अंधविश्वासों पर चोट करती कविता
डॉ. विनय कुमार
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मनोरोगों के बावजूद साहित्य में लेखकीय योगदान करनेवालों की सूची काफी लंबी है। इस अंक में हम दो कवयित्रिायों की रचनाएं दे रहे हैं। पेरिया परसिया उर्फ परी की यह कविता बहुत कड़वे और त्राासद यथार्थ को भोगने के जानलेवा सफर से उपजी है।
एक अज्ञात और मनोरोगी कवि की इतनी संतुलित और प्रौढ़ रचना पर एक मित्रा ने मुझसे पूछा कि क्या एक मनोरोगी ऐसी कविता लिख सकती है। चूंकि मनोरोग को असंतुलन का पर्याय समझा जाता है, इसलिए यह प्रश्न स्वाभाविक है। उनके इस प्रश्न का संपूर्ण उत्तर एक किताब की शक्ल में ही संभव हो सकता है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि रचनात्मकता व्यक्ति की क्षमता होती है और सारे मनोरोग व्यक्ति की सभी क्षमताओं को पूरी तरह नष्ट करनेवाले नहीं होते। मनोरोग और आत्महत्या के शिकार विश्व के कई लेखकों ने संतुलित ही नहीं विश्वस्तरीय लेखन किया है। रही बात परिपक्वता की तो वह इस बात पर निर्भर है कि परिपक्वता पहले आई या मनोरोग पहले हुआ। मनोरोग से उबरकर भी परिपक्वता प्राप्त की जा सकती है। नोबेल पुरस्कार विजेता गणितज्ञ जॉन नैश ने रोग के नियंत्रिात हो जाने के बाद कई महत्त्वपूर्ण शोध किए। ज्ञातव्य है कि नैश स्क्जि+ोफ्रेनिया के मरीज हैं और प्रिंसटन (अमेरिका) में रहते हैं। इतना तय है कि सायकोटिक फेज में संतुलित और सार्थक रचना संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में फार्म और कंटेंट दोनों पर मनोविकृतियों के दुःप्रभाव पड़ेंगे। जहां तक ÷परी' का सवाल है तो पुस्तिका के पाठ से उपलब्ध सूचनाओं और कविता की पड़ताल से अनुमान लगता है कि कवयित्राी ने रचना-प्रविधि और कविता की समझ में महारत पहले हासिल की और कालांतर में अपनी ÷हिमाकत' के कारण बाहरी दबावों को झेलने के लिए विवश हुई। इसकी तुलना एक आइने से की जा सकती है जो पत्थरों के शहर में अंतस में कौंधते अक्स के स्रोत को पाने की कोशिश में भागे और चूर हो जाए। एक काव्य-साधन-संपन्न कवि अगर मनोरोग और अस्पताल के अनुभवों से भोक्ता बनकर गुजरे और इलाज की प्रक्रिया उसके ÷लूजनिंग ऑफ असोशिएसंस' (विचारों की उच्छृंखलता) में कमी ला दे तो ÷यवन की परी' का रचा जाना संभव है। यह कविता एक लड़ती हुई औरत की ही नहीं, एक मनोरोगी की भी आवाज है। यह आवाज मनोरोग से जुड़े कई अंधविश्वासों पर प्रहार करती है। यह कविता ÷पेरिया' की रोगमुक्ति की घोषणा है और अगर उसने सचमुच आत्महत्या कर ली है तो यह उसके परिवार, मित्राों, समाज और अस्पताल की चिकित्सा व्यवस्था की विफलता है।
साहित्य और मनोचिकित्सा दो अलग विधाएं हैं। इनमें जीवन को देखने, जानने और समझने के औजार अलग-अलग हैं। ÷पेरिया' जो कि ÷पारानॉयड' स्टेज में है, उसे अस्पताल का वातावरण शत्राुवत् लगता है तो कोई अचरज की बात नहीं। अस्पताल आसमान में नहीं होते और न ही चिकित्सक फरिश्ते। विविध प्रकट और प्रच्छन्न शत्राुओं से डरा हुआ मन किसी के भी प्रति सशंक हो उठता है। खासतौर से उन लोगों के प्रति जो मरीज की मर्जी के खिलाफ आचरण करते हैं। स्किजोफ्रेनिया अपने शिकार से उसकी अंतर्दृष्टि (इनसाइट) छीन लेता है। रोग की जकड़न से विवश मन यह नहीं समझ पाता कि उसे हुआ क्या है। उसे लगातार यही लगता है कि वह तो ठीक है, उसे गड़बड़ समझनेवाले लोग ही गलत हैं। इस कविता के ÷डाक्टरों और नर्सों के सिर गायब हैं, वे ÷परी' को ÷मार डालने के आदी हो गए हैं' और नर्स के पांवों तले दबकर एक चींटी मर जाती है। बीमार परी से हम ÷दूध का दूध और पानी का पानी' की उम्मीद नहीं कर सकते। हर फोड़ा नश्तर को दुश्मन समझता है।
कोई भी अच्छी कविता एक ही अर्थ नहीं रखती। अभिधा से ऊपर उठकर देखें और अस्पताल को भी उसी समाज का हिस्सा मानें जिसमें परी के पति और एडीटर रहते हैं तो कविता एक नए धरातल पर नए अर्थों के साथ खुलती है।
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