मानसिक रोग
कुछ बुनियादी बातें
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एक और एक मिलकर दो होते हैं। यह गणित का नियम है, जीव विज्ञान का नहीं। जीव विज्ञान में एक पुरुष और एक स्त्राी के मिलने से शून्य भी हो सकता है, पांडव भी और कौरव भी। पांडव-कौरव की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए हम भारतवासी सौ करोड़ से भी अधिक हो गए। यह गौरव या शर्म से अधिक चिंता का विषय है।
जनसंख्या जब गुणनफल की तरह बढ़ती है तो जीने के साधन भागफल की तरह सिमटने लगते हैं, अस्तित्व रक्षा के लिए लगातार चलनेवाला संघर्ष तेज होने लगता है और संसाधनों को हासिल करने की प्रतियोगिता क्रम में शामिल मनुष्य स्वयं संसाधन में बदलने लगता है।
सिमटते साधनों की चिंता, उन्हें हासिल करने की होड़, हासिल को सहेजे रखने का दबाव, न हासिल कर पाने की छटपटाहट और हताशा, अक्षमता की अनुभूति से उपजी हीनता, अभाव का दुःख, स्वार्थों के टकराव के कारण पारस्परिक संबंधों में विकृति- बिखराव और इन सबके कारण जिस सर्वव्यापी आधुनिक ब्रह्म की सृष्टि होती है उसे कहते हैंतनाव।
अपने मन मंदिर में इस ब्रह्म की प्राण-प्रतिष्ठा के लिए हर व्यक्ति बाध्य है। औद्योगीकरण, सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष, पारिवारिक टूटन आदि उत्प्रेरक तो पहले से मौजूद थे, जाती हुई बीसवीं सदी के गर्भ से दो बड़े दैत्य निकले हैंभूमंडलीकरण और इंटरनेट। पहले व्यक्ति के आगे जो था, वही उसका संसार था। अब सारा संसार उसके आगे है। यह संसार वस्तुतः संसार न होकर एक बाजार है। पहले हम बाजार तक जाते थे और बाजार में कुछ देर के लिए होते थे, अब बाजार हम तक आ रहा है, और हमारे मन के तीनों अवयवों भाव, विचार और व्यवहार पर हावी होता जा रहा है। इंटरनेट ने सूचनाओं का ऐसा सर्वव्यापी मकड़जाल रच दिया है कि चाहे या अनचाहे, जाने या अनजाने हम उसमें फंसने को अभिशप्त होते जा रहे हैं।
तनाव हमारे समय का सबसे ख़तरनाक सच है। यह शरीर और मन दोनों की बलि लेता है। रक्तचाप, मधुमेह, हाइपरएसिडिटी, पेप्टिक अल्सर, दमा, हृदय रोग जैसे गंभीर शारीरिक रोगों का तनाव के साथ सीधा संबंध है। रही मन की बात। मन ही तो वह डाल है जिस पर अमरलता की तरह तनाव पलता है और मन के कमजोर पड़ते ही सांप की तरह अपनी कुंडली में लपेटकर उसे विवश और विषाक्त कर देता है। मानसिक रोगों के होने में टेंशन यानी तनाव महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
मानसिक रोग क्यों होते हैं?
इस प्रश्न के उत्तर में शोधकर्ताओं ने एक सहज और सटीक मॉडल पेश किया हैस्टे्रट-डायाथेसिस मॉडल। स्ट्रेस अर्थात् तनाव और डायाथेसिस अर्थात् रोग होने की अंतर्निहित संभावना। जिस व्यक्ति में रोग होने की संभावना होती है वह जब मानसिक, सामाजिक अथवा वातावरणजन्य दबावों से उपजे तनाव की चपेट में आता है तो मनोरोगी हो जाता है।
क्या होते हैं मनोरोग?
आप अपने सिर पर हाथ फिराइए। आपका सिर एक सख्+त चीज+ से बना है। यह सख्+त चीज+ हैखोपड़ी। इस खोपड़ी के भीतर मानव शरीर का सबसे महत्त्वपूर्ण और कोमल अंग होता हैमस्तिष्क। मस्तिष्क तंत्रिाका कोशिकाओं तथा अन्य ऊतकों से बना एक पिंड है। यह शरीर रूपी घर का मालिक है। इसके जीने को जीवन कहते हैं और मरने को मृत्यु। कान ध्वनियों को ग्रहण करते हैं, यह सुनता है। आंख की रेटिना पर छवि बनती हैयह देखता है।
गंध, स्पर्श, ताप, शीत आदि सभी संवेदनाओं की अंतिम अनुभूति यही करता है। इसी के नियंत्राण में हमारे शरीर के सभी अंग काम करते हैं। मस्तिष्क (ब्रेन) एक पिंड है। इसके कार्य को मानस (माइंड) या मन कहते हैं। कम्प्यूटर की भाषा में ब्रेन ÷हार्डवेयर' है और माइंड ÷सॉफ्टवेयर'।
मानस अथवा मन की ऐसी गड़बड़ियों को जिससे मनुष्य के विचार, अहसास और व्यवहार में असामान्यता आ जाए, मनोरोग कहते हैं।
कैसे हो मनोरोग की पहचान?
मनोरोग की पहचान का फार्मूला बड़ा आसान है। किसी व्यक्ति के व्यवहार में धीरे-धीरे अथवा अचानक होनेवाला कोई भी परिवर्तन अगर तर्कसंगत अथवा समाज-सम्मत नहीं है, तो वह मनोरोग होने की संभावना का सूचक है। उदाहरण के लिए हम अपने पड़ोसी वर्मा जी के परिवार को देखें। चालीस वर्षीय वर्मा जी पिछले दस वर्षों से नियमित शराब पीते हैं। पहले वे सिर्फ़ शाम को दोस्तों के साथ पीते थे, किन्तु एक वर्ष से वे चाय की जगह शराब से ही अपने दिन की शुरुआत करने लगे हैं। उनके घर में वर्षों से चलनेवाले पति-पत्नी संग्राम की भाषा पिछले दो महीनों में बदल गई है। आजकल वे पत्नी को पूरे विश्वास के साथ दुश्चरित्रा कहने लगे हैं। पत्नी की सफाई देने की कोई भी कोशिश वर्मा जी के लातों के प्रहार तले कुचल जाती है। वर्मा जी की शराब पर निर्भरता धीरे-धीरे बढ़ी है, पत्नी के प्रति अविश्वास अचानक पैदा हुआ और दोनों ही बदलाव न तर्कसंगत हैं न समाज-सम्मत। अतः वर्मा जी को तुरंत मनोरोग विशेषज्ञ के पास ले जाना चाहिए।
क्या मनोरोग का इलाज संभव है?
जी हां, मनोरोग शरीर के रोगों की तरह रोग होते हैं और इनका इलाज संभव है। कुछ मनारोग टी.बी. और टायफाइड की तरह पूर्णतया ठीक हो जाते हैं। कुछ दमा की तरह बार-बार उभरते और इलाज से ठीक होते रहते हैं और कुछ रक्तचाप तथा मधुमेह की तरह नियमित इलाज से नियंत्रिात रहते हैं। इलाज के बाद अधिकांश मनोरोगी जीवन और समाज की मुख्यधारा में आ सकते हैं।
मनोरोगियों का सही चिकित्सक कौन है?
कुछ लोग मनोरोगियों को ओझा, तांत्रिाकों अथवा चमत्कारी बाबाओं के पास ले जाते हैं। यह अंधविश्वास है। चूंकि मनोरोग दिमाग के अंदर रासायनिक परिवर्तनों की वजह से होते हैं इसलिए इनका इलाज सिर्फ मनोरोग विशेषज्ञ ही कर सकते हैं। मनोरोग विशेषज्ञ की डिग्रियां होती हैंएम.डी.न्यूरासायकिएट्री या डी. पी. एम. या एम. आर. सी. साइक। मस्तिष्क से संबंधित रोगों का इलाज दो अन्य विशेषज्ञ भी करते हैं। न्यूरो फिजिशियन मेनिनजाइटिस, लकवा आदि रोगों के इलाज के लिए उपयुक्त होते हैं तथा न्यूरोसर्जन मस्तिष्क की उन बीमारियों के लिए उपयुक्त होते हैं जिनका इलाज आपरेशन द्वारा किया जाता है, जैसे सिर की अंदरूनी चोट (हेड इंज्यूरी), ब्रेन ट्यूमर आदि। किन्तु किसी व्यक्ति के व्यवहार में कोई गड़बड़ी हो तो सबसे पहले मनोरोग विशेषज्ञ से ही मिलें, न्यूरो- फिजिसियन अथवा न्यूरोसर्जन से नहीं।
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