगों के शिकार होते हैं। अगर समय रहते इस रोग की पहचान और चिकित्सा हो जाए तो, ÷फैमिली कोर्ट' में तलाक के लिए कम अजिर्+याँ दाखिल हों।÷ऑथेलो' का ऑथेलो हो या ÷ओंकारा' का ओंकारा दोनों वहम के शिकार हैं और हत्या की हद तक पहुँचते हैं। इस वहम के कुछ शिकार सचमुच इस हद तक भी पहुँचते हैं।
ओंकारा का संदेश यह नहीं है कि इश्क़ वह नमक है जिसके जुबान पर लगते ही आदमी गाने लगता है कि बीड़ी जलाइले जिगर से पिया जिगर मा बड़ी आग है। ओंकारा का संदेश है - ÷शक' एक रोग है जो ख़तरनाक हो सकता है। और ओंकारा के बहाने मनोवेद का संदेश है कि शक का इलाज हक़ीम लुकमान के पास भले नहीं था, आधुनिक मनोचिकित्सा के पास है।

कहा जाता है प्रेम विश्वास की बुनियाद पर खड़ा होता है, होता होगा। लेकिन इस वास्तविकता से हम चाहते हुए भी इन्कार नहीं कर सकते कि यह परवान चढ़ता है शक की सीढ़ियों पर आहिस्ते-आहिस्ते। विचारकों, साहित्यकारों और प्रेमविदों ने शक को एक तरह से प्रेम का लिट्मस टेस्ट माना है। यदि इस टेस्ट में प्रेम सफल रहा तो ठीक, नहीं तो फिर बुनियाद की मजबूती सामाजिक रिश्ते तो कायम करवा सकती है, प्रेम को कायम रखने में सफल नहीं हो सकती।
प्रेम और शक के इस अद्भुत महात्मय पर सैकड़ों ग्रंथ रचे गए हैं। विभिन्न देशों में, विभिन्न भाषाओं में। प्रेम और शक की कथाए जाति-मोऽकी सीमाओं से भी परे रहीं, यहा तक कि काल से भी। वास्तव में मानवीय समाज का मात्र राजनीतिक विभाजन हो सकता है, पर जब उसके मूल स्वभाव को पहचानने की कोशिश की जाती है तो सामाजिक, राजनीतिक, घर्मिक, भौगोलिक सारे विभाजन बेमानी हो जाते हैं। आश्चर्य नहीं कि सोलहवीं सदी में शेक्सपीयर इंग्लैण्ड में ÷ऑथेलो' की रचना करते हैं और इक्कीसवीं सदी में विशाल भारद्वाज रजत पट पर ÷ओंकारा' के रूप में इसकी पुनर्रचना करते हैं। इंग्लैण्ड के राजघराने की पृष्ठभूमि बदलकर पश्चिमी उनर प्रदेश के अपरायिों की सल्तनत हो जाती है, लेकिन कथानक में, यहा तक कि संवादों के मूल रूप में भी कहीं परिवर्तन की जरूरत नहीं समझी जाती। मानवीय स्वभाव की सार्वभौमिकता का यह कमाल कि कहीं भी इसकी स्वीति में शायद किसी को भी कोई आपनि नहीं होती। कहीं नस्ली अभिमान से गौरवान्वित तो कहीं अपने जातीय अभिमान से दोहरे होते लोगों के लिए इस तरह की रचना-पुनर्रचना वाकई एक सबक है कि तुम कतई अलग नहीं हो। इस चमड़ी के रंग और माथे के तिलक के अन्दर जो आदमी है वह किसी भी सामान्य आदमी से स्वाभाविक तौर पर अलग नहीं।
कई लोगों को आपनि हो सकती है, लेकिन यदि ÷रामायण' को इतिहास मानें तो यह भी मानना पड़ेगा कि सीता के प्रति भगवान राम का अथाह माना जाने वाला प्रेम भी शक से परे नहीं रह सका था। और अंततः इसकी कीमत भगवान राम को भी अपने दाम्पत्य जीवन ही नहीं बल्कि सीता की शहादत से चुकानी पड़ी थी। प्रेम की नींव मजबूत रहने के बावजूद शक के दीमक ने संबं के महल को राशायी कर दिया। ÷ओंकारा' से गुजरते हुए रामकथा के इस अंश की याद कतई अस्वाभाविक नहीं। अथाह प्रेम और अंतहीन शक का जो द्वन्द वहा है, वही अपने चरम रूप में यहा भी है।
ओंकारा; अजय देवगन भाई साहब; नसिरूीन शाह का दाहिना हाथ है। भाई साहब लोकसभा का चुनाव लड़ने को तैयार होते हैं तो अपनी गी ओंकारा को सौंपते हैं। यहा विशाल भारद्वाज पश्चिमी उनर प्रदेश पर प्रभावी आपराकि परम्परा को रेखांकित करते हैं, जहा अपरा से राजनीति में प्रवेश का एक चव् चलता रहता है। ओंकारा अभी तक ÷बाहुबली' के आसन पर था। भाई साहब का स्थान लेने यानी राजनीति की ओर एक कदम आगे बढ़ने के लिए अब उसे भी सीे अपरा की दुनिया छोड़कर अपनी गी किसी और को सौंप देनी है। उसके सामने दो उम्मीदवार हैं - लंगड़ा त्यागी; सैफ अली खान और केशु शुक्ला; विवेक ओबेरॉय। वषोऽ से भाई साहब और ओंकारा के लिए जान की बाजी लगाता आ रहा लंगड़ा त्यागी आश्वस्त है कि ÷बाहुबली' की पदवी उसे ही मिलेगी, लेकिन वह हतप्रभ रह जाता है जब उसके हाथों में आरती की थाली सौंपकर उपाि केशु को दे दी जाती है। लंगड़ा को संभलने में क्षणभर ही लगते हैं, लेकिन फांस उसके दिल में चुभी रह जाती है। ÷ओंकारा' की यह पूर्वपीठिका है। प्यार, शक, समर्पण और अहम्‌ जैसे मानवीय स्वभाव में पिसते मानव की विडम्बनाओं की दास्तान यहीं से शुरू होती है।
डॉली; करीना कपूर शहर के एक बड़े वकील की बेटी है, कॉलेज में पढ़ी-लिखी। एक दिन उसका सामना ओमी से होता है, और वह उसे प्यार कर बैठती है। एक पढ़ी-लिखी लड़की ओमी जैसे घोषित मवाली के प्रति क्योंकर आकर्षित हो सकती है, विशाल इस मनोविज्ञान को टटोलने की कोशिश नहीं करते, लेकिन वह इसे ÷लव एट फर्स्ट साइट' कह स्टैबलिश भी नहीं करते। वास्तव में यह यहा कहीं न कहीं अपरा की सामाजिक स्वीकार्यता के प्रतीक रूप में दिखता है, जहा ओमी के आपराकि वर्चस्व में डॉली को उसके पुरुषत्व की मक सुनाई देती है। एक समाज जो आपराकि सरगना को सांसद बनाने के लिए पलक पांवड़े बिछाए हो, उस समाज में सांस लेती लड़की यदि एक अपराी के साथ अपना भविष्य सुरक्षित देखती है तो इसमें आश्चर्य क्या ? विशाल इंगित नहीं करते लेकिन सोचने का आघर तो देते ही हैं कि डॉली को अपरा की यह सहज स्वीकार्यता उसे अपने फौजदारी वकील पिता से भी मिल सकती है। पेशे से प्रतिष्ठित होने के बावजूद अपने पिता की अपरायिों से नजदीकिया उसने बचपन से ही देखी थी। जाहिर है अपराी उसके लिए अस्पृश्य नहीं थे।
लेकिन मामला सामाजिक प्रतिष्ठा का है, उससे भी बढ़कर अपने अहम्‌ का। डॉली की बारात रास्ते में ही रोक ली जाती है, दुल्हा किसी तरह मोपेड पर मारा-मारा जान बचाकर पहुंचता है तो पता चलता है डॉली को ओमी उठा ले गया। भाई साहब के ÷अदालत' में बात पहुंचती है और तमाम सुनवाई के बाद फैसला डॉली पर छोड़ दिया जाता है। डॉली निःसंकोच बोलती है कि वह ओमी से प्यार करती है और उससे शादी करना चाहती है। कहीं कोई हिचक नहीं। यह हिम्मत क्या सिर्फ प्यार की हो सकती है ? सवाल तो है।
डॉली ओमी के साथ बगैर किसी सामाजिक रिश्ते के उसके घर चली आती है। क्या इसे ÷लिव इन' रिश्ते की गांव तक स्वीकार्यता मानी जानी चाहिए, या फिर सामाजिक नैतिकता पर भारी पड़ते अपरा का प्रतीक ? पहले यह चकित कर सकता था, अब चकित नहीं करता। हिन्दी प्रदेश का यह गांव जहा अपराी एक सामान्य नागरिक से कहीं बेहतर और कहीं प्रतिष्ठित जिंदगी गुजारते दिखते हैं। ओमी के पड़ोस में रहने वाले लंगड़ा त्यागी की पत्नी इंदु; कोंकणा सेन डॉली की देखभाल ही नहीं करती, उसे अपनी छोटी बहन का मान भी देती है। इर ÷बाहुबली' नहीं बन पाने की फांस लंगड़ा के दिल में और गहरी घसती चली जाती है जब डॉली की बारात से भगाया गया दुल्हा उसे सींचने में जुट जाता है। लंगड़ा को पता है ओमी की सबसे कमजोर नब्ज डॉली है। वह उसी पर चोट करने का मन बनाता है।
ओमी जैसे हृदयहीन और मजबूत दिखते व्यक्ति की डॉली के प्रति बेइंतहा कमजोरी थोड़ी चकित भी करती है, लेकिन सुकून भी देती है कि वाकई प्यार आदमी को कुछ ही क्षण के लिए सही बदल तो सकता है। बदल भी सकता है, लेकिन यहा एक और वजह देखी जा सकती है। वास्तव में डॉली का साथ ओमी को एक अलग दुनिया का स्वाद देता है, खून-खराबे, षड्यंत्र में डूबे उसके व्यक्तित्व को आदमी होने का अहसास देता है। डॉली के नजदीक आकर वह सब कुछ भूल जाता है। डॉली के प्यार की अभिव्यक्ति में ओमी को पाने का अहसास दिखता है तो ओमी के प्यार में अपने आपको पाने के अहसास की पहचान की जा सकती है। आश्चर्य नहीं कि कह सकते हैं जैसे-जैसे डॉली के प्रति उसकी निर्भरता बढ़ती जाती है, उसी अनुपात में डॉली के प्रति वह असुरक्षित भी होता चला जाता है। ओमी को डॉली के खोने का गम नहीं, वास्तव में अपने व्यक्ति को खो देने का डर है।
लंगड़ा ओमी के इसी डर का लाभ उठाता है। वह एक पूरा ताना-बाना बुनता है जिसमें ओमी-डॉली और केशु फंसते चले जाते हैं। ताने-बाने के इस बुनावट को लंगड़ा की विश्वसनीयता और भी मजबूती देती है। डॉली और केशु के एक साथ कॉलेज में पढ़ने की पृष्ठभूमि के साथ केशु की दिलफेंक आदतें ओमी के विश्वास की नींव में दीमक की तरह प्रवेश करती हैं और शक की राह आसान बनती चली जाती है। ओमी के मन में डॉली के पिता की कही बात बार-बार घूमने लगती है कि जो अपने बाप की नहीं हुई वह किसी और की क्या होगी? विशाल भारद्वाज पुरुष मानसिकता की ऐसी विडम्बना को रेखांकित करते हैं, जहा एक बाप भी अपनी बेटी की आजादी स्वीकार नहीं कर पाता। वास्तव में हम से जब हमारा अहम्‌ बड़ा हो जाता है तो सब कुछ हम अपने नियंत्रण में रखना चाहते हैं। खासकर उसे जिसे हम अपनी मिल्कियत मानते हैं। समाज कोई भी हो, स्त्रिया मिल्कियत मानी जाती रही हैं। जब डॉली अपने पिता के आदेश को मानने से इन्कार करती है तो उसी के साथ उस पिता की सारी मानवीय भावनाए भी गौण हो जाती हैं और मनुष्य मात्र का स्वाभाविक अहम्‌ सिर चढ़कर बोलने लगता है।
विशाल भारद्वाज ÷ओंकारा' में संबंघें का सिर्फ वही रूप नहीं दिखाते, जो आमतौर पर दिखता है बल्कि वे इसकी जटिलताओं में प्रवेश करने की कोशिश करते हैं। जहा एक ईमानदार प्यार के लिए नौटंकीवाली भी बेचैन है, जहा एक ऐसी पड़ोसन है जो लालच में पड़कर अपनी छोटी मानने वाली लड़की का जेवर चुरा भी लेती है और अवसर आता है तो उसके पक्ष से तनकर सिर्फ खड़ी ही नहीं होती, अपने पति तक की गर्दन उतारने से नहीं चूकती। ÷ओंकारा' में पुरुष हो या स्त्री कोई भी चरित्र एकपक्षीय श्वेत या श्याम नहीं है, सभी की अपनी-अपनी कमजोरिया हैं, अपनी-अपनी अच्छाईया।
लंगड़ा ओंकारा की बेचैनी का आनंद उठाता है। लेकिन इतने भर से उसे संतुष्टि नहीं होती है। वह जानता है कि जिस शक की आग उसने लगायी है, वह सुलगती रही तो ओमी, केशु और डॉली तीनों को तबाह कर रख देगी। लंगड़ा की मानसिक विति की यह पराकाष्ठा है कि इस दुष्टता के एवज में उसे कुछ भी भौतिक प्राप्ति नहीं होती, सिवा अपने दुश्मन से बदला ले लेने के संतोष के। लेकिन उल्लेखनीय है कि लंगड़ा ओमी को दुश्मन भी कैसे मान सकता है, जिसने हमेशा उसे अपना दाहिना हाथ समझा है और उसी नाते उसका ख्याल रखा है। विचारणीय है कि क्या अपरा का मानसिक विति से कोई सीघ संबं है ?
एक ओर लंगड़ा त्यागी, दूसरी ओर अपनी बेटी पर कटु आक्षेप करने वाला फौजदारी मुकदमें लड़ने वाला वकील पिता, फिर शक की बुनियाद पर अपनी पत्नी की जान ले लेने वाला ओमी, क्या इन्हें एक सामान्य व्यक्ति के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए ? विशाल भारद्वाज अपनी ओर से कोई निर्णय नहीं देते, लेकिन यह जरूर दर्शाने की कोशिश करते हैं कि अपरा के चेहरे भले ही अलग हों, कहीं न कहीं उनका स्वभाव, उनकी मानसिकता एक हो जाती है, जिसकी तुलना कदाचित्‌ एक सामान्य व्यक्ति से नहीं की जा सकती।
ओंकारा के मन में शक के रूप में सवाल दर सवाल लंगड़ा भरता चला जाता है, जिसका जबाव डॉली के पास हो सकता था। लेकिन ओमी सवाल पूछने के लिए अपने आपको तैयार नहीं कर पाता। शायद कहीं न कहीं उसे इसमें अपनी हीनता झलक रही थी। इस हीनता को वह बगैर कोई सवाल पूछे दूर करता है विवाह की रात डॉली का गला घोंटकर और फिर अपनी जान देकर।
ओंकारा को देखते हुए यह तय करना मुश्किल है कि यह प्यार की दास्तान है, शक की दास्तान है या फिर मानसिक वितिया की दास्तान है। शेक्सपीयर को ÷ऑथेलो' लिखे 500 साल बीत चुके हैं, अभी साल भर पहले आती है ÷ओंकारा'। क्या वाकई बीते 500 सालों में मानवीय स्वभाव नहीं बदल सका ? आज का समय ये मानने की इजाजत नहीं देता। वास्तव में हम वाकई बदल चुके हैं, हमारे स्वभाव बदल चुके हैं, लेकिन शक को यदि एक बीमारी मानें तो वाकई 500 साल क्या अगले 5000 साल तक इस बीमारी के लक्ष्णों में फर्क आना मुश्किल है। ÷रामायण' ने भी शक की व्ूर नियति दिखाई थी, अब वही नियती विशाल भारद्वाज दिखा रहे हैं। जाहिर है इनका उेश्य एक कथा दिखाकर हमें छोड़भर देना नहीं बल्कि शक के व्ूर लक्षणों के प्रति उद्वेलित करना भी है, ताकि एक सहज मानवीय जीवन जी सकें हम।
विनोद अनुपम 53-ए सचिवालय कॉलोनी, कंकड़बाग, पटना-800020
मोबाइल : 09334406442

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