पहले अंक में पहली बात
डॉ. प्रमोद कुमार सिंह
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मन से जुड़ी पहली बात, मेरे दष्टिकोण में, वह है जिसका जिक्र आमतौर पर अंतिम अध्याय तक नहीं होता। पहली बात से नजरें संभवतः हम इसलिए चुराते हैं, क्योंकि पहली बात ही मन से जुड़ी सबसे कठिन बात है, उसके चरित्रा एवं गुण-दोष से जुड़ी बात है तथा इस काया से उसके सम्बन्धों से जुड़ी बात है। मन क्या है? मन के होने का अनुभव क्या हमारा एक आन्तरिक भ्रम मात्रा है या मन की अलग एक सत्ता है, स्वतंत्रा अस्तित्व है? ये सारे अनुत्तरित प्रश्न हैं? किन्तु इसका सामना करने की जिम्मेवारी से हम मुंह नहीं मोड़ सकते। वैसे इस बात की आशंका प्रबल है कि यह पहला प्रश्न भविष्य के गर्भ में दीर्घकाल तक एक प्रश्न ही बना रहे और हम अज्ञानता के आंगन में पांडित्य की उठा-पटक करते रहें।
अज्ञानता के आंगन में पांडित्य की उठा-पटक, यही तो सदियों से करते आ रहे हैं हम। इस विरोधाभास की अनुभूति, ज्ञानहीनता का यह बोध, हममें एक विनम्रता पैदा करे और यह विनम्रता ही हमारे जीवन एवं कर्म पथ को आलोकित करे-यही मेरी आकांक्षा है। पांडित्य का अहंकार इस पथ को अवरुद्ध न करे-यही मेरी अपेक्षा है। इसके लिए सजग रहना होगा कि आधुनिक विज्ञान के विशाल उपकरणों की चकाचौंध से पैदा पांडित्य के भ्रम से दिग्भ्रमित न हों तथा इस पहले प्रश्न के उत्तर की खोज में सतत प्रयत्नशील एवं संवेदनशील रहें। लगभग सौ वर्ष पहले जब पहली बार एक्स-किरण का प्रयोग शरीर के अंदर के अवयवों को देखने के लिए किया गया तो लगा कि एक नई आंख मिल गई है। हलचल हुई कि जीवन के अनेक रहस्यों पर से अब पर्दा उठ जाएगा। धीरे-धीरे अहसास हुआ कि एक नई आंख मिली तो जरूर, किन्तु इसकी क्षमता बहुत सीमित थी। जीवन के रहस्यों को बहुत दूर से भी देखने की ताकत इसमें नहीं थी। वैसी ही उम्मीदें फिर बंधी जब ई. ई. जी., सी. टी. स्कैन और एम. आर. आई. स्कैन का आविष्कार हुआ। लगा कि हमें रहस्यों की किलाबंदी तोड़ने को अचूक शस्त्रा मिल गए हैं। हमने मन से जुड़े प्रमुख अंग मस्तिष्क के अनेकानेक रंग-बिरंगे चित्रा उतारे। किन्तु फिर निराशा हाथ लगी। हमने सोचा कि हमने सहस्र योजन रास्ता तय कर लिया है रहस्यों को बेपर्द करने की दिशा में। किन्तु वहां भी कोई रोशनी नहीं थी, कोई रास्ता नहीं था, कोई दिशा नहीं थी। हम पहले की तरह अभिशप्त बने रहे, दिशाहीन और मार्गविहीन बने रहने को। मनोवेद का पहला अध्याय तभी लिखा जा सकेगा जब इस पहले प्रश्न के उत्तर की प्राप्ति की दिशा में कोई मार्ग प्रशस्त हुआ दिखेगा।
मन क्या है? मन कुछ भी हो, इतना अवश्य है कि इससे हमारा तादात्म्य बहुत गहरा है। मन ही हमारे ज्ञान-विज्ञान, सुख-दुख, सांसारिक और पारलौकिक सभी क्रिया-कलापों का आधार है। मनोवेद की रचना भी मन के ही आंगन में हो रही है। विडंबना यह है कि इतना गहरा रिश्ता होने तथा अनेक सहह्लाब्दियां बीत जाने के बावजूद हम इसके स्वरूप तथा संरचना से बिल्कुल अनभिज्ञ हैं। मन रूपी किसी तत्त्व का इस प्रकृति में कोई स्वतंत्रा अस्तित्व है भी या नहीं इस सम्बन्ध में हमारे पास कोई निश्चित अवधारणा नहीं है। अनेक संभावनाएं हैं। मत-मतान्तर अनगिनत हैं। उनमें कुछ मुख्य बिंदुओं की चर्चा नीचे की जाएगी।
मन जो इस शरीर से उत्पन्न होता हुआ प्रतीत होता है, क्या इस शरीर तक ही सीमित है? मन और शरीर का आपसी सम्बन्ध क्या है? विद्वानों में इस सम्बन्ध में द्वैत और अद्वैतवाद की तरह दो प्रकार के मत हैं। एक को मोनिज्+म तथा दूसरे को डुअलिज्+म कहते हैं। एक तो द्वैतवाद की तरह पदार्थ और मन की अलग-अलग सत्ता एवं अस्तित्व को स्वीकारता है तथा उनके सम्बन्धों की चर्चा करता है। दूसरा समूह उनका है, जिन्हें हम अद्वैतवादी कह सकते हैं, इनका कहना है कि पदार्थ और मन अलग-अलग नहीं बल्कि एक ही हैं। इसका सत्व और तत्त्व एक ही है। इनका अलग-अलग अनुभव होना एक भ्रम है। इन अद्वैतवादियों में भी दो विचारधाराएं हैं। एक है पदार्थवादी और दूसरी है आदर्शवादी। पदार्थवादियों का कहना है कि मन भी या तो पदार्थ का ही एक रूप है या फिर उसकी एक विशेष स्थिति। मन के हरेक अनुभव एवं आयाम को इनके अनुसार पदार्थ की भाषा में यानी रसायन-भौतिकी की भाषा में अनूदित किया जा सकता है। आजकल आधुनिक विज्ञान की चकाचौंध में पदार्थवादी मतावलम्बियों की संख्या में बहुत वद्धि हो गई है। इनमें से कुछ लोगों का दृढ़ मत यह है कि कुछ समय बाद मनोचिकित्सा विज्ञान आयुर्विज्ञान के एक स्वतंत्रा विषय के रूप में जीवित ही नहीं रह पाएगा। सारे मानसिक रोग स्नायुतंत्रा के रोग के रूप में परिणत हुए जान पड़ेंगे क्योंकि उनकी सारी गुत्थियां रसायन-भौतिकी की भाषा में सुलझा ली जाएंगी। ठीक इसके विपरीत आदर्शवादी- अद्वैतवादियों, जिनकी संख्या बहुत कम है, का यह मानना है कि इस जगत में या फिर इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी है वह मन ही है। मूलतः मन ही एक सार्वभौम प्राथमिक तत्त्व है। यह ब्रह्मांड तथा इसके समस्त पदार्थ मन का ही एक रूप है, उसी की एक विशेष स्थिति है या फिर उससे ही उत्पन्न है।
द्वैतवादियों में भी मन और पदार्थ के आपसी सम्बन्ध के बारे में अलग-अलग अवधारणाएं हैं। एक के अनुसार मन और शरीर दो समानान्तर रेखाओं की तरह साथ-साथ रहते और गुजरते हैं। किन्तु कभी एक-दूसरे से मिलते नहीं है। ये एक दूसरे को प्रभावित मात्रा करते हैं। लेकिन इनका आपस में कारण और कारक का सम्बध नहीं होता। दूसरे मत के अनुसार ये दोनों स्वतंत्रा हस्तियां अनेकानेक बिन्दुओं पर एक-दूसरे से लगातार हाथ मिलाती हैं इनके बीच कारण और कारक का सम्बन्ध होता है। एक में हुई हलचल दूसरे में भी लगातार परिलक्षित होती है। ये अन्तःक्रिया करती हैं। किन्तु यह अन्तःक्रिया किस स्तर पर, किस क्षितिज पर होती है यह प्रकृति के उन अन्तर्तम रहस्यों में से एक है, जहां से मनोवेद के पहले अध्याय की शुरुआत होगी। वह पल कितना दूर है, इससे हम सभी अनभिज्ञ हैं। उपरोक्त मतों के अतिरिक्त, मन और पदार्थ या मन और शरीर के आपसी संबंध के बारे में अन्य विभिन्न मत समय-समय पर अभिव्यक्त किए गए हैं। लेकिन वे सभी अंधकार में उठे छोटे-छोटे बवंडरों की तरह हैं जो उलझाते अधिक हैं किन्तु कोई दिशा या दृष्टि नहीं देते।
द्वैतवादियों के पक्ष में सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि मन और पदार्थ एक-
दूसरे से गुणात्मक स्तर पर बिल्कुल भिन्न हैं। एक जड़ है तो दूसरा चेतन। एक भविष्यानुरागी है तो दूसरा भूतानुरागी। मन की प्रक्रियाएं पूर्व निर्धारित लक्ष्य से संचालित हो क्रमशः लक्ष्य की ओर बढ़ती हैं। यहां लक्ष्य पहले निर्धारित होता है तथा वहां तक पहुंचने की प्रक्रियाएं उसी से संचालित व नियमित होती हैं। जिसे अंग्रेजी में इंटेन्शनलिटी कहते हैं। लक्ष्यानुरागी गुण भौतिक पदार्थ में नहीं होता है। यह ÷भूत' से क्रियान्वित हो भविष्य की ओर बढ़ता है। पदार्थ की प्रक्रियाएं पूर्व स्थिति के परिणामस्वरूप क्रमशः कदम दर कदम आगे बढ़ती हैं। भौतिक प्रक्रियाओं की दिशा हर कदम पर केंद्रित हो रहे अनेकानेक प्रभावों के समेकित परिणाम से निर्धारित होती है किसी पूर्व निर्धारित लक्ष्य के द्वारा नहीं।
इन गुणात्मक भिन्नताओं के कारण यह माना जाता है कि संभवतः मन और पदार्थ दोनों का अलग-अलग अस्तित्व है। ये दोनों एक दूसरे से भिन्न हैं। किन्तु द्वैतवादी सिद्धान्त की राह में सबसे बड़ी बाधा यह है कि मन के स्वतंत्रा अस्तित्व के कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। यदा-कदा कुछ पराभौतिक एवं चमत्कारिक घटनाओं के होने से उसके स्वतंत्रा अस्तित्व की संभावनाओं की झलक तो मिलती है, किन्तु उन्हें इस रूप में एक ठोस प्रमाण के रूप में नहीं लिया जा सकता।
हमें इंतज+ार करना होगा उस पल का जब हम इन पराभौतिक एवं चमत्कारिक घटनाओं को नियमित एवं नियंत्रिात रूप से घटित करवा सकेंगे। तभी हम मन एवं भौतिक पदार्थ की गुत्थियों को सुलझाने की दिशा में आगे बढ़ सकेंगे।
जगदीश चन्द्र बोस ने लगभग सौ वर्ष पहले, जब पहली बार कहा कि पौधों में भी चेतना होती है, तो दुनिया अचंभित रह गई। वैसे हमारे उपनिषदों में यह बात पहले ही कही गई है। लेकिन उन्होंने प्रायोगिक प्रमाण प्रस्तुत किए। संगीत व स्नेह तथा कठोरता के अलग-अलग परिणाम उन्होंने पौधों पर दिखाए। आगे उन्होंने निर्जीव पदार्थों में भी चेतना के अंश होने के प्रमाण प्रस्तुत किए। किन्तु दुनिया विचारों की इस कड़ी को आगे नहीं बढ़ा पाई। यह बात उसकी समझ से परे थी। किन्तु ये बातें हमारे इस पहले प्रश्न के यात्राा-अभियान के संदर्भ में अर्थपूर्ण एवं प्रासंगिक हैं। हमें हर दिशा के वातायन को खुला रखना है। उस रोशनी की झलक का इंतजार है जो हमें दिशा और दृष्टि दोनों देगी। सभी मनोवेदियों से मेरा आग्रह है कि इस यात्राा के लिए वे सदैव तैयार और तत्पर रहें।
डॉ. प्रमोद कुमार सिंह पटना मेडिकल कॉलेज के मनोचिकित्सा विभाग में प्रोफेसर और अध्यक्ष हैं। उन्होंने यह लेख ÷मनोवेद' के प्रवेशांक के लिए खास तौर से लिखा है।
संपर्क : रोड नं-3, राजेन्द्र नगर, पटना
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