इस अंक में
मन माने की बात बातचीत
माइंड योर लैंग्वेज यानी जुबान सँभाल के
डॉ विनय कुमार
शब्दों के अर्थ शुरुआती अर्थों तक ही सीमित नहीं रहते। सभ्यता की विकास-यात्र में समय-समय पर नए अर्थ जुड़ते जाते हैं। यह आवश्यक नहीं कि नए अर्थों की आमद सकारात्मक ही हो।
दुख को बेहतर समझती है मनोचिकित्सा...
डॉ. नरेन्द्रनाथ विग से डॉ. विनय कुमार की बातचीत
जीवन और ज्ञान की विविधताओं के गहरे अध्येता डॉ. एन.एन.विग भारतीय मनोचिकित्सा जगत की उज्ज्वलतम उपस्थितियों में से एक हैं।
 
मन माने की बात डायरी
रचनाकार की पूंजी होती है बचपन की ...
डॉ. नरेन्द्रनाथ विग से डॉ. विनय कुमार की बातचीत
अपनी कविताओं में मनुष्य और उसके जीवन के प्रति समाहित होनेवाले कथ्य को आप किस रूप में देखते हैं ? पानी में घिरे हुए लोग शीर्षक कविता की रचना प्रक्रिया के बारे में बताएं।
....फ्रायड ग़ायब और इन्द्र मुस्कुरा रहा था
लीलाधर मंडलोई
हिन्दी कविता के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर और दूरदर्शन के महानिदेशक लीलाधर मंडलोई कविता के अतिरिक्त गद्य लेखन के लिए भी जाने जाते हैं। वर्षों से वे अपनी मनःस्थितियां डायरी में दर्ज करते रहे हैं।
 
मनोचिकित्सक की कलम से मनोचिकित्सक की कलम से
हिस्टीरिया की कहानी : डॉ. प्रमोद कुमार सिंह
सचमुच यह अब एक कहानी मात्र ही रह गयी है, क्योंकि विशेषज्ञों ने इस शब्द का प्रयोग बन्द कर दिया है। किन्तु इस शब्द की प्रासंगिकता अभी बनी हुई है, क्योंकि जनमानस में यह शब्द अभी पूर्ण जीवंत रूप में कायम है। इसकी प्रासंगिकता इसलिए भी बनी हुई है क्योंकि जिन मनोशारीरिक दशाओं के लिए इसका प्रयोग किया जाता था, वे अभी भी लगभग उसी रूप में,
मनोरोगियों के परिवारों की चुनौतियां :
जे.के. त्रिवेदी/श्याम बिहारी राय/मोहन ध्यानी

मानसिक रोगों से कोई व्यक्ति, समाज अथवा देश प्रतिरक्षित नही है। इन रोगों का व्यक्ति के ऊपर गंभीर मनोवैज्ञानिक,सामाजिक व
 
मनोचिकित्सक की कलम से मनोचिकित्सक की कलम से
बढ़ती उम्र का सामना : डॉ. चित्तरंजन एन्ड्राडे
किशोरावस्था के अन्तिम तथा युवावस्था के आरंभिक वर्षों में बौद्धिक क्षमता अपने उच्चतम स्तर पर रहती है। इसके बाद इसमें लगातार गिरावट आती है, पर यह बात पचास या साठ की उम्र के बाद ही पता चलती है। बढ़ती उम्र के साथ हाल की घटनाओं की याददाश्त भी कम हो जाती है।
मनोरोगियों को बेड़ियाँ क्यों नेहा सईद सईद अख्तर
इस सभ्य समाज में भी मनोरोगियों के साथ परिवार, समाज और कभी-कभी तो विभिन्न चिकित्सा प्रणालियों के माननीय दिग्गजों के द्वारा जो व्यवहार होता है, वह बड़ा ही दिल दहलाने वाला होता है। रोगियों को आज भी हथकड़ियों से जकड़ कर रखा जाता है, रस्सियों से उनके हाथ पैर बाँध दिए जाते हैं , कमर में रस्सी बाँध कर जानवरों की तरह खींचा जाता है।
 
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पागलपन नहीं सायकोसिस
एक शब्द है पागल'। इस शब्द का हमारे जीवन में बड़ा महत्त्व है। दुनिया में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं जिसे कभी पागल न कहा गया हो। कोई भी मां बच्चे की ऊल-जुलूल, लेकिन मासूम हरकत पर कहती है, धत पागल और बच्चे की छोटी-सी गलती पर बड़ा दंड देने पर उतारू पिता को कहती है, पागल हो गए हैं क्या?
प्रसवोत्तर अवसाद
पुराण बताते हैं कि एक बार समुद्र का मंथन हुआ था और उससे चौदह रत्न निकले थे। यह भी बताते हैं कि किस रत्न को किस देवता अथवा किस असुर ने ग्रहण किया था, किंतु यह नहीं बताते कि मथे जाने और रत्नदान के बाद समुद्र ने क्या महसूस किया। समुद्र को ठीक वैसा ही लगा होगा जैसा फसल दे चुकने
 
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अटेंशन डेफिसिट हायपरएक्विविटी डिसॉर्डर
अभिभावक के रूप में आप अपने बच्चे का जीवन गढ़ने में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसी संभावना हो सकती है कि आपका बच्चा अटेंशन डेफिसिट हायपरएक्विविटी डिसॉर्डर (ए डी एच डी) का शिकार हो। आएं जानें कि–

ए डी एच डी क्या है ?

मनोरोग के लक्षण
¨ नींद में कमी , भूख में कमी , क्रोध आना , तोड़-फोड़ , मार-पीट , बेवजह डर , शक , बहुत कम या बहुत अधिक बात करना , अकेले बैठकर बुदबुदाना या मुस्कुराना , डायन या भूत का डर , कोई कहीं नहीं बोले तब भी आवाज सुनना , पत्नी को पति के अथवा पति को पत्नी के चरित्र पर बेवजह शक , गांजा , भांग , शराब , स्मैक आदि की लत।
 
बाल मन बाल मन
शिक्षा की अनोखी अवधारणा : मॉन्टेसरी स्कूल : मीनू मंजरी
रंग.विवरंगी मेज'कुर्सिया, खिलौनों से भरी अलमारी, समूहों में बैठे अपने काम में र्मग्‍न बच्‍चे यह द़श्‍य पारंपारकि पाछशाला से काफी भिन्‍न है ा पर दुनिया भर से मॅान्‍टेसरी स्‍कूलों की सफलता ने शिक्षा की इस अवधारणा को मान्‍य बनाया हैा
बच्चों को कहां ले जा रहा है मीडिया : नरेन
हलांकि प्रिट मीडिया हो चाहे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रायः हर किस्म का मीडिया वर्ग अपनी सामूहिक गतिविधियों के मद्देनजर लगभग पूरी तरह से मनी मिटिंग, वीभत्स बाजारू उत्पाद में तब्दील हो चुका है; लेकिन उसका पाखण्डी और आतंककारी दंभ उत्तरोत्तर परवान ही चढ़ता जा रहा है कि वह
 
निष्कलंक निष्कलंक
बु्रक शील्ड्स : विनोद अनुपम
14 मई 2007, दिन के दो बजे थे। सैनडिएगो(कैलिफोर्निया) के कन्वेंशन सेंटर में अमेरिका की प्रसिद्ध मनोचिकित्सक नैन्सी ऐन्ड्रियासन को सुनने के लिए हॉल में लगभग 500 मनोचिकित्सक बैठे थे। भाषण शुरू होने में कुछ विलम्ब था। मेरी सीट की दाहिनी तरफ बैठे सज्जन ने बायीं तरफ बैठे सज्जन से पूछा -
गोरख पांडेय! यादों के आईने में चमन लाल
किसी भी कवि के लिए सबसे बड़ी चुनौती है–गंभीर अर्थों से भरे लोकगीत लिखना। हक की लड़ाई लड़नेवालों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलनेवाले गोरख पांडेय ने यह कठिन काम तो आसानी से किया, मगर पारानॉयड स्किजोफ्रेनिया की मुश्किलों से पार नहीं पा सके। उन्होंने आत्महत्या कर ली।
 
क्रूरता की शिनाख्त क्रूरता की शिनाख्त
रैगिंग को सामाजिक वर्ग ढांचे में देखें : स्वतंत्र मिश्र
उच्च संस्थानों में रैगिंग एक आम समस्या बन गयी है। हाल ही में भारत के एक प्रतिष्ठित कॉलेज सेंट स्टीफेंस में कुछ सीनियर छात्रों द्वारा एक जूनियर छात्र को प्रताड़ित करने का मामला सामने आया है। इस घटना में सीनियर लड़कों ने अपने एक जूनियर के र डियोडरेंड खूशबू उत्पन्न करने वाला इत्र जैसा कुछ स्प्रेे छिड़कर उसको आग लगा दिया गया।
खुद की खबर पर खामोश मीडिया :
वर्तिका नन्दा सहाय
दो साल पहले दिल्ली पब्लिक स्कूल के दो छात्रों का जो अश्लील एमएमएस बना, वह बे्रकिंग न्यूज थी, देश भर ने वो तस्वीरें देखीं और जनता नैतिकता पर मीडिया की चिल्लाहट की गवाह बनी, लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि
 
 
इस अंक की दवा
लिथियम कार्बोनेट
   
बाल मन

शिक्षा की अनोखी अवधारणा : मॉन्टेसरी स्कूल : मीनू मंजरी

बच्चों को कहां ले जा रहा है मीडिया : नरेन

   
किताब के बहाने
श्रेष्ठता ग्रंथि से पीड़ित लोग : कुमार मुकुल
   
मनोव्यथा
हर कार मेरा पीछा कर रही थी : कमल
   
मीडिया पर निगाह
बाजार ही मीडिया का राष्ट्र और धर्म है : अनिल चमड़िया
   
क्रूरता की शिनाख्त
टीवी एंकरों की खुदकुशी और टीआरपी : मृणाल वल्लरी
   
विश्लेषण
अवसाद : चारुवाक
   
सपने
मेरे तीन सपने : उनका क्या करूं ? : बोधिसत्व
   
जनगीत
दुनिया नष्ट नहीं होगी : नचिकेता
   
कहानी
मुश्किल : सन्तोष चौबे
   
काव्य कथा
शान्ता : उद्भ्रान्त
   
फिल्म

ओंकारा : विनोद अनुपम

ऑथेलो : अनामिका

   
व्यंग्य  झूठ बोलने के फायदे : विष्णु नागर
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मनोवेद
अंक – 1 वर्ष – 1 जनवरी–मार्च, 2008

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अटेंशन डेफिसिट हायपरएक्विविटी डिसॉर्ड

अभिभावक के रूप में आप अपने बच्चे का जीवन गढ़ने में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसी संभावना हो सकती है कि आपका बच्चा अटेंशन डेफिसिट हायपरएक्विविटी डिसॉर्डर (ए डी एच डी) का शिकार हो। आएं जानें कि–

ए डी एच डी क्या है ?
अटेंशन डेफिसिट हायपरएक्विविटी डिसॉर्डर (ए डी एच डी) एक मनोआचरणगत विकार है जो स्कूली बच्चों को प्रभावित करता है। यह विकार बच्चों की एकाग्रता, व्यवहार और सीखने की संपूर्ण प्रक्रिया को प्रभावित करता है।

ए डी एच डी से कौन प्रभावित होता है ?
स्कूली उम्र के कम से कम 3-5 प्रतिशत बच्चों को ए डी एच डी होता है। लड़कियों की तुलना में यह लड़कों में तीन गुना ज्+यादा होता है। निम्न सामाजिक-आर्थिक वर्गों तथा ए डी एच डी से ग्रसित परिवार के बच्चों में ज्+यादा कॉमन होता है।

ए डी एच डी के संकेत व लक्षण क्या हैं ?
ए डी एच डी से ग्रस्त बच्चों में एकाग्रता बिगड़ने या अतिक्रियाशीलता या दोनों के संकेत दिख सकते हैं। यदि उनकी एकाग्रता कम है तो उन्हें ध्यान केन्द्रित करने, निर्देशों का पालन या काम पूरा करने में कठिनाई आ सकती है। यदि वे अतिक्रियाशील हैं तो चंचल और अधिक बातूनी हो सकते हैं। वे दूसरों को बीच में रोक सकते हैं या स्कूल जाना टाल सकते हैं। ए डी एच डी ग्रस्त बच्चों को स्कूल का काम पूरा करने, अन्य बच्चों के साथ चलने, निर्देशों का और नियमों का पालन करने में परेशानी हो सकती है।
इस तरह के आचरण यूँ तो सभी बच्चे कभी-कभी दर्शाते हैं मगर ए डी एच डी ग्रस्त बच्चों में ये आचरण ज्+यादा बार उभरते हैं जो अधिक तीव्र होते हैं और स्कूल व घर में अवरोध पैदा करते हैं।

इसका निदान कब होता है ?
ए डी एच डी का निदान सामान्यतः बचपन में होता है, यद्यपि यह स्थिति वयस्क होने पर भी जारी रह सकती है।

निदान कौन करता है ?
ए डी एच डी का निदान अभिभावक, शिक्षक और मनोचिकित्सक करते हैं, फिर भी इसकी पुष्टि मनोचिकित्सक ही करते हैं।

यह किस कारण होता है ?
वर्तमान अनुसंधान दृढ़तापूर्वक सुझाते हैं कि ए डी एच डी मस्तिष्क के निचले क्षेत्र में एक विशिष्ट न्यूरोट्रान्समीटर के अभाव के कारण होता है।

यह कितने समय तक रहता है ?
वर्तमान जानकारी सुझाती है कि क़रीब 50 प्रतिशत ग्रस्त बच्चों में यौवन प्राप्त होने पर ए डी एच डी से मुक्ति मिल जाती है, शेष में संभवतः वयस्क होने तक जारी रहता है।

सीखने की अक्षमता और भावनात्मक विकारों के लक्षण क्या हैं ?
पढ़ने तथा भाषा या गणित में समस्याएँ सीखने की अक्षमता के संकेत हो सकते हैं। अत्यंत जिद्दीपन, निर्देशों का पालन करने से नकारना और पारा चढ़ जाना : भावनात्मक समस्या के संकेत हो सकते हैं जिसे अपोजि+शनल डिफाएंट डिसॉर्डर कहा जाता है। दुखी और हताश होना अवसाद के संकेत हो सकते हैं।

इसे नियंत्रित करने का तरीका क्या है ?
ए डी एच डी का उपचार लक्षणों के नियंत्रण, कक्षा में शिक्षा और व्यक्तिगत संबंधों और वयस्क जीवन में प्रवेश पर ध्यान केंद्रित करने से होता है। मापने योग्य परिणामों से दिशा मिलती है–जैसे शिक्षक से अनुशासनात्मक कारवाई के लिए सप्ताह में बुलावों
की संख्या, गृहकार्य पर खर्च समय या बिना अवरोध अन्य गतिविधियों में प्रतिभागिता। इस रोग के इलाज के लिए दवाएँ उपलब्ध हैं।

यदि लगे कि बच्चे को ए डी एच डी है तो क्या करना चाहिए ?
यदि आपको लगता है कि आपके बच्चे को शायद ए डी एच डी है तो आपको उनकी जाँच मनोचिकित्सक से करवानी चाहिए। कभी-कभी दृष्टि या सुनने की समस्या, परिवार का तनाव, चिंता, सीखने की अक्षमता या संवाद संबंधी समस्याएँ बच्चे की एकाग्रता और आचरण को प्रभावित करती हैं। आपको स्कूल के तंत्र से भी मदद लेनी चाहिए।

स्कूल का तंत्र मेरे बच्चे के लिए क्या कर सकता है ?
यदि आपका बच्चा स्कूल में पढ़ने के लिए जूझ रहा है तो लिखित रूप में स्कूल प्रबंधक से अपने बच्चे का मूल्यांकन मांगिए। मूल्यांकन का प्रयोजन यह जानना है कि आपका बच्चा स्कूल में अच्छा क्यों नहीं कर रहा है। आपके बच्चे का मूल्यांकन करने के लिए प्रोफेशनल्स की एक टीम आपके साथ काम करेगी।

कुछ सहायक सुझाव
अपने बच्चे के अच्छे गुणों पर ध्यान दें। दिन में कम से कम तीन बार अपने बच्चे के अच्छे आचरण को ÷देखें' और उसे बताएँ कि आपने उस पर ध्यान दिया था। दिन में तीन से अधिक बार करने का प्रयास करें।
जब अपने बच्चे की प्रशंसा करें तब उसे बताएँ कि आपने जो व्यवहार देखा, उसे आप अधिक बार देखना चाहेंगे–जैसे ÷÷सचमुच तुम आज मॉल में मेरे साथ ही रहे।''
अपने बच्चे को बताइए आप उससे क्या चाहते हैं। यह नहीं बताएँ कि आप क्या नही चाहते। (÷मत दौड़ो' के बजाय कहिए ÷चलो')
ए डी एच डी से ग्रस्त बच्चे को दवाइयों के कारण ठीक से खाने और स्थिर बैठने में तकलीफ होती है। ध्यान रखें कि आपके बच्चे को नियमित रूप से पौष्टिक भोजन मिलता रहे।
आपके बच्चे के लिए व्यायाम भी काफी सहायक ह,ै लेकिन ध्यान रखें कि वह सुरक्षित रहे। ए डी एच डी से ग्रस्त बच्चों की उनकी उम्र के अन्य बच्चों से ज्+यादा निगरानी की ज+रूरत होती है क्योंकि वे सक्रिय और चंचल होते हैं।
अपने बच्चों को अच्छा समाजिक व संवाद कौशल सिखाएँ जो अन्य बच्चों से अच्छी मित्रता करने में उनकी मदद करेगा।
ध्यान दें कि बच्चे का ध्यान रखने वाले अन्य लोग दैनिक कामकाज और आरचणगत लक्ष्यों से परिचित हों। इससे आपके बच्चे को दिन भर एक समान व्यवहार मिलेगा।

हम ए डी एच डी से ग्रस्त बच्चे को बड़ा करने की चुनौतियों का सामना कैसे कर सकते हैं ?
शिक्षक तो हर साल बदलेंगे, लेकिन माता-पिता नहीं,
इसीलिए आप ही अपने बच्चे के श्रेष्ठ एवं सबसे महत्त्वपूर्ण शिक्षक हैं।
हर दिन अपने बच्चे के साथ एक समय में एक योजना करें। आपका सिर्फ 10-15 मिनट का साथ भी बच्चे को समझाने में सहायक होगा कि वह आपके लिए खास है। इस खास समय के दौरान अपने बच्चे के क्रियाकलापों पर नज+र रखें, इससे आप दोनों ही जुड़ाव और स्नेह का अनुभव करेंगे।
वैसा व्यवहार करें जैसा आप अपने बच्चे से चाहते हैं। एक अच्छा आदर्श बनें।

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