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![]() अंक – 1 वर्ष – 1 जुलाई-सितम्बर, 2007 |
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मन माने की बात |
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नोटिस बोर्ड |
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डॉ. ओमप्रकाश |
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| सिल्विया प्लाथ : अनामिका | |||||||||||||||||||
| बच्चों को सामाजिक कौशल सिखाएं : मीनू मंजरी |
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| पर्देदारी की घुटन लांघती महिलाएं : स्वतंत्रा मिश्र | |||||||||||||||||||
मन फाटे नहीं ठौर... : पंकज पराशर इधर को भी नजर कीजै : एक मनोरोगी |
उत्तर आधुनिक समय की विडंबना : विनोद अनुपम |
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व्यंग्य |
महत्त्वपूर्ण होना : विष्णु नागर | ||||||||||||||||||
| अंक – 1 वर्ष – 1 जुलाई-सितम्बर, 2007 | |
यह कहानी एक ऐसे इन्सान की है जो पिछले 7 सालों से अपने घर के बाहर एक पेड़ के नीचे परिजनों द्वारा जंजीर से बांधकर रखा गया है। महज इसलिए कि वह विक्षिप्त है। हाजीपुर मुख्यालय से 20 कि.मी. दूर गिरी जाति की एक आबाद बस्ती है लगुरांव। इस गांव में करीब एक हजार गिरी जाति के लोग रहते हैं जिनका मुख्य पेशा हस्तरेखा देखकर जीवन बसर करना है। इसी गांव का एक परिवार पिछले 7 सालों से महज इसलिए परेशान है कि उसके घर का चिराग राजीव विक्षिप्त हो गया है। शुरुआती दौर में राजीव मामूली विक्षिप्त हुआ, लेकिन उसकी हालत धीरे-धीरे खराब होती गयी। वह गांव के लोगों पर पत्थर-रोड़ा चला देता और लोगों से गाली-गलौज करता। यही राजीव की दिनचर्या बन गई। उसने इतना उत्पात मचाना शुरू किया कि परिजनों ने उसे जंजीर से बांध दिया। राजीव के इलाज में उसके पिता कमल गिरी के घर की चल और अचल संपत्ति बिक गई। गरीबी और तंगी ने उसके इलाज में बाधा डाली और उसे जंजीर में बांधे रखना मजबूरी हो गई। विक्षिप्तावस्था में राजीव सिर्फ़ अपनी मां सीता देवी की ही बात मानता है। वही उसको खाना देती है। राजीव मां के अलावा किसी से बात नहीं करता है। राजीव का मलमूत्रा साफ करना, उसकी पुकार पर देर रात जगकर उसके पास आ जाना, राजीव की सलामती के लिए मंदिरों और मस्जिदों में प्रार्थना करना उसका रोज का काम हो गया। ओझा-गुनी का सहारा भी लिया गया पर कहीं से कोई सुकून नहीं मिला। आखिर तंग आ राजीव के पिता भिक्षाटन करने लगे। भिक्षाटन में मिली आर्थिक मदद से वह राजीव की दवा-दारू की व्यवस्था करते आ रहे हैं। कमल गिरी को दो पुत्रा और दो पुत्रिायां हैं। राजकुमार और राजीव। राजीव सबसे छोटा है और खूबसूरत है। यह ज्+यादा पढ़-लिख नहीं सका क्योंकि बड़ा भाई राजकुमार बाहर रहकर मजदूरी करता है। ... |