| निःशब्द-2 |
अंधेरे में उतरती कविता
डॉ. विनय कुमार
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हमारे समय के शहरी और कस्बाई भारत में प्रेम पर चर्चा कोई अजूबा नहीं है। महामायावी मीडिया की कृपा से हम तरह-तरह के प्रेम पर होनेवाली तरह-तरह की चर्चाओं के अनिवार्य घेरे में हैं। मोनिका-क्लिंटन और जूली-मटुकनाथ जैसी कथाएं चाट मसाले की तरह हमारे खाने की प्लेटों में अनिवार्य रूप से छिड़की जा रही हैं और चूंकि हम भूखे नहीं रह सकते इसलिए उसे चखने को विवश हैं। प्रेम का हो या न हो यह ÷प्रेम' के अहर्निश उच्चारण से उठनेवाले शोर का समय अवश्य है और ऐसे समय में आई है एक फिल्म ÷निःशब्द''। एक ÷टीन' (युवती) और एक वक्त की मार से छीजे हुए ÷टीन' (वृद्ध) की प्रेमकथा लेकर।
इस फिल्म के पहले इस पर चर्चाएं आईं और खूब आईं, जिनका लुब्बोलुबाब यह था कि भारत बदल रहा है-इंडिया प्वायज्ड टु बिकम बोल्ड एण्ड ब्युटिफुल, देखो तो सही क्या मणिकांचन संयोग है-ओल्ड्र बिग बी और कमसिन ब्यूटिफुल जिया। सुपर स्टार की लोलितागिरी। जिया देखोगे तो जिया धड़क-धड़क जाएगा। तो ÷निःशब्द' से पहले आई शब्दों की भीड़ इश्तेहार की तख्+तियां उठाए। और जब फिल्म आई तो आई और आकर चली गई। पटना में मटुक-जूली का तड़का भी भीड़ न बटोर पाया।
दरअसल ÷निःशब्द' आकर्षण और प्रेम से अधिक त्राासदियों की कथा है। नायिका एक खंडित परिवार से आती है। पिताओं से भरे समाज में वह पिता के प्रेम से वंचित है। यह अभाव उसके मनोयौनिक (सायको सेक्सुअल) विकास में अपनी भूमिका निभाता है। चूंकि किसी चीज+ की इच्छा उसकी कमी से ही पैदा होती है इसलिए उसके अचेतन में पितृपुरुष के लिए चाह का मौजूद होना कोई अजूबा नहीं। यहां प्रश्न उठता है कि उसने सहेली के पिता को पिता की तरह क्यों नहीं चाहा। ऐसा इसलिए कि वह पिता-पुत्राी के संबंधों के व्याकरण से अनभिज्ञ थी। हर शिशु नर या मादा पैदा होता है। संबंधों की समझ तो परिवार और परिवेश के साथ ÷इंटरएक्शन' से विकसित होती है। नायिका की समस्या यह है कि जब संयोग उसे अबाधित एकांत में नायक को समझने का अवसर प्रदान करता है और उसके अचेतन से पितृपुरुष को पाने की इच्छा सिर उठाती है तो वह स्वयं को एक पुत्राी की तरह अभिव्यक्त नहीं कर पाती क्योंकि उसे वह मनोजैविक भाषा ही नहीं पता जिसमें एक पुत्राी अपने पिता से बात करती है। उसकी इच्छा उसके बचपने के अभाव से उठती है, मगर व्यक्त होती है युवा भाषा में। यह त्राासदी नहीं तो और क्या है! नायक अपनी तरह की त्राासदी का शिकार है, विवाहित होकर दाम्पत्य प्रेम से वंचित। दाम्पत्य की विडम्बना यह है कि वह प्रेमहीन होकर भी संतानवान हो सकता है। नायक तृप्त पिता है मगर एक अतृप्त पुरुष। फिल्म में संयोग उसके अतृप्त पुरुष का कद इतना बढ़ा देता है कि पिता बौना हो जाता है। अतृप्त पुरुष की भाषा के शोर में पिता की भाषा खो जाती है। अगर सही-गलत के पारंपरिक और समाजसम्मत नजरिये से सोचें तो यह दायित्व नायक का ही था कि वह नायिका के हित में सही भाषा में बात करता। क्योंकि नायिका भले ही पुत्राी की भाषा नहीं जानती थी, नायक तो पिता की भाषा जानता था। वह निःशब्द की ÷जिया' के मोह को गुड्डी की ÷जया' के मोह की तरह भंग कर सकता था। मगर इच्छाओं को बहकाते-दहकाते ग्लोबलाइज्ड समाज में यही, शायद यही हो सकता था। यह त्राासदी नहीं तो और क्या है।
अगर मिथकों पर रत्ती-भर भी यकीन करें तो मानना होगा कि भारत शांतनु और ययाति का देश है। स्मरण है कि कमसिन काया लोलुप-राजाओं की वासना को सैद्धांतिक आधार प्रदान करने के लिए लोभी शास्त्राकारों ने सोलह की उम्र को अक्षत सौंदर्य के भोग का प्रवेशद्वार घोषित कर दिया था। ÷स्वीट सिक्सटीन' का जुमला तो बहुत बाद की चीज+ है। आज चिकित्सा विज्ञान 16 की उम्र को मनोजैविक दृष्टिकोण से अपरिपक्व मानता है। 16 और 18 में फासला ही कितना है। ÷निःशब्द' के बहाने से ही सही, यहां यह कहना होगा कि 18 वर्षीय युवती के लिए 60 वर्ष के पुरुष के मन में उमड़ा प्रेम उस कंगन की तरह होता है, जिसके सहारे वह पंचतंत्रा के बूढ़े शेर की तरह अपने शिकार को फंसाने की कोशिश करता है। मीडिया और जूली को मटुक जी भी ÷निःशब्द' के नायक की तरह अपने दाम्पत्य-जीवन को असफल मानते हैं।
यहां उनसे यह जानना दिलचस्प होगा कि जूलीगिरी उनकी आदत तो नहीं। ÷सठियाना' एक फब्ती-भर नहीं है। बढ़ती उम्र के लोगों की रक्त नलिकाएं संकरी हो जाती हैं, इस कारण मस्तिष्क में रक्त-संचार कम हो जाता है। कभी-कभी मस्तिष्क में फैली रक्त-नलिकाओं में थक्का बन जाता है और मस्तिष्क के किसी हिस्से को रक्त मिलना बंद हो जाता है। अगर यह दुर्घटना मस्तिष्क के ÷फ्रंटल लोब' नामक हिस्से में घटित होती है, तो ग्रसित व्यक्ति वर्जनाहीन/अनैतिक व्यवहार कर सकता है। ÷जूलियों' को ÷मटुकों' से प्यार करने से पहले उनके मस्तिष्क का सीटी स्कैन कराकर देख लेना चाहिए कि ÷फ्रंटल लोब' सिकुड़ तो नहीं रहा। सनद रहे कि छाती में धड़कनेवाला दिल एक पंपिंग सेट-भर है, वह दिल जो भावनाओं का केंद्र है, उसका निवास मस्तिष्क में ही होता है।
अब जरा इस मुद्दे को ग्लोबलाइज्ड परिदृश्य में रखकर देखें। आज विश्वविधाता का पर्याय विश्व बैंक हो गया है और भारत भाग्यविधाता का दलाल स्ट्रीट। वित्त मंत्राालय शिक्षा मंत्राालय से अधिक महत्त्वपूर्ण है। 21वीं सदी में अर्थ के पास हर अनर्थ के लिए जस्टिफिकेशन है। यह बदलाव क्या पुरुष तक आकर रुक गया है। नहीं, कतई नहीं। पश्चिम का उपदेश अब भारत में भी फैल रहा है कि-अधेड़ और बूढ़े प्रेमी ÷सेफ' होते हैं। ज्ञातव्य है कि सेफ के दो अर्थ प्रचलित हैं-सुरक्षित और तिजोरी।
60 और 18 का अंतराल सिर्फ उम्र का अंतराल नहीं होता, यह ऊर्जा, क्षमता और भविष्य का अंतराल भी होता है। टेस्टोस्टेरोन नामक पुरुष हारमोन 25 वर्ष में अपने शिखर पर होता है जबकि 60 की उम्र में घाटी में घिसटता दिखता है। प्लैटोनिक प्रेम तो हारमोन की मदद के बगैर भी शिखर पर पहुंच सकता है, मगर प्लैटोनिक फेज खत्म होने के बाद क्या होगा-यह भी सोचा जाना चाहिए। अब आएं भविष्य पर।
18 की उम्र के भविष्य का अर्थ है सुबह के आठ बजे और 60 का शाम के पांच बजे। 60 वाला तो डूब जाएगा 18 वाली का दिन कैसे कटेगा। इसे भी सोचा जाना चाहिए।
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