जनसंचार माध्यम और मानसिक स्वास्थ्य
डॉ. अवधेश शर्मा
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1980-90 के दशक और हाल के इन वर्षों में सूचना प्रौद्योगिकी में एक अभूतपूर्व प्रगति हुई है जिसने दुनिया को वैश्विक ग्राम (ग्लोबल विलेज) बना दिया है। आज हमारी चुनौती स्थानीय समस्याओं को वैश्विक चिंताओं से और स्थानीय समाधानों को वैश्विक प्रत्युत्तरों से जोड़ने की है। विश्व के किसी भी कोने की समस्याएं और उनके हल अब लगभग पलक झपकते बाकी दुनिया तक पहुंच सकते हैं। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे दुनिया भर के तमाम समुदायों को प्रभावित करते हैं, पर हर संस्कृति कारणों, रोग, लक्षणों और चिकित्सा रूपों के बारे में अपने पूर्वकल्पित विचारों के अनुसार ही इन समस्याओं को समझती है। उपलब्ध बुनियादी संरचनाएं एक देश में भी बहुत भिन्न हो सकती हैं। भारत जैसे देश में चिकित्सा प्रणालियों और सामाजिक- आर्थिक क्षेत्रा में भी भिन्नताएं हैं। जनसंचार का कार्य यह है कि वे मित्रातापूर्ण ढंग से सच्ची घटनाओं को ही प्रतिबिम्बित करें। इसके लिए मानसिक बीमारियों और स्वभावगत समस्याओं के बारे में जागरूकता फैलाने के दीर्घ अवधि के कार्यक्रमों को लेना चाहिए।
मीडिया का बदलता चेहरा
मीडिया, इसकी तकनीक और इसके द्वारा प्रक्षेपित छवियां अभूतपूर्व गति से बदल रही हैं। मीडिया के प्रकार, पहुंच और प्रभाव में भी पिछली सदी में एक तरह से क्रांति हुई है। भविष्य में ऐसी भी तकनीक और दर्शकों की अपेक्षाएं होंगी जिनकी हम आज कल्पना तक नहीं कर सकते। परस्पर क्रियात्मक टी.वी. और रेडियो, डी टी एच, फिल्म, इंटरनेट पर आवाज सुनने, ब्रॉडबैंड, टेलीविजन का इंटरफेस, स्पेशल सुपरहाइवे, फोन और विडियो कम्प्यूटिंग का न केवल उत्तरोतर अधिक इस्तेमाल किया जाएगा, बल्कि इनकी वजह से संस्कृति की बुनावट, मूल्यों और समाज के मानसिक मापंदडों पर भी प्रभाव पडे+गा।
जनसंचार माध्यम
जनता तक पहुंचनेवाले सभी संचार माध्यम जनसंचार माध्यम हैं। वे समय के साथ बदल रहे हैं। पुराने समय में गप-शप, चौपाल, नगाड़ा, लोकगीत, नौटंकी, धर्मकथाएं तथा पुस्तकें इसका माध्यम थीं। धीरे-धीरे समाचार पत्रा-पत्रिाकाएं टेलीविजन, रेडियो आए। अब केवल और उपग्रह टेलीविजन, इंटरनेट, ई-मेल, सूचना सुपरहइवे इत्यादि प्रचलित हो गए हैं।
संचार माध्यमों में मानसिक स्वास्थ्य
टेलीविजन समाचार, सूचना-कैप्सूल, स्पॉट (मनोरंजन-जानकारी) आदि ऐसे कार्यक्रम हैं जिनकी थीम का एक हिस्सा मनोवैज्ञानिक समस्याएं भी हैं। चैनल की अपनी पहुंच और इन कार्यक्रमों को मुख्य समय पर प्रसारित करने तथा आर्थिक सहायता देने पर मनोवैज्ञानिक समस्याओं और संबंधित कार्यक्रमों का प्रदर्शन निर्भर करता है।
माइंडवॉच का अनुभव
÷माइंडवॉच' दूरदर्शन के स्वास्थ्य विशेषज्ञों, जिनमें लेखक की प्रमुख भूमिका थी, एक प्रायोगिक कार्यक्रम था। इसके तहत लेखक ने टीवी प्रोग्रामर और एंकर के रूप में 15 वर्षों के अनुभव के आधार पर प्रमुख मानसिक बीमारियों पर आधारित वास्तविक जीवन से जुड़ी पटकथा लिखने में मदद की। अंगे्रजी में 26 एपीसोडों की शूटिंग देश भर में करीब 30 स्थानों पर की गई, 400 से अधिक राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों, मरीजों और उनके परिवारवालों को इसमें शामिल किया गया। महिलाओं, बच्चों और वृद्धों के लिए अलग खंड थे। बाद में इसे हिन्दी में डब भी किया गया। दूरदर्शन, मेट्रो तथा अंतर्राष्ट्रीय चैनलों पर कुल मिलाकर इसे 12 बार प्रसारित किया जा चुका है। इस प्रकार हमारी जानकारी में यह विश्व का सबसे लम्बे समय तक चलनेवाला गैर-काल्पनिक, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी कार्यक्रम रहा।
कार्यक्रम के बाद दर्शकों के सवालों के व्यक्तिगत जवाब देकर भी संवाद स्थापित किया गया। प्रासंगिक होने के कारण मुद्दों ने दर्शकों को बांधे रखा और रेफरल पैटर्न में वृद्धि हुई। पूरे देश में शूटिंग होने, उसमें मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों तथा सिनेमाई सेलिब्रिटियों के शामिल होने से आशा एवं स्वास्थ्य का संदेश फैला। इन सभी कारकों ने इस कार्यक्रम को एक अत्यंत सफल जन-स्वास्थ्य कार्यक्रम बनाया।
प्रिंट
भाषिक, प्रादेशिक तथा राष्ट्रीय मीडिया में मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों द्वारा की जानेवाली आत्महत्याओं, हत्याओं तथा ÷गैरकानूनी हरकतों' और घटनाओं की खबरें, मानव व्यवहार के सामाजिक-मनोवैज्ञानिक पहलू, संपादकीय तथा संबंधित अधिकारियों एवं विशेषज्ञों से साक्षात्कार, घटनाएं (स्थानीय, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय) ÷उलझन-सुलझन' तथा अन्य नियमित स्तंभ द्वारा पाठकों से सीधा संवाद हो सकता है।
रेडियो
जनसेवा के संदेश, सूचना कैप्सूल, खास तौर से तैयार किए गए इनफोटेनमेंट कार्यक्रम, डायल-इन फोन कार्यक्रम जिनमें भावनात्मक समस्याएं उप-विषय हों।
इंटरनेट
यहां भारी मात्रा में सूचनाएं, कई बार भ्रामक तथा बिना सेंसर की गई सूचनाएं भी होती हैं। यह नवीनतम सूचनाओं का अद्भुत स्रोत है मगर सिर्फ उनके लिए जो इन्हें प्राप्त करना जानते हैं। सरकारी या फार्मास्युटिकल कंपनियों और गैर सरकारी संगठनों द्वारा प्रायोजित नुक्कड़ नाटक, होर्डिंग, पर्चे, पुस्तिकाएं, लोकगीत, कठपुतली नाटक, ÷फिल्म स्टार नाइट्स' ट्रक, बस, पोस्टकार्ड इत्यादि पर संदेश, झोपड़पट्टियों तथा स्कूल, कॉलेजों में बातचीत जैसे कार्यक्रम भी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों को लोगों तक पहुंचाने में समर्थ हैं।
मीडिया और स्वास्थ्य विशेषज्ञ
सकारात्मक-प्रत्यक्ष
ो मरीजों, इलाके के महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों, नेताओं द्वारा सूचनाओं का प्रसार।
ो भाषण देना : लायन्स/रोटरी आदि के मंचों पर।
ो पर्चे, पुस्तिकाएं उपलब्ध कराना
ो लेख, पुस्तकें लिखना
ो रेडियो, टीवी कार्यक्रमों में भाग लेना
परोक्ष : मांगे जाने या निमंत्रिात किए जाने पर सूचना उपलब्ध कराना।
नकारात्मक-प्रत्यक्ष
ो विवादों में शामिल होना
ो अन्तर्विरोधी संदेश देना
ो अशुद्ध/सनसनीखेज/अधूरी सूचनाएं देना
परोक्ष
ो मरीज के परिवार या जनसंचार माध्यम को सूचना देने से इनकार करना
ो सूचना देने में असमर्थ (भय, अपर्याप्त ज्ञान अथवा अत्यंत तकनीकी होने के कारण)
प्रासंगिक सामाजिक मुद्दों को विशेषज्ञ अन्य मुद्दों से जोड़ सकते हैं, जैसे-
ो एच आई वी तथा नशे की लत
ो तम्बाकू गुटखा आदि की लत
ो जीवन शैली से जुड़े सामाजिक एवं स्वास्थ्य संबंधी मुद्दे।
ो अकेलापन, अवसाद, मादक पदार्थों की लत से जुड़ी गैरकानूनी हरकतें और अवसाद
ो मानसिक बीमारियों की सामाजिक- आर्थिक कीमत।
ो मीडिया रणनीति के लिए एजेंडा खुद तय करना न कि घटनाओं से परिचालित होना।
ो भ्रामक/सनसनीखेज/सामाजिक तथा स्थानीय रूप से अप्रासंगिक सूचनाओं से बचना।
ो गलत सूचनाओं तथा सूचना की अति से बचाव के उपाय तलाशना, जिसमें इंटरनेट और ÷बीम्स फ्रॉम द स्काई' की समस्याएं भी शामिल हों।
ो सूचनाओं तथा समाचारों पर फॉलोअप देने के लिए मीडिया में उपलब्ध रहना। इसमें सेवाएं प्रदान करना भी सम्मिलित है।
ो प्रतियोगी माहौल में नित नए उठते मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किए रहना। सामाजिक रूप से प्रासंगिक मुद्दों का भी बाजार है यदि उन्हें ढंग से बेचा जाए।
ो वैकल्पिक सूत्राों से सही जानकारी इकट्ठा करना तथा विवादित एवं संदिग्घ सामग्री द्वारा समाचार को बेकार बनाने से बचना, जैसे, अल्कोहल से हृदय को फायदा होता है या भांग सुरक्षित है आदि।
ो दीर्घ अवधि से समर्पित मीडियाकर्मियों को मुद्दों के प्रति आकर्षित करना, खासतौर से यदि वह मुद्दा उनसे किसी व्यक्तिगत रूप से जुड़ा हो।
ो रोल मॉडल की तरह मशहूर हस्तियों का प्रयोग करना या उन्हें प्रवक्ता की तरह मुद्दे से जोड़ना।
भविष्य
मीडिया में मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान
बढा+ है, पर मानसिक स्वास्थ्यकर्मियों की जागरूकता बढ़ाने, समस्याओं से बचाव तथा स्वास्थ्य बेहतर बनाने के कार्यक्रमों हेतु मीडियाकर्मियों के साथ अन्तर्क्रिया करनी होगी। मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता फैलाने की चुनौती का सामना मीडिया को जनंसचार के अनौपचारिक तरीकों द्वारा करना पड़ेगा, जैसे-गपशप, बातें; पंचायत, नेताओं, धार्मिक प्रमुखों, डॉक्टरों के मत, लोक कथाएं, नुक्कड़ नाटक, कठपुतली इत्यादि। सूचना तकनीक के उपकरणों का बुनियादी (स्थानीय समाचारपत्रा- पत्रिाकाएं, एफ एम रेडियो, केबल ऑपरेटर); राष्ट्रीय (राष्ट्रीय समाचार पत्रा, पत्रिाकाएं, रेडियो तथा टीवी के राष्ट्रीय चैनल आदि) स्तर पर उपयोग करना होगा ताकि जनसंचार की क्षमता का पूर्णतः उपयोग किया जा सके और सीमित घेरे से बाहर के लोगांें तक पहुंचा जा सके। इनमें से प्रत्येक माध्यम की अपनी महत्ता है और वे एक खास उदेश्य, खास लक्ष्य श्रोताओं तक पहुंचा सकते हैं।
ये सभी माध्यम उस संपूर्ण तस्वीर का एक पहलू हैं जो साथ मिलकर, चिकित्सा तथा पुनर्वास में सहायता करेंगे तथा कलंकमुक्त समाज का निर्माण करेंगे।
÷अंधी गलियां' और ÷माइंडवाच' जैसे दूरदर्शन कार्यक्रमों के प्रस्तोता डॉ. अवधेश शर्मा मीडिया मनोचिकित्सक के रूप में जाने जाते हैं। इन दिनों वे ÷मनोचिकित्सा की कला' में गहरी रुचि ले रहे हैं।
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