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मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य की पत्रि‍का

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अंक – 1 वर्ष – 1 जुलाई-‍सितम्‍बर, 2007

मुद्रित मूल्य

एक प्रति
30 रुपये
सदस्यता (बार्षिक )
120 रुपये
संस्थाओं के लिए
250 रूपये

त्रैबार्षिक

360 रूपये
पंचबार्षिक
600 रूपये
विदेश के लिए
50 डालर
आजीवन सदस्यता
5000 रूपये

मन माने की बात

पहल

मन ही मनुष्य है : डॉ. विनय कुमार
जंजीर में जिंदगी : पंकज चौहान

नोटिस बोर्ड

बातचीत

मानसिक रोग : कुछ बुनियादी बातें

मनोरोग के प्रमुख लक्षण

अपनी नींद की पड़ताल करें
'' देयर इज+ नथिंग गुड ओर बैड!''
राजेन्द्र यादव

मनोचिकित्सकों की कलम से

क्रूरता की शिनाख्त

मन और मनोविज्ञान : डॉ. एम थिरूनवुकरसू

पहले अंक में पहली बात :डॉ. प्रमोद कुमार सिंह

मनोचिकित्सा क्या है ? :
  डॉ. अजित अवस्थी / डॉ. शुभ मोहन सिंह

जनसंचार माध्यम और मानसिक स्वास्थ्य
  डॉ. अवधेश शर्मा

स्वस्थ सेक्स संबंधों की शर्त-सही संप्रेषण :
  डॉ. ओमप्रकाश

राज-सत्ता का मानस : आर चेतनक्रांति

क्रूरता : कुमार अंबुज

आम आदमी बनाम ख़ास कुत्ते : हेम

निष्कलंक

बावजूद

विंस्टन चर्चिल : रोहित प्रकाश

सिल्विया प्लाथ : अनामिका

अंधविश्वासों पर चोट करती कविता :डॉ.विनय कुमार

एक ख़त पागलख़ाने से : पेरिया परसिया

जयश्री की कविताएं

बालमन

  किताब के बहाने

बच्चों को सामाजिक कौशल सिखाएं : मीनू मंजरी
विन्सेन्ट वॉन गॉग : कुमार मुकुल

संबंध

कहानी

पर्देदारी की घुटन लांघती महिलाएं : स्वतंत्रा मिश्र
मिचली : श्रीकांत वर्मा

मनोव्यथा

फिल्म ( निःशब्द)

मन फाटे नहीं ठौर... : पंकज पराशर

इधर को भी नजर कीजै : एक मनोरोगी

उत्तर आधुनिक समय की विडंबना : विनोद अनुपम
अंधेरे में उतरती कविता : डॉ. विनय कुमार

 

व्यंग्य

महत्त्वपूर्ण होना : विष्णु नागर
Top (back to contents)
मनोवेद
अंक – 1 वर्ष – 1 जुलाई-‍सितम्‍बर, 2007

'भारत में आत्म-चिंतन का विशेष स्थान रहा है!'
डॉ. श्रीधर शर्मा से डॉ. विनय कुमार की बातचीत

सात पुस्तकों और 170 से अधिक शोधपत्राों के लेखक डॉ. श्रीधर शर्मा के साथ भारत, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया और अमेरिका की उच्चतम डिग्रियां जुड़ी हैं। मेडिकल कॉलेज बड़ौदा में पहली बार स्वतंत्रा मनोचिकित्सा विभाग की स्थापना का श्रेय इन्हें ही है। कई मेडिकल कॉलेजों में प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष रहे डॉ. शर्मा ने अपने निर्देशन में केंद्रीय मनोचिकित्सा संस्थान रांची को एक नया स्वरूप प्रदान किया और शाहदरा दिल्ली की मानसिक आरोग्य शाला को इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलायड साइंसेज के रूप में विकसित किया। अपनी प्रशासकीय क्षमताओं के लिए पहचाने जानेवाले श्री शर्मा चिकित्सा अधीक्षक सफदरजंग अस्पताल, निदेशक पीजीआई चंडीगढ़ तथा अतिरिक्त स्वास्थ्य महानिदेशक भारत सरकार जैसे पदों पर कार्य कर चुके हैं।
लंबे समय तक विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के सलाहकार और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च, मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया तथा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के परामर्शी व निरीक्षक रहे श्री शर्मा कई अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। मनोचिकित्सा और मनोचिकित्सकों के हितों और मान के लिए संघर्षरत श्री शर्मा इंडियन सायकाएट्रिक सोसायटी के सचिव तथा अध्यक्ष और वर्ल्ड एसोशियेशन फॉर सोशल सायकाएट्री के अध्यक्ष रह चुके हैं। डॉ. बी.सी. राय नेशनल अवार्ड सहित कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित श्री शर्मा संप्रति नेशनल एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंसेज तथा इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलायड साइंसेज के एमेरिट्स प्रोफेसर (आजीवन मानद प्राध्यापक) हैं।

आधुनिक मनोचिकित्सा को एक वैज्ञानिक विषय की तरह विकसित करने का श्रेय पश्चिम को जाता है। किंतु मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा हर सभ्यता के मनीषियों की चिंता की परिधि के भीतर रहा है। ÷मन एव मनुष्याणां कारणं बन्ध्मोक्षयोः' जैसे उपनिषदीय सूत्रो और मानसिक तकलीफों के लिए ÷आधि' जैसे शब्दों के प्रयोग और ÷शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम्‌' कहनेवाले भारतीय दर्शन में मनुष्य को ÷मन' से परिभाषित करने और मानसिक स्वास्थ्य को महत्त्व देने की परंपरा थी। हम जानना चाहेंगे कि मन के प्रति भारतीय और पाश्चात्य दृष्टिकोण में क्या अंतर रहा है?
भारत में मन के बारे में चिंतन कोई नयी बात नहीं है। वेदों में इसके बारे में काफी विवरण मिलता है। इसके अलावा आयुर्वेद में भी काफी चर्चा है। पश्चिम में मन को समझने का पहला प्रयास प्लेटो के समय हुआ। प्लेटो ने मन के बारे में तीन विशेष बातें बतायीं। पहली बात यह कि मन का स्थान मस्तिष्क में है। दूसरा यह कि माइंड एक इंटेंट, एक उद्देश्य होता है। तीसरी बात प्लेटो ने यह बतायी थी कि मन चेतनता के प्रति चेतन होने का अवसर प्रदान करता है। यह एक बुनियादी और अहम बात है। चेतनता की चेतना ही है जो मनुष्य को पशु से अलग करती है। बाकी जीवों की जो जीवन प्रणाली है वह एक जैसी है। उनमें भी भावना होती है, बुद्धि होती है, याददाश्त होती है और उनका व्यवहार भी मनुष्यों की तरह एक पद्धति से निर्देशित होता है। जो विशेष चीज मानव में पायी जाती है, वह है अपनी चेतनता की चेतना। चेतना के बारे में भारतीय सभ्यता में काफी चिंतन हुआ है। मैं समझता हूं कि चेतना संबंधी चिंतन में भारत पश्चिमी सभ्यता से काफी आगे था। तुलनात्मक अध्ययन में हम नहीं जाना चाहते कि हम कितना आगे थे या वे हमसे कितना पीछे थे, क्योंकि इस तरह की चर्चा हमें एक अनावश्यक प्रतियोगिता की तरफ ले जाती है, जैसी इन दिनों चलन में है।
भारत में स्वयं के बारे में चिंतन को हमेशा प्रोत्साहित किया गया। यहां आत्मचिंतन का एक विशेष स्थान रहा है। दोनों सभ्यताओं के दृष्टिकोण में अहम अंतर यह है कि भारत में स्वयं के मोक्ष पर जोर है, जब कि पश्चिम में कॉस्मिक (क्रमबद्ध सांसारिक) मोक्ष पर।
मानसिक स्वास्थ्य और मनोचिकित्सा के क्षेत्रा में पिछली सदी में अद्भुत विकास हुआ है। इस बदलाव की प्रक्रिया में छात्रा, शिक्षक, शोधकर्ता और प्रशासक के रूप में सक्रिय साझीदार रहे आप इसे कैसे देखते है?
जो बदलाव आए हैं उनमें कुछ अच्छे हैं और कुछ बुरे। स्वास्थ्य के बारे में हमारा ज्ञान पिछले 60-70 सालों में बढ़ा है। यह गलत धारणा है कि मानसिक स्वास्थ्य शेष स्वास्थ्य की तुलना में शोध और विकास के स्तर पर पिछड़ा था। 1930 के पहले किस बीमारी का समुचित इलाज होता था? मैंने एक बार प्रदर्शनी लगवायी थी कि अलग-अलग तरह से सभ्यताओं का समानांतर विकास किस तरह हुआ और पिछले सौ सालों में स्वास्थ्य के क्षेत्रा में क्या-क्या जानकारियां आयीं। दरअसल स्वास्थ्य के क्षेत्रा में विकास प्रथम विश्व युद्ध के बाद हुआ।
भारतवर्ष कई क्षेत्राों में काफी आगे रहा। अगर आधुनिक चिकित्सा प्रणाली की बात करें तो, बहुत से लोगों को ताज्जुब होगा कि WHO की स्थापना के भी पहले 1943 में भोर कमिटि की मुख्य अनुशंसाएं आइर्ं। WHO ने स्वास्थ्य के संबंध में बुनियादी दर्शन कि किस आधार पर आगे बढ़ना चाहिए, भोर कमिटि से उधार लिया। स्वास्थ्य के क्षेत्रा में भारत का यह योगदान काफी बड़ा है। स्वास्थ्य के क्षेत्रा में यूरोप का योगदान अमेरिका की तुलना में ज्यादा रहा है। 1950 के पहले अमेरिका शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रा में यूरोप से काफी पिछड़ा था। हमारे कई साथी जो 1960 के पहले अमेरिका गए उन्हें ताज्जुब होता था कि भारत स्वास्थ्य के क्षेत्रा में अमेरिका से आगे नहीं तो पीछे भी नहीं था। इसका अर्थ यह नहीं कि भारत में सबकुछ ठीक था। सबको स्वास्थ्य सेवाएं नहीं मिलती थीं जैसा कि अभी भी है। मगर जहां मिलती थीं मैं उसकी बात कर रहा हूं। लेकिन पिछले 50-60 सालों में हम आगे बने रहने की जगह पीछे होते जा रहे हैं। सिवा टेक्नॉलॉजी के। इस क्षेत्रा में भी हम थोड़ा गलत तरीके से आगे हो रहे हैं। कुछ दिनों पहले एक मीटिंग से आते वक्त किसी ने मुझे बताया कि दिल्ली में लंदन से ज्यादा सीटी स्कैन मशीनें हैं, और यहां जितनी सीटी स्कैन और एम.आर.आई. मशीनें हैं, उतनी पूरे कनाडा में नहीं हैं। यह व्यावसायिक दृष्टिकोण चिंता का विषय है।
मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्रा में विधिवत इलाज 1950 के बाद विकसित हुआ। इसके पहले ई.सी.टी., सायकोसर्जरी, इनसुलिन कॉमा थेरापी आदि प्रचलित थे और ये भी 1930-40 के बीच विकसित हुए। 1930 के पहले स्वास्थ्य के क्षेत्रा में बहुत कम विकास हुआ था। यह जानकर आश्चर्य होगा कि 1917 में
जी.पी.आई, यानी तंत्रिाका तंत्रा को ग्रसित करनेवाले थर्ड स्टेज सिफलिस का इलाज यह था कि मरीज को मलेरिया से ग्रसित करा दिया जाए। यह जानकर और भी ताज्जुब होता है कि इस इलाज को विकसित करने के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया। 1951 में इगाज मोनिस को सायकोसर्जरी के लिए नोबल पुरस्कार मिला, जिस पर हम अब हंसते हैं। यह कहना उचित नहीं है कि वे आगे थे और हम पीछे थे। स्वास्थ्य के क्षेत्रा में सारी जानकारियां इधर के 50-60 वर्षों में आयी हैं। भारत में सब तो नहीं मगर कुछ मनोरोगों का इलाज होता था। मनोरोग चिकित्सा में सर्पगंधा, अश्वगंधा या ब्राह्मी का उपयोग काफी हद तक वैज्ञानिक है।
विज्ञान की कोई सीमा रेखा नहीं होती। जो चीज एक देश के लिए ठीक है वह दूसरे देश के लिए भी ठीक होनी चाहिए। विज्ञान के साथ एक अद्भुत बात है कि अगर वह विकास नहीं करता तो उसका क्षरण होने लगता है। हमारे यहां के ज्ञान का क्षरण इसलिए हुआ और हो रहा है कि हमने न तो अपने विज्ञान के विकास के लिए काम किया और न ही नये विचारों को स्वीकार किया। विज्ञान की दुनिया में हम भूत में नहीं रह सकते। हमें वर्तमान में रहना है और भविष्य के बारे में सोचना है। यह जो नयी संचार-क्रांति आयी है इसने एक नयी दिशा दी है। मुझे लगता है, यह नयी दिशा सभी देशों के लिए, खासतौर से विज्ञान के विकास में काफी लाभदायक सिद्ध होगी।
1970 के आसपास रिसेप्टर्स की अवधारणा आयी। हम न्यूरोट्रांसमीटर्स के बारे में पहले भी जानते थे लेकिन इनके बारे में हमारी जानकारी ज्यादा साफ हुई। परिणाम स्वरूप बॉयोलॉजिकल सायकाएट्री में भी काफी बदलाव आए। यह स्पष्ट होने लगा कि किस दवा का किस रिसेप्टर और किस न्यूरोट्रांसमीटर पर क्या प्रभाव पड़ता है। टेक्नोलॉजी की वजह से एक बात और हुई। पहले किसी दवा की रासायनिक संरचना पता करने में सालों लग जाते थे, अब यह काम कुछ घंटों में हो जाता है। तो इस प्रकार हम देखते हैं कि न्यूरोट्रांसमीटर्स और रिसेप्टर्स की अवधारणा ने बायोलॉजिकल सायकाएट्री के विकास को गति दी है।
बायोलॉजिकल सायकाएट्री का विकास सचमुच बहुत तेजी से हो रहा है। कहीं यह मनोवैज्ञानिक पक्ष की उपेक्षा का कारण तो नहीं बन रहा?
मनोवैज्ञानिक पक्ष की जो उपेक्षा दिखती है, मुझे लगता है कि इसका मुख्य कारण व्यावसायिक है। समय के साथ दृष्टिकोण बदलते भी हैं। एक उदाहरण देता हूं। 1956 में जब संचार के साधन कम थे तब की बात है। अमेरिकी मनोचिकित्सकों का एक समूह लंदन आया, उन्होंने देखा कि लंदन में बायोलॉजिकल सायकाएट्री पर ज्यादा जोर है। उन दिनों अमेरिका में सायको- एनालिसिस का प्रचलन अधिक था। अमेरिकी धारणा यह थी कि अगर आप सायकोएनालिसिस नहीं जानते तो मनोचिकित्सा नहीं जानते। वही अमेरिका 1970 के बाद मानता है कि अगर आप सायकोएनालिसिस कर रहे हैं तो समय से पीछे हैं। आप देखें कि एक ही देश में, एक ही सभ्यता में कैसे विचार बदलते हैं। इनके कारणों पर विस्तार से बात करना यहां संभव नहीं।
मार्क्स कहते हैं कि धर्म अफीम की तरह दर्द-निवारक हैइसलिए क्रांति में बाधक भी। क्या सचमुच धर्म मानसिक स्तर पर दर्द-निवारण का काम करता है?
पहले तो हमें धर्म की व्याख्या समझनी होगी। धर्म की भारतीय और पाश्चात्य व्याख्याएं अलग-अलग हैं। पश्चिम की तरह हमारे यहां एक पवित्रा ग्रंथ और एक पैगम्बर की अवधारणा नहीं है। हमारे यहां 36 करोड़ देवता हैं लेकिन तीन देवता प्रमुख हैंब्रह्मा, विष्णु, महेश। एक जन्म देनेवाला, दूसरा पालन करनेवाला और तीसरा संहार करनेवाला। अगर हम इसे प्रतीक के रूप में लें और मानव शरीर के साथ जोड़कर देखें तो पाते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु एनाबॉलिज्म के प्रतीक हैं, और शिव कैटाबॉलिज्म के।
अब आएं मार्क्स की स्थापना पर। दरअसल धर्म का प्रभाव हमारे विश्वास से उत्पन्न होता है। बिलीफ है तो रिलीफ है। धर्म जो दर्द निवारण करता है, इसका फार्मूला हैफेथबिलीफरिलीफ। इन दिनों अपने यहां जो धर्म प्रचारकों की बन आयी है उनकी सफलता के पीछे भी यही फार्मूला है। हमलोग जो दवाओं का रोगियों पर परीक्षण (ड्रगट्रायल) करते हैं तो तुलनात्मक अध्ययन के लिए प्लेसिबो यानी दवा के नाम पर दवारहित मगर रंग-रूप-स्वाद में मिलती- जुलतीं गोलियां भी देते हैं कभी-कभी हम देखते हैं कि 40 प्रतिशत रोगियों पर दवा और प्लेसिबो का असर लगभग बराबर पड़ता है। इसे कहते हैं प्लेसिबो इफेक्ट। हर दवा का एक प्लेसिबो प्रभाव भी होता है। दवा कौन दे रहा है, दवा का रंग क्या है, कैसा है, किस रूप में दे रहा हैइन चीजों का भी रोगियों पर असर होता है। यह प्लेसिबो प्रभाव है। धर्म का भी एक प्लेसिबो प्रभाव होता है। यही प्रभाव दर्द निवारण करता है। क्रांति या बदलाव में बाधा धर्म प्रचारकों की तरफ से भी आती है क्योंकि उनके निहित स्वार्थ होते हैं।
धर्म रुढ़िग्रस्त करता है। कहता है सवाल मत करो, विश्वास करो। कहीं ऐसा तो नहीं कि वह हमें तर्कसम्मत और विचारशील बनने से रोकता है?
अगर हम प्रश्न का वातावरण बनाएंगे तो आराम नहीं मिलेगा। आप किसी भी मंदिर में जाएं तो पाएंगे कि एक मूर्ति होती है, एक पुजारी होता है और भक्त होते हैं। सभी मंदिरों में एक बात समान होती है कि मूर्ति को निश्चित और पवित्रा स्थान पर सजाकर रखा जाता है। मंदिर का द्वार चौबीसों घंटे नहीं खुला रहता। उस वक्त तो निश्चित ही बंद कर दिया जाता है, जब मूिर्त की साज-सज्जा की जा रही होती है। कभी सोचा है कि ऐसा क्यों किया जाता है? ऐसा इसलिए किया जाता है कि अगर आप उस मूर्ति में पत्थर को या लोहे को, या सोने को देखेंगे तो आपकी आस्था डिग जाएगी। आस्था को बनाए रखने के लिए यह सब जरूरी होता है। आप उसे जितनी दूरी पर रखेंगे आपकी उत्सुकता उतनी ही बनी रहेगी। अगर आप उसके निकट जाएंगे तो पाएंगे कि वह तो पत्थर का एक टुकड़ा-भर है।
तो इस प्रकार धर्म एक तंत्रा के रूप में दिखता है जिसे तयशुदा तरीके से चलाया जा रहा होता है।
हां, यह सही है। अब आप मेस्मरिज्म का उदाहरण लें। 1774 से पहले मेस्मरिज्म काफी लोकप्रिय था। या फिर कोई किसी को ताबीज दे दे। मेस्मरिज्म हो या ताबीज, आराम आस्था से ही मिलता है। रही धर्म को तंत्रा की तरह चलाने की बात तो देखिए आज भी समझदार लोग लड़ रहे हैंयह जेरुसलम है, यह वाराणसी है, यह कोई मंदिर या मसजिद की जगह है। इसके लिए किसी एक धर्म को दोष देना ठीक नहीं। यह सब धर्मों की कमजोरी है। कहते तो सब यही हैं, हममें
कोई कमजोरी नहीं। हमारा तंत्रा सबसे अच्छा है। धर्मों के ढर्रे और उनके विवाद मूलतः निहित स्वार्थों के कारण होते हैं।
गीता, महाभारत और रामायण जैसे ग्रंथ भारतीय लोक-जीवन के मैदान में पवित्रा नदियों की तरह सदियों से प्रवाहमान हैं। क्या इन ग्रंथों की मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा में कोई भूमिका रही है या है?
इन ग्रंथों में सामान्य जीवनचर्या के लिए काफी दिशा-निर्देश हैं। इनमें जीवन के द्वन्द्वों को दर्शाया गया है, और उनका समाधान किया गया है। जहां कोई समाधान संभव नहीं होता है वहां परिस्थितियों को स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया जाता है। मैं इसे अप्रत्यक्ष सायकोथेरापी कहना चाहूंगा, क्योंकि इन बातों का मानस पर असर होता है, और जीवन के द्वन्द्वों को सुलझाने में सहूलियत होती है। कुल मिलाकर ये ग्रंथ अच्छे मानसिक स्वास्थ्य की तरफ ले जाते हैं।
गीता के प्रसंग पर आएं। यह सत्य है कि जो परिस्थितियां थीं उनमें अर्जुन के मन में द्वन्द्व पैदा हुआ, उस द्वन्द्व के समाधान के लिए कृष्ण ने कुछ बातें कहीं जिनका गीता में उल्लेख है। उन बातों से अर्जुन का द्वन्द्व जाता रहा।
उनका मन साफ हो गया। आजकल की जो सायकोथेरापी है, उसके तीन सौ से भी अधिक प्रकार हैं। मैं समझता हूं कि इन सबका बुनियादी सिद्धांत एक ही है। सायकोथेरापी और बिहेवियर थेरापी पर अक्सर बहस होती है। मुझे इन दोनों में कोई बुनियादी अंतर नजर नहीं आता। सिगमंड फ्रायड ने कहा था कि दो परस्पर विरोधी इच्छाओं की वजह से मन में द्वन्द्व पैदा होता है और पावलॉव ने जो कहा था उसे देखिए कि जब मस्तिस्क के कार्टेक्स में किसी बिन्दु पर एक साथ दो उद्दीपन, एक उत्तेजक और दूसरा वर्जनात्मक आते हैं तो मस्तिष्क में द्वन्द्व पैदा होता है। इसे उसने कुत्ते के प्रयोग द्वारा दर्शाने का प्रयास किया था। अब यहां देखें कि दोनों ने एक ही बात कही है अंतर सिर्फ शब्दों का है। दोनों द्वन्द्व की बात करते हैं। पावलॉव उसे कार्टेक्स (मस्तिष्क) केंद्रित बताते हैं तो फ्रायड मन केंद्रित। फ्रायड कहते हैं इच्छाएं और पावलॉव कहते हैं उद्दीपन।
हमारे जीवन में आए दिन ऐसी स्थितियां आती हैं
परस्पर विरोधी। जैसे आपके सामने एक प्रस्ताव है विदेश जाने का। आप दुविधा में पड़ते हैंविदेश जाऊं या भारत में रहूं। आप सोच-समझकर एक निर्णय ले लेते हैं। बहुत सारे लोग निर्णय नहीं ले पाते और द्वन्द्व मंें पड़ जाते हैं। परिणाम यह होता है कि वे तनावग्रस्त हो जाते हैं। ऐसे मौके पर धार्मिक ग्रंथों के सुझाये रास्ते काम आते हैं।
भारत ने विश्व को जो-जो चीजें दीं, उनमें योग अप्रतिम है। मानसिक स्वास्थ्य और मनोचिकित्सा के क्षेत्रा में योग के उपयोग पर हमें कुछ बताएं।
योग इन दिनों अधिक लोकप्रिय है। 100 वर्ष पहले ऐसा नहीं था। योग की लोकप्रियता बढ़ाने में पाश्चात्य लेखकों का बड़ा योगदान है। जैसा कि मैंने भारतीय जीवन दर्शन के बारे में प्रारंभ में कहा थायोग भी मूलतः वैयक्तिक मोक्ष के लिए है, वैश्विक मोक्ष के लिए नहीं। आज जो योग प्रचलन और चर्चा में है वह कौस्मिक योग है, वह पारंपरिक भारतीय योग नहीं। पारंपरिक भारतीय योग स्वयं को ऊपर उठाने की युक्ति है। चिंतन इसका एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। इसके आठ चरण हैंयम, नियम, प्राणायाम, आसन, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि। एक चरण से दूसरे में जाने की एक निश्चित प्रक्रिया है। आप सीधे ध्यान की स्थिति में नहीं जा सकते। भारतीय योग का एप्रोच पूरी तरह वैज्ञानिक है। आज का कोई योगी यम-नियम के बारे में बात नहीं करता। यह कठिन रास्ता है, इसलिए वह इससे बचता है। वह सिर्फ प्राणायाम और आसन की बात करता है।
जहां तक पश्चिम और योग का प्रश्न है तो ऐसा है कि वे योग को अपने तरीके से ले रहे हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। हम जो इतिहास की किताबें पढ़ते हैं आजकल, वो चार तरीकों से लिखी गयी हैं। पहले कुछ पश्चिमी नृतत्त्वशास्त्राी आए, उन्होंने चीजों को अपने तरीके से समझा और लिखा। उसके बाद मिशनरी आए, उन्होंने अपने ढंग से लिखा। इतिहास का तीसरा पाठ
अपने अनुसार तोड़-मरोड़ करके उन्होंने तैयार करवाया जो सत्ता
में रहे। इतिहास का चौथा पाठ मार्क्सवादी लेखकों ने लिखा। अब यह कहना कठिन है कि इतिहास का कौन सा पाठ सही है। दरअसल History is his-story। हम भारतीय हिज स्टोरी पढ़
रहे हैं नृतत्त्वशास्त्राी की, मिशनरी की, उपनिवेशवादी की या मार्क्सवादी की।
पाइन ट्री सीधा विकास करता है। अगर यह टेढ़ा या बौना होता है तो समझें कि उसके बीज में गड़बड़ थी या वातावरण में। यह मनुष्य पर भी लागू होता है। मनुष्य अगर प्राकृतिक वातावरण में बढ़े तो उसके बीमार होने की संभावना कम होती है। सभ्यता ने हमें विकास के औजार यकीनन दिए हैं मगर उसने हमंें क्षरण और विनाश की तरफ भी उन्मुख किया है। जंगल में देखकर आप पता नहीं कर सकते कि बाघ अमीर है या गरीब। अगर उन्हें कुछ होता है तो समझें कि उनके भोजन-पानी में कुछ दोष है। उन्हें कोई दवा नहीं देता। वे आम तौर पर बीमार नहीं होते। जंगल में अस्पताल तो होता नहीं। तब भी वे जीवित रहते हैं। तात्पर्य यह है कि प्रकृति के जितना पास रहेंगे बीमार होने की संभावना उतनी कम है। योग हमारे शरीर और मन के भीतर एक प्राकृतिक वातावरण बनाकर हमें स्वस्थ रहने में मदद करता है।
मनोरोगियों को अभिशापग्रस्त माना जाता रहा है। उनके साथ अछूतों और अपराधियों जैसा व्यवहार किया जाता है। आज भी पागलपन का कलंक (Stigma) एक अंधी गली की तरह है। हम आपसे जानना चाहेंगे क्या मनोरोग का स्टिग्मा दुनिया के अन्य देशों में भी है? और अगर है तो किस रूप में? हम यह भी जानना चाहेंगे कि अन्य देशों, खासकर यूरोप और अमेरिका में स्टिग्मा की स्थिति भारत से किस रूप में भिन्न है?
मानसिक रोगों से जुड़ा कलंक पश्चिम की देन है भारत की नहीं। आप देखें कि टी.बी., कुष्ठ और मानसिक रोगियों को रखने के लिए जो संस्थान बने वे पहले पश्चिम में ही बने। ऐसी कोई सूचना नहीं मिलती कि भारत में ऐसी कोई संस्था कभी बनी। ऐसी संस्थाएं पश्चिम में बनीं क्योंकि वहां समुदाय की सुरक्षा का व्यक्ति की सुरक्षा से अधिक महत्त्व था। सामुदायिक सुरक्षा के लिए वे इन रोगियों को शहर से दूर चारदीवारी के भीतर डाल देते थे। इन रोगियों के लिए जो कानून बने वे भी पश्चिमी देशों में ही। भारत में ऐसा कोई कानून नहीं बना। भारत में मनोरोग को लेकर कोई स्टिग्मा नहीं था। आप पूछ सकते हैं कि इसका क्या प्रमाण है? हमारे पास प्रमाण हैं। रामायण के हवाले से देखें। दशरथ को अवसाद (डिप्रेशन) के तीन दौरे पड़ेश्रवण को मारने के बाद, विश्वामित्रा की रक्षा के लिए राम-लक्ष्मण के जाने के बाद और राम वनवास के बाद। इन तीनों घटनाओं के बाद दशरथ की जो स्थिति हुई उसका डायग्नोसिस डिप्रेशन ही है। एक गौरतलब बात और है, दशरथ के पिता भी डिप्रेशन के शिकार हुए थे। इस बात का भी विवरण मिलता है। इससे भी महत्त्वपूर्ण यह है कि राम खुद डिप्रेशन में गए और उन्होंने आत्महत्या की। नाम चाहे जो देंस्वर्गारोहण या जलसमाधिहै तो आत्महत्या ही। इन सबके बावजूद हमने राम को अपना नायक माना है। हमने उनका मूल्यांकन दूसरे रूप में किया है। अब कृष्ण की बात करें। कृष्ण जिन्होंने अर्जुन के द्वन्द्व की गांठ खोली, अपने अंतिम दिनों में अपनी समस्याएं नहीं सुलझा सके। समाज से कटकर जंगल की तरफ गए जहां एक व्याधा ने उनकी हत्या की। इस नकारात्मक पक्ष के बावजूद कृष्ण नायक हैंदेवता हैं। महाभारत के यशस्वी पांडवों को देखें। अपने अंतिम दिनों में जीवन को अर्थहीन पाकर हिमालय में जा गले। अब हाल के इतिहास को देखें। 18वीं सदी में जगन्नाथपुरी में बहुत से लोग अपने प्राणों का अंत करने के लिए रथ के नीचे आ जाते थे। सतीप्रथा को ही देखिए, अनुचित होने के बावजूद कितनी महिमामंडित थी। जिसे बाद में उचित कानून बनाकर रोका गया। इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत में स्टिग्मा कोई मुद्दा नहीं था। एक प्रकार से ऐसे विचलनों के प्रति स्वीकृति भाव था। स्टिग्मा पूरी तरह से पश्चिम की देन है। मेरा तो यह भी मानना है कि मेंटल हेल्थ ऐक्ट की कोई जरूरत नहीं। ऐसे कानून मरीजों को जितनी मदद देते हैं, उससे ज्यादा स्टिग्मा।
फ्रेंच दार्शनिक फुको की किताब ÷मैडनेस ऐंड सिविलाइजेशन' का पहला अध्याय Stultifera Navis मनोरोगियों के निर्वासन की व्यथा-कथा कहता है और दूसरा अध्याय Great Confinement उनकी कैद की। चार दीवारी के बीच समाज के लिए खतरनाक ' ÷बेचारे' मनोरोगियों को बंद रखने की ÷प्रथा' पर हम आपके विचार जानना चाहेंगे।
यूरोप एक क्रूर इलाका रहा है। मानवीय मूल्यों की अवधारणा तो वहां 18वीं सदी के अंत में आई, मानवतावादी दार्शनिकों के सौजन्य से। इंग्लैंड जाकर वहां के पुराने किले देखेंगे तो पता चलेगा कि कैसे कैदियों को तहखानों में रखते थे और उन्हें कू्ररतापूर्वक यातनाएं देते थे। हिन्दुस्तान में ऐसा बहुत कम होता था, यूरोप में यह आम बात थी। मनोरोगियों के साथ उनका जो व्यवहार था उसमें हम इसी सभ्यतागत क्रूरता की झलक पाते हैं।
सिकंदर महान जब एक-एक देश को जीतता और उन्हें कुचलता भारत पहुंचा और उसने पोरस को हराकर उसे बंदी बनाया तो पोरस से पूछा कि उसके साथ क्या व्यवहार किया जाए। पोरस का उत्तर था कि ठीक वैसा ही जैसा एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है। यह घटना अद्भुत साहस की परिचायक है। एक गिरफ्तार आदमी जो अपने शत्राु के कारनामों के इतिहास को जानता हैवह ऐसा जवाब देता है कि शत्राु का हृदय परिवर्तन हो जाता है। चूंकि यह बात पश्चिमी अवधारणाओं के प्रतिकूल है, इसलिए इस घटना को अधिक महत्त्व नहीं दिया गया। लेकिन सोचने की बात है कि इसके बाद इतिहास बदल जाता है। भारत सिकंदर का आखिरी पड़ाव होता है। जिस तरह पश्चिम के विजेता पराजित राजा को तहखाने में डाल देते थे, उसी तरह की परंपरा अगर भारत में होती तो पोरस ऐसी बात न कहता। पोरस ऐसी बात इसलिए कह पाया होगा क्योंकि भारत में पारस्परिक सम्मान की परंपरा रही होगी।
यूरोप के लोग कितने असभ्य और क्रूर थे, इसके कई उदाहरण हैं। जब वे अमेरिका गए तो वहां के लोगों को मार दिया, उनकी सभ्यता नष्ट कर दी। ऑस्ट्रेलिया और दक्षिणी अमेरिका में भी यही किया। जब वे भारत में आए तो ऐसा नहीं कर पाए क्योंकि हमारी सभ्यता का ढांचा मजबूत था। अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए उन्हें ही अपने को अनुकूलित करना पड़ा।
अमेरिकी कहते हैंएशियन अमेरिकन, अफ्रीकन हिस्पैनिक अमेरिकन। मैं कहता हूं कि आप भी तो हैं यूरोपियन अमेरिकन। लेकिन विडम्बना देखिए कि वे अपने को अमेरिकन कहते हैं, सिर्फ अमेरिकन, जिनके पास शक्ति होती है, वही इतिहास के फैसले करते हैं।
पिछले कुछ दशकों से मनोचिकित्सा को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने के प्रयास हो रहे हैं। आरोग्यशाला आधारित मनोचिकित्सा की जगह ÷आउट डोर' मनोचिकित्सा पर जोर है। इसे आप कैसे देखते हैं?
फैमिली थेरापी और कम्युनिटी सायकाएट्री की अवधारणा कोई आज की नहीं है। सबसे पहला श्रेय तो भोर कमिटि को देना पड़ेगा। 1965 में जिला मानसिक अस्पताल की अवधारणा आयी थी। इसे स्वास्थ्य मंत्राालय ने स्वीकृत किया था। चूंकि स्वास्थ्य मूलतः राज्य सरकार का विषय होता हैशायद इसलिए यह मामला आगे नहीं बढ़ पाया था। किंतु एक नयी दिशा देने की कोशिश तो की ही गयी थी। 1976 में मैंने आई.पी.एस. की एक डायरेक्ट्री निकाली थीरूरल मेंटल हेल्थ। हालांकि बहुत से लोग इन चीजों पर चर्चा नहीं करना चाहते। रांची में 1920 में फैमिली वार्ड बना। उस समय विदेशों में इस विषय पर कोई बात भी नहीं होती थी। किसी मेडिकल कॉलेज में सबसे पहला स्वतंत्रा मनोचिकित्सा विभाग मैंने शुरू किया था। यह 1965 की बात है, जब मैं बड़ौदा मेडिकल कॉलेज के मनोचिकित्सा विभाग में प्रोफेसर तथा विभागाध्यक्ष बना। इससे पहले ऐसी स्थिति सिर्फ ऑल इंडिया इन्स्टीच्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में थी। किंतु देश के अन्य मेडिकल कॉलेजों में मनोचिकित्सा की एक यूनिट भर होती थीमेडिसिन विभाग के साथ। आउटडोर, इमर्जेंसी, इनडोर आदि के साथ पहली बार पूर्ण विकसित विभाग मेरी कोशिशों से बना। यहां एक बात बताता चलूं कि अभी हाल में मैं बड़ौदा गया था। मैंने देखा कि मनोचिकित्सा विभाग को मुख्य भवन से हटाकर बाहर कर दिया गया है और दुःख की बात तो यह है कि मनोचिकित्सक इसे स्वीकार कर रहे हैं। यह विकास नहीं द्द्वास है ऐसी स्थितियों के लिए हमें दूसरों से ज्यादा अपने आप को जिम्मेवार मानना चाहिए।
अगर पश्चिम की बात करें तो मैं कहना चाहूंगा कि वहां की किताबों में इस विषय का जिक्र नहीं होता था। हालांकि लक्ष्य पूरा नहीं हुआ, फिर भी अलमा आटा की घोषणा÷सबके लिए स्वास्थ्य' का महत्त्व है। इसने एक नयी दिशा दी। इसके पहले वे सिर्फ शहरी क्षेत्राों में केन्द्रित थे। कल ही मैंने एक किताब खत्म की है। समीक्षा के लिए उससे नोट्स लिए हैैं। यह किताब विश्व स्वास्थ्य संगठन की हैमानसिक स्वास्थ्य की उन्नति तथा मनोरोगों की रोक-थाम पर। इस किताब में लिखा है कि मानसिक स्वास्थ्य की उन्नति के लिए ज्यादा पैसा लगाने की जरूरत है। लेकिन मेरा मानना है कि पैसे से ही सब ठीक नहीं होता। बेहतर मानसिक स्वास्थ्य कई कारकों पर निर्भर करता है। अधिक पैसे आएंगे तो मशीनों और दवाओं पर खर्च होंगे। इससे मेंटल हेल्थ का भला नहीं होनेवाला। किसी मनोचिकित्सा विभाग में एम.आर.आई. लग जाए तो मनोरोगियों की बेहतर देखभाल होगीऐसा मैं नहीं मानता।
काहिरा में वर्ल्ड कांग्रेस ऑफ सायकाएट्री में मानसिक अस्पतालों की आवश्यकता और प्रासंगिकता पर एक डिबेट हुआ था। क्या मानसिक अस्पतालों की आवश्यकता और प्रासंगिकता आज भी है?
वह जो डिबेट हुआ था, उसमें उपस्थित लोगों ने मेंटल हास्पीटल की जरूरत है, के पक्ष में वोट दिया था जो कि मेरा भी दृष्टिकोण था।
जी हां मुझे अच्छी तरह याद है। आपके प्रतिद्वन्द्वी जो कि कनाडा के थे, उन्हें सिर्फ दो वोट मिले थे।
एक आंकड़ा है कि 60-70 फीसदी मनोरोगी जिन्हें भर्ती किया जाता है, उनकी देखभाल मानसिक अस्पतालों के जिम्मे है। मैं खासतौर से अमेरिका की बात करना चाहूंगा जहां मानसिक अस्पताल बंद कर दिए गए। यह इस बात का प्रमाण है कि हास्पीटल से बाहर किए गए मनोरागी सड़कों पर भटक रहे हैं या जेलों में पहुंच गए हैं। प्रश्न यह है कि उनका क्या किया जाए और यह भी कि मानसिक रूप से बीमार लोगों के प्रति किसी राष्ट्र का क्या दृष्टिकोण होना चाहिए? मेरा मानना है कि अगर उनके प्रति आपका रवैया सकारात्मक है, तो आप सभ्य हैं और नकारात्मक है, तो असभ्य। पश्चिमी देशों का दृष्टिकोण अभी भी नकारात्मक है। उनकी नीतियां बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के निर्देशों पर बनती हैं। मैं नहीं कहता कि बहुत अस्पताल बनाएं। लेकिन गौर करना होगा कि भर्ती योग्य रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है और पारिवारिक-सामाजिक सहारा घटता जा रहा है। रास्ते क्या हैं? एक तो यह कि हम वैकल्पिक सेवा प्रदान करें, उसके बाद आरोग्यशालाओं को बंद कर दें। दूसरा यह कि उन्हें बंद कर दें और वैकल्पिक व्यवस्था भी नहीं करें। रोगियों का जो होना है सो हो। तीसरा रास्ता यह है कि इन अस्पतालों को नया रूप दिया जाए। मेरा अपना मानना है कि इन्हें बंद करने और वैकल्पिक व्यवस्था शुरू करने की जगह इन्हें नया रूप दिया जाए, क्योंकि यह कॉस्ट-इफेक्टिव रास्ता है। हमारे पास संसाधनों की वैसे ही कमी है। नया रूप देने की दिशा में मैंने कुछ प्रयोग किए हैंगोआ में, रांची में, इहबास, शाहदरा (दिल्ली) में। तेजपुर में भी मैंने एक नया दृष्टिकोण दिया था।
इस नए रूप का मॉडल क्या है?
मॉडल यह है कि मानसिक आरोग्यशालाएं भी अन्य अस्पतालों की तरह हों। कस्टोडियल केयर की जगह मरीजों का इलाज किया जाएक्यूरेटिव अप्रोच। इन अस्पतालों में खुलापन आए, बहुत ऊंची दीवारें न हों, लोगों के आने-जाने की निगरानी हो मगर मनाही न हो। बाह्‌य रोगियों के इलाज की व्यवस्था हो, आपातकालीन सेवाएं उपलब्ध हों तथा आउटरीच प्रोग्राम यानी अस्पताल से दूर जाकर छोटे-छोटे केन्द्रों पर मनोचिकित्सकों की सेवाएं उपलब्ध कराई जाएं तथा रोगियों के पुनर्वास के लिए कार्यक्रम चलाए जाएं। ये सारी सुविधाएं एक ही छत के नीचे होंयही है नया मॉडल। आधारभूत ढांचे को नष्ट करने की जगह उनका सदुपयोग किया जाना चाहिए। कार्यरत मानव संसाधन को पुनः प्रशिक्षण देकर उन्हें नयी भूमिका के लिए तैयार किया जाना चाहिए।
मनोचिकित्सा के क्षेत्रा में भारत की उपलब्धियों को आप कैसे देखते हैं?
उसे कई तरह से देखा जा सकता है। सुविधाएं जरूर बढ़ी हैं। पहले मनोचिकित्सा की सुविधा सीमित थी। विकेन्द्रीकरण के कारण सुविधाओं की उपलब्धता तथा उन तक लोगों की पहुंच निश्चित रूप से बढ़ी है। लोगों की क्रयशक्ति भी बढ़ी है। सेवा देनेवाले लोगों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। 1950 से पहले अपने यहां मुश्किल से 30-40 मनोचिकित्सक थेवे भी अर्द्धप्रशिक्षित या अप्रशिक्षित। कोई भी पूरी तरह प्रशिक्षित नहीं। उस वक्त टे्रनिंग विदेशों में होती थी। अब मनोचिकित्सकों की संख्या 4000 से अधिक है। मनोचिकित्सकों के अलावा सायकॉलाजिस्ट सायकाएट्रिक सोशल वर्कर्स आदि भी भूमिका निभा रहे हैं। तो इस प्रकार हम देखते हैं कि सुविधाएं काफी बढ़ी हैं। और खास बात यह है कि लोगों में जागरूकता भी बढ़ी है। इसे हम सकारात्मक विकास कहेंगे।
नागरिकों के मानसिक स्वास्थ्य के संरक्षण और संवर्द्धन की कितनी जिम्मेवारी सरकार की होनी चाहिए? इस दिशा में मनोचिकित्सकों की जिम्मेवारी पर भी अपनी राय दें।
आज की दुनिया में सरकार का अर्थ हैकल्याणकारी सरकार। जहां तक भारत की बात हैलोगों को स्वास्थ्य और शिक्षा देना सरकार की संवैधानिक और नैतिक जिम्मेवारी का हिस्सा है। अभी जो निजीकरण का दौर है कि हम हर चीज को निजी हाथों में दे देंगे, यह पीछे लौटना है। हमें सरकार से पूछना होगा कि आप जो हमसे टैक्स लेते हैं, उसे कहां खर्च करेंगेडिफेंस पर या बाकी चीजों पर, जो कहीं से भी रचनात्मक नहीं। स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा पर होनेवाले व्यय के बीच संतुलन होना चाहिए। अगर सरकार यह जिम्मेवारी नहीं निभा रही है तो वह कल्याणकारी सरकार नहीं है। कुछ स्कैंडेवियन देश हैं जो मेरे ख्याल से आदर्श हैं। अमेरिका कल्याणकारी राज्य नहीें है। जहां तक स्वास्थ्य संबंधी सरोकारों की बात है, अमेरिका एक असफल राज्य है। अमेरिका में सिर्फ इलाज की बात होती है। निजी क्षेत्रा सिर्फ रोगों के इलाज के केन्द्रों में रुचि रखते हैं, बचाव और स्वास्थ्य वृद्धि केन्द्रों में उनकी कोई रुचि नहीं क्योंकि इन क्षेत्राों में पैसा नहीं है। इसलिए यह सरकार की जिम्मेवारी बनती है कि अक्षम तबकों को भी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराए। पश्चिम में स्वास्थ्य बीमा को भी समाधान की तरह पेश किया जाता है। लेकिन ऐसा नहीं है। बीमा कंपनियां अपनी जेब से पैसे नहीं देतीं। वे आपके पैसे को आप पर लगाती हैं अपना कमीशन काटकर। अगर डाक्टर, अस्पताल, नियोजक/सरकार और मरीज सभी ईमानदार हों तो कम पैसे में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं दी जा सकती हैं।
हमें ईमानदारी से सोचना चाहिए कि कितने मनोचिकित्सकों को मनोरागों की रोकथाम और मानसिक स्वास्थ्य की उन्नति के लिए काम करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। इस क्षेत्रा में उनसे योगदान की उम्मीद करने के पहले उन्हें प्रशिक्षण देकर जानकार और निपुण बनाना होगा। दूसरी बड़ी बाधा है रुचि और प्रेरणा का अभाव, क्योंकि इस क्षेत्रा में निजी क्षेत्रा की तरह पैसा नहीं है। जो चीज सब बाधाओं को पार कर सकती है वह है कमिटमेंट, प्रतिबद्धता।
अपने यहां ÷1912 के इंडियन ल्युनैसी एक्ट' की जगह 1987 का ÷मेंटल हेल्थ एक्ट' लागू हो गया है। दोनों में क्या अंतर है? क्या नये कानून में भी कुछ कमियां हैं?
1987 के मेंटल हेल्थ एक्ट को विकसित करनेवाली टीम का मैं हिस्सा था। बावजूद इसके मैं मानता हूं कि मेंटल हेल्थ ऐक्ट होना ही नहीं चाहिए। मैंने उस वक्त बहुत जोर देकर अपना दृष्टिकोण रखा था। लेकिन सारे मित्राों ने इस राय का विरोध किया। मैं फिर दुहराना चाहूंगा कि एक्ट मनोरोगियों को स्टिग्मैटाइज करता है, कलंकित करता है।
1912 और 1987 के कानूनों में कई अंतर हैंबेहद सकारात्मक। बहुत से लोग कहते हैं कि ऐक्ट तो ऐक्ट है, ल्युनैटिक कहो या मेंटल हेल्थ, क्या फर्क पड़ता है। मैं ऐसे लोगों से पूछना चाहूंगा कि (ईश्वर न करे) आप बीमार पड़ें तो अपने लिए किन शब्दों का प्रयोग चाहेंगेल्युनैटिक, मैड, सायकाएट्रिक प्रॉब्लम, मेन्टल हेल्थ प्रॉब्लम या इमोशनल प्राब्लम। ल्युनैसी, पागलपन शब्द में कलंक का भाव है। 1921 के पहले मानसिक आरोग्यशाला को ल्युनैटिक असाइलम कहते थे। 1921 में इस नाम को बदलकर मेंटल हॉस्पीटल कर दिया गया। इस पर मुझे बर्कले हिल का एक लेख याद आ रहा है जिसमें उन्होंने लिखा था कि शब्दों को बदलने से पड़नेवाले फर्क का महत्त्व वही समझ सकते हैं जो इन अस्पतालों को चलाते हैं और जो मनोरोगों के शिकार होते हैं।
मनोरोगों की पहचान के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन क्रमशः सुधार करते हुए एक के बाद एक ÷इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ डिजीजेज' के दस संस्करण निकाल चुका है। अमेरिका में भी ÷डायग्नोस्टिक एंड स्टैटिस्टिकल मैनुअल' के चौथे संस्करण में सुधार किया जा चुका है। रोगों की पहचान के तरीके लगातार बदले जा रहे हैं। कानून रोज नहीं बन सकते। यह कानून मानता है कि मनोरोग वह है जिसे इलाज की जरूरत है। यह कानून अपनी लचीली मान्यता के कारण बदलती परिभाषाओं के साथ तादात्म्य बिठाने में सक्षम है। इस कानून के कारण मरीजों की भरती का तरीका आसान हो गया है। पहले विजिटर्स बोर्ड के नाम आवेदन देना पड़ता था, अब कोई भी मौखिक या लिखित आवेदन के द्वारा भर्ती हो सकता है। इस कानून में यह एक बहुत ही प्रगतिशील बात है, जो इसे पश्चिमी देशों के कानूनों से अलग करती है। यह एक ऐसी बात है जो मनोरोगियों को अन्य रोगियों के बराबर के दर्जे में लाती है। इसी तरह अस्पतालों से छुट्टी के तरीके को भी आसान बनाया गया है।
अनैच्छिक भर्ती के लिए भी पुराने तरीके के साथ-साथ एक नया और आसान तरीका जोड़ा गया है। परिवार, मित्रा या पड़ोसी मरीज को दो-तीन दिनों के लिए भर्ती करा सकते हैं; इसके बाद बोर्ड के दो सदस्य इस अवधि को तीन महीनों के लिए बढ़ा सकते हैं। सोचा यह गया था कि अगर आप रोगी में तीन महीनों में सुधार नहीं ला सकते तो कभी नहीं ला सकते। मैं साभार कहना चाहूंगा कि इस बात को जोड़ने में डॉ. चन्नाबसवन्ना ने मेरा साथ दिया था। इस मेंटल हेल्थ एक्ट की एक और विशेषता यह है कि इसमें मानवाधिकार की अवधारणा को भी जगह दी गयी है। इसमें वे बातें भी हैं जो बाकी लोगों ने बाद में कहीं।
हमें इस कानून की अनावश्यक आलोचना नहीं करनी चाहिए। यह जो लोगों का ऑब्जेक्शन है कि सायकाएट्रिक नर्सिंग होम के लिए लाइसेंस की जरूरत क्यों हो, यह गलत विरोध है। दिल्ली और मुंबई सहित कई राज्यों में नर्सिंग होम चलाने के लिए पहले से ही कानून है और लाइसेंस लेना पड़ता है। हम एक ऐसे समाज में रहते हैैं जहां कानून का शासन है। जब आपको गाड़ी चलाने के लिए लाइसेंस की जरूरत पड़ती है तो एक नागरिक के जीवन से जुड़े कार्य के लिए उसकी जरूरत क्यों न हो। दूसरा विरोध इस बात पर है कि एक नर्सिंग होम में कितनी शय्याओं के लिए एक मनोचिकित्सक हो। किसी ने कहा कि 100 शय्याओं के लिए एक मनोचिकित्सक काफी है। इसे नहीं माना जा सकता। यह निहित स्वार्थ का मामला है। अगर इस अवधारणा पर चलें तो कहा जा सकता है कि हमें ज्यादा मनोचिकित्सकों की जरूरत नहीं है। इस हिसाब से तो हमंें मनोचिकित्सकों की कमी का रोना नहीं रोना चाहिए। सरकार भी कह सकती है कि अगर प्राइवेट हास्पीटल में सौ रोगियों के लिए एक चिकित्सक काफी है तो सरकारी अस्पताल में पांच सौ रोगियों के लिए पांच काफी होंगे। तो इस तरह के विरोध सिर्फ निजी स्वार्थ के लिए हैं। दस बेड के लिए एक मनोचिकित्सक का प्रावधान एकदम ठीक है। इससे कम नहीं हो सकता।
मुझे लगता है कि यह ऐक्ट काफी प्रगतिशील है। यह ऐक्ट मुख्यतः मेंटल हास्पीटल पर केंद्रित है। यह सामान्य अस्पतालों के संचालन को संबोधित नहीं करता। मेडिकल कॉलेज के मनोचिकित्सा विभाग इस कानून के दायरे में नहीं आते। मनोरोग अमीरों को ही नहीं, गरीबों को भी होते हैं। क्या आपके हिसाब से अमीर और गरीब मनोरोगी में कोई अंतर होता है? अंतर तो देखते ही पता चल जाता है। रोगों के लक्षण तो एक जैसे होते हैं मगर गरीब मरीज गंदे, बदबूदार और फटेहाल होते हैं। गरीब आदमी हर स्तर पर दुःख सहता है। एक अमीर या प्रसिद्ध आदमी जब आता है चिकित्सक का व्यवहार बदल जाता है। सच्चाई यही है कि हम अमीर और गरीब के प्रति एक-सा व्यवहार नहीं करते।
एक रोचक तथ्य है कि पश्चिम की तुलना में भारतीय मनोरोगियों का इलाज दवाओं की कम खुराक से ही हो जाता है। इसके क्या कारण हैं?
शोध प्रमाणों से यह स्पष्ट है कि प्रभाव के मामले में दवाएं नस्ली भेदभाव बरतती हैं। दूसरी बात यह है कि जैसी आक्रामकता पश्चिम में है वैसी अपने यहां नहीं। मैंने अपना आधा जीवन मेडिकल कालेज अस्पतालों में और आधा मानसिक आरोग्यशालाओं में कार्य करते हुए बिताया है। मैं आधी रात के वक्त भी किसी मेंटल हास्पीटल में बेहिचक अकेले जा सकता हूं, बिल्कुल निडर होकर। पश्चिम के किसी मेंटल हास्पीटल में मैं दिन में भी जाने का साहस नहीं कर सकता। आक्रामक मरीजों से बचने के लिए वहां काफी सुरक्षा-व्यवस्था होती है। सुरक्षा के लिए कर्मचारी तैनात होते हैं। दीवारों पर जगह-जगह आईने लगे होते हैं, ताकि आप पीछे से हमला करनेवाले को देखकर सतर्क हो सकें। ऐसे एहतियात बेहद जरूरी है क्योंकि वहां मरीज के हाथों मरीज या कर्मचारी की हत्या की या आपसी मारपीट की घटनाएं घटती रहती हैं।
हाल के परिवर्तनों के बावजूद भारत संयुक्त परिवारों का देश है। संयुक्त परिवार व्यक्ति को सहारा तो देते ही हैं किंतु कई बार व्यक्ति की निजता और स्वतंत्राता को बाधित कर तनाव भी पैदा करते हैं। संयुक्त परिवार मनोरोग का कारक है या निवारक?
भारत परिवारों का देश है। परिवार एक अद्भुत संस्था है। यह रोगियों को सहारा और सुरक्षा तो देता ही है, वह हमें तकलीफ उठाने के लिए प्रशिक्षित भी करता है। परिवार का एक सदस्य दूसरे सदस्य की तकलीफों और जिम्मेवारियों को कर्तव्य समझकर उठा लेता है। इससे एक बेरोजगार और अनुत्पादक रोगी को राहत मिलती है। दूसरी खास बात यह है कि परिवार जीवन मूल्यों की शिक्षा देता है। अच्छे जीवन मूल्यों की शिक्षा की मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्रा में बड़ी भूमिका है मगर यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि परिवार टूट रहे हैं और पारिवारिक भावनाओं का द्द्वास हो रहा है।
कोई भी संस्था एक दूसरे के विचारों को समझने और सहने से चलती है। जो ये कहते हैं कि संयुक्त परिवार में आजादी नहीं होती है, दरअसल वे किसी और के लिए त्याग नहीं करना चाहते। परिवार में टूटन स्वार्थ और त्याग न करने की प्रवृति के कारण तो होती ही है, कई बार परिवार का आकार बहुत बढ़ जाने के कारण भी होती है। इन दिनों हमारे ऊपर पश्चिम का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। शायद इसलिए भी एकल परिवारों की संख्या बढ़ रही है। हमें इन स्थितियों से निपटने की तैयारी करनी होगी।
यह दैत्याकार मास मीडिया का समय है। मास मीडिया के असर से लोग मस्त और व्यस्त तो हैं ही, त्रास्त भी हैं। क्या मानसिक स्वास्थ्य पर भी मास मीडिया का प्रभाव पड़ रहा है? यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि मास मीडिया का प्रभाव मनुष्य के मन पर पड़ता है। बहुत सारे शोध बताते हैं कि मीडिया हमारे विचारों और प्रवृत्तियों में बदलाव लाता है।
दुनिया में कोई भी व्यक्ति बिना ÷आइडियॉलॉजी' के नहीं होता। मास मीडिया के पास भी अपनी आइडियॉलॉजी होती है। पर जब वह एक नयी ÷आइडियॉलॉजी' के तहत चीजों को बेचने पर उतारू हो जाता है तो एक द्वन्द्व पैदा होता है। इस द्वन्द्व का असर लोगों पर भी पड़ता है। लोग दुविधा की स्थिति में आ जाते हैं कि कौन-सा अर्थ ग्रहण करें। एक उदाहरण देता हूं। एड्स से बचाव का एक विज्ञापन है÷जब चलो, कांडोम साथ लेकर चलो'। आप क्या संदेश देना चाहते हैंबचाव का या ÷फ्री सेक्स' का। यह विज्ञापन सावधानी से अधिक सेक्स के लिए प्रेरित करता प्रतीत होता है। एक तरफ आप लोगों को सावधानी के नाम ÷फ्री सेक्स' के लिए प्रेरित कर रहे हैं, और दूसरी तरफ परेशान हो रहे हैं कि एड्स बढ़ रहा है। ऐसे विज्ञापन कांडोम बनानेवाली मल्टीनेशनल कंपनियों के दबाव में बनते हैं।
मनोचिकित्सा के क्षेत्रा में ही देखिए। कोई दवा किसी खास रोग के लिए विकसित और परीक्षित होती है। मगर कंपनियां प्रायोजित शोधों के आधार पर कहती हैं कि यह दवा अन्य बीमारियों में भी उपयोगी है। उनकी रुचि बीमारी और उसके इलाज से ज्यादा दवा की बिक्री में होती है। ऐसा ही मीडिया के साथ है। उन्हें लोगों से ज्यादा उत्पादों की बिक्री की फिक्र है। वे विज्ञापनों की बमबारी से लोगों के विचारों और स्वभाव को खास दिशा में मोड़ने की कोशिश करते हैं। मीडिया के मानसिक प्रभावों को स्पष्ट करने के लिए एक कंट्रोल्ड स्टडी (तुलनात्मक अध्ययन) का उदाहरण देता हूं। इस अध्ययन में तीन समुदाय लिये गए। एक जिस में आत्महत्या की घटनाओं की सामान्य रिपोर्टिंग होती थी, दूसरा जिसमें बढ़ा-चढ़ाकर और तीसरा जिसमें बिल्कुल नहीं होती थी। अध्ययन का निष्कर्ष यह निकलता है कि जहां बढ़ा-चढ़ाकर रिपोर्टिंग होती है, वहां आत्महत्या की दर बढ़ जाती है और जहां-जहां कोई रिपोर्टिंग नहीं होती वहां घट जाती है। ऐसे ही प्रमाण हिंसक व्यवहारों की व्याख्या के लिए भी उपलब्ध हैं।
अमेरिकन एकैडमी फॉर चाइल्ड एंड ऐडोलेसेन्ट सायकाएट्री का एक प्रस्ताव था कि जिस प्रकार माता-पिता यह तय करते हैं कि बच्चे क्या खाएं, उसी प्रकार उन्हें यह तय करने का हक होना चाहिए कि बच्चे क्या देखें। हालांकि अकेडेमी इसमें सफल नहीं हुई, मगर उसने मुद्दा तो उठाया ही कि बच्चे क्या देखें, इसे मीडिया तय करे या माता-पिता। इस मुद्दे पर जागरूकता हो रही है जिसे बढ़ाने और कार्यान्वित करने की जरूरत है।
÷मनोवेद' के प्रकाशन पर आपकी राय?
पहली बात तो यह कि इसकी जरूरत है। दूसरी बात यह कि आप किस ÷आइडियॉलॉजी' पर चलते हैं यह महत्त्वपूर्ण है क्योंकि हर गतिविधि के पीछे कोई ÷आइडियॉलॉजी' जरूर होती है। आजकल जैसे एन.जी.ओ. आ रहे हैं, मैं उनके पक्ष में नहीं हूं। पुराने जमाने के संगठनों जैसे रामकृष्ण मिशन, ईसाई मिशनरियां, आर्य समाज आदि के पास एक सिद्धांत था, समाज तक सकारात्मक संदेश पहुंचाने का। मैं ऐसे एन.जी.ओ. के पक्ष में हूं। तीसरी बात यह है कि अति महत्त्वाकांक्षी नहीं होना चाहिए। ऐसे प्रोजेक्ट बनाने चाहिए जो व्यावहारिक हों। छोटे-छोटे समुदायों का अध्ययन करना चाहिए। किसी खास प्रयास से उस समुदाय के व्यवहार में क्या परिवर्तन आया इसका आकलन करना चाहिए। यह कार्य आप कर सकते हैं।
÷मनोवेद' के प्रवेशांक के पाठकों के लिए आपका संदेश।

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