इस अंक में
मन माने की बात बातचीत
माइंड योर लैंग्वेज यानी जुबान सँभाल के
डॉ विनय कुमार
शब्दों के अर्थ शुरुआती अर्थों तक ही सीमित नहीं रहते। सभ्यता की विकास-यात्र में समय-समय पर नए अर्थ जुड़ते जाते हैं। यह आवश्यक नहीं कि नए अर्थों की आमद सकारात्मक ही हो।
दुख को बेहतर समझती है मनोचिकित्सा...
डॉ. नरेन्द्रनाथ विग से डॉ. विनय कुमार की बातचीत
जीवन और ज्ञान की विविधताओं के गहरे अध्येता डॉ. एन.एन.विग भारतीय मनोचिकित्सा जगत की उज्ज्वलतम उपस्थितियों में से एक हैं।
 
मन माने की बात डायरी
रचनाकार की पूंजी होती है बचपन की ...
डॉ. नरेन्द्रनाथ विग से डॉ. विनय कुमार की बातचीत
अपनी कविताओं में मनुष्य और उसके जीवन के प्रति समाहित होनेवाले कथ्य को आप किस रूप में देखते हैं ? पानी में घिरे हुए लोग शीर्षक कविता की रचना प्रक्रिया के बारे में बताएं।
....फ्रायड ग़ायब और इन्द्र मुस्कुरा रहा था
लीलाधर मंडलोई
हिन्दी कविता के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर और दूरदर्शन के महानिदेशक लीलाधर मंडलोई कविता के अतिरिक्त गद्य लेखन के लिए भी जाने जाते हैं। वर्षों से वे अपनी मनःस्थितियां डायरी में दर्ज करते रहे हैं।
 
मनोचिकित्सक की कलम से मनोचिकित्सक की कलम से
हिस्टीरिया की कहानी : डॉ. प्रमोद कुमार सिंह
सचमुच यह अब एक कहानी मात्र ही रह गयी है, क्योंकि विशेषज्ञों ने इस शब्द का प्रयोग बन्द कर दिया है। किन्तु इस शब्द की प्रासंगिकता अभी बनी हुई है, क्योंकि जनमानस में यह शब्द अभी पूर्ण जीवंत रूप में कायम है। इसकी प्रासंगिकता इसलिए भी बनी हुई है क्योंकि जिन मनोशारीरिक दशाओं के लिए इसका प्रयोग किया जाता था, वे अभी भी लगभग उसी रूप में,
मनोरोगियों के परिवारों की चुनौतियां :
जे.के. त्रिवेदी/श्याम बिहारी राय/मोहन ध्यानी

मानसिक रोगों से कोई व्यक्ति, समाज अथवा देश प्रतिरक्षित नही है। इन रोगों का व्यक्ति के ऊपर गंभीर मनोवैज्ञानिक,सामाजिक व
 
मनोचिकित्सक की कलम से मनोचिकित्सक की कलम से
बढ़ती उम्र का सामना : डॉ. चित्तरंजन एन्ड्राडे
किशोरावस्था के अन्तिम तथा युवावस्था के आरंभिक वर्षों में बौद्धिक क्षमता अपने उच्चतम स्तर पर रहती है। इसके बाद इसमें लगातार गिरावट आती है, पर यह बात पचास या साठ की उम्र के बाद ही पता चलती है। बढ़ती उम्र के साथ हाल की घटनाओं की याददाश्त भी कम हो जाती है।
मनोरोगियों को बेड़ियाँ क्यों नेहा सईद सईद अख्तर
इस सभ्य समाज में भी मनोरोगियों के साथ परिवार, समाज और कभी-कभी तो विभिन्न चिकित्सा प्रणालियों के माननीय दिग्गजों के द्वारा जो व्यवहार होता है, वह बड़ा ही दिल दहलाने वाला होता है। रोगियों को आज भी हथकड़ियों से जकड़ कर रखा जाता है, रस्सियों से उनके हाथ पैर बाँध दिए जाते हैं , कमर में रस्सी बाँध कर जानवरों की तरह खींचा जाता है।
 
नोटिस बोर्ड नोटिस बोर्ड
पागलपन नहीं सायकोसिस
एक शब्द है पागल'। इस शब्द का हमारे जीवन में बड़ा महत्त्व है। दुनिया में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं जिसे कभी पागल न कहा गया हो। कोई भी मां बच्चे की ऊल-जुलूल, लेकिन मासूम हरकत पर कहती है, धत पागल और बच्चे की छोटी-सी गलती पर बड़ा दंड देने पर उतारू पिता को कहती है, पागल हो गए हैं क्या?
प्रसवोत्तर अवसाद
पुराण बताते हैं कि एक बार समुद्र का मंथन हुआ था और उससे चौदह रत्न निकले थे। यह भी बताते हैं कि किस रत्न को किस देवता अथवा किस असुर ने ग्रहण किया था, किंतु यह नहीं बताते कि मथे जाने और रत्नदान के बाद समुद्र ने क्या महसूस किया। समुद्र को ठीक वैसा ही लगा होगा जैसा फसल दे चुकने
 
नोटिस बोर्ड नोटिस बोर्ड

अटेंशन डेफिसिट हायपरएक्विविटी डिसॉर्डर
अभिभावक के रूप में आप अपने बच्चे का जीवन गढ़ने में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसी संभावना हो सकती है कि आपका बच्चा अटेंशन डेफिसिट हायपरएक्विविटी डिसॉर्डर (ए डी एच डी) का शिकार हो। आएं जानें कि–

ए डी एच डी क्या है ?

मनोरोग के लक्षण
¨ नींद में कमी , भूख में कमी , क्रोध आना , तोड़-फोड़ , मार-पीट , बेवजह डर , शक , बहुत कम या बहुत अधिक बात करना , अकेले बैठकर बुदबुदाना या मुस्कुराना , डायन या भूत का डर , कोई कहीं नहीं बोले तब भी आवाज सुनना , पत्नी को पति के अथवा पति को पत्नी के चरित्र पर बेवजह शक , गांजा , भांग , शराब , स्मैक आदि की लत।
 
बाल मन बाल मन
शिक्षा की अनोखी अवधारणा : मॉन्टेसरी स्कूल : मीनू मंजरी
रंग.विवरंगी मेज'कुर्सिया, खिलौनों से भरी अलमारी, समूहों में बैठे अपने काम में र्मग्‍न बच्‍चे यह द़श्‍य पारंपारकि पाछशाला से काफी भिन्‍न है ा पर दुनिया भर से मॅान्‍टेसरी स्‍कूलों की सफलता ने शिक्षा की इस अवधारणा को मान्‍य बनाया हैा
बच्चों को कहां ले जा रहा है मीडिया : नरेन
हलांकि प्रिट मीडिया हो चाहे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रायः हर किस्म का मीडिया वर्ग अपनी सामूहिक गतिविधियों के मद्देनजर लगभग पूरी तरह से मनी मिटिंग, वीभत्स बाजारू उत्पाद में तब्दील हो चुका है; लेकिन उसका पाखण्डी और आतंककारी दंभ उत्तरोत्तर परवान ही चढ़ता जा रहा है कि वह
 
निष्कलंक निष्कलंक
बु्रक शील्ड्स : विनोद अनुपम
14 मई 2007, दिन के दो बजे थे। सैनडिएगो(कैलिफोर्निया) के कन्वेंशन सेंटर में अमेरिका की प्रसिद्ध मनोचिकित्सक नैन्सी ऐन्ड्रियासन को सुनने के लिए हॉल में लगभग 500 मनोचिकित्सक बैठे थे। भाषण शुरू होने में कुछ विलम्ब था। मेरी सीट की दाहिनी तरफ बैठे सज्जन ने बायीं तरफ बैठे सज्जन से पूछा -
गोरख पांडेय! यादों के आईने में चमन लाल
किसी भी कवि के लिए सबसे बड़ी चुनौती है–गंभीर अर्थों से भरे लोकगीत लिखना। हक की लड़ाई लड़नेवालों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलनेवाले गोरख पांडेय ने यह कठिन काम तो आसानी से किया, मगर पारानॉयड स्किजोफ्रेनिया की मुश्किलों से पार नहीं पा सके। उन्होंने आत्महत्या कर ली।
 
क्रूरता की शिनाख्त क्रूरता की शिनाख्त
रैगिंग को सामाजिक वर्ग ढांचे में देखें : स्वतंत्र मिश्र
उच्च संस्थानों में रैगिंग एक आम समस्या बन गयी है। हाल ही में भारत के एक प्रतिष्ठित कॉलेज सेंट स्टीफेंस में कुछ सीनियर छात्रों द्वारा एक जूनियर छात्र को प्रताड़ित करने का मामला सामने आया है। इस घटना में सीनियर लड़कों ने अपने एक जूनियर के र डियोडरेंड खूशबू उत्पन्न करने वाला इत्र जैसा कुछ स्प्रेे छिड़कर उसको आग लगा दिया गया।
खुद की खबर पर खामोश मीडिया :
वर्तिका नन्दा सहाय
दो साल पहले दिल्ली पब्लिक स्कूल के दो छात्रों का जो अश्लील एमएमएस बना, वह बे्रकिंग न्यूज थी, देश भर ने वो तस्वीरें देखीं और जनता नैतिकता पर मीडिया की चिल्लाहट की गवाह बनी, लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि
 
 
इस अंक की दवा
लिथियम कार्बोनेट
   
बाल मन

शिक्षा की अनोखी अवधारणा : मॉन्टेसरी स्कूल : मीनू मंजरी

बच्चों को कहां ले जा रहा है मीडिया : नरेन

   
किताब के बहाने
श्रेष्ठता ग्रंथि से पीड़ित लोग : कुमार मुकुल
   
मनोव्यथा
हर कार मेरा पीछा कर रही थी : कमल
   
मीडिया पर निगाह
बाजार ही मीडिया का राष्ट्र और धर्म है : अनिल चमड़िया
   
क्रूरता की शिनाख्त
टीवी एंकरों की खुदकुशी और टीआरपी : मृणाल वल्लरी
   
विश्लेषण
अवसाद : चारुवाक
   
सपने
मेरे तीन सपने : उनका क्या करूं ? : बोधिसत्व
   
जनगीत
दुनिया नष्ट नहीं होगी : नचिकेता
   
कहानी
मुश्किल : सन्तोष चौबे
   
काव्य कथा
शान्ता : उद्भ्रान्त
   
फिल्म

ओंकारा : विनोद अनुपम

ऑथेलो : अनामिका

   
व्यंग्य  झूठ बोलने के फायदे : विष्णु नागर
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मनोवेद
अंक – 1 वर्ष – 1 जनवरी–मार्च, 2008

मनोचिकित्‍सक के कलाम से

मनोरोगियों के परिवारों की चुनौतियां
डॉ. जे.के. त्रिवेदी , श्याम बिहारी राय , डॉ. मोहन ध्यानी

मानसिक रोगों से कोई व्यक्ति, समाज अथवा देश प्रतिरक्षित नहीें है। इन रोगों का व्यक्ति के ऊपर गंभीर मनोवैज्ञानिक, सामाजिक व आर्थिक प्रभाव पड़ता है। विश्व में लगभग 40 करोड़ लोग मनोवैज्ञानिक समस्याओं और मानसिक रोगों से पीड़ित हैं। स्वास्थ्य सेवाओं में परामर्श हेतु आने वाले प्रत्येक चार व्यक्तियों में कम से कम एक मनोवैज्ञानिक समस्या से ग्रस्त होता है, जिसका कि अक्सर उचित इलाज तो दूर, सही निदान भी नहीं हो पाता। इन मरीजों को लांछित किया जाता है व इन्हें समुदाय तथा चिकित्सा व्यवसाय का तिरस्कार भी झेलना पड़ता है। वे तिरस्कार, भ्रांति व गलत विचार, अन्धविश्वास और अनुपयुक्त इलाज के शिकार होते हैं। ग्रामीण व पिछड़े लोगों के साथ-साथ शिक्षित व शहरी लोग भी समान रूप से मानसिक रोगों से बचाव, शीघ्र पहचान और उपयुक्त इलाज के बारे में अनभिज्ञ हैं। मानसिक रोगों से सम्बद्ध लांछन, रोजगार, विवाह के अवसर व पास पड़ोस तथा समाज के सहयोग को कम कर देते हैं।
विगत चार दशकों में मानसिक रोगियों के इलाज की अवधारणा में तीव्र परिवर्तन आया है। वर्तमान में संस्थागत देखभाल की जगह रोगियों को अस्पताल में आवश्यकतानुसार भर्ती रखने के उपरान्त उन्हें उनके समुदाय में पुनःस्थापित करने व रोगी की देखभाल में परिवार को शामिल करने पर जोर दिया जाता है।

परिवार की भूमिका : विभिन्न शोधों व अन्तर्राष्ट्रीय अध्ययनों में पाया गया है कि मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में परिवार का अमूल्य योगदान है। एक सार्वभौमिक प्राथमिक सामाजिक इकाई के रूप में परिवार का इसके सदस्यों के विकास, सुरक्षा एवं समग्र कुशलता के अनेक कार्यों में महत्त्वपूर्ण स्थान है।
एक इकाई के रूप में परिवार कई तरह के कार्यों का सम्पादन करता है जोकि प्रमुख रूप से जैविक, सामाजिक और सांस्कृतिक होते हैं। प्राथमिक स्तर पर ये कार्य, सुरक्षा, लालन-पालन, सदस्यों की सांवेगिक आवश्यकताओं की संतुष्टि, पुनरुत्पादकता के द्वारा यौन आवश्यकताओं की संतुष्टि, बच्चों का सामाजीकरण और वित्तीय तथा आर्थिक सहयोग हैं। द्वितीयक कार्य; राजनीतिक, रीतिरिवाज या धार्मिक प्रवृत्ति से सम्बद्ध हैं।
इन्हीं कार्यों से परिवार की रोग के ठीक होने में भूमिका एवं उसे निभाने की योग्यता का अभ्युदय होता है।
मानसिक रोगियों की देख-भाल में परिवार की विशेष भूमिका को हमारे चिकित्सकीय अवलोकनों से बल मिलता है। बहुत से अनुसंधान अध्ययनों से यह पता चला है कि परिवार मनोचिकित्सा में महत्त्वपूर्ण सहायक हो सकता है और इनका भरपूर उपयोग होना चाहिए।
पहले के परम्परागत परिवारों से भिन्न अब परिवारों पर मानसिक बीमारियों का कारण होने का आरोप नहीं लगता, बल्कि अब परिवारों को गंभीर मानसिक बीमारियों में अनुकूल परिणाम हेतु मुख्य स्रोत के रूप में माना जाता है। वर्तमान अवधारणा के अनुसार देख-भाल के बोझ से निपटने में परिवारों की सहायता की जाती है। हालांकि, परिवार का प्रत्युत्तर उसकी क्षमता के स्तर व उसके अनुकूलन के कौशल पर निर्भर करता है।

परिवार को क्यों शामिल करें : बहुत से कारण हैं जिनकी वजह से मनोरोगियों की दैनिक देखभाल में परिवार की सहभागिता के महत्त्व का पता चलता है। ये निम्न हैं :
1. परिवार के सदस्य एवं रिश्तेदार मानसिक रोगियों के मुख्य देख-भाल करने वाले होते हैं। ये दवा लेने का पर्यवेक्षण करते हैं और मरीज को सांवेगिक व सामाजिक सहयोग देते हैं।
2. जब परिवार का कोई सदस्य पहली बार मानसिक बीमारी से ग्रसित होता है तो परिजन अक्सर यह नहीं जानते कि क्या गड़बड़ है। वे अजीब व्यवहारों को देखते हैं और ये मान सकते हैं कि ये स्वतः समाप्त हो जायेंगे। वे इसे किसी परालौकिक या किसी अन्य कारण से उत्पन्न हुआ मान सकते हैं और बीमारी की सम्भावना को नहीें मानते। उन्हें इस प्रकार के व्यवहार के कारणों और रोगी के भविष्य को लेकर चिंता व भय होता है।
3. परिवार के सदस्य रोगी के इलाज में सहयोग देना चाहते हैं किंतु ऐसा करने का तरीका पता न होने के कारण असहाय महसूस करते हैं।
4. परिवार के सदस्य यह मान सकते हैं कि वे किसी तरह इस प्रकार के व्यवहार के लिए जिम्मेदार हैं और इसके कारण ग्लानि अनुभव कर सकते हैं।
5. वे रोगी की समस्याओं के लिए खुद को आरोपी अनुभव कर सकते हैं। वे रोगी के उपचार में उनकी भूमिका के बारे में अनिच्छुक हो सकते हैं।
6. परिवार में किसी सदस्य के रोग ग्रस्त होने से आम पारिवारिक जीवन में परिवर्तन हो जाता है। परिवार के सदस्यों को कुछ अतिरिक्त घरेलू कार्य करने पड़ सकते हैं क्योंकि रोगी अपना योगदान देने में असमर्थ होता है। वे परिवारिक जीवन को सामान्य रखने का प्रयास करते हुए रोगी की सहायता करने का प्रयास करते हैं। यह झुंझलाहट भरा हो सकता है।
7. परिवार के लोगों के लिए रोगी का व्यवहार शर्मनाक या पीड़ादायक हो सकता है और वे परिवार के सदस्य के मानसिक रोगी होने के लांछन के कारण दूसरे लोगों के साथ सामान्य रूप से मिलने-जुलने से बच सकते हैं।
8. रोग के लक्षण विद्यमान होने पर रोगी हिंसक हो सकता है जिसे खतरनाक समझा जा सकता है।
9. वे रोगी से नाराज हो सकते हैं, जब इन्हें ऐसा लगे कि मरीज आलसी है व अपने व्यवहार को नियंत्रित करने का प्रयास नहीं कर रहा है।
10. जब परिवार की मनोरोगी व्यक्ति के साथ अति सहभागिता, (अति-संरक्षात्मक, अत्यधिक ध्यान देना और लम्बे समय तक आमने-सामने रहना) मारपीट, आलोचना और असंतुष्टि (अभिव्यक्त भावनाएं) होती हैं तब व्यक्ति के पुनःबीमार होने की सम्भावना अधिक होती है। यद्यपि परिवार के कारण बीमारी नहीं होती फिर भी जिस तरह वे मरीज के साथ बर्ताव करते हैं (अज्ञानता और जानबूझकर नहीं) और रोग का सामना करते हैं, इसका बीमारी की ÷अवधि' पर प्रभाव पड़ सकता है।
11. परिवार के सदस्य मित्रों या पड़ोसियों की बजाय रोगी में और आपस में अधिक व्यस्त हो जाते हैं जिससे परिवार का एकाकीपन बढ़ता है।

बदलते भारतीय परिवार
भारत में संगठित समुदाय आधारित सेवाओं की अनुपस्थिति में परिवार मानसिक रोगियों के सहयोग का प्रमुख साधन है। भारतीय परिवेश में अधिकांश गंभीर रोगी अपने परिवार के साथ रहते हैं। भारतीय परिवार उनके सम्बन्धियों की देखभाल के मामले में काफी लचीले होते हैं; हालांकि वे भी काफी शारीरिक व सांवेगिक तनाव से पीडित होते हैं (थारा इत्यादि, 1998; होवांग इत्यादि, 1999) भारत में तीव्र गति से विकसित हो रहे नगरीकरण व औद्योगीकरण के बावजूद अधिकांश जनसंख्या ग्रामीण है व अभी भी उनमें दृढ़ पारिवारिक सम्बन्ध हैं।

परिवारों पर बोझ
बडे+ पारम्परिक भारतीय परिवार दुनिया में अपनी विशेषताओं और मूल्यवान बन्धन के लिए जाने जाते हैं। बाहरी सहयोग के अभाव में अक्सर परिवार में सांवेगिक शून्यता आ सकती है। हालांकि मानसिक या व्यवहारिक रोग से ग्रस्त परिवार के सदस्य की देखभाल में पारिवारिक बोझ का पर्याप्त अध्ययन होना बाकी है, परन्तु उपलब्ध साक्ष्यों से स्पष्ट है कि यह उल्लेखनीय है (पाई व कपूर 1982 फेडेन इत्यादि, 1987; वाइन फील्ड और हार्वी, 1994)। परिवारों पर भार आर्थिक कठिनाइयों से लेकर बीमारी के प्रति संवेगात्मक प्रतिक्रिया, गड़बड़ व्यवहार का सामना करने का दबाव, घरेलू दिनचर्या में बदलाव व सामाजिक गतिविधियों में प्रतिबंध तक होते हैं (WHO, 1997a) भारत व अन्य विकासशील देशों में मानसिक बीमारियों के इलाज पर होने वाले खर्च का वहन परिवार द्वारा किया जाता है क्योंकि यहां बीमा उपलब्ध नहीं है। हाल के कुछ वर्षों में भारत में भी स्वास्थ्य बीमा की शुरुआत हुई है, परन्तु अभी यह बहुत सीमित है व इसके व्यापक प्रचार प्रसार की आवश्यकता है। विकसित देशों में भी यह खर्च परिवार ही उठाते हैं क्योंकि मानसिक बीमारियां बीमे द्वारा रक्षित नहीं है।
पश्चिम की तरह भारत में भी अब नगरों में संयुक्त परिवार टूट रहे हैं और परिवार का स्वरूप एकाकी होता जा रहा है। स्वतःस्फूर्त सम्बल की व्यवस्था के विघटन और तीव्र नगरीकरण के फलस्वरूप समुदाय में टूट और एकाकी घरों का जन्म हो रहा है (स्लरिमा इत्यादि, 1985)।
बढ़ते हुए व्यक्तिवाद के कारण परम्परागत भारतीय महिला की भूमिका भी परिवर्तित हो रही है, जिसे कि भारतीय समाज की आधारस्तम्भ कहा जाता था। इन सबके कारण परिवार के सदस्यों में सामंजस्य व देख-भाल के भार को सहने की योग्यता का ह्रास हो रहा है।

मनोरोगियों के परिवारों या देख-भाल कर्त्ताओं के
समक्ष उत्पन्न चुनौतियों से निपटने के लिए कुछ सुझाव
अनुसन्धान से पता चलता है कि व्यक्ति की बीमारी या अक्षमता की स्थिति में परिवार की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। मानसिक रोगी की स्थिति के अनुरूप आवश्यक अनुकूलक परिवर्तन लाने की परिवार की क्षमता मानसिक रोगी के ठीक होने में महत्त्वपूर्ण निर्धारक है। मानसिक बीमारियों के कारण प्रभावित व्यक्ति के साथ-साथ उसके परिवार पर काफी दबाव पडता है।
मानसिक रोगियों के परिवारों के संरक्षण में शिक्षा, उपचार व सशक्तीकरण शामिल होना चाहिए। उपचार के साथ-साथ परिवारों को शिक्षित करना, सूचना देना, उपचारकर्ता व परिवार के बीच सम्बन्ध, परिवार सहायता समूह के निर्माण को प्रोत्साहन, मानसिक बीमारियों के बारे में सामाजिक लांछनों के दिन-प्रतिदिन के समस्याकारक व्यवहार का प्रबन्ध, पुनरावृत्ति संकट के प्रति प्रतिक्रिया और उपलब्ध सामुदायिक संसाधनों तक पहुंच पर ध्यान देना चाहिए (MC Peak, 1989; Pfeilfer and Mastek, 1991)।

सुझाव
l अपेक्षाओं के प्रति यथार्थवादी दृष्टिकोण होना चाहिए।
l व्यक्ति की बीमारी के कारण उसकी सीमाएं उत्पन्न होने वाले लक्षण व बीमारी की सम्भावित अवधि के बारे में जानकारी इकट्ठा करें।
l स्वयं की एवं आप जिसकी देख-भाल कर रहे हैं उसकी सीमाओं को स्वीकार करें।
l स्वयं पर बहुत अधिक दबाव न डालें।
l आराम के लिए समय निर्धारण में मित्रों व परिवार की मदद स्वीकार करें।
l लोगों को बताएं कि आप उनसे क्या चाहते हैं।
l देखभाल कर्त्ताओं के किसी समूह का सदस्य बनें।
l देखभाल में सकारात्मक अनुभवों को तलाशें।
l अनुभूतियों व सूचना के आदान-प्रदान हेतु नियमित पारिवारिक बैठकें आयोजित करें।
l समुदाय में उपलब्ध अन्य सेवाओं का प्रयोग करें।
l देखभाल कर्त्ता की भूमिका के लिए काफी समय व ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
l आवश्यक परिवर्तन या भूमिका एवं जिम्मेदारी के निर्धारण के निर्वाह की क्षमता का विकास होना चाहिए।
उपर्युक्त सुझावों को अमल में लाकर परिवार या देख-भाल कर्ताओं को उनकी भूमिका के निर्वाह में अवश्य सहायता मिलेगी।

निष्कर्षड्ढः मानसिक रोगियों के परिवार द्वारा अनुभव की जाने वाली कुछ मनोसामाजिक समस्याएं किसी खास बीमारी के बारे में जानकारी का अभाव, सांस्कृतिक मनोवृत्ति और सगे सम्बन्धी जोकि चिकित्सकीय देख-भाल का उपयोग करने में बाधा उत्पन्न करते हैं, अक्रियात्मक अर्न्तवैयक्तिक सम्बन्धों, संज्ञानात्मक व भावनात्मक कठिनाइयां, पारिवारिक व्यवस्था, मानसिक रोगी व्यक्ति व अन्य महत्त्वपूर्ण लोगों की अप्रभावकारी प्रकार्यात्मकता, अनुपयुक्त सामाजिक सहयोग व उपयुक्त संसाधनों के अभाव से सम्बन्धित हो सकती है।
भारतीय परिवार गत्यात्मक व संक्रमण काल में होने के कारण दबाव के प्रति अधिक संवेदनशील हैं। लम्बे समय से बीमार रोगियों की देख-भाल में भारतीय परिवारों पर उल्लेखनीय दबाव है। इससे यह पुनोपयोगी मूल्यवान संसाधन बोझिल हो रहा है। इसके बचाव की आवश्यकता है क्योंकि सदियों से मानव जीवन में परिवार सुख-दुख के साथी रहे हैं। भावनात्मक संकट के समय बीमारी या अपंगता की स्थिति में परिवार व परिजनों की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। विशेड्ढकर भारत में जहां संस्थागत देख-भाल व सामाजिक सुरक्षा प्रावधानों का अभाव है, परिवार की भूमिका और महत्त्वपूर्ण हो जाती है। सस्ते व सांस्कृतिक रूप से उपयुक्त सेवा प्रदायी व्यवस्था का विकास होना चाहिए। देख-भाल कर्त्ताओं पर पड़ने वाले मार का शीघ्र पता लगाकर उनको इसके दुष्प्रभाव से बचाया जा सकता है। तनाव के समय में परिवार की शक्तियों को पुर्नबलित किया जाना चाहिए। मानसिक रोगियों के परिवारों का सशक्तीकरण होना चाहिए जिससे कि वे देख-भाल में उनकी सहभागिता में जागरुक हों व लांछनों का मुकाबला कर सकें।
विश्व मानसिक स्वास्थ्य संघ (WPA) के योकोहामा घोषणापत्र (2000) में रोगियों एवं उनके परिवारों के बोझ को कम करने में समुदाय के सदस्यों की सहभागिता पर बल दिया गया है। जहां कहीं भी संभव हो इस नीति का पालन होना चाहिए। संचार माध्यम के लोग, नीति निर्माता और परिवारिक संघ इस सतत प्रयास के अतिमहत्त्वपूर्ण भागीदारों में हैं।
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इंडियन सायकाएट्रिक सोसायटी के पूर्व अध्यक्ष डॉ. जे.के. त्रिवेदी किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में मनोचिकित्सा के प्रोफेसर हैं। इन दिनों वे भारत और इसके पड़ोसी देशों का विश्व मनोचिकित्सा संघ में प्रतिनिधित्व करते हैं।
डॉ. मोहन ध्यानी एवं श्यामबिहारी राय शोध सहायक हैं। संपर्क : मानसिक चिकित्सा विभाग छत्रपति साहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय, लखनऊ (उ.प्र.)

 

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