राज-सत्ता का मानस
आर चेतनक्रांति
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सत्ता का मानस। जिस तरह जनता का मानस अनेक वैयक्तिक मानसिक इकाइयों से मिलकर बनता है, उसी तरह सत्ता का भी बनता है। लेकिन उसमें कुछ और भी शामिल होता है-अधिकार, अहंकार और स्वयंप्रभुता का वह बोध जिसे हम सब चाहते हैं, कि हमारे पास हो, और जिसके लिए हममें से हर कोई अपने-अपने किस्म की एक विशिष्टता को अपने वजूद से चिपकाए रहता है। सत्ता के पास वह वैशिष्ट्य अनायास होता है, उसके अस्तित्व में, उसके होने के एक तरीके के रूप में। वह अपने होने में विशिष्ट है, हालांकि शायद आरंभ में उससे ऐसी कोई अपेक्षा की नहीं गई होगी। सामाजिक समझौता बस इतना भर रहा होगा कि हम आप को चुनकर, अपनी दैनिक दिक्कतों से बाहर कर रहे हैं ताकि आप हमारी उन चीजों पर नजर रखें जिन्हें हम अपनी दैनिकता में नहीं देख पाते। लेकिन कब बिल्कुल हमारे ही जैसे कुछ लोग हमारे शासक हो गए, और कैसे-यह एक पहेली है जिसे हमने,
क्योंकि हम खुद सत्ता से आभांध होते चले गए, अपनी चिंता के दायरे से बाहर कर दिया। आज सत्ता हमारे लिए एक लगभग शाश्वत इकाई है। लगभग ईश्वर का स्थानापन्न...
और अब वह है, व्यवहार्यतः। ईश्वर से भी कुछ ज्यादा। क्योंकि ईश्वर केवल एक अवधारणा हुआ, और शासक-सत्ता एक पदार्थ जिसे हम भले न छू पाएं, लेकिन वह जब चाहे हमें छू सकती है। हम उसकी ÷हूं' अपने कानों से सुनते हैं, हम उसका इनकार अपने शरीर पर ओटते हैं।
पिछले दिनों दिल्ली में जो हुआ, वह एक उदाहरण है, जो बताता है कि सत्ता अपने तरीकों से, तमाम लोकतांत्रिाक बहानेबाजियों के साथ, कितनी स्वयंभू, कितनी तानाशाह हो सकती है। अपनी ताकत का प्रदर्शन वह कितनी निर्लज्जता के साथ कर सकती है और अपनी काहिली की कीमत आम आदमी से वसूलने के लिए किस हद तक जा सकती है। जैसे कि वह उनके बिना भी बनी रह सकती हो जैसे कि उसे लोगों की जरूरत ही नहीं है। दशकों बाद वह नींद से जागती है, अपने अयालों से धूल झाड़ती है, और एक बनैली गुर्राहट के साथ, एक नक्शा लेकर चल पड़ती है। उसे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी मौजूदगी जताने के लिए खिलाड़ियों की मेजबानी करनी है, और इसके लिए, सिर्फ इसी के लिए, उसे एक साफ-सुथरा शहर चाहिए, बिल्कुल वैसे ही जैसे राजघाट जानेवाले देशी और विदेशी नेताओं के लिए उसे एक मनुष्यहीन रिंग रोड चाहिए होता है।
और उसके इस तर्क पर कोई सवाल नहीं उठा सकता, क्योंकि यह मसला राष्ट्र से जुड़ा हुआ है। एक और मिथ जो होते-होते मनुष्यों से बड़ी कोई चीज हो गया। जो इतनी आसानी से सिर्फ भूगोल बने रह कर अपने आप में संपूर्ण होने का दंभ पाल सकता है, जो सिर्फ एक नक्शे में अपने अथ और इति पा सकता है। ऐसा राष्ट्र जो इतिहास को अपनी निजी उपलब्धि के रूप में प्रचारित करता है, और डींग हांकने के लिए भविष्य को अपनी ओछी कल्पनाओं का पीकदान बना डालता है, और जिसका वर्तमान, जिसके मौजूदा बाशिंदे बिन बाप के बच्चों की तरह सदैव संशय और अनिश्चय के भंवर में डोलते रहते हैं। ऐसा राष्ट्र जो सिर्फ शासक के लिए वास्तविक होता है, और जिसके बहाने से वह जब चाहे अपनों ओर जब चाहे दूसरों को उनके पैरों तले की जमीन से बेदखल कर सकता है। या वहीं का वहीं लोगों को उनके होने की वैधता से रहित कर सकता है।
न्यायपालिका, कार्यपालिका, नगर निगम, विकास प्राधिकरण, दिल्ली सरकार, केन्द्र सरकार, आदि पदों का उल्लेख करना यहां वाजिब नहीं क्योंकि यह शब्दावली उनकी होगी जो इस तंत्रा के जादू को जायज मानते हैं, हमारी नहीं, क्योंकि हम कहते हैं कि आपका जो भी है, वह अंतर्राष्ट्रीय खेल ही क्यों न हों, मान लिया, कि यही मानव जीवन की परम घटना है, उसे लोगों से शुरू होना चाहिए। वह कोई तंत्रा, वह कोई नक्शा नहीं होना चाहिए जो लोगों के बावजूद हो। मनुष्य के ऊपर जो हो, ऐसा न शासक चाहिए, न राष्ट्र।
बेशक ऐसे शहर भी नहीं चाहिए जहां चलने के लिए सड़कें न हों, फुटपाथ न हो, हरियाली न हो और खुले-खूबसूरत पार्क न हों। जहां गंदगी हो, दुर्घटनाएं हो, बीमारियां हों, ऐसे शहर सचमुच नहीं चाहिए होंगे। लेकिन यह सब जिस भविष्यद्रष्टा नियोजन का नतीजा होता है, जिस कल्पना से शहरों को बसाया जाता है, उसकी अपेक्षा किससे की जाती है। निस्संदेह उन्हीं से, जिन्हें हमने श्रेष्ठतम् के रूप में चुना, और उस ताकत का दंभ पालने का अवसर दिया, जो जाने कैसे और जाने क्यों पलटकर हमें अपने शत्राु के रूप में चिन्हित करने लगते हैं।
कौन नहीं जानता कि सड़क पर अपना रास्ता ढूंढते, एक कतई आम आदमी के लिए सबसे पराया,और सबसे भयावह कौन होता है। और सबसे अबूझ भी। शासक। सत्ता। उसका मंत्राी। इस तंत्रा के प्रतिनिधि। पुलिस के एक मामूली कांस्टेबल से लेकर माननीय जज तक। सरकारी चपरासी से लेकर मंत्राी महोदय तक। गलियों मुहल्लों को किसी विजेता देश के सैनिक की तरह रौंदते किसी मुंहलगे कार्यकर्ता से लेकर पार्टी के अध्यक्ष तक।
और ये सब हमारे लिए थे। हमारे बाद। उनके होने का एकमात्रा तर्क, कि वे हमारे लिए उपयोगी हों। लेकिन वे बस हमारे ऊपर हैं। हम उनके उपनिवेश हैं। हम उनसे नहीं पूछ सकते कि आदमीयत और शहरियत के जिन नक्शों में सजाकर वे हमें देखना चाहते हैं, वे पहले से उनके पास क्यों नहीं होते। अगर होते हैं तो उन्हें साकार करने की इच्छा शक्ति, उनमें इतनी कैजुअल क्यों होती है। और उनकी कल्पनाओं का अधिकांश आदमी के खिलाफ क्यों हो जाता है?
यह न पूछना ही, उन्हें शासक और हमें शासित के रूप में चिन्हित करता है और उस क्रूरता का स्रोत बनता है जिसे हम सत्ता और उसके एकाधिकार के रूप में पहचानते हैं। यही हमारे आस्तित्व को प्रभावित करनेवाली पहली क्रूरता है। बेशक प्रकृति की उस क्रूरता के बाद जब वह हमें अपने से अलग कर एक साकार, सजीव प्राणी के रूप में अनाथ, अपना रास्ता टटोलने के लिए छोड़ देती है अपनी असीमता और संपूर्णता से बहिष्कृत कर देती है।
लेखक सुपरिचित कवि हैं।
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