बाइपोलर मूड डिजार्डर की मरीज जयश्री की कविताएं धर्मवीर भारती की चर्चित कृति कनुप्रिया की याद दिलाती हैं।
मैं कल्पना करती हूं
मैं कल्पना करती हूं-''कर्तव्य, समझदारी, सहयोग, परिपक्वता''
इन सबके अर्थ मैं जानती हूं
एक-एक शब्द पहचानती हूं मैं
फिर भी,
फिर भी, इन सबको अनदेखा करती हूं मैं?
मेरे प्रिय!
तुम इसका अर्थ क्यों नहीं समझते?
तुम अनबोला क्यों ठान लेते हो?
अपने इस नायक की तैयारी में मैं
न जाने कितनी कल्पनाएं करती हूं
प्रिय, मैं कल्पना करती हूं
कि मैं एक पत्थर की मूरत हूं
और तुम उसे तराशकर
अपने अनुसार ढाल रहे हो
तुम पेड़ की घनी छांव हो और मैं
एक भटकी राहगीर
जो लगातार तुम्हारी छांव की ठंडक को
पकड़ना चाहती है
तुम लगातार मुझे समझाते जा रहे हो
''कर्तव्य, समझदारी, सहयोग, परिपक्वता
कर्तव्य, समझदारी, सहयोग, परिपक्वता''।
तुम्हारे शब्द
मुझ तक पहुंचते-पहुंचते खो जाते हैं
और रह जाता है सिर्फ भाव
तुम्हारा समझाना मुझे बहुत अच्छा लगता है
मैं तुम्हें देख रही हूं एकटक, लगातार
बिना कुछ बोले
जैसे अभिभावक या गुरु की बात कोई सुनता है
और तुम इसे, मेरी चुप्पी को
ज्ञान-पिपासा समझकर
हौले से मेरी पीठ थपथपा देते हो
एक अभिभावक या गुरु की तरह।
सुरक्षा का ये अहसास क्यों चाहती हूं मैं?
अपने ज्ञान को छिपाकर
तुमसे उपदेशित क्यों होना चाहती हूं मैं?
पता नहीं प्रिय, मुझे बिल्कुल पता नहीं!
फिर भी मैं लगातार नादानी करती हूं
ताकि तुम मुझे समझा सको एक गुरु की तरह
कर्तव्य, समझदारी, सहयोग, परिपक्वता
कर्तव्य, समझदारी, सहयोग, परिपक्वता।
मैं कैसी इंसान हूं
मुझे अपने साथ रहना है, और इसलिए,
इसलिए मैं अपने आपको जानना चाहती हूं
वक्त जो गुजर रहा है,
उसे मुट्ठी में कैद करना चाहती हूं
ताकि, उसे कभी भूल ना पाऊं।
पता है? गुजरते वक्त के साथ
रहना नहीं चाहती मैं
इसलिए,
इसलिए उसकी आंखों में आंखें डालकर
उसे भगा देना चाहती हूं मैं
और सुनो, डूबते सूरज को देखना
मुझे अच्छा नहीं लगता
और अपनी गलतियों के लिए
खुद से नफरत करना
नहीं चाहती मैं
नहीं चाहती मैं अपनी डायरी में
अपने सारे रहस्य छिपाकर रखना।
कि दूसरे मेरे बारे में क्या सोचेंगे...
कि मैं कैसी इंसान हूं
मैं सिर उठाकर सबसे सम्मान पाना चाहती हूं
मैं चाहती हूं कि मैं खुद को पसंद करूं
मैं शेखीबाज, झूठी और खोखली
नहीं कहलाना चाहती
और इसलिए,
इसलिए, चाहे कुछ भी करना पड़े
मैं बनूंगी
आत्मसम्मान से पूर्ण
और मुक्त अन्तरात्मावाली।
आसमान सजाने का ख्वाब
मुट्ठी भर सितारों से
आसमां सजाने चली थी मैं,
बड़े यत्नों से समेटा था,
बड़ी मेहनत से बटोरा था,
और बड़ी आशा से उन्हें आंचल में समेटकर
आसमान तक पहुंची थी मैं।
लेकिन,
लेकिन मैंने पाया कि आसमान का चांद
हंस रहा था
कभी मेरे भोलेपन पर
तो कभी मेरी मूर्खता पर।
मैंने चांद की परवाह नहीं की
पर चांद!
चांद, तुम कितने सच्चे निकले
मैंने पाया-कि मेरी इन नन्ही मुट्ठियों के
चंद सितारों से
आसमान नहीं सज सकता
और मैं लौट आई।
लेकिन मैं जानतीख् हूं
मेरी मुट्ठी में सितारे अब भी कैद हैं
आसमान सजाने का ख्वाब जिन्दा है
और तुम, तुम अब भी हंस रहे हो?