मन ही मनुष्य है...

÷ मनोवेद डाइजेस्ट ' का ÷ जुलाई-सितंबर ०७ ' अंक प्राप्त हुआ , धन्यवाद , पत्रिका पढ़कर मन बेहद प्रसन्न हुआ। पत्रिका का स्लोगन ÷ मन ही मनुष्य है ' बेहद सटीक व उपयुक्त लगा। आपने सही कहा मन ही मनुष्य है। क्योंकि शरीर तो मन का गुलाम है। जैसा मन वैसा तन , अगर आपका मन बीमार है तो तन अपने आप बीमार हो जाता है। किसी ने ठीक ही कहा है , ÷ मन जीते जगजीत है , मन के हारे हार ' ।

आजकल शारीरिक स्वास्थ्य की पत्रिकाओं की बाजार में बाढ़ सी आई हुई है। लेकिन मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित एक भी पत्रिका बाजार में ढूंढे+ से भी नहीं मिलती। जबकि आज के तनावपूर्ण समय में सबसे ज्यादा जरूरत मानसिक स्वास्थ्य की पत्रिकाओं की है , क्योंकि आज हर मनुष्य मानसिक परेशानियों से घिरा हुआ है। इस तनाव की वजह से ही शारीरिक स्वास्थ्य बिगड़ रहा है। इस तनावपूर्ण जि+ंदगी में इस तरह की पत्रिका एक ताजे हवा के झोंके की तरह है , रेगिस्तान में कुएं की तरह है।

हिन्दी में सबसे पहले इस तरह की पत्रिका निकालने का साहस करने के लिए आप बधाई के पात्र हैं।

अब एक सुझाव देना चाहता हूं कि पत्रिका के हर अंक में एक स्थाई कालम ÷ समीक्षा ' नाम से शुरू करें जिसमें देश-विदेश की मानसिक रोगों से संबंधित किताबों की समीक्षा छापे या उन महान व्यक्तियों , जो मानसिक रोगों से पीड़ित रहे हो और उनसे उबरकर अपनी महानता हासिल की हो , की जीवनी या आत्मकथाओं की समीक्षा छापें।

एक स्थाई कालम ऐसा हो जिसमें पाठकों से ऐसे लेख आमंत्रित करें जिसमें उनके या उनके नजदीकियों की मानसिक समस्याओं व बीमारियों से उबरने की आपबीती हो।

ये दोनों कालम शुरू करने पर पत्रिका को चार चांद लग जाएंगे।

राजकुमार मक्कड़ , ८७५/२२ , झंग कालोनी , दिल्ली रोड , रोहतक ( हरियाणा)


जीवन की प्रतिष्ठित होती अर्थवत्ता

÷ मनोवेद डाइजेस्ट ' ज्ञानरंजन जी ने मुझे पढ़ने को दी थी और इसे अपनी आदतों के विरुद्ध बहुत मनोयोग से पढ़ा। मनोयोग से इसलिए कि इसमें जो सामग्री है , वह दुर्लभ है और हाथ पकड़कर बाध्य करती है। मन की जटिलतम संरचना और उसकी अमूर्त उपस्थिति के संदर्भों को सरलतम ढंग से आपने अपने सम्पादकीय में अभिव्यक्त किया है। दरअसल , मन से सबन्धित बातों को यथार्थ के धरातल पर लाकर कह पाना जोखिम भरा है , क्योंकि यहां से एक रास्ता छद्म आध्यात्मिकता की ओर भी जाता है। पुरोहितों , तथाकथित आचार्यों और प्रवचनकर्ताओं की दुकानें वहां सजी हैं और मासूम , निर्दोष लोगों के शांतिस्थल वहां से लापता हैं।

अर्थोपार्जन के क्षेत्र में अनथक सक्रिय लोगों के लिए पत्रिका बेहद कारगर हो सकती है। पूंजी के रास्तों की एक सपाट ढलान अब इस देश में निर्माणधीन है , उसका एक बाइपास पहले से निर्मित है। यहां भीड़ लगातार बढ़ रही है। इसे रोक पाना कठिनतर होता जा रहा है। तब ऐसे में इस पत्रिका का प्रादुर्भाव विस्मित करता है। ÷ हर्ष के नेपथ्य में व्याकुल उदासीनता ' के इस दौर में सार्थक नियति के मार्ग को चौड़ा करने का प्रयास इस पत्रिका में परिलक्षित है। वान गॉग से लेकर सिल्विया प्लाथ तक के प्रसंगों से जीवन की अर्थवत्ता प्रतिष्ठित होती है।

राजेन्द्र दानी , १५ , के. जी. बोस नगर गढा , जबलपुरदृ४८२००३ ( म.प्र.)


अच्छा आरंभ

÷ मनोवेद डाइजेस्ट ' का पहला अंक बहुत अच्छा है। वानगॉग पर पुस्तक का सारांश तथा चर्चिल पर रोहित प्रकाश के आलेख बहुत ही स्तरीय हैं। इतने अच्छे आरंभ के लिए मेरी हार्दिक बधाई।

विजेन्द्र नारायण सिंह , छाता चौक , मुजफ्फरपुर ( बिहार)


काम की पत्रिका

मनोवेद तो बड़े काम की पत्रिका है...सब नया लगा...सिनेमा वाला पक्ष बेहतर लगा...मनोरोगियों के लक्षण , अच्छे लगे...हिन्दी में शायद यह अकेली पत्रिका है...कुल मिलाकर अंक अच्छा लगा
...इसका स्वागत किया जाना चाहिए।

बोधिसत्व , मुंबई

इस अंक में
मन माने की बात बातचीत
माइंड योर लैंग्वेज यानी जुबान सँभाल के
डॉ विनय कुमार
शब्दों के अर्थ शुरुआती अर्थों तक ही सीमित नहीं रहते। सभ्यता की विकास-यात्र में समय-समय पर नए अर्थ जुड़ते जाते हैं। यह आवश्यक नहीं कि नए अर्थों की आमद सकारात्मक ही हो।
दुख को बेहतर समझती है मनोचिकित्सा...
डॉ. नरेन्द्रनाथ विग से डॉ. विनय कुमार की बातचीत
जीवन और ज्ञान की विविधताओं के गहरे अध्येता डॉ. एन.एन.विग भारतीय मनोचिकित्सा जगत की उज्ज्वलतम उपस्थितियों में से एक हैं।
 
मन माने की बात डायरी
रचनाकार की पूंजी होती है बचपन की ...
डॉ. नरेन्द्रनाथ विग से डॉ. विनय कुमार की बातचीत
अपनी कविताओं में मनुष्य और उसके जीवन के प्रति समाहित होनेवाले कथ्य को आप किस रूप में देखते हैं ? पानी में घिरे हुए लोग शीर्षक कविता की रचना प्रक्रिया के बारे में बताएं।
....फ्रायड ग़ायब और इन्द्र मुस्कुरा रहा था
लीलाधर मंडलोई
हिन्दी कविता के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर और दूरदर्शन के महानिदेशक लीलाधर मंडलोई कविता के अतिरिक्त गद्य लेखन के लिए भी जाने जाते हैं। वर्षों से वे अपनी मनःस्थितियां डायरी में दर्ज करते रहे हैं।
मनोचिकित्सक की कलम से मनोचिकित्सक की कलम से
हिस्टीरिया की कहानी : डॉ. प्रमोद कुमार सिंह
सचमुच यह अब एक कहानी मात्र ही रह गयी है, क्योंकि विशेषज्ञों ने इस शब्द का प्रयोग बन्द कर दिया है। किन्तु इस शब्द की प्रासंगिकता अभी बनी हुई है, क्योंकि जनमानस में यह शब्द अभी पूर्ण जीवंत रूप में कायम है। इसकी प्रासंगिकता इसलिए भी बनी हुई है क्योंकि जिन मनोशारीरिक दशाओं के लिए इसका प्रयोग किया जाता था, वे अभी भी लगभग उसी रूप में,
मनोरोगियों के परिवारों की चुनौतियां :
जे.के. त्रिवेदी/श्याम बिहारी राय/मोहन ध्यानी

मानसिक रोगों से कोई व्यक्ति, समाज अथवा देश प्रतिरक्षित नही है। इन रोगों का व्यक्ति के ऊपर गंभीर मनोवैज्ञानिक,सामाजिक व
 
मनोचिकित्सक की कलम से मनोचिकित्सक की कलम से
बढ़ती उम्र का सामना : डॉ. चित्तरंजन एन्ड्राडे
किशोरावस्था के अन्तिम तथा युवावस्था के आरंभिक वर्षों में बौद्धिक क्षमता अपने उच्चतम स्तर पर रहती है। इसके बाद इसमें लगातार गिरावट आती है, पर यह बात पचास या साठ की उम्र के बाद ही पता चलती है। बढ़ती उम्र के साथ हाल की घटनाओं की याददाश्त भी कम हो जाती है।
मनोरोगियों को बेड़ियाँ क्यों नेहा सईद सईद अख्तर
इस सभ्य समाज में भी मनोरोगियों के साथ परिवार, समाज और कभी-कभी तो विभिन्न चिकित्सा प्रणालियों के माननीय दिग्गजों के द्वारा जो व्यवहार होता है, वह बड़ा ही दिल दहलाने वाला होता है। रोगियों को आज भी हथकड़ियों से जकड़ कर रखा जाता है, रस्सियों से उनके हाथ पैर बाँध दिए जाते हैं , कमर में रस्सी बाँध कर जानवरों की तरह खींचा जाता है।
 
नोटिस बोर्ड नोटिस बोर्ड
पागलपन नहीं सायकोसिस
एक शब्द है पागल'। इस शब्द का हमारे जीवन में बड़ा महत्त्व है। दुनिया में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं जिसे कभी पागल न कहा गया हो। कोई भी मां बच्चे की ऊल-जुलूल, लेकिन मासूम हरकत पर कहती है, धत पागल और बच्चे की छोटी-सी गलती पर बड़ा दंड देने पर उतारू पिता को कहती है, पागल हो गए हैं क्या?
प्रसवोत्तर अवसाद
पुराण बताते हैं कि एक बार समुद्र का मंथन हुआ था और उससे चौदह रत्न निकले थे। यह भी बताते हैं कि किस रत्न को किस देवता अथवा किस असुर ने ग्रहण किया था, किंतु यह नहीं बताते कि मथे जाने और रत्नदान के बाद समुद्र ने क्या महसूस किया। समुद्र को ठीक वैसा ही लगा होगा जैसा फसल दे चुकने
 
नोटिस बोर्ड नोटिस बोर्ड

अटेंशन डेफिसिट हायपरएक्विविटी डिसॉर्डर
अभिभावक के रूप में आप अपने बच्चे का जीवन गढ़ने में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसी संभावना हो सकती है कि आपका बच्चा अटेंशन डेफिसिट हायपरएक्विविटी डिसॉर्डर (ए डी एच डी) का शिकार हो। आएं जानें कि–

ए डी एच डी क्या है ?

मनोरोग के लक्षण
¨ नींद में कमी , भूख में कमी , क्रोध आना , तोड़-फोड़ , मार-पीट , बेवजह डर , शक , बहुत कम या बहुत अधिक बात करना , अकेले बैठकर बुदबुदाना या मुस्कुराना , डायन या भूत का डर , कोई कहीं नहीं बोले तब भी आवाज सुनना , पत्नी को पति के अथवा पति को पत्नी के चरित्र पर बेवजह शक , गांजा , भांग , शराब , स्मैक आदि की लत।
 
बाल मन बाल मन
शिक्षा की अनोखी अवधारणा : मॉन्टेसरी स्कूल : मीनू मंजरी
रंग.विवरंगी मेज'कुर्सिया, खिलौनों से भरी अलमारी, समूहों में बैठे अपने काम में र्मग्‍न बच्‍चे यह द़श्‍य पारंपारकि पाछशाला से काफी भिन्‍न है ा पर दुनिया भर से मॅान्‍टेसरी स्‍कूलों की सफलता ने शिक्षा की इस अवधारणा को मान्‍य बनाया हैा
बच्चों को कहां ले जा रहा है मीडिया : नरेन
हलांकि प्रिट मीडिया हो चाहे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रायः हर किस्म का मीडिया वर्ग अपनी सामूहिक गतिविधियों के मद्देनजर लगभग पूरी तरह से मनी मिटिंग, वीभत्स बाजारू उत्पाद में तब्दील हो चुका है; लेकिन उसका पाखण्डी और आतंककारी दंभ उत्तरोत्तर परवान ही चढ़ता जा रहा है कि वह
 
निष्कलंक निष्कलंक
बु्रक शील्ड्स : विनोद अनुपम
14 मई 2007, दिन के दो बजे थे। सैनडिएगो(कैलिफोर्निया) के कन्वेंशन सेंटर में अमेरिका की प्रसिद्ध मनोचिकित्सक नैन्सी ऐन्ड्रियासन को सुनने के लिए हॉल में लगभग 500 मनोचिकित्सक बैठे थे। भाषण शुरू होने में कुछ विलम्ब था। मेरी सीट की दाहिनी तरफ बैठे सज्जन ने बायीं तरफ बैठे सज्जन से पूछा -
गोरख पांडेय! यादों के आईने में चमन लाल
किसी भी कवि के लिए सबसे बड़ी चुनौती है–गंभीर अर्थों से भरे लोकगीत लिखना। हक की लड़ाई लड़नेवालों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलनेवाले गोरख पांडेय ने यह कठिन काम तो आसानी से किया, मगर पारानॉयड स्किजोफ्रेनिया की मुश्किलों से पार नहीं पा सके। उन्होंने आत्महत्या कर ली।
 
क्रूरता की शिनाख्त क्रूरता की शिनाख्त
रैगिंग को सामाजिक वर्ग ढांचे में देखें : स्वतंत्र मिश्र
उच्च संस्थानों में रैगिंग एक आम समस्या बन गयी है। हाल ही में भारत के एक प्रतिष्ठित कॉलेज सेंट स्टीफेंस में कुछ सीनियर छात्रों द्वारा एक जूनियर छात्र को प्रताड़ित करने का मामला सामने आया है। इस घटना में सीनियर लड़कों ने अपने एक जूनियर के र डियोडरेंड खूशबू उत्पन्न करने वाला इत्र जैसा कुछ स्प्रेे छिड़कर उसको आग लगा दिया गया।
खुद की खबर पर खामोश मीडिया :
वर्तिका नन्दा सहाय
दो साल पहले दिल्ली पब्लिक स्कूल के दो छात्रों का जो अश्लील एमएमएस बना, वह बे्रकिंग न्यूज थी, देश भर ने वो तस्वीरें देखीं और जनता नैतिकता पर मीडिया की चिल्लाहट की गवाह बनी, लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि
 
 
इस अंक की दवा
लिथियम कार्बोनेट
   
बाल मन

शिक्षा की अनोखी अवधारणा : मॉन्टेसरी स्कूल : मीनू मंजरी

बच्चों को कहां ले जा रहा है मीडिया : नरेन

   
किताब के बहाने
श्रेष्ठता ग्रंथि से पीड़ित लोग : कुमार मुकुल
   
मनोव्यथा
हर कार मेरा पीछा कर रही थी : कमल
   
मीडिया पर निगाह
बाजार ही मीडिया का राष्ट्र और धर्म है : अनिल चमड़िया
   
क्रूरता की शिनाख्त
टीवी एंकरों की खुदकुशी और टीआरपी : मृणाल वल्लरी
   
विश्लेषण
अवसाद : चारुवाक
   
सपने
मेरे तीन सपने : उनका क्या करूं ? : बोधिसत्व
   
जनगीत
   
कहानी
मुश्किल : सन्तोष चौबे
   
काव्य कथा
शान्ता : उद्भ्रान्त
   
फिल्म
   
व्यंग्य  झूठ बोलने के फायदे : विष्णु नागर
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