इस अंक में
मन माने की बात बातचीत
माइंड योर लैंग्वेज यानी जुबान सँभाल के
डॉ विनय कुमार
शब्दों के अर्थ शुरुआती अर्थों तक ही सीमित नहीं रहते। सभ्यता की विकास-यात्र में समय-समय पर नए अर्थ जुड़ते जाते हैं। यह आवश्यक नहीं कि नए अर्थों की आमद सकारात्मक ही हो।
दुख को बेहतर समझती है मनोचिकित्सा...
डॉ. नरेन्द्रनाथ विग से डॉ. विनय कुमार की बातचीत
जीवन और ज्ञान की विविधताओं के गहरे अध्येता डॉ. एन.एन.विग भारतीय मनोचिकित्सा जगत की उज्ज्वलतम उपस्थितियों में से एक हैं।
 
मन माने की बात डायरी
रचनाकार की पूंजी होती है बचपन की ...
डॉ. नरेन्द्रनाथ विग से डॉ. विनय कुमार की बातचीत
अपनी कविताओं में मनुष्य और उसके जीवन के प्रति समाहित होनेवाले कथ्य को आप किस रूप में देखते हैं ? पानी में घिरे हुए लोग शीर्षक कविता की रचना प्रक्रिया के बारे में बताएं।
....फ्रायड ग़ायब और इन्द्र मुस्कुरा रहा था
लीलाधर मंडलोई
हिन्दी कविता के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर और दूरदर्शन के महानिदेशक लीलाधर मंडलोई कविता के अतिरिक्त गद्य लेखन के लिए भी जाने जाते हैं। वर्षों से वे अपनी मनःस्थितियां डायरी में दर्ज करते रहे हैं।
 
मनोचिकित्सक की कलम से मनोचिकित्सक की कलम से
हिस्टीरिया की कहानी : डॉ. प्रमोद कुमार सिंह
सचमुच यह अब एक कहानी मात्र ही रह गयी है, क्योंकि विशेषज्ञों ने इस शब्द का प्रयोग बन्द कर दिया है। किन्तु इस शब्द की प्रासंगिकता अभी बनी हुई है, क्योंकि जनमानस में यह शब्द अभी पूर्ण जीवंत रूप में कायम है। इसकी प्रासंगिकता इसलिए भी बनी हुई है क्योंकि जिन मनोशारीरिक दशाओं के लिए इसका प्रयोग किया जाता था, वे अभी भी लगभग उसी रूप में,
मनोरोगियों के परिवारों की चुनौतियां :
जे.के. त्रिवेदी/श्याम बिहारी राय/मोहन ध्यानी

मानसिक रोगों से कोई व्यक्ति, समाज अथवा देश प्रतिरक्षित नही है। इन रोगों का व्यक्ति के ऊपर गंभीर मनोवैज्ञानिक,सामाजिक व
 
मनोचिकित्सक की कलम से मनोचिकित्सक की कलम से
बढ़ती उम्र का सामना : डॉ. चित्तरंजन एन्ड्राडे
किशोरावस्था के अन्तिम तथा युवावस्था के आरंभिक वर्षों में बौद्धिक क्षमता अपने उच्चतम स्तर पर रहती है। इसके बाद इसमें लगातार गिरावट आती है, पर यह बात पचास या साठ की उम्र के बाद ही पता चलती है। बढ़ती उम्र के साथ हाल की घटनाओं की याददाश्त भी कम हो जाती है।
मनोरोगियों को बेड़ियाँ क्यों नेहा सईद सईद अख्तर
इस सभ्य समाज में भी मनोरोगियों के साथ परिवार, समाज और कभी-कभी तो विभिन्न चिकित्सा प्रणालियों के माननीय दिग्गजों के द्वारा जो व्यवहार होता है, वह बड़ा ही दिल दहलाने वाला होता है। रोगियों को आज भी हथकड़ियों से जकड़ कर रखा जाता है, रस्सियों से उनके हाथ पैर बाँध दिए जाते हैं , कमर में रस्सी बाँध कर जानवरों की तरह खींचा जाता है।
 
नोटिस बोर्ड नोटिस बोर्ड
पागलपन नहीं सायकोसिस
एक शब्द है पागल'। इस शब्द का हमारे जीवन में बड़ा महत्त्व है। दुनिया में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं जिसे कभी पागल न कहा गया हो। कोई भी मां बच्चे की ऊल-जुलूल, लेकिन मासूम हरकत पर कहती है, धत पागल और बच्चे की छोटी-सी गलती पर बड़ा दंड देने पर उतारू पिता को कहती है, पागल हो गए हैं क्या?
प्रसवोत्तर अवसाद
पुराण बताते हैं कि एक बार समुद्र का मंथन हुआ था और उससे चौदह रत्न निकले थे। यह भी बताते हैं कि किस रत्न को किस देवता अथवा किस असुर ने ग्रहण किया था, किंतु यह नहीं बताते कि मथे जाने और रत्नदान के बाद समुद्र ने क्या महसूस किया। समुद्र को ठीक वैसा ही लगा होगा जैसा फसल दे चुकने
 
नोटिस बोर्ड नोटिस बोर्ड

अटेंशन डेफिसिट हायपरएक्विविटी डिसॉर्डर
अभिभावक के रूप में आप अपने बच्चे का जीवन गढ़ने में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसी संभावना हो सकती है कि आपका बच्चा अटेंशन डेफिसिट हायपरएक्विविटी डिसॉर्डर (ए डी एच डी) का शिकार हो। आएं जानें कि–

ए डी एच डी क्या है ?

मनोरोग के लक्षण
¨ नींद में कमी , भूख में कमी , क्रोध आना , तोड़-फोड़ , मार-पीट , बेवजह डर , शक , बहुत कम या बहुत अधिक बात करना , अकेले बैठकर बुदबुदाना या मुस्कुराना , डायन या भूत का डर , कोई कहीं नहीं बोले तब भी आवाज सुनना , पत्नी को पति के अथवा पति को पत्नी के चरित्र पर बेवजह शक , गांजा , भांग , शराब , स्मैक आदि की लत।
 
बाल मन बाल मन
शिक्षा की अनोखी अवधारणा : मॉन्टेसरी स्कूल : मीनू मंजरी
रंग.विवरंगी मेज'कुर्सिया, खिलौनों से भरी अलमारी, समूहों में बैठे अपने काम में र्मग्‍न बच्‍चे यह द़श्‍य पारंपारकि पाछशाला से काफी भिन्‍न है ा पर दुनिया भर से मॅान्‍टेसरी स्‍कूलों की सफलता ने शिक्षा की इस अवधारणा को मान्‍य बनाया हैा
बच्चों को कहां ले जा रहा है मीडिया : नरेन
हलांकि प्रिट मीडिया हो चाहे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रायः हर किस्म का मीडिया वर्ग अपनी सामूहिक गतिविधियों के मद्देनजर लगभग पूरी तरह से मनी मिटिंग, वीभत्स बाजारू उत्पाद में तब्दील हो चुका है; लेकिन उसका पाखण्डी और आतंककारी दंभ उत्तरोत्तर परवान ही चढ़ता जा रहा है कि वह
 
निष्कलंक निष्कलंक
बु्रक शील्ड्स : विनोद अनुपम
14 मई 2007, दिन के दो बजे थे। सैनडिएगो(कैलिफोर्निया) के कन्वेंशन सेंटर में अमेरिका की प्रसिद्ध मनोचिकित्सक नैन्सी ऐन्ड्रियासन को सुनने के लिए हॉल में लगभग 500 मनोचिकित्सक बैठे थे। भाषण शुरू होने में कुछ विलम्ब था। मेरी सीट की दाहिनी तरफ बैठे सज्जन ने बायीं तरफ बैठे सज्जन से पूछा -
गोरख पांडेय! यादों के आईने में चमन लाल
किसी भी कवि के लिए सबसे बड़ी चुनौती है–गंभीर अर्थों से भरे लोकगीत लिखना। हक की लड़ाई लड़नेवालों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलनेवाले गोरख पांडेय ने यह कठिन काम तो आसानी से किया, मगर पारानॉयड स्किजोफ्रेनिया की मुश्किलों से पार नहीं पा सके। उन्होंने आत्महत्या कर ली।
 
क्रूरता की शिनाख्त क्रूरता की शिनाख्त
रैगिंग को सामाजिक वर्ग ढांचे में देखें : स्वतंत्र मिश्र
उच्च संस्थानों में रैगिंग एक आम समस्या बन गयी है। हाल ही में भारत के एक प्रतिष्ठित कॉलेज सेंट स्टीफेंस में कुछ सीनियर छात्रों द्वारा एक जूनियर छात्र को प्रताड़ित करने का मामला सामने आया है। इस घटना में सीनियर लड़कों ने अपने एक जूनियर के र डियोडरेंड खूशबू उत्पन्न करने वाला इत्र जैसा कुछ स्प्रेे छिड़कर उसको आग लगा दिया गया।
खुद की खबर पर खामोश मीडिया :
वर्तिका नन्दा सहाय
दो साल पहले दिल्ली पब्लिक स्कूल के दो छात्रों का जो अश्लील एमएमएस बना, वह बे्रकिंग न्यूज थी, देश भर ने वो तस्वीरें देखीं और जनता नैतिकता पर मीडिया की चिल्लाहट की गवाह बनी, लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि
 
 
इस अंक की दवा
लिथियम कार्बोनेट
   
बाल मन

शिक्षा की अनोखी अवधारणा : मॉन्टेसरी स्कूल : मीनू मंजरी

बच्चों को कहां ले जा रहा है मीडिया : नरेन

   
किताब के बहाने
श्रेष्ठता ग्रंथि से पीड़ित लोग : कुमार मुकुल
   
मनोव्यथा
हर कार मेरा पीछा कर रही थी : कमल
   
मीडिया पर निगाह
बाजार ही मीडिया का राष्ट्र और धर्म है : अनिल चमड़िया
   
क्रूरता की शिनाख्त
टीवी एंकरों की खुदकुशी और टीआरपी : मृणाल वल्लरी
   
विश्लेषण
अवसाद : चारुवाक
   
सपने
मेरे तीन सपने : उनका क्या करूं ? : बोधिसत्व
   
जनगीत
दुनिया नष्ट नहीं होगी : नचिकेता
   
कहानी
मुश्किल : सन्तोष चौबे
   
काव्य कथा
शान्ता : उद्भ्रान्त
   
फिल्म

ओंकारा : विनोद अनुपम

ऑथेलो : अनामिका

   
व्यंग्य  झूठ बोलने के फायदे : विष्णु नागर
Top (back to contents)
मनोवेद
अंक – 1 वर्ष – 1 जनवरी–मार्च, 2008

फिल्‍म

झूठ बोलने के फायदे
विष्णु नागर

वैसे फायदा हर बात में है, बस बंदे को फायदा उठाना आना चाहिए। लहरें गिनने में भी उतना ही फायदा है जितना कि दलाली करके नोट गिनने में। और अगर फायदा उठाना न आता हो तो आदमी देश का बड़े से बड़ा नेता भी बन जाए तो न तो वह किसी का फायदा करा सकता है, न खुद फायदा उठा सकता है। फायदा उठाना एक कला है और आप जानते ही हैं कि कला की देवी हरेक पर प्रसन्न नहीं हुआ करती। वह जिस पर प्रसन्न होती है वह अगर सार्वजनिक रूप से रोता है तो भी उसे इसका फायदा होता है और वह अगर किसी को रुलवाता है तो भी उसमें उसे फायदा होता है।
हम यहां स्थानाभाव के कारण सिर्फ एक चीज से होने वाले फायदे की बात करेंगे और वह है झूठ बोलने से होने वाला फायदा। यहां फिर से दोहराने की जरूरत है कि झूठ बोलने से भी फायदा तभी हो सकता है जब आपको फायदा उठाने की कला आती हो वरना झूठ और सच बोलने में नुकसान की मात्रा बराबर होती है। यह दिलचस्प है कि सच बोलने के फायदे सबको हर समय बताये जाते हैं और गांधी जी की तस्वीर हर दफ्तर में लगायी जाती है मगर फिर भी हर कोई झूठ बोलना ही ज्यादा पसंद करता है–और इसमें भी नेता तो सबसे ज्यादा–इसलिए हमने सोचा कि क्यों न आम जनता को भी झूठ बोलने के फायदे बताए जाएं ताकि कोई अज्ञानवश या पूर्ण जानकारी के अभाव में इसका पूरा लाभ उठाने से वंचित रह गया हो तो उसका सशक्तीकरण हो जाए। यह सच है कि सच बोलने का फायदा यह है कि हो सकता है किसी दिन आप महात्मा गांधी बन जाएं और दुनियाभर में आपका नाम हो जाए मगर इसके चांसेज फिलहाल कम हैं क्योंकि एक महात्मा गांधी पिछली सदी में ही यानी हाल ही में हो के चुके हैं इसलिए आदमी इन दिनों कुछ और तो बन सकता है मगर महात्मा गांधी नहीं बन सकता। इसलिए आइए हम कुछ और बनने की कोशिश क्यों न करें और वही बनें जो कि हम बन सकते हैं और निश्चित मानिए, झूठ इसमें बहुत कारगर साबित हो सकता है।
सच बोलने के क्या नुकसान होते हैं, यह बताने की विशेष जरूरत नहीं है क्योंकि यह मेरा भोला विश्वास है कि आप में से हरेक ने कभी-न-कभी इसकी वजह से नुकसान जरूर उठाया होगा। फिर भी कई लोग आदतन सच बोलने की कोशिश करते हैं और जीवन में इस कारण कई बार मार खाते हैं बल्कि कई को तो मार खाने की ऐसी बुरी लत पड़ चुकी होती है कि मार खाए बिना उनका काम नहीं चलता। अगर कभी ऐसा हो कि वे सच भी बोलें और उन्हें मार खाने की सजा भी न मिले तो वे हैरान-परेशान हो जाते हैं कि आखिर ऐसा हुआ कैसे? कहीं उनके बुनियादी चरित्र का इस बीच पतन तो नहीं हो गया है? ऐसे विशिष्ट लोग हमारे इस लेख का विषय नहीं हैं। उन्हें मार खाने, खाते चले जाने के लिए हमारी अनेकानेक शुभकामनाएं। ईश्वर उनका भला करे और ईश्वर से हम उनके लिए प्रार्थना करें कि व कभी इतनी ज्यादा मार न खा जाएं कि मर ही जाएं। वैसे एक न एक दिन मरना तो सभी को होता है मगर सच बोलने के कारण कोई मार खाकर मर जाए, यह बात सभ्य जनों को बहुत बुरी लगती है। इससे उनकी आत्मा तो कष्ट पाती ही है, उनके मुंह का जायका भी खराब हो जाता है। जो कि उनके लिए ठीक नहीं है। इस तरह से मरनेवाला भले ही मोहल्ला स्तर पर शहीद बन जाता है और कुछ नहीं होता। हालांकि किसी के शहीद होने से कोई सबक नहीं लेता मगर उसकी प्रतिमा पर फूलमाला अवश्य चढ़ाता है और प्रतिमा को देखकर तरस भी खाता है कि हाय बेचारा कितना भला था कि शहीद हो गया!
मैं अक्सर झूठ बोलता हूं और मैंने पाया है कि इससे समस्याएं पैदा कम होती हैं और समस्याएं बढ़ती तो कतई नहीं हैं। मसलन अभी एक सज्जन का फोन आया था, जिन्होंने कहा कि भाई साहब, पता नहीं आपको आज शाम के कार्यक्रम का निमंत्रण मिला है या नहीं, अगर न भी मिला हो तो मैं फोन से आपसे आग्रह कर रहा हूं कि आप हमारे कार्यक्रम में जरूर आएं, इससे हमारा मान बढ़ेगा। मैं उससे सीधे-सीधे कह सकता था कि भाई, मुझे निमंत्रण नहीं मिला मगर मैंने तुरंत जोड़-बाकी करके देखा कि इतना सच बोलने से मुझे कोई फायदा नहीं है तो नुकसान भी नहीं है। और जहां फायदा-नुकसान कुछ न हो, वहां सच बोलने में फायदा मानना चाहिए या कम-से-कस नुकसान बिल्कुल नहीं है, यह मानकर चलना चाहिए। तो मैंने इतना सच बोल दिया कि निमंत्रण मुझे मिला है। इससे मुझे भी कुछ संतोष हुआ कि चलो मैं समय के साथ इतना झूठा भी नहीं हुआ हूं कि झूठ के अलावा कभी कुछ नहीं बोलता। सच बोलने का कुछ तो माद्दा मुझमें अब भी बचा है। वैसे आप स्वतंत्र हैं यह कहने के लिए कि दिल को बहलाने के लिए गालिब ये खयाल अच्छा है। खैर इतना सच बताने के बाद मैंने कहा कि मैं आपके कार्यक्रम में जरूर आऊंगा जबकि सच यह था कि निमंत्रण मिलने के साथ ही मैं यह तय कर चुका था कि इसमें मैं कतई नहीं जाऊंगा। इतना फालतू वक्त और पैसा मेरे पास नहीं है कि जहां जो भी बुला ले, चला जाऊं, वह भी ऐन छुट्टी के दिन, जब घर में, परिवार के लोगों के साथ सुख से रहा जा सकता है। मैं सच भी बोल सकता था और कह सकता था कि भाई मैं नहीं आ पाऊंगा लेकिन इतना सच बोलने के बाद मुझे अंततः कुछ-न-कुछ झूठ बोलना ही पड़ता कि आज शाम मुझे कहीं जाना है या मेरे घर कोई आ रहा है। यानी मुझे ऐसा ठोस और मजबूत झूठ बोलना ही पड़ता जिससे कि निमंत्रित करनेवाले को यह विश्वास हो जाता कि वह बंदा वाकई आज फंसा हुआ है वरना ऐसा हो नहीं सकता कि हमारे कार्यक्रम में यह न आए। लेकिन ये भी संभव था कि मैं जो झूठा कारण, उसे बताता वह उसे कन्विंसिंग नहीं लगता और वह मानता कि वह आदमी कोरी बहानेबाजी कर रहा है। इससे अंततः मेरी इमेज ही खराब होती। यह भी हो सकता है कि वह मेरे मना करने के बावजूद मुझसे आग्रह करता रहता कि भाईसाहब इसे आप अपना ही कार्यक्रम समझिए और अगर आप जैसे प्रबुद्ध लोग ही इसमें नहीं आएंगे तो फिर बताइए बाकी ढेर सारे लोग आ भी जाएं तो उसका क्या मतलब? उसके इस आग्रह का एक परिणाम यह हो सकता था कि ÷अपना ही कार्यक्रम है' जैसा मधुर वाक्य सुनकर मैं व्यर्थ ही भावुक हो जाता और भूल जाता कि यह महज भीड़ बढ़ाने का एक आजमाया हुआ नुस्खा है और सोचता कि चलो, इतना आग्रह कर रहा है, मुझे प्रबुद्ध तक बनाने पर उतर आया है तो चल ही पड़ते हैं। इतनी भी अकड़ किस काम की! कोई खास काम तो है नहीं घर पर और वैसे भी दिनभर तो घर के लोगों के साथ रह ही लिए हैं, शाम के कुछ घंटे प्रबुद्ध हो जाना ज्यादा बुरा भी नहीं है। उसके आग्रह का एक परिणाम यह भी हो सकता था कि मैं उससे यह कहता कि अच्छा ठीक है बंधु, देखता हूं और समय मिल पाय तो जरूर आऊंगा और थोड़ी देर बाद मैं रियलाइज करता कि यार, भावुक होने से क्या फायदा, अपन तो घर में ही ज्यादा ठीक हैं। सप्ताह के छहों दिन भागते रहते हैं, आज घर में आराम ही सही। तो मैंने शुरू से ही यह कहकर कि मैं जरूर आऊंगा, बाद में झूठ बोलने या भावुकता में पड़ने या दुविधाग्रस्त होने से अपने आपको साफ बचा लिया। अब मैं उस कार्यक्रम में जाऊंगा नहीं तो एक संभावना यह है कार्यक्रम इतना सफल हो जाए कि बुलानेवाले को यह याद ही न आए कि उसने मुझे भी बुलाया था और मैं नहीं आया था और अगर कार्यक्रम सफल नहीं रहता है तो वह सोच सकता है कि वे आना तो जरूर चाहते होंगे और हां कहा था तो वे आते भी जरूर लेकिन रविवार का दिन होने से शायद कोई उनके घर आ गया होगा या अचानक उन्हें कहीं जाना पड़ गया होगा। वह शायद ही यह सोचते कि मैंने उससे सफेद झूठ बोला था कि मैं आऊंगा क्योंकि मेरा उससे इतना ज्यादा संपर्क नहीं है कि वह मान ले कि मैं आदतन झूठा हूं और ऐसे झूठ बोलना मेरे बाऐ हाथ का खेल है।
मेरे खयाल से प्राचीनकाल से आज तक सच बोलने के कारण जितने लोग फांसी पर चढ़े हैं, भूख और गरीबी के अंधेरे से घिरे हैं, दर-दर की ठोकरें खाई हैं, नौकरियां खोई हैं, जेल गये हैं, प्रताड़नाएं सही हैं, इतने दुख शायद ही झूठ बोलने के कारण लोगों ने सहे होंगे। जितने लोग सच बोलने के कारण फांसी पर चढ़े हैं, उतने लोग झूठ बोलने के कारण शायद ही फांसी पर चढ़े होंगे। बल्कि आप पाएंगे कि वे लोग कुछ ज्यादा ही सुखी हैं जो मेरी तरह या तो आंशिक रूप से या फिर पूर्ण रूप से झूठ बोलते हुए जीवन जीते हैं। वैसे भी सच बोलकर न तो कोई हसबैंड, किसी वाइफ को खुश रख सकता है और न कोई वाइफ, किसी हसबैंड को। मान लो कि कि किसी दिन वाइफ, हसबैंड को यह सच बता दे कि पिछली कई रातों से उसके सपने में फलां-फलां सुंदर पुरुष या फिल्मी हीरो आ रहा है और सपने में उसके साथ रहने में उसे बहुत आनंद आ रहा है तो क्या हसबैंड इसे खुशी-खुशी सहन कर लेगा? वाइफ को वह फौरन घर से निकाल देगा या उसका गला रेत देगा। इसकी बजाय अगर वाइफ किसी के सपने में आने-जाने के बारे में अपने पति को कुछ न बताए तो इससे उसे कोई प्राब्लम नहीं होगी क्योंकि ठीक इसी तरीके से, ठीक इसी समय उसका पति भी अपनी पत्नी के लिए इस तरह की कोई प्राब्लम पैदा नहीं कर रहा होगा। लेकिन मान लीजिए वाइफ यह तय करे कि वह हसबैंड को यह बताएगी कि आजकल तुम सपने में बहुत आने लगे हो, क्या बात है, दिन में भी तुम हो और सपने में भी तुम ही तुम ही, आखिर माजरा क्या है? तो इस सफेद झूठ का दोनों के वैवाहिक जीवन पर जो सुखद प्रभाव पड़ेगा, उसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। इस उदाहरण से यह सिद्ध हुआ कि सच बोलना प्रथमतः नुकसानेदह है और झूठ बोलने से लाभ ही लाभ है, नुकसान कोई नहीं है। इस तरह के झूठ की पोल कभी भी खुलने का कोई खतरा नहीं रहता क्योंकि इस झूठ का दुनिया में और दुनिया के बाहर कोई गवाह नहीं होता।
दरअसल झूठ एक नैसर्गिक सच है जबकि सच के बारे में आप ठीक यही बात नहीं कह सकते। सूरदास खुद इस बात के गवाह हैं कि कृष्ण बचपन से ही झूठ बोलते थे जिससे कि यशोदा और नंद बाबा तो खुश होते ही थे, सबसे ज्यादा खुश हुए थे सूरदास, जिन्होंने बालगोपाल के इस झूठ की तारीफ में तमाम पद लिख दिये और महाकवि के रूप में अमर हो गए। अगर कृष्ण तक झूठ बोल सकते थे तो हम क्यों नहीं? हममें ऐसे क्या सुर्खाब के पर लगे हैं? जब युधिष्ठिर तक युद्ध के मैदान में डटे रहते हैं–÷नरोवा-कुंजरोवा' से आगे क्यों नहीं बढ़ सकते? जब इतने बड़े-बड़े लोगों ने दुनिया में इतने बड़े-बड़े झूठ बोले हैं तो गांधीजी सिर्फ सच ही बोलते होंगे, इसकी क्या पक्की गांरटी है? गांधीजी ब्रह्मचर्य का परीक्षण करने के लिए जो ÷प्रयोग' किया करते थे उससे उनके ब्रह्मचर्य का परीक्षण वाकई कितना होता होगा और उनकी मर्दानगी का कितना हो जाता होगा, माफ करें मुझे, वास्तव में आज इसकी हकीकत कौन जानता है? वैसे भी परीक्षण तो परीक्षण ही होता है और जरूरी नहीं कि परीक्षण के परिणाम हमेशा सकारात्मक ही निकलें लेकिन परिणाम के डर से कोई वैज्ञानिक या कोई गांधीजी परीक्षण करना तो नहीं छोड़ता और छोड़ना भी नहीं चाहिए। आखिर पायलट प्रोजेक्ट की सफलता से ही तय होता है कि प्रोजेक्ट चलेगा या नहीं।
कहते हैं कि झूठ के पांव नहीं होते लेकिन इसके बावजूद हम जानते हैं कि वह दिन-रात और हर कहीं चलता है और कभी भी नहीं थकता। झूठ कभी नहीं कहता कि मुझसे अब नहीं चला जाएगा, जबकि सच के पांव होते हुए भी ज्+यादातर बार वह खुद नहीं चलता। वह अपने पांवों का इस्तेमाल एक्सलरेटर और ब्रेक दबाने के लिए करता है और लोग कहते हैं कि देखो सच ने कितनी जल्दी कितनी दूरी पार कर ली है, जबकि सच को भी यह मालूम नहीं होता कि उसने झूठ के पेट्रोल से कार चलाकर दूरी तय की है। झूठ के बारे में यह भी कहा जाता है कि अंततः वह नंगा हो जाता है लेकिन क्षमा कीजिए, झूठ नंगा होकर भी ज्+यादा बुरा नहीं लगता जबकि सच जब नंगा होकर सामने आता है तो उसे देखकर कै होने लगती है, डिप्रेशन हो जाता है, कई बार आत्महत्या करने तक को मन होने लगता है, अपने पर और दूसरों पर से विश्वास खत्म हो जाता है। लोग यह भी कहते हैं कि झूठ, झूठ होता है और सच, सच। लेकिन लोग यह नहीं जानते कि ÷झूठा-सच' और ÷सच्चा-झूठ' जैसा भी कुछ होता है।
इसलिए मुझे झूठ बोलनेवालों से पूरी सहानुभूति है मगर कृपया झूठ क्षमतानुसार ही बोलें और जिससे कि आपका जीवन बर्बाद न हो जाए। आपका झूठ किसी जगह नहीं चल पाए तो आप एक और झूठ बोल दें कि मैंने तो ऐसा कभी कहा ही नहीं था, मेरी बात को संदर्भ से काट करके देखा जा रहा है या मेरी बात को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है या मुझे याद नहीं आ रहा है कि मैंने ऐसा कहा था और अगर आपका सच नहीं चल पा रहा है तो यह साफ झूठ बोल दें कि मैंने जो तब कहा था, दबाव में आकर कहा था, इसलिए वह झूठ था और अब जो मैं कह रहा हूं वह सच है। जैसे गांधीजी ÷सत्य के प्रयोग' सफल होने के बाद दो युवतियों के कंधों पर हाथ रखकर चलने लगे थे, उसी तरह आप भी अपना एक हाथ झूठ के कंधे पर और दूसरा हाथ सच के कंधे पर रखें तो शायद आपका जीवन भी करीब-करीब आराम से चल जाए। और कंधे अगर एक ही के उपलब्ध हों तो दोनों हाथ उसी के यानी झूठ के कंधों पर ही रखें तो भी आपका बेड़ा अवश्य पार हो जाएगा। इसलिए मैं अक्सर कहता हूं कि झूठ जिंदाबाद और झूठ अगर कभी मर भी गया तो वह अमर रहेगा।
कादंबिनी के संपादक विष्णु नागर सुपरिचित व्यंग्यकार और कवि हैं।

...

Top (back to contents)
all rights reserved to manoveda.com      designed by tapas sarkar : tapasdesigner@hotmail.com