टी.वी. एंकरों की खुदकुशी और टीआरपी
मृणाल वल्लरी
|
बहुत दिन नहीं बीते हैं जब नोएडा से चलने वाले एक प्रसिद्ध और राष्ट्रीय कहे जाने वाले टीवी चैनल की एक एंकर ने खुदकुशी कर ली। उसकी नौकरी छूट गई थी और वह लगातार तनाव से गुजर रही थी। इसके कुछ ही दिन बाद देश की राजधानी से ही चलने वाले एक और चैनल की एक और एंकर ने खुदकुशी कर ली। मरने से पहले उसने अपने नोट में खुद को लगातार प्रताड़ित किए जाने की बात लिखी थी। और यह भी कि कैसे उसका बॉस उसके काम को नजरअंदाज कर अपनी बेटी को तरजीह दे रहा था।
वक्त-बेवक्त पति-पत्नी के झगड़ों को भी लाइव दिखाने और किसी भी छोटी-बड़ी घटना पर एसएमएस मंगाने में आगे रहने वाले सभी चैनलों ने दन दोनो एंकरों की खुदकुशी पर किसी की बाइट लेना तो दूर, इसकी खबर तक चलाना जरूरी नहीं समझा। लेकिन इसी दौरान एक टीवी चैनल ने मॉडल बनी भिखारन द्यशीर्षक से एक ब्रेकिंग स्टोरी दिखाई। यह एक ऐसे मॉडल की कहानी थी, जो मिस यूनिवर्स सुष्मिता सेन के साथ काम कर चुकी है। चैनल के कैमरामैनों को देखते ही उस अर्द्धविक्षिप्त मॉडल ने जिस तरह से मॉडलिंग की विभिन्न मुद्राएं बनानी शुरू कर दी, उससे उसकी प्रतिभा का अंदाजा लगाया जा सकता था। फलक से फुटपाथ पर पहुंची वह मॉडल इस हालत में भी फर्राटेदार अंग्रेजी में फैशन और ग्लैमर के बारे में बता रही थी। उसके आत्मविश्वास को देख कर कोई भी आश्चर्य कर सकता था, तो दिल्ली के प्रतिष्ठित लेडी श्रीराम कॉलेज से गे्रजुएट उस लड़की की हालत देख कर कोई भी तरस खा सकता था। इस ब्रेकिगं स्टोरी की मार्फत चैनल ने इस मॉडल की तकलीफ बयान करने में कोई कमी नहीं छोड़ी।
तस्वीर बिल्कुल साफ है। किसी मरी हुई खबर को भी बे्रकिंग बना कर टीआरपी बटोरने वाले चैनलों के लिए दोनों एंकरों की खुदकुशी की खबर शायद ज्यादा मसालेदार साबित होती। लेकिन फिर उस तिलस्म की परतें भी उघड़ जातीं, जिसकी चकाचौंध में सब कुछ सुहाना और महान दिखता है।
दरअसल, खुद को सबसे तेज या अव्वल साबित करने की कोशिश में पत्रकारिता का धमाकेदार ब्रेकिंग न्यूज की शरण लेना मजबूरी बनती जा रही है। भले ही इस प्रवृति से उनकी प्रतिबद्धता और ईमानदारी पर गहरे सवाल उठने लगें। उमा खुराना पर किए गए तथाकथित स्टिंग ऑपरेशन के पर्दाफाश के बाद जो तस्वीर उभरी है, उससे पार पाना चैनलों के लिए क्या इतना सहज होगा ?
दूसरी ओर सच यह है कि कम से कम इलेक्ट्रॅानिक मीडिया में ग्लैमर और प्रतिभा के इस घालमेल के इस दौर ने एक टीवी एंकर और रैंप की मॉडल के बीच कोई खास फर्क नहीं रहने दिया है। पच्चीस साल की होते-होते किसी मॉडल के कैरियर पर खतरा मंडराने लगता है। उसके शरीर पर बढ़ती चर्बी, चेहरे पर आती मेच्योरिटी, और उसके बाद आने वाली पतली-छरहरी लडकी उसके कैरियर के लिए खतरे की घंटी होती है। यही हालत टीवी एंकर की भी है। भले आप उमा भारती को उत्तर प्रदेश की सांसद बता दें या फिर टोनी ब्लेयर को अमेरिका का राष्ट्रपति- आपका चेहरा सुदर्शन है तो सब कुछ आराम से खप जाएगा।
कौन जानता है कि कास्टिंग काउच का सिरा बॉलीवुड से चल कर कहां-कहां पहुंचता है। आज का हिडेन कैमरा दीवारों के पार की तस्वीरें आसानी से उतार लेता है, लकिन चैनलों की चहारदीवारी के भीतर जाने किस धुंध का शिकार हो जाता है। शायद ऐसी ही कुछ वजहों से कहा जाने लगा है कि समाज, राजनीति या दुनिया के अंधेरे कोनों का पर्दाफाश करने वाले चैनलों के अंदर की दुनिया भी उतनी ही लिजलिजी हैं।
जैसे -जैसे चैनलों ने गांव-गांव तक अपने पांव पसारे हैं-सुष्मिता सेन या मलईका अरोड़ा या टीवी पर दिखने वाले खूबसूरत चेहरे, लड़कियों के आदर्श बने। खासतौर पर शहरी समाज में मेकओवर जैसेद्यशब्दों को पहचान मिली और ग्लैमर की अंधी दौड़ ने कम से कम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को टीआरपी का खेल बना दिया। अगर कोई लड़की टीवी में एंकरिंग करती है तो देश-दुनिया की खबरों से ज्यादा फिक्र उसे एक मॉडल की तरह अपने शरीरिक समीकरण की होती है अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा वह खुद को मेनटेन रखने पर खर्च करती है, ताकि ज्यादा दिनों तक उसकी मांग बनी रहे। एक आधुनिक होती लड़की ने चाहा था कि उसे सामाजिक बेड़ियों और वर्जनाओं से मुक्ति मिलेगी, लेकिन उसे मुक्ति मिली उसके कपड़ों से।
हमारे यहां पुरुषों पर फिटनेस का दबाव आज भी ज्यादा नहीं है। जबकि महिलाओं पर काम और ग्लैमर की दोहरी मार पड़ रही है। मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि आज के दौर में यहां नौकरीशुदा औरतों पर दबाव बहुत ज्यादा है और शरीर को सुंदर या आकर्षक बनाए रखने की चाह उसे भीतर से घुन की तरह खाए जा रही है। दो साल पहले दिल्ली के एक बंद कमरे से राखी नाम की एक
मॉडल की लाश मिली थी। बाद में पता चला कि उसकी मौत भूख से हुई थी। और कि ग्लैमर और रोटी में से उसने ग्लैमर को चुना था।
तो क्या उसी तरह के दबावों से पैदा हुआ अवसाद अब महिला टीवी एंकरों के बीच भी पसरने लगा है ? सवाल यह भी है कि चैनलों के लिए उन दो एंकरों की खुदकुशी की खबर क्या इसलिए गैरजरूरी रही कि इससे टीआरपी में कोई इजाफा नहीं होता ? बात शायद इसके उलट साबित होती, अगर उन एंकरों की खुदकुशियों की भी बे्रकिंग न्यूज बनाया जाता। लेकिन अगर होता तो शायद शीशे के इन घरों के भीतर टंगे पर्दो का फाश भी हो जाता।
... |