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मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य की पत्रि‍का

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अंक – 1 वर्ष – 1 जुलाई-‍सितम्‍बर, 2007

मुद्रित मूल्य

एक प्रति
30 रुपये
सदस्यता (बार्षिक )
120 रुपये
संस्थाओं के लिए
250 रूपये

त्रैबार्षिक

360 रूपये
पंचबार्षिक
600 रूपये
विदेश के लिए
50 डालर
आजीवन सदस्यता
5000 रूपये

मन माने की बात

पहल

मन ही मनुष्य है : डॉ. विनय कुमार
जंजीर में जिंदगी : पंकज चौहान

नोटिस बोर्ड

बातचीत

मानसिक रोग : कुछ बुनियादी बातें

मनोरोग के प्रमुख लक्षण

अपनी नींद की पड़ताल करें
'' देयर इज+ नथिंग गुड ओर बैड!''
राजेन्द्र यादव

मनोचिकित्सकों की कलम से

क्रूरता की शिनाख्त

मन और मनोविज्ञान : डॉ. एम थिरूनवुकरसू

पहले अंक में पहली बात :डॉ. प्रमोद कुमार सिंह

मनोचिकित्सा क्या है ? :
  डॉ. अजित अवस्थी / डॉ. शुभ मोहन सिंह

जनसंचार माध्यम और मानसिक स्वास्थ्य
  डॉ. अवधेश शर्मा

स्वस्थ सेक्स संबंधों की शर्त-सही संप्रेषण :
  डॉ. ओमप्रकाश

राज-सत्ता का मानस : आर चेतनक्रांति

क्रूरता : कुमार अंबुज

आम आदमी बनाम ख़ास कुत्ते : हेम

निष्कलंक

बावजूद

विंस्टन चर्चिल : रोहित प्रकाश

सिल्विया प्लाथ : अनामिका

अंधविश्वासों पर चोट करती कविता :डॉ.विनय कुमार

एक ख़त पागलख़ाने से : पेरिया परसिया

जयश्री की कविताएं

बालमन

  किताब के बहाने

बच्चों को सामाजिक कौशल सिखाएं : मीनू मंजरी
विन्सेन्ट वॉन गॉग : कुमार मुकुल

संबंध

कहानी

पर्देदारी की घुटन लांघती महिलाएं : स्वतंत्रा मिश्र
मिचली : श्रीकांत वर्मा

मनोव्यथा

फिल्म ( निःशब्द)

मन फाटे नहीं ठौर... : पंकज पराशर

इधर को भी नजर कीजै : एक मनोरोगी

उत्तर आधुनिक समय की विडंबना : विनोद अनुपम
अंधेरे में उतरती कविता : डॉ. विनय कुमार

 

व्यंग्य

महत्त्वपूर्ण होना : विष्णु नागर
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मनोवेद
अंक – 1 वर्ष – 1 जुलाई-‍सितम्‍बर, 2007

मिचली
श्रीकान्‍त वर्मा

सीढ़ियों पर चढ़ते हुए हमेशा दुर्गन्ध आती थी उबले हुए अंडों और प्याज के छिलकों की, मसाले और जली हुई दाल की, सीलन भरे कपड़ों और न जाने किस चीज की। वह वहां ठहर नहीं पाता। तेजी से भागता सीढ़ियों पर अपने ऊपर के कमरे की ओर, जहां वह अकेला रहता था।
तीन साल पहले जब वह आया था, तब भी इस निचले तल्ले के इस कुनबे से उसे वैसी ही गंध और शोर आता था। कुछ ही दिनों में उसने तय कर लिया कि वह यहां नहीं रहेगा। मगर अब भी वह रह रहा था। तमाम गन्दगी, दुर्गन्ध और शोर के बावजूद। वह ऊपर आता हुआ अपनी नाक पर रूमाल रख लेता और कल्पना करने की कोशिश करता, दरअसल वहां कुछ नहीं है। उसका वहम है।
कोशिश के बाद भी जब वह इस पर विश्वास नहीं कर सका तो जानने की कोशिश की कि आखिर वहां है क्या? दो-एक बार ताक-झांक के बाद उसने पाया कि एक छोटा सा कमरा है, जिसके एक कोने में रसोई है और दूसरे कोने में एक पूरानी-सी मेज जिसके ठीक सामने दीवार पर एक कई साल पुराना कैलेंडर है और सिनेमावालों और हनुमान का एक चित्रा है। कमरे के बीचो-बीच एक छोटी खाट है। उसके बगल में एक उससे छोटी खाट और तीसरे कोने पर एक खटोली। कमरे का फर्श इतना गंदा है कि वह फर्श है या मिट्टी? अन्दर की ओर एक बरामदा है जहां बिठाकर वह औरत छोटे बच्चे को पाखाना फिराती है। उसका जी मिचलाने लगा।
बच्चे कई हैं। लगभग सात या हो सकता है आठ। उसने गिनने की कोशिश नहीं की। स्त्राी अधेड़ है। पुरुष भी। मगर उसका शरीर काला भुजंग और विकराल है। उसे देखकर उसे क्रेन की याद आती जो बड़ी से बड़ी चीज को अपने जबड़ों में एक खिलौने की तरह उठा लेती है। उसे अपने इस ख्याल पर मजा आया कि रात को यह आदमी भी एक औरत को इसी तरह उठा लेता होगा। मजे की बात यह थी कि उस आदमी की आवाज बहुत पतली और सुरीली थी। उसे हैरानी हुई कि वह इतनी कमजोर आवाज में अपनी बीवी को कैसे दबाता होगा। मगर जब उसने ढेर सारे बच्चे और स्त्राी का पिलपिला शरीर देखा तो उसकी समझ में आ गया।
जब वह सीढ़ियों से गुजरता तो कचरे के ढेर की तरह देहरी पर पड़े और द्वार पर खेलते उस घर के बच्चे उसका सूट देखकर सहम जाते, हालांकि उसका सूट बहुत मामूली थाकई बार रफू किया जा चुका था। उसे यह देखकर खुशी भी होती कि कोई उसके कपड़ों से भी सहम सकता है। वह चाहता कि उसके आतंक का यह घेरा कभी न टूटे, इसलिए वह और भी अलगाव के साथ उधर से गुजरता।
उसके लौटने का कोई वक्त न था। वह किसी भी समय आता और धड़धड़ाता हुआ चढ़ जाता। देर से रात को लौटने पर कमरा बन्द देख उसे जिज्ञासा होती है कि अन्दर वे क्या कर रहे हैं?
उसे बिलकुल विश्वास था कि यह आदमी जरूर अपनी स्त्राी को पीटता है। स्त्राी के मार खाए चेहरे से ही यह साफ था। एक रात जब खुश और धुन गुनगुनाता हुआ लौटा तो सुना, कमरे के अन्दर से पुरुष के हांफने और स्त्राी के हल्के-हल्के चीखने की आवाज आ रही थी। जरूर उन दोनो में हाथपाई हो रही है। वह रुक गया और दरवाजे की सेंध से भांपने की कोशिश की। उसने पाया कि वह चारपाई पर पड़ी हुई है और मर्द उन्मत्त होकर उसके अंगों को चूम रहा है और नोच-बकोट रहा है।
वह उसे प्यार कर रहा है। उसने कहा और चाहा कि वहां से हट जाए। मगर वह वहीं बना रहा और जब तक पुरुष बुझकर स्त्राी के पड़ोस में गिर न गया तब तक वह तनाव-भरे सुख में जकड़ा खड़ा रहा। फिर उस दृश्य को अपने अन्दर दुहराता वह ऊपर आ गया और अपने कमरे की बत्ती जलाते ही उसे महसूस हुआ कि सब-कुछ बड़ा ही घिनौना था।
सचमुच वह उनसे बहुत घिन करता था। कोई भी उसका परिचित न था जिससे उनकी बात न की हो। उनके घिनौने जीवन की बात करते हुए उसे अन्दर ही अन्दर सुख का अनुभव होता और वह महसूस करता कि उसने अपना बदला ले लिया है।
लेकिन वह समझ नहीं पाता कि वह दरअसल किस बात से घृणा करता है?
कुछ महीनों से उसे उन पर और भी गुस्सा आ रहा था। बदमाशों ने एक रेडियो सेट खरीद लिया था जो सारा वक्त बजता रहता था। जब वह सीढ़ियों पर उतरता तो उसे अनुभव होता कि जब वह उतरता होता है तो वे रेडियो की आवाज और तेज कर देते हैं। कमीने! उसे सचमुच उन पर बहुत गुस्सा था। उसने बिलकुल तय कर लिया कि वह मकान छोड़ देगा। मगर छोड़ने के पहले उन्हें वह सबक सिखाएगा कि याद रखें। उसने दोस्तों से जगह तलाशने को कहा भी। एक बार इस सिलसिले में मकान-मालिक के पास भी गया। मगर फिर बिना कुछ कहे लौट आया। उसने सोचा कि उनके विषय में सोचना बन्द कर देना चाहिए। उसे यह मान लेना चाहिए कि वे नहीं हैं। और खुश होकर उसने अपने कमरे की खिड़कियां खोल दीं। पुस्तकों पर जमी धूल साफ की और तय किया कि कल से वह बिलकुल बेलाग होकर जीवन जिएगा।
दूसरे दिन उठने पर उसने पाया कि रेडियो से कोई स्वर नहीं आ रहा है। वह कुछ खुश हुआ और कुछ उसे उत्सुकता भी हुई। शायद उनका सेट खराब हो गया है। उन्हें नुकसान पहुंचने के ख्याल पर उसे संतोष हुआ और उनसे कुछ सहानुभूति भी हुई।
मगर थोड़ी ही देर बाद जब एकाएक रेडियो शुरू हो गया तो वह चौंक गया। इस बार उसे लगा, हरामजादों ने उसे चौंकाने के लिए ही यह किया है।
उसने जल्दी-जल्दी कपड़े बदले, चाय भी नहीं पी और निकल पड़ा। उतरते हुए उसने उन्हें देखा भी नहीं, केवल तेजी से सड़क पर आ गया। सारा दिन वह खोया और झुंझलाया हुआ रहा। मगर शाम को बड़ी देर टहलने और बढ़िया चाय पीने के बाद उसकी तबीयत खुश होने लगी। उसने सारी बातों पर एक सिलसिले से नजर दौड़ाई और उसे उन पर हंसी आई। अजब हैं कमबख्त!
सिनेमा देखने और बढ़िया खाना खाने के बाद जब वह टहलता हुआ लौटा तो पाया कि मकान में बुरी तरह अंधेरा है। हरामजादे सो गए। उसने बत्ती जलाई और आहिस्ता, आराम से सीढ़ियां चढ़ने लगा। उसने सोचा अपने कमरे में जाकर कोई अच्छी-सी किताब पढ़ेगा और फिर उसे धीरे-धीरे नींद आ जाएगी और वह सुबह देर तक सोता रहेगा।
मगर उनके कमरे के पास पहुंचकर उसके पैर ठिठक गए। वह रुका और उनके द्वार पर अपने कान लगा दिए। फिर वही आवाज। उसने पाया, पुरुष फिर उसी तरह हांफ रहा था और स्त्राी फिर उसी तरह चीख रही थी। उसने सेंध से देखने की कोशिश की और देखता रहा।
कमीने! लुच्चे!
उसके माथे की तमाम शिराएं तन गई थीं और कमरे में लौटने के बाद उसे नींद नहीं आई। वह एक भयंकर तनाव में छटपटा रहा था। उसने संकल्प किया कि चाहे कुछ भी हो वह सुबह उनसे निपटकर रहेगा।
सुबह जब उठा तो आंखें कड़वा रही थीं और जी मिचला रहा था। थकान थी। मगर उनसे बात करनी ही होगी। इस तरह नहीं चल सकता। खीझकर उसने कपड़े पहने, तैयार हुआ और उतर पड़ा। कमरे के पास रूका और द्वारा खटखटाने के लिए हाथ बढ़ाया। मगर फिर तेजी से नीचे उतरकर सड़क पर आ गया। उसे खुद पर बहुत गुस्सा आया। आखिर वह उनसे साफ-साफ बात क्यों नहीं कर सकता। उसने फिर निश्चय किया और इस बार मजबूत कदम उठाता हुआ द्वार के सामने आ खड़ा हुआ। अपनी कांपती अंगुलियों से हल्की सी दस्तक दी। थोड़ी देर के बाद द्वार खुला। उसने देखा, वह स्त्राी सामने खड़ी थी। उसे देखकर स्त्राी ने अपना घूंघट काढा+ और अन्दर चली गई।
फिर शरीर पर तौलिया लपेटे आदमी बाहर निकला और इज्जत के साथ उसे अन्दर ले जाते हुए बोला÷आप तो इधर कभी आते नहीं '।
कमीने! वह मन ही मन बुदबुदाया और कमरे पर अच्छी तरह नजर दौड़ाने लगा। ÷गन्दे!' उसे उनसे फिर बहुत घिन हुई।
उसने उसे एक छोटे-से स्टूल पर बिठा दिया था और पत्नी से चाय बनाने के लिए कह रहा था।
उसने देखा, उसका एक बच्चा खटोली पर पड़ा था, दूसरे की नाक से रेहट बह रही थी। तीसरी चाक से फर्श पर तसवीर बना रहा थी। लड़की की उम्र बारह-तेरह साल थी जो मसाला पीस रही थी। सबसे छोटा बच्चा छह महीने का था, जिसे स्त्राी अपनी गोद में लिए हुए थी।
चाय की प्याली उसके हाथों में थमाते हुए उस आदमी ने फिर अपना प्रश्न दोहराया, ÷आप तो इधर कभी आते ही नहीं'। उसने अपने हाथों में थमी प्याली पर गौर किया। कप की नाक टीन की थी, जिसके जोड़ पर मैल जमी हुई थी। चाय एकदम काली, दूध का नामोनिशान नहीं। सभ्यता के नाते उसने एक सिप ली और उसका जी मिचलाने लगा। और उसे लगा, उसके साथ यह सारा कमरा, यह पुरुष, यह स्त्राी, ये बच्चे, यह शोर, यह घृणा, यह गुस्सा, यह समूचा दृश्य निकलकर एकबारगी बाहर आ जाएगा। मगर चाय की वह घूंट पेट में एक बार बवंडर मचाकर शान्त हो गई। उसे स्वयं पर पहली बार इतना क्रोध आया कि उसे लगा, अब वह जब्त नहीं कर पायेगा।
उसने उस आदमी की तरफ देखा, घृणा में नाक सिकोड़ी और गुस्से में कहना चाहा, ÷मुझे आपके बच्चे बिलकुल नापसन्द हैं'। मगर तेज स्वर में उसके मुंह से निकला, ÷आपके बच्चे बहुत प्यारे हैं'। अपने स्वर की तेजी पर उसे जितनी खुशी हुई, अपनी जबान से निकले वाक्य पर उससे अधिक आश्चर्य।
उसने दखा, कृतज्ञता में उसका पड़ोसी मुस्करा रहा था और उसकी स्त्राी घूंघट के अन्दर से उसे देख रही थी।
÷टुच्चे!' मगर इस तरह काम नहीं चलेगा। उसे सब-कुछ साफ-साफ मगर संयत होकर कह देना चाहिए।
अतः उसने अपने-आपको संयत करते हुए कहना चाहा, ÷आपका यह रेडियो बहुत शोर करता है।' मगर उसके मुंह से आहिस्ते निकला, ÷आपने यह रेडियो कितने में लिया?'
उसने सुना, वह कह रहा था, ÷किस्तों में लिया है। पौने तीन सौ का है।'
÷लानत है!' मुझ जैसा आदमी दुनिया में कहीं नहीं होगा।
एक झन्नाटे के साथ कप फर्श पर रखकर वह उठ खड़ा हुआ। दरवाजे की ओर बढ़ा और पूरी ताकत के साथ कहना चाहा, ÷देखिए, मैं आपसे घृणा करता हूं।' मगर पूरी ताकत के साथ उसने कहा, देखिए, मेरी वजह से आपको कोई असुविधा तो नहीं होती? और तेजी से उतरता हुआ वह सड़क पर आ गया। बहुत दूर चलने और कुछ शांत होने के बाद उसने अनुभव किया। उसका जी अब भी मिचला रहा था। (साभार)

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