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मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य की पत्रि‍का

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अंक – 1 वर्ष – 1 जुलाई-‍सितम्‍बर, 2007

मुद्रित मूल्य

एक प्रति
30 रुपये
सदस्यता (बार्षिक )
120 रुपये
संस्थाओं के लिए
250 रूपये

त्रैबार्षिक

360 रूपये
पंचबार्षिक
600 रूपये
विदेश के लिए
50 डालर
आजीवन सदस्यता
5000 रूपये

मन माने की बात

पहल

मन ही मनुष्य है : डॉ. विनय कुमार
जंजीर में जिंदगी : पंकज चौहान

नोटिस बोर्ड

बातचीत

मानसिक रोग : कुछ बुनियादी बातें

मनोरोग के प्रमुख लक्षण

अपनी नींद की पड़ताल करें
'' देयर इज+ नथिंग गुड ओर बैड!''
राजेन्द्र यादव

मनोचिकित्सकों की कलम से

क्रूरता की शिनाख्त

मन और मनोविज्ञान : डॉ. एम थिरूनवुकरसू

पहले अंक में पहली बात :डॉ. प्रमोद कुमार सिंह

मनोचिकित्सा क्या है ? :
  डॉ. अजित अवस्थी / डॉ. शुभ मोहन सिंह

जनसंचार माध्यम और मानसिक स्वास्थ्य
  डॉ. अवधेश शर्मा

स्वस्थ सेक्स संबंधों की शर्त-सही संप्रेषण :
  डॉ. ओमप्रकाश

राज-सत्ता का मानस : आर चेतनक्रांति

क्रूरता : कुमार अंबुज

आम आदमी बनाम ख़ास कुत्ते : हेम

निष्कलंक

बावजूद

विंस्टन चर्चिल : रोहित प्रकाश

सिल्विया प्लाथ : अनामिका

अंधविश्वासों पर चोट करती कविता :डॉ.विनय कुमार

एक ख़त पागलख़ाने से : पेरिया परसिया

जयश्री की कविताएं

बालमन

  किताब के बहाने

बच्चों को सामाजिक कौशल सिखाएं : मीनू मंजरी
विन्सेन्ट वॉन गॉग : कुमार मुकुल

संबंध

कहानी

पर्देदारी की घुटन लांघती महिलाएं : स्वतंत्रा मिश्र
मिचली : श्रीकांत वर्मा

मनोव्यथा

फिल्म ( निःशब्द)

मन फाटे नहीं ठौर... : पंकज पराशर

इधर को भी नजर कीजै : एक मनोरोगी

उत्तर आधुनिक समय की विडंबना : विनोद अनुपम
अंधेरे में उतरती कविता : डॉ. विनय कुमार

 

व्यंग्य

महत्त्वपूर्ण होना : विष्णु नागर
Top (back to contents)
मनोवेद
अंक – 1 वर्ष – 1 जुलाई-‍सितम्‍बर, 2007

विंस्टन चर्चिल
रोहित प्रकाश

मनोरोग के स्ट्रेट जैकेट में कैद चर्चिल ने दुनिया को तानाशाही के स्ट्रेट जैकेट से बचाया।

मानसिक स्वास्थ्य की राह के बड़े अवरोधों में एक है स्टिग्मा। स्टिग्मा यानी कलंक। जिसका स्रोत अज्ञान या ज्ञान के बावजूद अज्ञान के प्रति कायर दास भाव का होना है। हम जब किसी के बारे में सच नहीं जानते तो अज्ञानतावश अपनी प्रचलित धारणाओं को आंख मूंदकर मान लेते हैं। ऐसी धारणाएं पूर्वाग्रह को जन्म देती हैं। पूर्वाग्रहों से परिचालित व्यवहार हमें भेदभाव की तरफ ले जाते हैं। इस प्रकार मानसिक रोग के स्टिग्मा का अर्थ हुआ कि फलां व्यक्ति मनोरोगी है, इसलिए वह खतरनाक या बेकार है। उस व्यक्ति से बचो। उसे काम मत दो, उसे दूर भगाओ। लगभग 10 फीसदी आबादी को कमतर बनाने की अमानवीय कोशिश के विरुद्ध जंग जारी है। इस जंग में ऐसे व्यक्तित्व जिन्होंने मनोरोग के बावजूद खुद को अपने समय के लोगों से बेहतर साबित किया, जीत दिलाने में बड़े मददगार हो सकते हैं। चर्चिल एक ऐसे ही व्यक्तित्व हैं, इसलिए ÷मनोवेद' के लिए एक प्रतीक, एक कलंक-कुचक्र विरोधी मूर्ति, एक एन्टी स्टिग्मा आइकॉन। चर्चिल आजीवन गहरे अवसाद के दौरे झेलते रहे। वे अपने अवसाद के दौरे को ब्लैक ÷डॉग' कहते थे। इस काले कुत्ते को उन्होंने बार-बार काबू में किया और अपने व्यक्तित्व को अपनी काया के कद से बड़ा किया। अवसाद से उबरने के बाद चर्चिल अधिक उत्साह और ऊर्जा के साथ काम करते थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय उनके सामरिक और कूटनीतिक व्यवहार से पता चलता है कि उनका दिमाग बेहद तेजी से चल रहा था और वे खतरे उठाने से परहेज नहीं कर रहे थे। उनके व्यवहार का यह पहलू इस बात का सूचक है कि अवसाद के बाद वे हलके हाइपोमैनिया के दौर से भी गुजरते थे। चर्चिल का रूस के बारे में यह कहना कि रूस रहस्यमय अबूझ पहेली के भीतर एक और पहेली है, जितना कूटनीतिक है उतना ही हाइपोमैनिक। हाइपोमैनिया यानी अवसाद का प्रति ध्रुव-निराशा, हताशा और आत्महीनता के ऊपर ऊर्जा, उत्साह, जोश, तेजी और आक्रामकता का दौर। इन लक्षणों के आधार पर माना जाता है कि चर्चिल बाइपोलर मूड डिजार्डर से ग्रस्त थे।
जब तथाकथित ÷नार्मल' नेताओं का विवेक काम नहीं कर रहा था तब एक बाइपोलर मूड डिजार्डर से ग्रस्त व्यक्ति की सूझ ने आगे आकर दुनिया को हिटलर से बचाया। फिर ऐसा व्यक्तित्व ÷एन्टी-स्टिगमा आइकॉन' क्यों न हो। पहली बार इस दिशा में पहल की थी ब्रिटेन की एक संस्था ÷चैरिटी रिथिंक' ने। संस्था ने ग्लास-फाइबर और कांसे की एक प्रतिमा बनवाकर नॉरविच के सिटी सेंटर में ऐन्टी स्टिग्मा अभियान के तहत कुछ दिनों के लिए स्थापित की थी। संस्था के निदेशक पॉल कैरी ने इस कदम को अभियान की सफलता का श्रेय दिया। विवाद सिर्फ इस बात पर उठा कि चर्चिल को स्ट्रेट जैकेट क्यों पहनाया गया। स्ट्रेट जैकेट का चलन 18वीं सदी में था। इसे पहनने के बाद चलना-फिरना और हाथ हिलाना मुश्किल हो जाता था।
इसका उपयोग हिंसक मनोरोगियों को नियंत्रिात करने के लिए किया जाता था। चर्चिल के सांसद पौत्रा ने अभियान को तो उचित माना था, मगर स्टे्रट जैकेट पहनाने को गलत। चर्चिल आर्काइव सेंटर के निदेशक का भी कहना था कि चर्चिल के लिए अवसाद कभी भी स्टेट जैकेट नहीं रहा।' विवाद के कारण बाद में प्रतिमा हटा दी गई।
किंतु चर्चिल के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकनकर्ता मनोचिकित्सक ऐन्थनी स्टॉर के हवाले से कहा जा सकता है कि चर्चिल के जीवन में कई ऐसे दौर आए, जब अवसाद ने उनकी सक्रियता और आजादी को बुरी तरह जकड़ लिया था। अपने अंतिम दिनों में तो वे बेहद गहरे अवसाद मेलैन्कोलिया से ग्रसित हुए। चैरिटी रीथिंक के निदेशक उचित ही कहते हैं कि स्टे्रट जैकेट एक ऐसा प्रतीक है। जो चर्चिल की कामयाबियों को और भी बुलंद दिखाता है। मनोरोग के स्ट्रेट जैकेट में कैद चर्चिल ने दुनिया को तानाशाही के स्ट्रेट जैकेट से बचाया। चर्चिल के जीवन पर यह लेख इतिहास में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त रोहित प्रकाश का है। रोहित सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से सक्रिय हैं और कविताएं भी लिखते हैं।-संपादक

÷...पर मेरा ख्याल है/चर्चिल को सब पता था/शायद यह भी कि/रात के तीसरे पहर/जब किसी झुरमुट में/ठनकता था गेहुंअन/तो नाच के किसी अंधेरे कोने से/धीरे-धीरे उठती थी/एक लंबी और अकेली/भिखारी ठाकुर की आवाज' वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह की कविता ÷भिखारी ठाकुर' के अंश।
यह कविता चर्चिल को आधार बनाकर नहीं लिखी गई है लेकिन इस कविता को पढ़ते हुए चर्चिल की दृष्टि की व्यापकता का पता चलता है। चर्चिल के व्यक्तित्व के इन्हीं आयामों की वजह से बीसवीं सदी के कुछ प्रभावशाली विश्व-नेताओं में उनका नाम शुमार है। एक कुशल राजनीतिज्ञ की दृष्टि अतीत में भी होती है और भविष्य की ओर देखती हुई भी, साथ ही वह वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में इनका समन्वय भी करता है और चर्चिल अपने पूरे राजनीतिक जीवन (कैरियर) में ऐसा करते नजर आते हैं। ''इतिहास दयालुता से हमारा फैसला करेगा'' 1943 में द्वितीय विश्वयुद्ध के समय आयोजित हुए मित्रा राष्ट्रों की तेहरान कांफ्रेंस में उन्होंने जब अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट और सोवियत नेता स्टालिन को ऐसा कहा तो उनके पास यही इतिहास-दृष्टि रही होगी जिसका इस्तेमाल उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध पर आधारित 6 खंडों की अपनी पुस्तक के लेखन में किया और जिसके बाद उन्हें 1953 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार भी मिला।
बीसवीं सदी का इतिहास घटनाओं और त्राासदियों का इतिहास है। प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध दो ऐसी त्राासदियां हैं जिन्होंने विश्व मानवता एवं अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को विभिन्न स्तरों पर व्यापक रूप से प्रभावित किया। चर्चिल न सिर्फ इन दोनों विश्वयुद्धों के साक्षी रहे बल्कि इस काम में वे इंग्लैंड के महत्त्वपूर्ण राजनीतिक पदों पर भी रहे। द्वितीय विश्वयुद्ध का काल उनके राजनीतिक जीवन के लिए शिखर का काल है। युद्ध के उन कठिन वर्षों में जब नाजी हिटलर की सैनिक सफलताओं से इंग्लैंड सहित समूचा विश्व भयाक्रांत था और जिसने विश्व मानवता के लिए खतरा उपस्थित कर दिया था, उसी समय चर्चिल को 10 मई 1940 को इंग्लैंड का प्रधानमंत्राी बनाया गया। इसके बाद चर्चिल ने हर मोर्चे पर जिस कुशाग्र बुद्धि और उत्साह के साथ स्टालिन और रूजवेल्ट के साथ मिलकर विश्व के देशों को हिटलर के खिलाफ संगठित किया और निर्णायक रूप से युद्ध का नक्शा ही बदल दिया-उसका विश्व इतिहास में अप्रतिम महत्त्व है। इंग्लैंड का प्रधानमंत्राी बनने के पश्चात 13 मई 1940 को अपने विख्यात भाषण में उन्होंने कहा था, ''मित्राो! इंग्लैंड की जनता को सम्बोधित करता इस समय मैं आपको खून, आंसू, परिश्रम और पसीने के अलावा कुछ नहीं दे सकता। आप हमारी नीति जानना चाहेंगे, हमारी नीति है ऐसे दुश्मन के खिलाफ हर कहीं लड़ना-जमीन पर, हवा में, समुद्रों में, जिसकी शैतानी हरकतों की मिसाल पूरे इतिहास में कहीं नहीं मिलती। आप हमारा उद्देश्य जानना चाहेंगे, हमारा उद्देश्य है जीतना, किसी भी कीमत पर। जीत के बिना हमारा अस्तित्व ही संभव नहीं। इस उद्घोष से चर्चिल के आत्मविश्वास का पता चलता है और निश्चय ही इसने इंग्लैंड की निराश जनता का आत्मविश्वास बढ़ाया होगा और एक नई स्फूर्ति पैदा की होगी। चर्चिल राजनीतिज्ञ, शासक, इतिहासकार, लेखक, युद्ध रणनीतिकार होने के साथ-साथ एक ऐसे व्यक्ति भी थे जिसकी रुचि का दायरा बहुत बड़ा था। खेलों के अलावा चित्राकला और मानवजाति के इतिहास में उनकी रुचि उल्लेखनीय है। ए.जे.पी. टेलर उनके विषय में लिखते हैं, ''शुरुआत से ही चर्चिल राजनीतिज्ञ होने से ज्यादा एक शासक थे। ज्यादातर लोग औसत स्तर पर राजनीतिक जीवन में प्रवेश करते हैं और धीरे-धीरे राजनीतिक दक्षता प्राप्त करते हैं। चर्चिल ने शिखर से ही राजनीति शुरू की।'' चर्चिल विश्व इतिहास के उन कुछेक व्यक्तियों में शामिल हैं जो सामाजिक विज्ञान के विभिन्न अनुशासनों में विस्तृत अध्ययन का केन्द्र रहे हैं। उन पर विपुल लेखन का भंडार हमारे पास उपलब्ध है। 19वीं सदी के आरंभ में यह आप्त वाक्य काफी प्रसिद्ध था कि ÷इतिहास महान व्यक्ति की जीवनी होता है।'' खुद उन्होंने भी काफी कुछ लिखा है। इस दृष्टि से उनके मूल्यांकन या जीवन चित्रा खींचने का कोई भी प्रयास अधूरेपन का आरोप झेलने को अभिशप्त होगा। फिर भी, मैं उनके जीवन के कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्यों, घटनाओं और उनके द्वारा लिये गये फैसलों को एक क्रम देना चाहूंगा, जिसका इंग्लैंड और विश्व की राजनीति पर सार्थक प्रभाव पड़ा और जो विन्सटन चर्चिल जैसी शख्सियत के निर्माण के लिए उत्तरदायी थे।
विन्सटन चर्चिल का जन्म ब्रिटिश अभिजात वर्ग की विशेषाधिकार प्राप्त दुनिया में 30 नवम्बर, 1874 को हुआ। उनके पिता लार्ड रैंडॉल्फ चर्चिल कंजर्वेटिव पार्टी के नेता थे और इंग्लैंड के खजाना मंत्राी भी रहे। कंजर्वेटिव पार्टी को लोकतांत्रिाक छवि देने का श्रेय इन्हें ही जाता है। खुद, रैंडाल्फ चर्चिल मार्लबोरों के सातवें ड्यूक (ब्रिटेन का सर्वोच्च सामंत) के सबसे छोटे पुत्रा थे। विन्सटन चर्चिल की मां जेनी जेरोम एक बड़े अमेरिकी व्यापारिक घराने की पुत्राी थी। लेकिन, चर्चिल का बचपन खुशहाल नहीं था। अन्य विक्टोरियन अभिभावकों की तरह उनके मां-पिता ने उन पर ध्यान नहीं दिया। न ही चर्चिल को उनका प्यार मिला और उनका शुरुआती जीवन लगभग उपेक्षित अवस्था में बीता। परिवार की आया की देखभाल में ही वे और उनके छोटे भाई जॉन चर्चिल पले-बढ़े। सात वर्ष की अवस्था में उन्हें बोर्डिंग स्कूल भेज दिया गया। लेकिन इन स्थितियों ने उनमें नकारात्मक प्रवृत्तियों का बीजारोपण नहीं किया बल्कि वे एक जुझारू और साहसी व्यक्ति के रूप में विकसित हुए। साथ ही उनमें स्वतंत्रा मानसिकता का भी विकास हुआ। उनका दृढ़ विश्वास था कि वे तब तक नहीं रुकेंगे जबतक गुण और प्रतिष्ठा के उस शिखर पर नहीं पहुंच जाते, जिसके लिए वे बने हैं। इन चरित्रागत विशेषताओं और असंभव को संभव बनाने की उत्कंठा को उनके लंबे राजनीतिक जीवन के दौरान देखा जा सकता है। उनकी आया उन्हें साहसिक कथाएं सुनाया करती थी जिनमें आर. एल. एल्बेवियन का ÷ट्रेजर आयरलैंड' उन्हें काफी पसंद था। संभवतः एक फौजी के रूप में अपना कैरियर शुरू करने के उनके चुनाव में इसने अहम भूमिका निभाई होगी। हैरो से शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात्‌ सैंडहर्स्ट स्थित ÷रॉयल मिलिट्री कॉलेज' में उन्होंने दाखिला लिया। इसके बाद 1895 में वे फोर्थ हुसार्स से जुड़े और भारतीय उत्तर-पश्चिम फ्रंटियर पर चल रही सैनिक गतिविधियों को देखा। 1898 में पहली दफा उन्होंने सूडान में हो रहे ओमदुर्रकान युद्ध में हिस्सा लिया। सेना में रहते हुए ÷डेली टेलीग्राफ' के लिए उन्होंने सैन्य सूचनाएं भी भेजीं। इस दौरान उन्होंने इन अनुभवों पर आधरित दो किताबें, लिखीं। 1899 में ब्रिटिश सेवा छोड़ने के बाद ÷मार्निंग पोस्ट' के लिए युद्ध संवाददाता के रूप में भी कार्य किया। दक्षिण अफ्रीका से बोयर युद्ध की रिपोर्टिंग के दौरान उन्हें उस वक्त गिरफ्तार कर लिया गया जब उन्होंने हथियारों से लैस एक ट्रेन की रक्षा में भाग लिया, जिस पर पहले से बोयर्स हमले के लिए घात लगाकर बैठे थे। उन्हें युद्धकैदी बना दिया गया लेकिन चमत्कारी रूप से पुरानी साहसिक कथाओं की तरह, जो उन्होंने बचपन में सुनी थीं, वे कैद से भाग निकले। उन्हें ब्रिटिश सरकार और मीडिया ने नायक का दर्जा दिया, जिसका परवर्ती वर्षों में अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा की प्राप्ति के लिए उन्होंने भरपूर लाभ उठाया। चर्चिल ने प्रगति को लम्बी छलांग के रूप में देखा न कि क्रमबद्ध विकास के रूप में। 1900 में वापस इंग्लैंड लौटने पर अपने इन अनुभवों को उन्होंने संस्मरणात्मक ढंग से लंदन टू लेडीस्मिथ शीर्षक अपनी किताब में संकलित किया। इसी साल के चुनावों में पहली बार ओल्डहैम से वे कंजर्वेटिव पार्टी के एम. पी. चुने गये।
''चर्चिल राजनीतिक कैरियरवाद से ग्रस्त थे जिन्होंने अपना पूरा वयस्क जीवन राजनीतिक व्यवसाय में झोंक दिया।'' राबर्ट रोड्स जेम्स अपने इस आकलन की पुष्टि के लिए लार्ड बेवरबु्रक के इस कथन का हवाला देते हैं कि ''प्रत्येक अर्थ में वे एक प्रोफेशनल राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने अपने धंधे के लिए खुद को पूर्णतः प्रशिक्षित किया था। उनकी अन्य उपलब्धियों में निश्चय ही उनका महत्त्वपूर्ण लेखन शामिल है लेकिन यह भी उस कैरियर का ही अभिन्न हिस्सा है और इन दोनों पहलुओं में कोई गंभीर प्रतिद्वंद्विता नहीं है।'' इस आलोक में ही 1900 से 1955 तक के उनकी राजनीतिक सक्रियता के काल को समझा जा सकता है। (1955 में गिरते स्वास्थ्य की वजह से उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया। महारानी विक्टोरिया के निधन के कुछ दिनों पहले ही वे हाउस ऑफ कामंस के लिए चुने गये थे। उन्हीं वर्षों में सीवॉम राउन्ट्री की चर्चित किताब पोवर्टी अ स्टडी आफ टाउन लाइफ पढ़ने के उपरांत चर्चिल सामाजिक सुधार के समर्थक हो गए। कंजर्वेटिव के तौर पर मात्रा चार साल गुजारने के पश्चात्‌ वे लिबरल पार्टी में आ गए और हाउस ऑफ कामंस में क्रांतिकारी नेता डेविड लॉयड जार्ज की बगल में बैठने लगे। 1906 के आम चुनावों में चर्चिल उत्तर-पश्चिम मैनचेस्टर सीट से जीते और नई लिबरल सरकार में उन्हें उपनिवेशों का उप-राज्य सचिव बनाया गया। 1908 में चर्चिल को कैबिनेट मंत्राी बनाया गया और व्यापारिक बोर्ड के अध्यक्ष का कार्यभार सौंपा गया। इस पद पर रहते हुए उन्होंने कुछ महत्त्वपूर्ण सामाजिक कानून बनाए जिनमें रोजगार एक्सचेंज को स्थापित करना भी शामिल है। 12 सितंबर 1908 को चर्चिल ने क्लेकेंटाइन ओडिल्वी स्पेंसर से विवाह किया। अगले ही साल राजनीतिक अर्थशास्त्रा पर उनकी पुस्तक लिबरलिज्म एंड सोशल प्राब्लम का प्रकाशन हुआ। 1910 के आम चुनावों के बाद चर्चिल को गृह-सचिव का पदभार दिया गया। उन्होंने कारागार व्यवस्था में कुछ महत्त्वपूर्ण सुधार किए। खदान मजदूरों की एक हड़ताल के दौरान व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से सैन्य बल इस्तेमाल करने के कारण उनकी आलोचना भी हुई। अक्टूबर 1911 में वे नौ-अधिकरण के प्रथम लार्ड बने, जहां उन्होंने नौ-सेना को आधुनिक बनाने के ठोस प्रयत्न किये। 1912 में उन्होंने रॉयल नेवल एयर सर्विस का गठन किया। इस पद पर रहते हुए उन्होंने कई अन्य महत्त्वपूर्ण सुधार किए।
1919 में प्रथम विश्वयुद्ध के शुरू होने पर चर्चिल युद्ध परिषद से जुड़ गए। 1915 में चर्चिल को उनके कैरियर का सबसे बड़ा झटका लगा, जब तुर्की को परास्त करने के उद्देश्य से नौ-सेना के दस्ते को उन्होंने डारडैनलेस भेजा। यह अभियान एक मुसीबत साबित हुआ। इस असफलता का ठीकरा चर्चिल के सिर पर ही फोड़ा गया और उन्हें दूसरे पद पर स्थानांतरित कर दिया गया। सरकार की युद्धनीति को प्रभावित करने योग्य कोई पद या शक्ति न मिलने से खफा होकर वे पुनः ब्रिटिश आर्मी में चले गये। लेकिन, जल्द ही डेविड लॉयड जार्ज ने प्रधानमंत्राी बनते ही चर्चिल को पुनः सरकार में शामिल कर लिया और युद्ध के आखिरी वर्षों में उन्हें युद्ध सामग्री के उत्पादन का प्रभार दिया गया। लेकिन, इनके बीच का रिश्ता हमेशा अच्छा नहीं रहा, खासतौर पर तब जब चर्चिल ने ''प्रथम विश्व युद्ध के बाद सोवियत रूस के बोल्शेविकों के खिलाफ युद्ध में इंग्लैंड को झोंक देने का प्रयास किया। यह वही चर्चिल थे जिन्होंने इंग्लैंड के प्रधानमंत्राी के तौर पर द्वितीय विश्वयुद्ध के समय हिटलर के खिलाफ विश्व के अन्य देशों के साथ मिलकर व्यापक गठबंधन बनाने की पहल की थी और सोवियत रूस के इन्हीं बोल्शेविकों से हाथ मिलाया था, इन्होंने अंततः हिटलर को शिकस्त देने में निर्णायक भूमिका निभाई। राजनीतिक अवसरवाद के ऐसे कई उदाहरण चर्चिल के यहां मौजूद हैं। लिबरल पार्टी में हुई फूट के कारण 1922 के आम चुनावों में ई. डी. मोरेल से चर्चिल हार गए। इसके बाद थोड़ा हिचकते हुए वे कंजर्वेटिव पार्टी में पुनः शामिल हो गए और 1924 के आम चुनावों में इपिंग से जीतने में सफल रहे। प्रधानमंत्राी स्टान्ले बैल्डविन ने उन्हें खजाना मंत्राी नियुक्त किया, जिस पद पर 1924 से 1929 तक वे बने रहे। 1926 में इंग्लैंड की आम हड़ताल के खिलाफ उन्होंने सख्त और आक्रामक रुख अपनाया। इस विवाद के वक्त वे सरकारी पत्रा ब्रिटिश गजट के संपादक थे जहां उन्होंने लिखा कि ''या तो यह देश इस आम हड़ताल को तोड़ देगा, नहीं तो यह आम हड़ताल इस देश को तोड़ देगी।'' 1929 में कंजर्वेटिव पार्टी की हार के बाद चर्चिल को अपना पद खोना पड़ा। 1931 में जब रामसे मैकडोनाल्ड ने राष्ट्रीय सरकार का गठन किया तो चर्चिल को कैबिनेट में शामिल नहीं किया, क्योंकि उस वक्त तक वे एक चरम दक्षिणपंथी के रूप में ख्यात हो चुके थे। इस दौरान भारत को स्वराज का अधिकार देने के प्रश्न पर बैल्डविन से उनका विवाद भी काफी चर्चित रहा। उन्हें राजनीतिक अलगाव का शिकार होना पड़ा और निरंतर विरोध के इन अनुभवों ने उनके भीतर गहरी निराशा को जन्म दिया। अगले कुछ वर्ष उन्होंने लेखन पर ध्यान दिया जिसके परिणामस्वरूप उनकी किताब हिस्ट्री आफ इंगलिश स्पीकिंग पीपुल का प्रकाशन हुआ।
चर्चिल ने आगे भी कुछ ऐसी भूलें कीं, जिनका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा। 1936 के सिंहासन-परित्याग संकट के दौरान उन्होंने किंग एडवर्ड अष्टम का समर्थन कर दिया। उनके द्वारा पूर्व में की गई राजनीतिक गलतियों का ही प्रभाव था कि जब वे हिटलर के उदय के खतरों से इंग्लैंड की जनता को आगाह कर रहे थे और नेविल चैम्बरलेन की तुष्टीकरण की नीति के घातक परिणामों की ओर इशारा कर रहे थे तो लोगों ने उन्हें बहुत गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन म्यूनिख संकट के पश्चात्‌ उनके सारे अनुमान सही साबित होते दिख रहे थे और सितंबर 1939 में जब द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हुआ तो चैम्बरलेन ने उन्हें नौ-अधिकरण का प्रथम लार्ड नियुक्त किया। लगभग पचीस साल पहले जिस पद को उन्होंने अपमान और दुख के साथ छोड़ा था, नौ-सेना ने जहाजी बेड़ों को सूचना भेज दी थी, ''विन्सटन वापस आ चुका है।'' इसके आगे का इतिहास चर्चिल ने अपनी कार्य-उपलब्धियों और बाद में अपनी कलम से लिखा।
10 मई 1940 को जार्ज षष्ठम ने चर्चिल को इंग्लैंड का प्रधानमंत्राी नियुक्त किया। उन्होंने एक राष्ट्रीय सरकार का गठन किया और क्लेमेंट एटली, अर्नेस्ट बेविन, हरबर्ट मारीशन, स्टैफर्ड क्रिप्स और ह्‌यूग डाल्टन जैसे लेबर पार्टी के नेताओं को महत्त्वपूर्ण पदों का अधिकार सौंपा। चैम्बरलेन के पुराने और धुर विरोधी एन्थॉनी एडेन को युद्ध-राज्य सचिव बनाया गया। उनके मजबूत नेतृत्व के बावजूद युद्ध में इंग्लैंड को कठिन स्थितियों का सामना करना पड़ रहा था। कुछेक सैन्य विफलताओं के पश्चात ब्रिटिश पार्लियामेंट में उन्हें अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा, फिर भी हाउस ऑफ कामंस के 25 के मुकाबले 475 वोटों से वे जीतने में सफल रहे। सैन्य मामलों में हस्तक्षेप और सैन्य कमांडरों की अपेक्षा अपने मित्राों (फ्रेडरिक लिंडेमॉन आदि) के विचारों को ज्यादा गंभीरता से लेने के लिए उनकी लगातार आलोचनाएं होती रहीं। लेकिन, इन सबके बावजूद इंग्लैंड की जीत में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा। ब्रिटिश जनता को सिर्फ उन पर ही भरोसा था, उसने अपना नेता चुन लिया था। महत्त्वपूर्ण मौकों पर अपने सार्वजनिक भाषणों द्वारा जिस प्रकार ब्रिटिश जनता को उन्होंने महान प्रयत्नों की ओर प्रेरित किया, उसने आग्नेय स्थितियों का अनुभव कर रही जनता में दृढ़ विश्वास और संघर्षशील चेतना को जन्म दिया।
चर्चिल ने अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट से घनिष्ठ व्यक्तिगत संबंध विकसित कर लिए थे, अलबत्ता स्टालिन के साथ उनके रिश्ते हमेशा मुश्किल रहे। फिर भी उन्होंने धुरी राष्ट्रों के खिलाफ एक संयुक्त रणनीति तैयार की और अंततः 1944 में सफल हुए। इसी वर्ष घरेलू मोर्चे पर सार्वजनिक रूप से विलियम बेव्रिज की सामाजिक सुधार की योजना को स्वीकार कर लिया। फिर भी, वे मतदाताओं को ये समझाने में असफल रहे कि लेबर पार्टी और क्लेमेंट एटली की तरह वे इस योजना को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। भविष्य की लेबर सरकार की तुलना नाजी जर्मनी से करने के उनके प्रयत्न को उस समय जोरदार झटका लगा जब वे 1945 के आम चुनावों में बुरी तरह पराजित हुए और एटली इंग्लैंड के नये प्रधानमंत्राी चुने गए। विपक्ष के नेता के तौर पर 1946 में चर्चिल ने अमेरिका की यात्राा की और वहीं चर्चित आयरन कर्टेन भाषण दिया। उन्होंने ÷यूरोपियन परिवार' के पुनर्निर्माण के उद्देश्य से ÷आध्यात्मिक रूप से महान फ्रांस और जर्मनी' के बीच समझौते का प्रस्ताव किया। साथ ही वे ÷संयुक्त राज्य यूरोप' में इंग्लैंड की भूमिका को लेकर भी मुखर थे। द्वितीय विश्वयुद्ध की राख अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि उन्होंने फुल्टन, मिसौरी में शीतयुद्ध के आरंभ की घोषणा की और सोवियत यूनियन को नये खतरे के रूप में चिन्हित किया।
चर्चिल 1951 में पुनः सत्ता में लौट आए। उन्होंने ÷कुछ वर्षों के शांतिपूर्ण प्रशासन' का नारा दिया। 1955 में हृदयाघात झेलने के बाद और रूस के साथ शिखर बैठक के आयोजन की आशा की असफलता के पश्चात्‌ अप्रैल 1955 में वे सक्रिय राजनीति से अलग हो गए। 24 जनवरी 1955 को 91 वर्ष की अवस्था में उनकी मृत्यु हो गई।
चर्चिल का पारिवारिक जीवन सुखद नहीं रहा। उनके बच्चों की शादियां असफल रहीं और परिवार में मृत्यु का सिलसिला लगातार बना रहा। 3 साल की अवस्था में अपनी तीसरी बेटी कैरी-गोल्ड की मृत्यु का उन्हें काफी सदमा लगा। चर्चिल को जुआ खेलना बहुत अच्छा लगता था। 1929 के अमेरिकी सट्टा बाजार में आई जबरदस्त गिरावट में उन्होंने अपनी काफी संपत्ति गंवा दी जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति को बहुत नुकसान पहुंचा। चर्चिल के गतिविधिपूर्ण जीवन में परिवार और सोने के लिए उन्हें बहुत कम समय मिलता था। उनकी रुचि का दायरा बहुत व्यापक था, राजनीति से जब कभी उन्हें फुरसत मिलती, उसमें ही वे अपना बचा-खुचा समय लगाते थे। उनकी ऊर्जा का स्रोत कभी सूखता नहीं था। सकारात्मकता और आशावाद उनके चरित्रा की दो खास विशेषताएं थीं। निश्चय ही चर्चिल की जीवनशैली और प्रवृत्तियां उनके व्यक्तित्व के इन्हीं दो कोणों पर टिकी हैं।
मैं यहां चर्चिल के एक काले पक्ष की ओर इशारा करना चाहता हूं जिसे आप चाहें तो अमानवीय भी कह सकते हैं। 1919-20 में डेविड लॉयड जार्ज के प्रधानमंत्रिात्व काल में चर्चिल युद्धमंत्राी थे। इराक के संदर्भ में उनकी युद्ध नीतियों ने विवाद पैदा कर दिया था। ऐसा अनुमान लगाया गया था कि इराक के विरोधियों को नियंत्रिात करने के लिए 25 हजार ब्रिटिश और 80 हजार भारतीय सैनिकों की आवश्यकता है। लेकिन चर्चिल का मत था कि इंग्लैंड यदि हवाई शक्ति पर भरोसा करता है तो 4 हजार ब्रिटिश और 10 हजार भारतीय सैनिकों से काम चलाया जा सकता है। सरकार इस बात से सहमत हो गई और उसने नई गठित रॉयल एयर फोर्स को इराक भेजने का निर्णय लिया। वहां 1 लाख से भी ज्यादा की संख्या में जनजातियों ने सशस्त्रा विद्रोह कर दिया था। अगले कुछ महीनों में रॉयल एयर फोर्स ने 97 टन बम गिराए और लगभग 9 हजार इराकी इससे मारे गए। फिर भी ब्रिटिश शासन के खिलाफ अरब और कुर्द बागियों के विद्रोह को कुचला नहीं जा सका। उनका सुझाव था कि प्रयोग के तौर पर अड़ियल अरबों के खिलाफ रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया जाए। साथ ही उन्होंने कहा, ''मैं दृढ़ता के साथ इस पक्ष में हूं कि जीवंत आतंक को फैलाने के लिए इन असभ्य जनजातियों के खिलाफ जहरीली गैस का इस्तेमाल किया जाए।'' यह क्रूर, नस्लवादी विचार चर्चिल का ही था।
इन हालात में गांधी और आइंस्टाइन से चर्चिल की तुलना करते हुए उन्हें ÷शताब्दी पुरुष' का दर्जा दिया जाना उपयुक्त नहीं लगता। बुर्जुआ मीडिया और कुछ बुद्धिजीवियों का तर्क है कि आइंस्टाइन के विज्ञान, गांधी के अहिंसा के सिद्धांत की तुलना में स्वतंत्राता के लिए चर्चिल का संघर्ष ज्यादा महत्त्वपूर्ण था। मेरा खयाल है कि राज्य की शक्ति के खिलाफ गांधी के नेतृत्व में जिस प्रकार स्वतंत्राता के लिए महान जनांदोलन हुए, उनके आगे चर्चिल कहीं नहीं ठहरते और यदि बुर्जुआ नेताओं में किसी को शताब्दी पुरुष चुना जाना होगा तो वह अनिवार्य रूप से गांधी ही होंगे। यूं 20वीं सदी के पूर्वार्द्ध का इंग्लैंड और विश्व का राजनीतिक इतिहास चर्चिल की सक्रियताओं का गवाह है। किसी ने ठीक ही कहा है-खूबियां बहुत थीं मरनेवाले में...!

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